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शुक्रवार, मई 30, 2014

अखिलेश सरकार की उल्टी गिनती शुरू हो गई है

उत्तर प्रदेश में भाजपा के लिए रास्ता साफ़ कर रही है समाजवादी पार्टी की सरकार
 
उत्तर प्रदेश की अखिलेश सरकार ने लगता है कि हाल के लोकसभा चुनावों में करारी हार से कोई सबक़ नहीं सीखा है. ऐसा लगता है कि सबक़ तो दूर उसने प्रदेश के लोगों को सबक़ सिखाने का फ़ैसला कर लिया है.

प्रदेश से जिस तरह की चिंताजनक और दहला देनेवाली ख़बरें आ रही हैं, उससे लगता है कि अखिलेश यादव की न सिर्फ सरकार पर से पकड़ ख़त्म हो रही है बल्कि उसमें शासन करने की इच्छाशक्ति भी नहीं रह गई है. आश्चर्य नहीं कि वह लगातार ढलान पर फिसलती जा रही है. 

मुहावरे में जिसे कहते हैं कि पानी सिर पर से गुज़रने लगा है, वही उत्तर प्रदेश में हो रहा है. बदायूँ में दो दलित लड़कियों को जिस तरह से बलात्कार के बाद नृशंस तरीक़े से पेड़ पर लटका दिया गया, वह न सिर्फ शर्मनाक और दहलानेवाला है बल्कि ख़ुद मुख्यमंत्री ने जिस असंवेदनशील तरीक़े से एक महिला पत्रकार को जवाब दिया, वह बताता है कि ये घटनाएँ क्यों हो रही हैं?

याद कीजिए, चुनाव प्रचार के दौरान ख़ुद मुलायम सिंह ने बलात्कार क़ानून में बदलाव की यह कहते हुए वकालत की थी कि बच्चों से ग़लतियाँ हो जातीं हैं. 

साफ़ है कि सपा की राजनीति और सोच में वह समस्या है जिससे जातिवादी दबंगों-अपराधियों का हौसला बढ़ता है, पुलिस लाचार हो जाती है और जाति और क्षेत्र देखकर व्यवहार करती है और सरकार आँख बंदकर सोई रहती है.

बदायूँ में दलित लड़कियों के साथ जिस तरह का नृशंस और मध्ययुगीन व्यवहार हुआ है, वह अपवाद नहीं है
और न ही कुछ दबंगों का अपराध या ग़लती है बल्कि दलितों के साथ होनेवाले सामंती ज़ुल्मों के अंतहीन दुखांत का हिस्सा है.

नई बात सिर्फ यह है कि कल तक दलितों पर सामंती ज़ुल्म और बलात्कार की अगुवाई सवर्ण दबंग/गुंडे कर रहे थे, आज सत्ता मिलने के बाद इस क़तार में मध्यवर्ती जातियों के दबंग और लफ़ंगे भी शामिल हो गए हैं. 

मुलायम सिंह के कभी-कभी ग़लती करनेवाले बच्चे यही हैं. अफ़सोस यह है कि यह सरकार ख़ुद को लोहिया, जयप्रकाश और नरेंद्रदेव के समाजवादी राजनीति की वारिस बताती है. अफ़सोस अखिलेश यादव के लिए होता है जिनसे लोगों को बहुत उम्मीदें थीं लेकिन वे उम्मीदें दो साल के अंदर ही धूसरित होती दिख रही हैं. लेकिन इसके लिए कोई और नहीं बल्कि वे ख़ुद, उनका परिवार और पार्टीगण ज़िम्मेदार हैं. 

कहने की ज़रूरत नहीं है कि अखिलेश यादव सरकार की नाकामियां और ग़लतियाँ राज्य में भाजपा की पुनर्वापसी के लिए ज़मीन और रास्ता तैयार कर रही हैं.

एक सेक्युलर सरकार सांप्रदायिक ताक़तों के लिए कैसे जगह बनाती है, इसका एक और उदाहरण उत्तर प्रदेश में देखा जा सकता है.

