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रविवार, मार्च 31, 2013

राजकोषीय घाटे का हव्वा

राजकोषीय घाटे में कटौती के लिए सरकार इतनी बेचैन क्यों है? 

दूसरी और आखिरी क़िस्त 
वित्त मंत्री का तर्क है कि राजकोषीय घाटा बढ़ने से सरकार पर कर्ज बढ़ता है. इसके ब्याज में कीमती संसाधन जाया होते हैं. दूसरे, इसकी भरपाई के लिए सरकार बाजार में कर्ज लेने उतरती है और उसके कारण न सिर्फ ब्याज दरें बढ़ जाती हैं बल्कि निजी क्षेत्र को निवेश के लिए सस्ती दरों पर कर्ज नहीं मिल पाता है.
तीसरे, इससे अनावश्यक उपभोग बढ़ता है और मुद्रास्फीति बढ़ने लगती है. चौथे, सरकार अपनी अक्षमताओं और भ्रष्टाचार के कारण पैसे का दुरुपयोग करती है. लेकिन ये सभी तर्क बहुत कमजोर और एक विकासशील अर्थव्यवस्था के लिए बेमानी हैं.
सच यह है कि राजकोषीय घाटे को काबू में रखने की मांग आवारा विदेशी पूंजी की ओर से आती रही है क्योंकि उन्हें मुद्रास्फीति बढ़ने से अपने निवेश की कीमत घटने का अंदेशा सताता रहता है.
तथ्य यह है कि दुनिया भर में विकासशील अर्थव्यवस्थाओं में राजकोषीय घाटा आम बात रही है. विकसित अर्थव्यवस्थाओं ने भी अपने शुरूआती दौर में राजकोषीय घाटे के जरिये ही विकास सम्बन्धी जरूरतें पूरी कीं और विकास की बुनियाद रखी. दूसरे, राजकोषीय घाटे को पूरा करने के लिए लिया गया कर्ज घरेलू और दीर्घकालिक है तो उसमें चिंता की कोई बात नहीं है.

तीसरे, राजकोषीय घाटे को बढ़ाकर किये जानेवाले सार्वजनिक निवेश से निजी निवेश बढ़ता है क्योंकि उससे मांग बढ़ती है. चौथे, राजकोषीय घाटे के कारण मुद्रास्फीति आमतौर पर उस समय बढ़ती है जब मांग के अनुपात में आपूर्ति नहीं होती है.

इसलिए इसके लिए सिर्फ राजकोषीय घाटे को जिम्मेदार ठहराना सही नहीं है. लेकिन जैसे हर चीज की अति बुरी होती है, वैसे बहुत अधिक राजकोषीय घाटा भी अच्छा नहीं है.
सवाल यह है कि क्या भारत में राजकोषीय घाटा खतरे की सीमा पार कर गया है? तथ्य यह है कि इस समय अधिकांश देशों में राजकोषीय घाटा जी.डी.पी ५ से ७ फीसदी के आसपास है. इसलिए भारत में राजकोषीय घाटे का हौव्वा खड़ा करना तथ्यों के विपरीत है.
दूसरे, भारत में राजकोषीय घाटे का बड़ा हिस्सा आंतरिक संसाधनों से पूरा किया जाता है. ताजा आर्थिक सर्वेक्षण के मुताबिक, केन्द्र सरकार पर कुल कर्ज ४४६८७१४ करोड़ रूपये है जो जी.डी.पी का ५० फीसदी के आसपास है. इसकी तुलना में दुनिया के कई विकसित और विकासशील देशों में कर्ज-जी.डी.पी अनुपात १०० से लेकर १५० फीसदी तक पहुँच चुका है. इस लिहाज से भारत में स्थिति इतनी गंभीर नहीं है जितना कि हौव्वा खड़ा किया जाता है.
तीसरे, इस कर्ज का ७६.३ प्रतिशत सार्वजनिक कर्ज है जिसमें ९०.९ फीसदी आंतरिक कर्ज है. घरेलू कर्ज होने के कारण भारत वैश्विक पूंजी बाजार की उथल-पुथल से काफी हद तक संरक्षित है. यही नहीं, कुल कर्ज में सिर्फ १.८ फीसदी कर्ज ही फ्लोटिंग ब्याज दर पर लिया गया है, बाकी कर्ज फिक्स्ड ब्याज दर पर है.

साफ़ है कि राजकोषीय घाटे का हौव्वा यू.पी.ए सरकार अपनी सामाजिक जिम्मेदारियों से बचने, आमलोगों पर अधिक से अधिक बोझ डालने और बड़ी विदेशी पूंजी के मुनाफे की गारंटी के लिए खड़ा कर रही है.

सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर यू.पी.ए सरकार को राजकोषीय घाटे की इतनी ही चिंता है तो वह खर्चों में कटौती और आमलोगों पर बोझ डालने के बजाय आय बढ़ाने का विकल्प क्यों नहीं आजमाती है? खासकर इस तथ्य के मद्देनजर कि भारत दुनिया के चुनिन्दा देशों में है जहाँ टैक्स-जी.डी.पी अनुपात कम है.
खुद वित्त मंत्री ने स्वीकार किया है कि भारत में टैक्स-जी.डी.पी अनुपात बढ़ाने की गुंजाइश है. तथ्य यह है कि भारत में वर्ष ११-१२ में टैक्स-जी.डी.पी अनुपात ९.१ फीसदी था जो वर्ष २००७-०८ के टैक्स-जी.डी.पी अनुपात ११.९ फीसदी २.८ फीसदी कम है. दूसरी ओर, बहुतेरे विकासशील देशों में टैक्स-जी.डी.पी अनुपात १५-२० फीसदी के बीच है.
इस तरह अगर भारत अगर २००७-०८ के स्तर को ही हासिल कर ले तो कोई तीन लाख करोड़ रूपये सरकारी खजाने में आ सकते हैं. अगर वह दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों के स्तर तक पहुँच जाए तो एक झटके में राजकोषीय घाटा पूरी तरह से खत्म हो जाएगा.
लेकिन यू.पी.ए सरकार सरकार की आय बढ़ाने के बजाय अमीरों, आवारा विदेशी पूंजी और बड़े देशी-विदेशी कार्पोरेट्स को टैक्स में छूट/रियायतों के जरिये हर साल ५.५० लाख करोड़ रूपये से अधिक की सब्सिडी दे रही है.

यही नहीं, ताजा बजट से पहले अमीरों पर टैक्स की बहस चलवाने के बाद चिदंबरम ने एक करोड़ रूपये से अधिक की आयवाले लोगों के टैक्स पर १० फीसदी का सरचार्ज लगाने का प्रस्ताव यह कहते हुए किया है कि यह सिर्फ एक साल के लिए हैं.

