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शनिवार, जनवरी 25, 2014

नव उदारवादी आर्थिक सैद्धांतिकी के नए दांव हैं मोदी

लोगों के सामने है सीमित और संकीर्ण आर्थिक विकल्पों के बीच चुनाव की मजबूरी 

लोकसभा चुनावों के मद्देनजर केन्द्रीय सत्ता की दावेदार पार्टियों और उनके प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवारों के आर्थिक दर्शन और कार्यक्रमों/योजनाओं को लेकर आम लोगों से लेकर अर्थशास्त्रियों तक और शेयर बाजार के सटोरियों से लेकर देशी-विदेशी औद्योगिक लाबी संगठनों जैसे फिक्की, सी.आई.आई आदि तक सभी की उत्सुकता और दिलचस्पी बढ़ गई है.
यह स्वाभाविक भी है क्योंकि इन चुनावों में आर्थिक-राजनीतिक तौर पर बहुत कुछ दांव पर लगा हुआ है. सवाल यह है कि सुस्त पड़ती अर्थव्यवस्था की रफ़्तार को तेज करने से लेकर महंगाई और बेरोजगारी से निपटने तक, कृषि से लेकर उद्योगों तक, शिक्षा से लेकर स्वास्थ्य तक और गरीबी से लेकर बढ़ती गैर बराबरी तक अनेकों गंभीर आर्थिक चुनौतियों से निपटने के लिए प्रधानमंत्री के दावेदारों का आर्थिक दर्शन क्या है और उनके पास कौन से कार्यक्रम/योजनाएं हैं?
हालाँकि दोनों ही गठबंधनों के विस्तृत आर्थिक दर्शन, कार्यक्रम और योजनाओं के लिए उनके घोषणापत्र और विजन दस्तावेज का इंतज़ार करना पड़ेगा लेकिन बीते सप्ताह कांग्रेस की ओर से चुनाव अभियान की अगुवाई कर रहे राहुल गाँधी ने कांग्रेस महासमिति और खासकर भाजपा/एन.डी.ए के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी ने पार्टी की राष्ट्रीय परिषद की बैठक में अपना आर्थिक दर्शन और कार्यक्रम पेश किया है.

इसमें भी जहाँ राहुल गाँधी आर्थिक दर्शन के नामपर यू.पी.ए सरकार की उपलब्धियों (आर.टी.आई, मनरेगा, आर.टी.ई और भोजन के अधिकार आदि) को गिनाने और समावेशी विकास के रटे-रटाए जुमलों को दोहराने से आगे नहीं बढ़ पाए, वहीँ नरेन्द्र मोदी ने बड़े-बड़े कार्यक्रमों/योजनाओं और कुछ लोकप्रिय मैनेजमेंट जुमलों के एलान के जरिये सपनों की सौदागरी करने में कोई कोर-कसर नहीं उठा रखी.

लेकिन अगर बारीकी से देखा जाए तो मोदी और राहुल के आर्थिक दर्शन में बुनियादी तौर पर कोई फर्क नहीं है. अगर कोई फर्क है तो सिर्फ उसके विभिन्न पहलुओं पर जोर और उसकी प्रस्तुति, पैकेजिंग और मार्केटिंग के तरीके में फर्क है.
लेकिन बुनियादी तौर पर दोनों ‘मुक्त बाजार’ पर आधारित नव उदारवादी आर्थिक सैद्धांतिकी के पैरोकार हैं जो अर्थव्यवस्था में राज्य की सीमित या न के बराबर भूमिका और निजी पूंजी खासकर बड़ी देशी-विदेशी पूंजी को अगुवा भूमिका देने की वकालत करती है. नव उदारवादी आर्थिक सैद्धांतिकी मूलतः मुक्त बाजार पर आधारित भूमंडलीकरण, उदारीकरण और निजीकरण को आगे बढाती है और वह न सिर्फ अर्थव्यवस्था में राज्य की सीमित भूमिका पर जोर देती है बल्कि राज्य की कल्याणकारी भूमिका को भी सीमित करने की पैरवी करती है.
लेकिन मुश्किल यह है कि पिछले दो दशकों से देश में नव उदारवादी आर्थिक सैद्धांतिकी पर आधारित आर्थिक सुधारों को आगे बढ़ाए जाने और जी.डी.पी के पैमाने पर आर्थिक विकास की अपेक्षाकृत तेज गति के बावजूद गरीबों की स्थिति में कोई उल्लेखनीय बदलाव नहीं आया है, आर्थिक गैर बराबरी तेजी से बढ़ी है और गरीबों, निम्न मध्यमवर्ग, छोटे-मध्यम किसानों, श्रमिकों, दलितों और आदिवासियों में असंतोष बढ़ा है.

इसकी मुख्य वजह यह है कि उन्हें आर्थिक सुधारों का कोई खास फायदा नहीं मिला है लेकिन कीमत भारी चुकानी पड़ी है. सच यह है कि इन वर्गों के लिए आर्थिक सुधार एक कड़वी गोली की तरह साबित हुए हैं जिसे और निगलने के लिए वे तैयार नहीं हैं. यहाँ तक कि इन आर्थिक सुधारों के लाभार्थी- मध्यम वर्ग में भी हाल के वर्षों में अवसरों के सीमित होने और याराना पूंजीवाद की अगुवाई में बेतहाशा भ्रष्टाचार और महंगाई बढ़ने से निराशा का माहौल है.