अगर ऐसा नहीं होता तो क्या कोई सरकार सिर्फ चुनाव में हार से बौखलाकर प्रदेश की जनता को सबक़ सिखाने और घंटों बिजली कटौती का फ़ैसला करती? 

लेकिन कोई क्या करे जब सरकार अपने पैर पर इसलिए कुल्हाड़ी मारने पर उतारू हो कि इससे उन लोगों को भी दर्द होगा जिन्होंने उन्हें वोट नहीं दिया.

अफसोस दूसरे के दुख में मज़ा लेने की यह राजनीति अखिलेश यादव और सपा को बहुत दूर तक नहीं ले जा पाएगी. वह सिर्फ सैफ़ई और मैनपुरी तक सीमित रह जाएगी, जैसाकि इन चुनावों में हुआ.

अखिलेश सरकार के रंग-ढंग जल्दी नहीं बदले तो उसके लिए कार्यकाल पूरा करना भी मुश्किल हो जाएगा। उनका समय तेजी से खत्म हो रहा है लेकिन सपा नेतृत्व इस मुगालते में है कि अभी उसके तीन साल बचे हुए हैं।

उन्हें अंदाज़ा नहीं है कि जिस राजनीतिक ढलान पर वे तेजी से फिसल रहे हैं, वहां से उन्हें रसातल में पहुँचने में
देर नहीं लगेगी। वैसे अभी भी मौका है लेकिन सरकार के तौर-तरीकों से लगता नहीं है कि वह इसका इस्तेमाल कर पाएगी।

उसने लगता है कि उत्तर प्रदेश तश्तरी में रखकर भाजपा को देने का फैसला कर लिया है. प्रदेश में भारी जीत से उत्साहित भाजपा अखिलेश सरकार की छोटी-बड़ी गलतियों को मुद्दा बनाकर सड़क पर उतर रही है. वह सरकार को चैन से नहीं रहने देगी। केंद्र की सरकार भी सपा सरकार को घेरने और उसे परेशान करने का कोई मौका नहीं छोड़ेगी।

दूसरी ओर, नौकरशाही भी हवा का रुख भांपकर हाथ खड़े करने लगेगी और उससे काम करना मुश्किल होता जाएगा। वह सरकार को मुश्किल में डालने के लिए ख़बरें भी लीक करेगी। ऐसी हालत में अखिलेश सरकार एक 'लैम-डक' सरकार बन जाने की आशंका दिन पर दिन बढ़ती जा रही है.     

रविवार, मई 25, 2014

अखिलेश यादव के पास अब ज़्यादा समय नहीं बचा है

परिवार, बाहुबलियों और भ्रष्ट अफसरों-मंत्रियों-नेताओं से पीछा छुड़ाए बिना सरकार का इकबाल लौटना मुश्किल है

हालिया लोकसभा चुनावों में उत्तर प्रदेश में उम्मीदों के विपरीत समाजवादी पार्टी के बहुत ख़राब प्रदर्शन के बाद अखिलेश यादव की सरकार के पास दो ही विकल्प बचे हैं: राज्य में बेहतर प्रशासन और क़ानून-व्यवस्था की बहाली और समावेशी विकास ख़ासकर सड़क, बिजली, पानी, शिक्षा और स्वास्थ्य के मोर्चे पर युद्धस्तर पर अभियान छेड़ने की पहल करना और राजनीतिक पहलकदमी की कमान संभाल लेना या फिर एक लचर और दिशाहीन सरकार चलाते हुए धीरे-धीरे इतिहास के गर्त की ओर बढ़ने को अभिशप्त हो जाना.

यह अखिलेश भी जानते हैं कि उनके पास समय बहुत कम है और राजनीतिक रूप से वे कमज़ोर विकेट पर हैं जहाँ से सिर्फ ढलान ही है. चुनावों में हार के बाद उनकी सरकार की चमक फीकी पड़ गई है और स्थिति को तुरंत नहीं संभाला तो सरकार का राजनीतिक इक़बाल भी ख़त्म हो जाएगा.