हालाँकि यह सरचार्ज उनके टैक्स दर को सिर्फ तीन प्रतिशत बढाता है जबकि इसमें ५ से १० फीसदी की बढ़ोत्तरी होनी चाहिए थी. दूसरे, क्या यह बढ़ोत्तरी ५० या २० लाख सालाना से अधिक आयवाले करदाताओं पर नहीं होनी चाहिए थी?

उल्टे वित्त मंत्री ने कार्पोरेट्स को निवेश के लिए १५ प्रतिशत का अतिरिक्त प्रोत्साहन देकर सरकारी खजाने को २५ हजार करोड़ रूपये संभावित आय गँवा दी. मजे की बात यह है कि कारपोरेट क्षेत्र पर अधिकतम ३० फीसदी की टैक्स दर के बावजूद तमाम छूटों/रियायतों के कारण कारपोरेट टैक्स की वास्तविक प्रभावी दर मात्र २२ फीसदी रह जाती है.
लेकिन गरीबों और आमलोगों पर बोझ डालने में जुटे वित्त मंत्री अमीरों और कार्पोरेट्स पर मामूली बोझ डालने में भी न जाने क्यों घबराते हैं? यही नहीं, चिदंबरम ने शेयर बाजार में शेयरों की खरीद-बिक्री पर लगनेवाले एस.टी.टी की दर में भी कटौती कर दी. उन्होंने उत्तराधिकार कर लगाने से भी एक बार फिर परहेज किया.
कहने की जरूरत नहीं है कि इस बजट से यू.पी.ए सरकार की प्राथमिकताएं और पक्षधरता और उजागर हो गई है. इस सरकार की प्राथमिकता का अंदाज़ा इसी से चल जाता है कि खाद्य सुरक्षा के लिए सिर्फ १० हजार करोड़ रूपये का अतिरिक्त प्रावधान किया गया है लेकिन रक्षा बजट में सिर्फ हथियारों की खरीद पर ८६७४० करोड़ रूपये का प्रावधान किया गया है.

यही नहीं, कुल रक्षा बजट को चालू वित्तीय वर्ष के १७८५०३ करोड़ रूपये से बढ़ाकर २०३७६२ करोड़ रूपये कर दिया गया है. अफ़सोस यह कि यह एक गरीब देश का रक्षा बजट है. अगर इस साल के बजट में स्वास्थ्य, कृषि, महिला-बाल कल्याण, आदिवासी और अल्पसंख्यक कल्याण मंत्रालयों के योजना बजट को जोड़ लिया जाए तो वह ८७९३४ करोड़ रूपये होता है जो हथियारों की खरीद के बजट के लगभग बराबर है.

इसी तरह अगर शिक्षा और स्वास्थ्य के योजना बजट को जोड़ा जाए तो वह ९८६०२ करोड़ रूपये होता है जो हथियारों की खरीदद के बजट से सिर्फ १२ हजार करोड़ रूपये ज्यादा है. इससे यू.पी.ए सरकार की राजनीति की प्राथमिकताओं का अनुमान लगाया जा सकता है. हथियारों की खरीद के इतने विशाल बजट का राज क्या है?
क्या यह भाजपा के राष्ट्रवादी एजेंडे का जवाब और खुद को बड़ा राष्ट्रवादी साबित करने के लिए है या हथियारों की खरीद में मिलनेवाले भारी कमीशन की लालच में है? कारण चाहे जो हो लेकिन इस सवाल का क्या जवाब है जब देश आर्थिक संकट में फंसा है और राजकोषीय घाटे को कम करने की चिंता है तो हथियारों की खरीद पर इतना खर्च करने का क्या औचित्य है?
इस तरह वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने एक बार फिर बजट में गरीबों, दलितों, महिलाओं, आदिवासियों, अल्पसंख्यकों और युवाओं की दुहाई देते हुए आम आदमी पर बोझ बढाने और अमीरों, कार्पोरेट्स और आवारा विदेशी पूंजी को तोहफे देने की नव उदारवादी अर्थनीति को आगे बढ़ाया है.

इससे न तो महंगाई पर अंकुश लगनेवाला है, न अर्थव्यवस्था की स्थिति सुधरनेवाली है और न ही युवाओं को रोजगार मिलनेवाला है. यह आर्थिक संकट को और बढ़ाएगा और फिर उसका सारा बोझ आम आदमी पर डाला जाएगा. साफ़ है कि आम आदमी की सरकार किसके लिए काम कर रही है?

('समकालीन जनमत' के मार्च'१३ अंक में प्रकाशित टिप्पणी की अंतिम क़िस्त। पहली क़िस्त ४ मार्च को छप चुकी है)  

सोमवार, मार्च 04, 2013

कार्पोरेट्स और बड़ी पूंजी के लिए है आम आदमी की सरकार का बजट

आम आदमी के हितों पर हावी वित्तीय कठमुल्लावाद

पहली क़िस्त

जैसीकि आशंका थी, यू.पी.ए-२ सरकार का आखिरी बजट भी आवारा विदेशी पूंजी और उसके लठैतों- वैश्विक क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों को समर्पित है. वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने बजट में उन्हें खुश करने के लिए कोई कोर कसर नहीं उठा रखा. उन्होंने इसे छुपाने की कोशिश नहीं की है. अपने बजट भाषण में चिदंबरम ने साफ़-साफ़ कहा कि देश की मौजूदा आर्थिक स्थिति खासकर चालू खाते के घाटे की भरपाई के लिए विदेशी पूंजी को लुभाने के अलावा कोई विकल्प नहीं है और वह अनिवार्य है.
नतीजा यह कि बजट में विदेशी आवारा पूंजी को खुश करने के लिए उसे न सिर्फ और रियायतें दी गईं हैं बल्कि उसकी सबसे बड़ी मांग राजकोषीय घाटे को कम करने को पूरा करने के लिए सब्सिडी से लेकर योजना बजट में कटौती करने से भी संकोच नहीं किया गया है.
यही नहीं, वित्त मंत्री पी. चिदंबरम बड़ी देशी-विदेशी पूंजी को खुश करने के लिए कितने बेताब हैं, इसका अंदाज़ा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि बजट के बाद जब शेयर बाजार लगभग ३०० अंक गिर गया तो अगले दिन खुद वित्त मंत्री सफाई देने के लिए आगे आए कि मारीशस के रास्ते निवेश करनेवालों की नागरिकता पर कोई सवाल नहीं पूछा जाएगा.

इसके साथ ही आर्थिक सुधारों और सब्सिडी में कटौती के प्रति वचनबद्धता को साबित करने के लिए उसी दिन पेट्रोल की कीमतों में प्रति लीटर १.६० रूपये वृद्धि की घोषणा की गई. उल्लेखनीय है कि चिदंबरम ने आवारा और देशी-विदेशी बड़ी पूंजी को खुश करने के लिए वित्त मंत्रालय संभालने के बाद सबसे पहले टैक्स से बचने के तौर-तरीकों पर अंकुश लगानेवाले गार नियमों को स्थगित कर दिया था.