भाजपा के पक्ष में जिस तरह का ध्रुवीकरण हुआ है और वह सपा के सामाजिक आधार में घुसने में कामयाब हो गई है, उसमें वह अपनी स्थिति मज़बूत करने के लिए कोई कसर नहीं उठा रखेगी. ख़ुद सपा में आंतरिक सत्ता संघर्ष तेज़ होने और नेताओं में सुरक्षित राजनीतिक ठिकाने की ओर पलायन करने की प्रवृत्ति तेज़ होने की आशंका बढ़ रही है.

अखिलेश के पास इस गंभीर और अनप्रिसिडेंटेड संकट से निपटने के लिए मामूली उपायों और फ़ैसलों से काम नहीं चलनेवाला है. उन्हें सपा की मौजूदा बीमारियों से निपटने के लिए उपाय और फ़ैसले भी उतने ही अनप्रिसिडेंटेड करने पड़ेंगे. उन्हें सरकार से लेकर पार्टी तक की गंभीर बीमारी को दूर करने के लिए दवा के बजाय आपरेशन करने का साहस दिखाना होगा. इस मामले में उन्हें अपनी सरकार या परिवार या क़रीबियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने और उसे जोखिम में डालने से हिचकना नहीं चाहिए. 

कहने की ज़रूरत नहीं है कि सपा के पुनर्नवीनीकरण और सरकार को ऊर्जावान बनाने के लिए अखिलेश यादव को सबसे पहले अपने परिवार से ही शुरू करना होगा. सपा सिर्फ मुलायम परिवार की पार्टी है, इस धारणा को तोड़ने के लिए सबसे पहले परिवार की पार्टी और सरकार में भूमिका ख़त्म करनी होगी.
 

इसके लिए ज़रूरी है कि वे सबसे पहले शिवपाल यादव को मंत्रिमंडल से बाहर करें, ख़ुद प्रदेश पार्टी के अध्यक्ष का पद छोड़ें और परिवार के बाक़ी सदस्यों की भूमिका सीमित करें. दूसरी ओर, मंत्रिमंडल से राजा भैया समेत तमाम दागियों और आज़म खान जैसे विवादास्पद मंत्रियों को बाहर करें. मंत्रिमंडल छोटा करें और नए-युवा लोगों को मौक़ा दें. 

इसके साथ तुरंत क़ानून-व्यवस्था के मामले में ज़ीरो टालरेंस के आधार पर पुलिस अधिकारियों को निष्पक्ष होकर और पूरी सख़्ती के साथ क़ानून-व्यवस्था पर नियंत्रण क़ायम करने का ज़िम्मा दें और सुनिश्चित करें कि कोई राजनीतिक हस्तक्षेप नहीं हो. पार्टी से अपराधियों और असामाजिक तत्वों की तुरंत छुट्टी होनी चाहिए क्योंकि सपा की सरकार को जितना नुकसान पार्टी से जुड़े असामाजिक तत्वों और अपराधियों ने पहुँचाया है, उतना नुकसान किसी और चीज से नहीं हुआ है. ऐसे तत्वों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए और यह स्पष्ट सन्देश जाना चाहिए कि सरकार ऐसे तत्वों और उनकी हरकतों को कतई बर्दाश्त नहीं करेगी।



दूसरी ओर, समयबद्ध आधार पर सड़क-बिजली-पानी-स्कूल-अस्पताल को दुरुस्त करने के लिए अभियान शुरू करें. इसके लिए मंत्रियों से लेकर ज़िला अधिकारियों को चार-चार महीने का निश्चित टास्क दिया जाए जिसकी मुख्यमंत्री ख़ुद और उनका कार्यालय सख़्त निगरानी करे. मुख्यमंत्री को ख़ुद बिजली और सड़क का ज़िम्मा लेना चाहिए. इसमें ख़ासकर शहरों के इंफ़्रास्ट्रक्चर का पुनर्नवीनीकरण प्राथमिकता पर होना चाहिए. 
 
 
यह आसान नहीं है. अखिलेश की राह में सबसे ज़्यादा रोड़े ख़ुद उनके पिता और परिवार के लोग या उनके नज़दीक़ी अटका रहे हैं. उनसे निपटने के लिए ज़बरदस्त साहस और इच्छाशक्ति की ज़रूरत है.
 
याद रहे जिस तरह से कभी चंद्रबाबू नायडू ने अपने ससुर एनटीआर के लक्ष्मी पार्वती प्रेम और उसमें पार्टी को डूबते देखने के बजाय बग़ावत का रास्ता चुना था, वैसे ही अखिलेश को अपने पिता, चाचाओं, भाइयों और संबंधियों के ख़िलाफ़ बग़ावत का झंडा उठाने से हिचकिचाना नहीं चाहिए. अगर वे संकोच करेंगे तो उन्हें अपने परिवार के साथ राजनीतिक हाराकिरी के लिए तैयार हो जाना चाहिए. 

लेकिन अगर मौजूदा संकट से निपटने के नामपर अखिलेश को हटाकर मुलायम सिंह खुद मुख्यमंत्री बनने और अखिलेश को उप-मुख्यमंत्री बनाने  करते हैं तो इससे बड़ा मजाक और कोई नहीं होगा। उत्तर प्रदेश की जनता का सन्देश बिलकुल साफ़ है. उसने 2012 में सपा को बहुमत की सरकार देते हुए उम्मीद की थी कि वह एक साफ़-सुथरी, ईमानदार, कानून-व्यवस्था और राज्य के समावेशी विकास पर जोर देनेवाली सरकार होगी. खासकर युवा अखिलेश से ज्यादा उम्मीद थी क्योंकि वे डी पी यादव जैसे बाहुबली को नकार कर और विकास की बातें करके सत्ता में आये थे.

लेकिन अगर पारिवारिक तख्तापलट के जरिये मुलायम सिंह को मुख्यमंत्री बनाने की कोशिश की जाती है तो यह जनादेश की भावना के खिलाफ होगा। कहने की जरूरत नहीं है कि मुलायम सिंह समेत शिवपाल यादव, रामगोपाल यादव और दूसरी ओर, आज़म खान तक राज्य में सभी सुपर चीफ मिनिस्टर हैं और इन सभी की मनमानियों और खब्तों ने ही राज्य में सपा की लुटिया डुबाई है और भाजपा को मौका दिया है.      

सोमवार, मार्च 12, 2012

अब शुरू होगी अखिलेश यादव की असली परीक्षा

उनके शुरूआती संकेतों, संदेशों और फैसलों से सपा सरकार की दिशा तय हो जाएगी 

उत्तर प्रदेश में इस सप्ताह अखिलेश यादव के नेतृत्व में समाजवादी पार्टी की नई सरकार सत्ता संभाल लेगी. पिछले दो दशकों में उत्तर प्रदेश में यह दूसरी सरकार है जिसे न सिर्फ पूर्ण और स्पष्ट बहुमत से प्राप्त है बल्कि जो इतनी सद्भावनाओं के बीच सत्ता में आई है. इसमें कोई शक नहीं है कि इस सरकार से उत्तर प्रदेश के लोगों को जबरदस्त उम्मीदें और अपेक्षाएं हैं.

लेकिन अच्छी बात यह है कि इस सरकार के प्रति लोगों में भारी सद्भावना है और लोग अखिलेश यादव को पूरा मौका और समय देने के लिए तैयार हैं. यह नई सपा सरकार की सबसे बड़ी पूंजी है.

याद रहे, इससे पहले २००७ में मायावती के नेतृत्व में बसपा की सरकार भी इससे थोड़ी ही कम सीटों लेकिन पूर्ण बहुमत और सभी वर्गों की सद्भावनाओं के बीच सत्ता में पहुंची थी. मायावती सरकार से भी लोगों खासकर गरीबों, दलितों, अल्पसंख्यकों, किसानों, युवाओं और महिलाओं को बहुत उम्मीदें और अपेक्षाएं थीं. लोगों ने मायावती को भी पूरा मौका और समय दिया.