ध्यान रहे कि गार का एलान पूर्व वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने किया था. यही नहीं, चिदंबरम ने प्रणब मुखर्जी के वोडाफोन पर टैक्स लगाने के फैसले को भी ठंडे बस्ते में डाल दिया था. जाहिर है कि ये सभी फैसले विदेशी निवेशकों को खुश रखने के नामपर किये गए. उसके बाद विदेशी पूंजी को आकर्षित करने के लिए खुदरा व्यापार से लेकर बीमा-पेंशन क्षेत्र को विदेशी पूंजी के लिए खोलने से लेकर विदेशी संस्थागत निवेशकों (एफ.आई.आई यानी आवारा विदेशी वित्तीय पूंजी) को कई रियायतें/छूट दी गईं.
यही नहीं, बजट पेश करने से ठीक पहले जनवरी महीने में चिदंबरम विदेशी वित्तीय पूंजी के प्रमुख केन्द्रों- हांगकांग, सिंगापुर, लन्दन और फ्रैंकफर्ट में खास तौर पर बड़े विदेशी निवेशकों, बड़े फंड मैनेजरों और निवेश बैंकों के प्रतिनिधियों को भरोसा दिलाने गए कि बजट में उनके हितों और मांगों का पूरा ध्यान रखा जाएगा.
जाहिर है कि बजट से पहले ही बजट की प्राथमिकताएं तय हो चुकी थीं. यू.पी.ए सरकार ने तय कर लिया था कि चुनावों से पहले देशी-विदेशी बड़ी पूंजी और कार्पोरेट्स को खुश करना और उनका भरोसा जीतना ज्यादा जरूरी है. असल में, कांग्रेस नेतृत्व देशी-विदेशी कार्पोरेट्स के भाजपा में प्रधानमंत्री के दावेदार और गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के पक्ष में खुलकर खड़े होने से बेचैन और घबराया हुआ है.

यह भी किसी से छुपा नहीं है कि देशी-विदेशी कार्पोरेट्स यू.पी.ए सरकार पर आर्थिक सुधारों को तेजी से आगे बढ़ाने में नाकाम रहने के कारण ‘नीतिगत लकवे’ का आरोप लगाते रहे हैं. नतीजा, यू.पी.ए सरकार ने पिछले छह महीनों में देशी-विदेशी बड़ी पूंजी और कार्पोरेट्स का भरोसा जीतने के लिए आर्थिक सुधारों को आक्रामक तरीके से आगे बढ़ाया है.

इसलिए ताजा बजट को उसी प्रक्रिया की निरंतरता में देखा जाना चाहिए. इस बजट में वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने समावेशी विकास और महिलाओं, युवाओं, गरीबों, दलितों, आदिवासियों, पिछडों और अल्पसंख्यकों के हितों का ख्याल रखने की चाहे जितनी कसमें खाईं हों लेकिन सच यह है कि यू.पी.ए-२ सरकार का आखिरी बजट पूरी तरह से बड़ी आवारा विदेशी पूंजी और बड़े कार्पोरेट्स के हितों को समर्पित हैं.
आश्चर्य नहीं कि बजट में पेट्रोलियम से लेकर उर्वरक/खाद्य सब्सिडी पर कैंची चलाने और योजना बजट में न के बराबर वृद्धि करने जैसे फैसलों के जरिये राजकोषीय घाटे में कमी करने का गुलाबी मीडिया और बड़े कार्पोरेट्स ने स्वागत किया है.
हालाँकि वित्त मंत्री ने बजट भाषण में दावा किया कि यू.पी.ए सरकार का मूलमंत्र ‘समावेशी और स्थाई विकास के साथ उच्च विकास दर को हासिल करना है’ लेकिन सच यह है कि बजट का मूलमंत्र वित्तीय कठमुल्लावाद यानी किसी भी तरह से राजकोषीय घाटे में कटौती है.

एक ऐसे समय में जब अर्थव्यवस्था की विकास दर गिरकर ५ फीसदी रह गई है, वित्तीय कठमुल्लावाद से प्रेरित इस बजट के कारण यह आशंका बढ़ गई है कि अर्थव्यवस्था और गहरे संकट खासकर मुद्रास्फीति जनित मंदी (स्टैगफ्लेशन) की चपेट में न फंस जाए. कहने की जरूरत नहीं है कि बजट में राजकोषीय घाटे को कम करने पर हद से ज्यादा जोर देने के कारण कटौतियों की गाज सबसे अधिक गरीबों और हाशिए पर पड़े लोगों पर गिरी है.

उदाहरण के लिए, चिदंबरम ने अगले वर्ष के बजट में प्रमुख सब्सिडियों जैसे पेट्रोलियम उत्पादों, उर्वरक और खाद्य के बजट में लगभग २६८८४ करोड़ रूपये की कटौती कर दी है. उल्लेखनीय है कि चालू वित्तीय वर्ष (१२-१३) में इन तीनों मदों पर कुल सब्सिडी २४७८५३ करोड़ रूपये थी जिसे अगले वर्ष (१३-१४) घटाकर २२०९७१ करोड़ रूपये कर दिया गया है.
इसमें सबसे ज्यादा कटौती पेट्रोलियम सब्सिडी में की गई है जिसमें चालू वर्ष की तुलना में ३१८७९ करोड़ रूपये की कटौती करते हुए ९६८७९ करोड़ रूपये से घटाकर मात्र ६५००० करोड़ रूपये कर दिया गया है. इसका सीधा सा अर्थ यह है कि अगले साल भी पेट्रोलियम उत्पादों खासकर पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस की कीमतें बढ़ती रहेंगी.
इसी तरह बजट भाषण में वित्त मंत्री ने खाद्य सुरक्षा को ‘मूलभूत अधिकार’ और खाद्य सुरक्षा कानून के प्रति यू.पी.ए सरकार की वचनबद्धता का एलान करते हुए भी उसके लिए दिखावे के तौर पर दस हजार करोड़ रूपये दिए हैं. साफ़ है कि २००९ के चुनावों में वायदे के बावजूद यू.पी.ए सरकार खाद्य सुरक्षा कानून को लागू करने को लेकर बहुत उत्साहित नहीं है.

यही कारण है कि खाद्य सुरक्षा को सार्वभौम अधिकार बनाने और सबके लिए भरपेट भोजन की गारंटी करने से मुकर चुकी सरकार सीमित और आधे-अधूरे खाद्य सुरक्षा कानून को भी लागू करने और उसके लिए पर्याप्त बजट प्रावधान करने से कन्नी काट रही है. इससे साफ़ है कि खाद्य सुरक्षा के नामपर गरीबों खासकर भूखमरी के शिकार करोड़ों लोगों के साथ कितना बड़ा मजाक होने जा रहा है.