लेकिन उन्होंने वह मौका और लोगों की सद्भावनाओं को गंवाने में ज्यादा समय नहीं लगाया. बसपा सरकार जल्दी ही संगठित भ्रष्टाचार, लूट-खसोट, सार्वजनिक संसाधनों की बर्बादी, राजनीतिक अहंकार, मनमानी और दमन-उत्पीड़न की सरकार बन गई जिसका खमियाजा उसे इन चुनावों में भुगतना पड़ा है.

इस मायने में यह चुनाव वास्तव में मायावती सरकार के खिलाफ जनादेश है. बसपा सरकार के खिलाफ लोगों के गुस्से का सबसे अधिक फायदा समाजवादी पार्टी को मिला. हालांकि इसके कई राजनीतिक, सामाजिक और सांगठनिक कारण हैं लेकिन इसमें कोई दो राय नहीं है कि इन चुनावों में समाजवादी पार्टी को एक सकारात्मक जनादेश भी मिला है.
इसमें समाजवादी पार्टी के चुनावी वायदों, नकारात्मक के बजाय सकारात्मक प्रचार और उसके साथ खुद अखिलेश यादव की साफ़-सुथरी छवि और गुंडा-माफिया राज के खात्मे की उनकी स्पष्ट प्रतिबद्धता की बहुत बड़ी भूमिका है.

लेकिन सपा के लिए चुनाव जीतना जितना आसान था, खासकर बसपा विरोधी माहौल के कारण, उससे अधिक मुश्किल और चुनौती भरा रास्ता आगे का है. युवा अखिलेश यादव से अपेक्षाएं और उम्मीदें बहुत ज्यादा हैं. ये अपेक्षाएं और उम्मीदें उन्होंने खुद पैदा की हैं.

उनके सामने चुनौती न सिर्फ एक भ्रष्टाचार मुक्त और साफ़-सुथरी सरकार चलाने और गुंडों-माफियाओं पर अंकुश लगाते हुए कानून-व्यवस्था दुरुस्त करने की चुनौती है बल्कि उन वायदों और प्रतिबद्धताओं को भी पूरा करना है जिसका वायदा घोषणापत्र में किया गया है.

जाहिर है कि यह आसान नहीं होगा. हालांकि अखिलेश यादव के पास पांच साल हैं लेकिन सच यह है कि उत्तर प्रदेश के लोगों खासकर युवाओं में जितनी बेचैनी है, उसके कारण कई मामलों में कुछ करके दिखाने को उनके पास बहुत कम समय है. अखिलेश यादव ने अपने पिता से लोहिया जी का यह कथन जरूर सुना होगा कि ‘जिन्दा कौमें पांच साल इंतज़ार नहीं करती हैं.’

उत्तर प्रदेश में लोगों की आकांक्षाएं जिस तरह से उबल रही हैं, उससे लगता नहीं है कि लोग खासकर युवा बहुत दिनों तक इंतज़ार करेंगे. सनद रहे कि मायावती सरकार के पराभव की शुरुआत भी सिर्फ दो सालों में ही २००९ के आम चुनावों के साथ हो गई थी.

उम्मीद है कि अखिलेश यादव और समाजवादी पार्टी पिछली सरकार के हश्र को याद रखेगी. इस नाते अगले कुछ महीने अखिलेश की परीक्षा के होंगे. उनकी सबसे पहली और सबसे बड़ी परीक्षा कानून-व्यवस्था को बनाए रखने खासकर समाजवादी पार्टी से जुड़े विधायकों, सांसदों और पार्टी कार्यकर्ताओं-पदाधिकारियों को कानून हाथ में लेने, गुंडागर्दी करने और थानों को चलाने से रोकना होगा.

लेकिन चिंता की बात यह है कि मतगणना के नतीजों के आने के बाद से जिस तरह से पूरे प्रदेश से सपा नेताओं और समर्थकों की मनमानी, गुंडागर्दी और हंगामों की खबरें आ रही हैं, उससे माहौल बिगड़ रहा है. खासकर दलितों पर हमलों से सामाजिक सद्दभाव बिगड़ रहा है.