यही नहीं, यू.पी.ए सरकार मनरेगा की उपलब्धियों का ढिंढोरा पीटती रहती है. लेकिन ऐसा लगता है कि सरकार उसकी धीमी मौत का इंतजाम करने में लगी हुई है. उल्लेखनीय है कि मनरेगा का बजट दो साल पहले ४० हजार करोड़ रूपये था लेकिन पिछले दो बजटों से उसके बजट में सात हजार करोड़ रूपये की कटौती करके उसे ३३ हजार करोड़ रूपये कर दिया गया.
हालाँकि इसमें भी वर्ष ११-१२ में २९ हजार करोड़ और १२-१३ में भी २९ हजार करोड़ रूपये खर्च किये गए. अगले साल के बजट में भी चिदंबरम ने ३३ हजार करोड़ रूपये का आवंटन किया है. आश्चर्य नहीं कि मनरेगा में काम देने से लेकर भुगतान करने तक में देरी, अनियमितताओं और भ्रष्टाचार की शिकायतें बढ़ती जा रही हैं.
लेकिन इस बजट में सबसे अधिक गाज योजना बजट पर गिरी है. मजे की बात यह है कि चिदंबरम ने बजट भाषण में योजना बजट खासकर ग्रामीण विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य और कृषि के लिए भारी आवंटन का दावा किया है. लेकिन यह आंकड़ों की बाजीगरी के अलावा कुछ नहीं है.

सच यह है कि अगले साल के ज्यादातर बजट प्रावधानों को उन्होंने पिछले साल के बजट के संशोधित अनुमानों की तुलना में दिखाया है. इसके कारण शिक्षा, स्वास्थ्य, ग्रामीण विकास से लेकर कुल योजना बजट में वृद्धि ठीक-ठाक दिखती है.

असल में, चिदम्बरम ने पिछले साल अगस्त में वित्त मंत्रालय का कार्यभार संभालने के बाद सबसे पहले राजकोषीय घाटे पर नियंत्रण के नामपर चालू वित्तीय वर्ष (१२-१३) के बजट आवंटन में भारी कटौती कर दी.

नतीजा यह हुआ कि चालू वित्तीय वर्ष (१२-१३) के योजना बजट में जहाँ प्रणब मुखर्जी ने ५२१०२५ करोड रूपये का प्रावधान किया था, उसमें चिदंबरम ने ९१८३८ करोड़ रूपये की कटौती करके उसे मात्र ४२९१८७ करोड़ रूपये कर दिया. यह बजट प्रावधान की तुलना में लगभग १७.६२ फीसदी की कटौती है. दूसरे, यह वर्ष ११-१२ के योजना मद में हुए वास्तविक खर्च ४१२३७५ करोड़ रूपये से मात्र ४.०७ फीसदी अधिक है.
इस तरह अगर चालू वित्तीय वर्ष के योजना बजट अनुमान की तुलना अगले वित्तीय वर्ष के बजट अनुमान से करें तो चिदंबरम ने योजना बजट में सिर्फ ६.५७ फीसदी की वृद्धि की है. लेकिन अगर इस वृद्धि को मौजूदा ७ फीसदी की मुद्रास्फीति दर के सन्दर्भ में देखें तो साफ़ है कि योजना बजट में नकारात्मक वृद्धि हुई है.
लेकिन चिदंबरम ने चतुराई के साथ अगले वित्तीय वर्ष में योजना बजट के अनुमान को चालू वित्तीय वर्ष के संशोधित बजट से तुलना करते हुए पेश किया है जिसके कारण योजना बजट में लगभग २९ फीसदी की वृद्धि दिखाई देती है. सवाल यह है कि इस बात की क्या गारंटी है कि अगले साल भी योजना बजट में २९ फीसदी की वृद्धि के बावजूद उसमें आगे कटौती नहीं की जायेगी?

असल में, यह कोई नई बात नहीं है. पिछले कई वर्षों से वित्त मंत्री वाहवाही लूटने के लिए योजना बजट में भारी बढ़ोत्तरी का एलान करते हैं लेकिन वास्तव में उसे खर्च नहीं होने देते और घाटे की दुहाई देकर उसमें कटौती कर देते हैं. यह एक सुनियोजित रणनीति बन चुकी है.

सबसे अधिक चिंता की बात यह है कि योजना बजट में यह भारी कटौती उस साल की गई है, जब अर्थव्यवस्था घरेलू मांग और निवेश में गिरावट के कारण लड़खड़ा रही है, वृद्धि दर में गिरावट आ रही है और उसके गहरे संकट में फंसने का खतरा बढ़ता जा रहा है. लेकिन चिदंबरम ने अर्थव्यवस्था को खतरे में डालकर बड़ी देशी-विदेशी पूंजी खासकर आवारा पूंजी को खुश करने के लिए योजना बजट में कटौती की है.
इस समय जरूरत यह थी कि सरकार खुद अर्थव्यवस्था खासकर कृषि, इन्फ्रास्ट्रक्चर खासकर सामाजिक इन्फ्रास्ट्रक्चर यानी शिक्षा और स्वास्थ्य में भारी निवेश करती और उससे न सिर्फ युवाओं को रोजगार मिलता और अर्थव्यवस्था में मांग बढ़ती बल्कि आपूर्ति पक्ष बेहतर होने से महंगाई पर काबू पाना आसान होता.
यही नहीं, इस सार्वजनिक निवेश में बढ़ोत्तरी की इस रणनीति से अर्थव्यवस्था की गति तेज होने का फायदा सरकार को टैक्सों से होनेवाली आय में वृद्धि के रूप में भी मिलता. इससे राजकोषीय घाटा वास्तव में कम होता.

लेकिन इसके उलट वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने विदेशी आवारा पूंजी और उसके वैश्विक पहरेदारों- क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों को खुश करने के लिए राजकोषीय घाटे को जी.डी.पी के ४.८ फीसदी की बेतुकी सीमा में रखने के लिए सब्सिडी से लेकर योजना बजट तक में कटौती की है. इससे बड़ी देशी-विदेशी पूंजी के अलावा किसे फायदा होगा? उल्टे यह रणनीति अर्थव्यवस्था के साथ-साथ आमलोगों के लिए बहुत भारी पड़ सकती है.

सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि राजकोषीय घाटे को जी.डी.पी के ४.८ फीसदी के दायरे में रखने का फैसला किस आधार पर किया गया है? यही नहीं, वित्त मंत्री ने वर्ष १४-१५ में राजकोषीय घाटे को जी.डी.पी के ४.२ फीसदी, १५-१६ में जी.डी.पी के ३.६ फीसदी और वर्ष १६-१७ में जी.डी.पी के तीन फीसदी करने का एलान कर रखा है.

इसका अर्थ हुआ कि यू.पी.ए और कांग्रेस का अगले साल चुनावों के बाद लगातार तीन सालों तक राजकोषीय घाटे में कटौती के नामपर आमलोगों पर अधिक से अधिक से अधिक बोझ डालने और सामाजिक सुरक्षा की योजनाओं के बजट में कटौती का इरादा है.

जारी ......

('समकालीन जनमत' के मार्च अंक'13 में प्रकाशित टिप्पणी। यह पूरी टिप्पणी आप पत्रिका में पढ़ सकते हैं) 

रविवार, फ़रवरी 24, 2013

बजट'१३ : महंगाई और रोजगार का मुद्दा एजेंडे से गायब है

अर्थव्यवस्था का संकट निवेश की कमी से गहरा रहा है लेकिन चिदंबरम वित्तीय कठमुल्लावाद से बाहर निकलने को तैयार नहीं हैं

दूसरी क़िस्त    

इसमें कोई शक नहीं है कि अर्थव्यवस्था गहरे संकट में है. खुद भारत सरकार के केन्द्रीय सांख्यकीय संगठन (सी.एस.ओ) के मुताबिक, चालू वित्तीय वर्ष में जी.डी.पी की वृद्धि दर मात्र ५ फीसदी रहने का अनुमान है जो पिछले एक दशक में अर्थव्यवस्था का सबसे खराब प्रदर्शन है.

इस कारण वित्त मंत्री पर एक ऐसा बजट पेश करने का दबाव है जो अर्थव्यवस्था की मद्धिम पड़ती रफ़्तार को फिर से तेज कर सके. इसके लिए जरूरी है कि अर्थव्यवस्था में निवेश बढ़े. इस मुद्दे पर व्यापक सहमति है कि अर्थव्यवस्था को मौजूदा स्थिति से बाहर निकालने के लिए निवेश बढ़ाने के अलावा और कोई विकल्प नहीं है.

लेकिन निवेश बढ़ाने की रणनीति को लेकर अर्थव्यवस्था के मैनेजरों और अर्थशास्त्रियों में मतभेद हैं. खुद वित्त मंत्री और उनके आर्थिक मैनेजरों समेत नव उदारवादी आर्थिक सुधारों के पैरोकारों का मानना है कि निवेश बढ़ाने के लिए सरकार को निवेश के अनुकूल माहौल बनाने और निजी निवेश की राह में आनेवाली बाधाओं को हटाने पर जोर देना चाहिए और बाकी निजी क्षेत्र पर छोड़ देना चाहिए.

इस नव उदारवादी रणनीति के तहत ही पी. चिदंबरम अगले बजट में राजकोषीय घाटे को कम करने, ब्याज दरों में कमी करने के लिए रिजर्व बैंक को मनाने और देशी-विदेशी निजी निवेशकों और कार्पोरेट्स को निवेश के लिए प्रेरित करने हेतु और अधिक रियायतें देने की तैयारी कर रहे हैं.

लेकिन इस रणनीति की सफलता को लेकर अर्थशास्त्रियों में गहरे मतभेद हैं. अर्थशास्त्रियों के एक हिस्से का मानना है कि राजकोषीय घाटे में कटौती के ‘आब्सेशन’ और वित्तीय कठमुल्लावाद से अर्थव्यवस्था का संकट और गहरा सकता है.
इसके लिए वे यूरोप का उदाहरण देते हैं जहाँ राजकोषीय घाटे में कटौती के नामपर अपनाई गई किफायतशारी (आस्ट्रीटी) की नीतियों के कारण अर्थव्यवस्था और गहरे संकट में फंस गई है. असल में, जब अर्थव्यवस्था की रफ़्तार धीमी पड़ रही हो और मांग में गिरावट और आर्थिक अनिश्चितताओं के कारण निजी निवेश ठहर गया हो, उस समय अर्थव्यवस्था में निजी निवेश को प्रोत्साहित करने के लिए ‘उत्प्रेरक’ (स्टिमुलस) की जरूरत होती है.
कीन्सवादी अर्थशास्त्रियों के मुताबिक, ऐसे समय में सरकार को कुछ समय के लिए राजकोषीय घाटे की चिंता छोड़कर अर्थव्यवस्था में उत्पादक सार्वजनिक निवेश खासकर सामाजिक और भौतिक ढांचागत क्षेत्र में बढ़ाना चाहिए. सार्वजनिक निवेश बढ़ने से न सिर्फ रोजगार के नए अवसर बढ़ेंगे बल्कि उससे विभिन्न वस्तुओं और उत्पादों की मांग भी बढ़ेगी जिसे पूरा करने के लिए निजी निवेश आगे आएगा.

लेकिन अर्थव्यवस्था के मैनेजरों का तर्क है कि अर्थव्यवस्था को वैश्विक मंदी के संकट से उबारने के लिए चार साल पहले ही स्टिमुलस पैकेज दिया जा चुका है और उसके कारण बढ़ते राजकोषीय घाटे को देखते हुए अब राजकोषीय स्थिति को सुदृढ़ करने की सख्त जरूरत है.

उल्लेखनीय है कि यू.पी.ए सरकार ने वर्ष २००७-०८ में अमेरिकी आर्थिक संकट के बाद पैदा हुई वैश्विक आर्थिक संकट से निपटने कोई दो लाख करोड़ रूपये के स्टिमुलस पैकेज का एलान किया था. लेकिन इस स्टिमुलस पैकेज में करो में छूट और कारपोरेट क्षेत्र को दी गई रियायतें ज्यादा थीं और सार्वजनिक निवेश को बढ़ाने के लिए कोई खास कोशिश नहीं की गई.
इसका नतीजा यह हुआ कि इस पैकेज के कारण कारपोरेट क्षेत्र अपने मुनाफे को बनाए रखने में कामयाब रहा लेकिन उसने वैश्विक आर्थिक संकट के मद्देनजर निवेश बढ़ाने में रूचि नहीं दिखाई. दूसरी ओर, स्टिमुलस पैकेज के कारण राजकोषीय घाटे में तेजी से वृद्धि हुई.
इसके बावजूद यह एक तथ्य है कि स्टिमुलस पैकेज के कारण राजकोषीय घाटे में भले वृद्धि हुई हो लेकिन उससे अर्थव्यवस्था को वैश्विक मंदी की मार से उबरने में मदद मिली. आश्चर्य नहीं कि जी.डी.पी वृद्धि की रफ़्तार वैश्विक आर्थिक संकट के कारण वर्ष २००७-०८ के ९.३ फीसदी की तुलना में २००८-०९ में गिरकर ६.७ फीसदी रह गई थी, वह २००९-१० और १०-११ में बढ़कर क्रमश: ८.६ और ९.३ फीसदी तक पहुँच गई.

लेकिन उसके बाद तत्कालीन वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने बढ़ते राजकोषीय घाटे की दुहाई देकर स्टिमुलस उपायों को वापस लेना शुरू कर दिया जिसका नतीजा यह हुआ कि वर्ष २०११-१२ में जी.डी.पी की वृद्धि दर एक बार फिर लुढककर ६.२ फीसदी रह गई जिसके चालू वित्तीय वर्ष में और गिरकर मात्र ५ फीसदी रह जाने का अनुमान है.