इसपर अगर तुरंत अंकुश नहीं लगाया गया और अपराधियों को दण्डित नहीं किया गया तो इसका बहुत गलत सन्देश जाएगा. यह कहने से काम नहीं चलेगा कि यह बसपा समर्थक अफसरों की सपा को बदनाम करने की साजिश है. इन बहानों से काम नहीं चलेगा.

सच सामने है. आगरा के बाह क्षेत्र के विधायक अरिदमन सिंह के समर्थकों पर बसपा समर्थक दलित ग्राम प्रधान के पति की हत्या का आरोप लगा है. यह और ऐसे ही कुछ और मामले अखिलेश यादव की सरकार के लिए पहले टेस्ट केस हैं. अगर इस मामले में विधायक सहित बाकी नामजद अपराधियों को तुरंत जेल भेजने में सरकार नाकाम रहती है तो सरकार की फिसलन शुरू हो जायेगी, जिसे फिर रोक पाना मुश्किल हो जाएगा.

कहने की जरूरत नहीं है कि सरकार संकेतों, संदेशों और मिसालों से चलती है. प्रदेश की नौकरशाही और पुलिस मशीनरी सपा के नए नेतृत्व से बयानों से आगे बढ़कर स्पष्ट संकेतों का इंतज़ार कर रही है. उदाहरण के लिए, चुनावों के दौरान अखिलेश यादव ने जिस तरह से डी.पी. यादव को पार्टी में घुसने से रोक दिया था, वहीँ से उनका राजनीतिक ग्राफ चढना शुरू हुआ.
उस एक कदम से सपा के खिलाफ विपक्ष के सबसे बड़े आरोप की धार भोथरी हो गई थी. हालांकि यह तथ्य है कि सपा के नेताओं और विधायकों में ऐसे दागी और अपराधिक छवि के लोगों की तादाद अच्छी-खासी है जो मौके के इंतज़ार में हैं.

इस अर्थ में अखिलेश यादव की यह भी बड़ी परीक्षा है कि वे मंत्रिमंडल में किन लोगों को शामिल करते हैं और उन्हें कौन से विभाग देते हैं? अगर मंत्रिमंडल में ऐसे कुछेक ‘माननीयों’ को जगह मिल जाती है जिनकी छवि दागदार है और आपराधिक मामलों में आरोपित हैं तो जैसे तालाब को गंदा करने के लिए एक भी मछली काफी होती है, वैसे ही मंत्रिमंडल में उनकी उपस्थिति भर से एक गलत सन्देश चला जाएगा. यही नहीं, उन्हें अपने विधायकों, सांसदों और मंत्रियों पर पूरा अंकुश रखना होगा.

इसी तरह नौकरशाहों की नियुक्तियों में भी अगर योग्य, ईमानदार, काम के प्रति निष्ठावान और संवेदनशील अफसरों के बजाय भ्रष्ट, अक्षम और काम के बजाय व्यक्तिगत निष्ठा को पैमाना बनाया गया तो वह स्थिति आते देर नहीं लगेगी जो पिछली बसपा और उसके पहले सपा और भाजपा सरकारों के दौरान रही है.

अखिलेश यादव को याद रखना होगा कि इस बार वे गठबंधन और सरकार चलाने की मजबूरी जैसे बहाने नहीं कर सकते हैं क्योंकि उन्हें उत्तर प्रदेश के मतदाताओं ने छप्पर फाड़ बहुमत दिया है.

 कहने की जरूरत नहीं है कि सपा और अखिलेश यादव को ऐतिहासिक अवसर मिला है. वे अगर मुलायम सिंह यादव के बेटे नहीं होते तो शायद ही यह मौका उन्हें मिलता. पर याद रहे, इतिहास में ऐसे मौके दुबारा नहीं मिलते हैं. उनके नेतृत्व की असली परीक्षा अब शुरू हो रही है. 

('नया इंडिया' में १२ मार्च को सम्पादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित लेख)