साफ़ है कि किफायतशारी की नीति काम नहीं कर रही हैं. उसका असर उल्टा हो रहा है. ऐसे में, यह सवाल बहुत मौजूं हो जाता है कि क्या वित्त मंत्री पी. चिदंबरम के उन्हीं नीतियों पर और जोर देने से स्थिति और नहीं बिगड़ जाएगी?
लेकिन चिदंबरम के रवैये से लगता नहीं है कि वे इस नीति पर पुनर्विचार करने के लिए तैयार हैं. जाहिर है कि वे एक बड़ा जोखिम ले रहे हैं. वे सार्वजनिक निवेश के बजाय निजी देशी-विदेशी निवेश में बढ़ोत्तरी पर दांव लगा रहे हैं. इसके लिए वे उसकी हर मांग पूरी कर रहे हैं. राजकोषीय घाटे में कमी के लिए आमलोगों पर अधिक से अधिक बोझ लादने के साथ-साथ वे अर्थव्यवस्था के बचे क्षेत्रों जैसे खुदरा व्यापार को विदेशी पूंजी के लिए खोल रहे हैं.
लेकिन यह सवाल बना हुआ है कि क्या बड़ी देशी-विदेशी निजी पूंजी और कार्पोरेट्स अर्थव्यवस्था में निवेश बढ़ाने की पहल करेंगे? हालाँकि चिदंबरम का जादू चला या नहीं, यह जानने के लिए अगले कुछ महीनों का इंतज़ार करना पड़ेगा लेकिन इतना तय है कि वे एक बड़ा जुआ खेल रहे हैं जो अर्थव्यवस्था के लिए बहुत भारी भी पड़ सकता है.

यही नहीं, अगर वे निजी निवेश को प्रोत्साहित करने में कामयाब भी होते हैं तो यह सवाल बना रहेगा कि यह किस कीमत पर हुआ और कितना स्थाई है? आखिर आमलोगों पर इतना बोझ डालकर और उनकी बुनियादी जरूरतों की अनदेखी करके और दूसरी ओर, बड़ी पूंजी और कार्पोरेट्स को इतनी रियायतें देकर अर्थव्यवस्था की रफ़्तार को तेज करने की इस रणनीति से किसे लाभ हो रहा है?

यही नहीं, इस रणनीति की सबसे बड़ी समस्या यह है कि निजी निवेश को प्रोत्साहित करने के नामपर यह कार्पोरेट्स और आवारा विदेशी पूंजी को अधिक से अधिक रियायतें देने और उसकी सभी जायज-नाजायज मांगों को स्वीकार करती जा रही है.
एक अर्थ में यह बड़ी देशी-विदेशी पूंजी के ब्लैकमेल के आगे घुटने टेकने की तरह है. लेकिन अर्थव्यवस्था की कमान बड़ी देशी-विदेशी पूंजी और कार्पोरेट्स के हाथों में सौंपने के बाद वित्त मंत्री के पास इसके अलावा और कोई विकल्प भी नहीं रह गया है.
काबू से बाहर महंगाई और आम आदमी की उम्मीदें

लेकिन सवाल यह भी है कि इस बजट में महंगाई से निपटने के लिए क्या होगा? दूसरे, इस चुनावी वर्ष में बजट से आम आदमी को क्या मिलनेवाला है? तीसरे, खाद्य सुरक्षा जैसे पिछले चुनावी वायदों का क्या होगा? क्या ये चिंताएं भी वित्त मंत्री की प्राथमिकता सूची में कहीं हैं?
निश्चय ही, वित्त मंत्री महंगाई को लेकर इनसे चिंतित हैं. लेकिन उनका मानना है कि महंगाई पर अंकुश के लिए भी राजकोषीय घाटे पर काबू पाना जरूरी है. इसलिए बजट में महंगाई पर अंकुश लगाने के लिए अलग से कोई पहल और उपाय करने के बजाय वे राजकोषीय घाटे पर अंकुश लगाने और इसके जरिये मांग और कीमतों पर दबाव कम करने की कोशिश करेंगे.
लेकिन इससे महंगाई खासकर खाद्य महंगाई में कमी आने की उम्मीद बहुत कम है जोकि अभी भी दोहरे अंकों में चल रही है. इसी तरह बजट में आम आदमी खासकर गरीबों को कुछ नहीं मिलने जा रहा है. उल्टे गरीबी उन्मूलन की कई योजनाओं में काट-छांट और उनके बजट में कटौती की आशंका है.

अलबत्ता यह संभव है कि चिदंबरम आम आदमी के नामपर मध्यवर्ग को करों में रियायत देकर कांग्रेस की ओर आकर्षित करने की कोशिश करें. इससे बड़ी पूंजी और कार्पोरेट्स को भी शिकायत नहीं होगी क्योंकि मध्य वर्ग के हाथ में अधिक पैसा आने का सबसे अधिक फायदा उसे ही होता है. मध्य वर्ग आमतौर पर उस अतिरिक्त आय को उपभोक्ता वस्तुओं पर खर्च करता है जिससे इन उत्पादों की मांग बढ़ती है.

लेकिन एक बड़ा सवाल यह भी है कि वित्त मंत्री इस बजट में खाद्य सुरक्षा कानून को लेकर क्या प्रावधान करेंगे? कांग्रेस अगले आम चुनावों में इस योजना को भुनाना चाहती है. इस बात के पूरे आसार हैं कि वित्त मंत्री न चाहते हुए भी इस योजना के लिए बजटीय प्रावधान करेंगे.

लेकिन राजकोषीय घाटे को काबू में करने की उनकी प्राथमिकता के मद्देनजर यह संभव है कि वे इस योजना पर ईमानदारी से अमल के लिए जरूरी बजटीय प्रावधान के बजाय प्रतीकात्मक प्रावधान करें लेकिन बजट भाषण में बड़े-बड़े दावे करें.

यही नहीं, चुनावी वर्ष का बजट होने के नाते इसमें लच्छेदार बातें खूब होंगी, आम आदमी की खूब कसमें खाई जायेंगी, किसानों की दुहाई दी जाएगी लेकिन बजटीय प्रावधानों में वित्तीय कठमुल्लावाद की ही चलेगी.

(साप्ताहिक 'शुक्रवार' के मार्च के अंक में कवर स्टोरी) 

बजट'१३ : क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों के लिए होगा बजट

चिदंबरम का सारा जोर विदेशी आवारा पूंजी और बड़े कार्पोरेट्स को खुश करने और आमलोगों पर बोझ डालने पर है

पहली क़िस्त   

यू.पी.ए-२ सरकार का आखिरी और इस सरकार में अपना पहला बजट पेश करने जा रहे वित्त मंत्री पी. चिदंबरम पर उम्मीदों और अपेक्षाओं का भारी बोझ है. वैसे तो हर वित्त मंत्री पर उम्मीदों और अपेक्षाओं का बोझ होता है और पी. चिदंबरम को इसका खासा अनुभव भी है.
लेकिन पहले संयुक्त मोर्चा सरकार और बाद में यू.पी.ए-१ सरकार में कोई आधा दर्जन बार बजट पेश कर चुके चिदंबरम के लिए इस बार इन उम्मीदों और अपेक्षाओं का बोझ कुछ ज्यादा ही भारी साबित हो रहा है.
इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि अर्थव्यवस्था की बदतर होती स्थिति के बीच यू.पी.ए खासकर कांग्रेस उनसे एक संकटमोचक बजट की उम्मीद कर रही है ताकि २०१४ के आम चुनावों में उसकी नैय्या पार लग सके.
दूसरी ओर, खुद वित्त मंत्री पी. चिदंबरम के लिए उनकी नव उदारवादी आर्थिक सुधारों के चैम्पियन की छवि और प्रतिष्ठा दाँव पर लगी है. देशी-विदेशी बड़ी पूंजी और कारपोरेट क्षेत्र को उनसे काफी उम्मीदें हैं और खुद वित्त मंत्री भी लगातार उन्हें भरोसा दिला रहे हैं कि बजट में उनकी अपेक्षाओं का पूरा ख्याल रखा जाएगा.

लेकिन चिदंबरम पर सबसे ज्यादा दबाव स्टैण्डर्ड एंड पुअर, मूडी, फिच जैसी वैश्विक क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों का है जिनकी निगाहें इस बजट पर लगी हुई हैं. इन क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों की मांग है कि वित्त मंत्री अपने वायदे के मुताबिक बजट में राजकोषीय घाटे को कम करने की ठोस और विश्वसनीय योजना पेश करें. ऐसा न होने पर वे भारत की क्रेडिट रेटिंग गिराकर ‘कबाड़’ (जंक) स्थिति में डाल देंगी.

खुद वित्त मंत्रालय से आ रहे संकेतों से साफ़ है कि पी. चिदंबरम का सबसे अधिक जोर क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों और उनके जरिये विदेशी खासकर आवारा पूंजी को खुश करने और उनका भरोसा जीतने पर है. इसके लिए वे कुछ भी करने को तैयार हैं.
आश्चर्य नहीं कि वित्त मंत्री ने बजट की तैयारियों की व्यस्तता के बावजूद पिछले महीने वैश्विक आवारा पूंजी के सबसे बड़े केन्द्रों- हांगकांग, सिंगापुर, लन्दन, फ्रैंकफर्ट में रोड शो के जरिये बड़े विदेशी संस्थागत निवेशकों (एफ.आई.आई) और कार्पोरेट्स को आश्वस्त करने की कोशिश की है कि वे चुनावी साल के दबावों के बावजूद एक ‘जिम्मेदार बजट’ पेश करेंगे.
लेकिन असली सवाल यह है कि यह बजट किसके प्रति ‘जिम्मेदार’ होगा? वित्त मंत्री के बतौर पद संभालने के बाद से पी. चिदंबरम के बयानों और फैसलों से साफ़ है कि वित्त मंत्री ने अपनी प्राथमिकता तय कर ली है. इसके मुताबिक यह बजट वैश्विक क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों और बड़े विदेशी निवेशकों/कार्पोरेट्स/शेयर बाजार के प्रति जिम्मेदार होगा.

इस कारण यह अनुमान लगाना मुश्किल नहीं है कि बजट में सबसे अधिक जोर राजकोषीय घाटे को कम करने पर होगा. इसका अर्थ यह हुआ कि इस बजट के केन्द्र में चुनाव से ज्यादा राजकोषीय घाटे यानी आमलोगों खासकर गरीबों को पांच साल में एक बार मिलनेवाली राहत से ज्यादा बड़ी देशी-विदेशी पूंजी और कार्पोरेट्स के हितों का ख्याल रखा जाएगा.

राजकोषीय घाटा: हौव्वा या वास्तविक खतरा?
खुद वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने यह सार्वजनिक तौर पर घोषित कर रखा है कि आनेवाले बजट में राजकोषीय घाटे को जी.डी.पी के ४.८ फीसदी के अंदर रखा जाएगा. यही नहीं, वित्त मंत्री ने राजकोषीय घाटे को कम करने की अपनी इसी प्रतिबद्धता को साबित करने के लिए चालू वित्तीय वर्ष (१२-१३) में राजकोषीय घाटे को जी.डी.पी के ५.३ फीसदी की सीमा में रखने के लिए पिछले छह महीने में पेट्रोलियम और उर्वरक सब्सिडी में कटौती से लेकर मंत्रालयों के बजट में १० फीसदी से अधिक की कटौती की है.

इसके तहत पेट्रोल, डीजल, रसोई गैस, उर्वरकों की कीमतों से लेकर बिजली और रेल किरायों में बढ़ोत्तरी की गई है जिसका सबसे अधिक बोझ मध्य वर्ग से लेकर गरीबों पर पड़ा है.

सवाल यह है कि वित्त मंत्री राजकोषीय घाटे को लेकर इतना परेशान, चिंतित और बेचैन क्यों हैं और वैश्विक क्रेडिट रेटिंग एजेंसियां और आवारा पूंजी राजकोषीय घाटे को कम करने और आर्थिक सुधारों को तेजी से आगे बढ़ाने का दबाव क्यों बनाए हुए हैं?
असल में, नव उदारवादी आर्थिक सैद्धांतिकी में राजकोषीय घाटा कुफ्र या ईशनिंदा की तरह है. इसके पैरोकारों का मानना है कि राजकोषीय घाटा यानी सरकार की आय और खर्चों के बीच अंतर को पूरा करने के लिए सरकार बाजार से कर्ज लेती है जिसके कारण न सिर्फ ब्याज दरों पर दबाव बढ़ता है बल्कि निजी क्षेत्र को नए निवेश के लिए कर्ज लेना मुश्किल होने लगता है.
उनका दावा है कि इससे अर्थव्यवस्था में नया कारपोरेट निवेश कम होता है जिससे अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर गिरने लगती है. इसके अलावा, राजकोषीय घाटे को पूरा करने के लिए गए कर्ज की ब्याज अदायगी में भी काफी रकम जाया होती है और धीरे-धीरे अर्थव्यवस्था एक कर्ज जाल में फंसने लगती है जहाँ कर्ज चुकाने के लिए कर्ज लेने की नौबत आ जाती है.

राजकोषीय घाटे पर अंकुश के पैरोकारों का यह भी तर्क है कि यह सरकारों की फिजूलखर्ची का नतीजा है जिसके कारण न सिर्फ मुद्रास्फीति बढ़ती है बल्कि अर्थव्यवस्था में कई विसंगतियाँ पैदा हो जाती है. लेकिन इन सभी तर्कों के पीछे मूल तर्क यह है कि अर्थव्यवस्था में सरकार की भूमिका सीमित होनी चाहिए क्योंकि सरकार की तुलना में निजी क्षेत्र ज्यादा कुशल, सक्षम और जिम्मेदार है.

इसमें कोई शक नहीं है कि एक सीमा से ज्यादा राजकोषीय घाटे से अर्थव्यवस्था में कई समस्याएं पैदा होती हैं. लेकिन यह भी तथ्य है कि दुनिया की तमाम विकासशील अर्थव्यवस्थाओं में सीमा से ज्यादा राजकोषीय घाटा आम परिघटना है क्योंकि समग्र विकास के लिए निजी के साथ सार्वजनिक निवेश भी बहुत महत्वपूर्ण है.
कहने की जरूरत नहीं है कि इन अर्थव्यवस्थाओं में सरकार को न सिर्फ आमलोगों की बुनियादी जरूरतें और शिक्षा-स्वास्थ्य मुहैया कराने के लिए निवेश करना पड़ता है बल्कि निजी निवेश को प्रोत्साहित करने के लिए सड़क-बिजली-रेल-बंदरगाह जैसे ढांचागत इन्फ्रास्ट्रक्चर में भी निवेश जरूरी है.
साफ़ है कि राजकोषीय घाटा अर्थव्यवस्था के लिए हमेशा नुकसानदेह नहीं है, खासकर अगर वह उत्पादक और सामाजिक रूप से जरूरी क्षेत्रों में निवेश के रूप में हो. यही नहीं, राजकोषीय घाटा खासकर विकासशील देशों में आर्थिक वृद्धि के लिए भी जरूरी है क्योंकि सार्वजनिक निवेश से निजी निवेश को भी गति मिलती है.
लेकिन नव उदारवादी आर्थिक सुधारों के पैरोकार इसका इसलिए विरोध करते हैं क्योंकि वे मानते हैं कि अर्थव्यवस्था में राज्य यानी सरकार की सीमित और निजी पूंजी की प्रमुख भूमिका होनी चाहिए. वे राजकोषीय घाटे पर अंकुश के जरिये अर्थव्यवस्था में राज्य की भूमिका को सीमित करने की कोशिश करते हैं.

साथ ही, वे मानते हैं कि किसी को भी कोई चीज मुफ्त नहीं मिलनी चाहिए (देयर इज नो फ्री लंच) क्योंकि इससे संसाधनों की बर्बादी होती है. इस आधार पर वे सब्सिडी का विरोध करते हैं.

राजकोषीय घाटे पर अंकुश के और भी हैं विकल्प
लेकिन राजकोषीय घाटे के खिलाफ अभियान चलानेवाले उसके मूल कारण की चर्चा नहीं करते हैं. असल में, राजकोषीय घाटा सिर्फ खर्चों में बढ़ोत्तरी के कारण ही नहीं बल्कि आय में अपेक्षित वृद्धि न होने के कारण भी बढ़ता है.

तथ्य यह है कि भारत में राजकोषीय घाटे में बढ़ोत्तरी की बड़ी वजह सरकार की आय कम होना है. उल्लेखनीय है कि भारत में टैक्स-जी.डी.पी अनुपात वर्ष २०१०-११ में मात्र १०.१ फीसदी था जोकि वर्ष २००७-०८ के ११.९ फीसदी से भी कम रह गया है. प्रत्यक्ष करों (आयकर और कारपोरेट करों)-जी.डी.पी का अनुपात तो और भी कम ७.६ फीसदी के आसपास है.

इसके उलट दुनिया के अधिकांश विकसित और प्रमुख विकासशील देशों में टैक्स-जी.डी.पी अनुपात २० से २५ फीसदी के बीच है. भारत में टैक्स-जी.डी.पी अनुपात कम होने की कई वजहों में से एक वजह अमीरों और कार्पोरेट्स को करों में मिलनेवाली भारी छूट और रियायतें भी जिम्मेदार हैं.
चौंकानेवाली बात यह है कि भारत में अमीरों और कार्पोरेट्स को हर साल ५.१५ लाख करोड़ रूपये से ज्यादा की टैक्स रियायतें दी जाती हैं. अगर इन रियायतों को खत्म कर दिया जाए तो राजकोषीय घाटा पूरी तरह से खत्म हो जाएगा. इसी तरह अगर टैक्स-जी.डी.पी अनुपात को १० फीसदी से बढ़ाकर १५-१६ फीसदी तक ले आया जाए तो राजकोषीय घाटा पूरी तरह से समाप्त हो सकता है.
लेकिन वित्त मंत्री और आर्थिक सुधारों के पैरोकार इस विकल्प के लिए तैयार नहीं हैं क्योंकि वे अमीरों और कार्पोरेट्स को नाराज नहीं करना चाहते हैं. हालाँकि ऐसी चर्चाएं है कि बजट में सुपर अमीरों पर १० प्रतिशत का मामूली सरचार्ज और विरासत और सम्पदा टैक्स (वेल्थ और इन्हेरिटेंस टैक्स) लगाया जा सकता है लेकिन चिदंबरम के ‘ड्रीम बजट’ के अतीत को देखते हुए इसके आसार कम ही हैं.

ऐसे में, वे राजकोषीय घाटे में कमी का सारा बोझ आमलोगों पर डालने की तैयारी कर रहे हैं. ऐसी रिपोर्टें हैं कि चिदंबरम सरकारी खर्चों खासकर योजना बजट में १० फीसदी की कटौती करके उसे मौजूदा वर्ष के स्तर पर रखने में जुटे हुए हैं.

इसी तरह सरकारी योजनाओं में भ्रष्टाचार खत्म करने और उन्हें प्रभावी बनाने के नामपर विभिन्न योजनाओं के पुनर्गठन और विलय के जरिये उनकी संख्या कम करने की भी तैयारी है.

इस कारण माना जा रहा है कि पिछले एक दशक में यह सबसे अधिक किफायती बजट होगा. साफ़ है कि राजकोषीय घाटे का हौव्वा दिखाकर कार्पोरेट्स को सौगात और आमलोगों पर बोझ डालने की जानी-पहचानी नीति इस बजट में भी जारी रह सकती है.
इससे चिदंबरम को उम्मीद है कि वे बड़ी देशी-विदेशी पूंजी, कार्पोरेट्स और उनकी पैरोकार वैश्विक क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों का भरोसा जीतने में कामयाब होंगे. इससे अर्थव्यवस्था में देशी-विदेशी निजी कारपोरेट निवेश बढ़ेगा और अर्थव्यवस्था फिर से पटरी पर आ सकेगी. लेकिन क्या सचमुच में ऐसा होगा?
कल भी जारी ....
(साप्ताहिक 'शुक्रवार' के मार्च के अंक में प्रकाशित कवर स्टोरी की पहली क़िस्त)