इसके कारण नव उदारवादी आर्थिक सुधारों पर सवाल उठने लगे हैं और राजनीतिक तौर पर नव उदारवादी आर्थिक सुधारों को आम लोगों के बीच स्वीकार्य बनाना एक बड़ी चुनौती बन गई है. कांग्रेस के नेतृत्ववाले यू.पी.ए ने इसी चुनौती के मद्देनजर नव उदारवादी आर्थिक सुधारों की कड़वी गोली को लोगों में स्वीकार्य बनाने के लिए उसे मनरेगा जैसी योजनाओं की चाशनी में लपेट कर पेश करने और गरीबों, कृषि मजदूरों, दलितों और आदिवासियों का समर्थन जीतने की कोशिश की लेकिन शुरूआती सफलता के बाद यह रणनीति भी दस सालों में फीकी पड़ने लगी है.
दूसरी ओर, देशी-विदेशी बड़ी पूंजी और कार्पोरेट्स आर्थिक सुधारों की गति धीमी पड़ने के कारण बेचैन होने लगे हैं. वे सरकार से सुधारों की गति तेज करने यानी सब्सिडी में कटौती और खुद के लिए अधिक से अधिक रियायतें मांग रहे हैं.    
हैरानी की बात नहीं है कि नरेन्द्र मोदी ने यू.पी.ए/कांग्रेस की अर्थनीति की आलोचना करते हुए कहा कि वे ‘खैरात बाँटने’ वाली आर्थिक सैद्धांतिकी (डोलोनोमिक्स) यानी सब्सिडी के विरोधी हैं. हालाँकि वे गरीबों और कमजोर वर्गों के वोट को लुभाने के दबाव के कारण यह खुलकर नहीं कहते लेकिन इसका सीधा संकेत यह है कि वे मनरेगा और ऐसी दूसरी ‘लोकलुभावन योजनाओं’ में सब्सिडी दिए जाने के पक्ष में नहीं हैं.

उनका तर्क है कि सिर्फ वोट बटोरने के लिए शुरू की गई लोकलुभावन योजनाएं गरीबों और कमजोर वर्गों को अपने पैरों पर खड़ा नहीं होने देतीं, कीमती संसाधनों की बर्बादी है, भ्रष्टाचार को बढ़ावा देती हैं और सबसे बढ़कर मुक्त बाजार की व्यवस्था को तोडमरोड (डिसटार्ट) करती है.

नव उदारवादी आर्थिक सैद्धांतिकी के पैरोकारों की तरह उनका भी दावा है कि वे अर्थव्यवस्था में निजी निवेश को प्रोत्साहित करके रोजगार के नए अवसर पैदा करेंगे ताकि गरीबों को अपने पैरों पर खड़ा होने का मौका मिल सके.

दरअसल, मोदी नव उदारवादी आर्थिक सैद्धांतिकी को लोगों में स्वीकार्य बनाने के लिए उसकी ‘विकास’ और ‘गुड गवर्नेंस’ के सपनों के साथ पैकेजिंग करने की कोशिश कर रहे हैं. एक अच्छे सेल्समैन की तरह वे देश के चारों दिशाओं में बुलेट ट्रेन से लेकर १०० स्मार्ट शहर बसाने, देश के हर राज्य में आई.आई.टी-आई.आई.एम-एम्स खोलने से लेकर ब्रांड इंडिया को चमकाने और गैस ग्रिड से लेकर राष्ट्रीय फाइबर आप्टिक ब्राडबैंड नेटवर्क बनाने तक की बड़ी और अत्यंत महत्वाकांक्षी योजनाओं के एलान से निम्न, मध्यम और उच्च मध्यमवर्ग को चमत्कृत करने की कोशिश कर रहे हैं.
दूसरी ओर, कृषि से लेकर गांव तक और किसान से लेकर महिलाओं और युवाओं की बातें करके सबको खुश करने की कोशिश कर रहे हैं, वहीँ आर.एस.एस से जुड़े अपने कोर समर्थकों को पारिवारिक मूल्यों से लेकर भारत माता के नारों से बाँधने में जुटे हैं.
कहने की जरूरत नहीं है कि मोदी कोई कसर नहीं छोड़ना नहीं चाहते हैं. आश्चर्य नहीं कि वे अपने आर्थिक दर्शन और कार्यक्रम/योजनाओं को वोटरों के सभी वर्गों के लिए आकर्षक और लुभावना बनाने के लिए हर उस सपने को बेच रहे हैं जो पिछले डेढ़ दशकों में बड़ी पूंजी और कार्पोरेट्स ने देश को बेचने की कोशिश की है.

कहने की जरूरत नहीं है कि मोदी की बड़ी-बड़ी घोषणाएं और योजनाएं उनकी मौलिक सोच से नहीं बल्कि वहीँ से आईं हैं. आप चाहें तो पिछले सालों में विश्व बैंक-मुद्राकोष से लेकर मैकेंसी, बोस्टन कंसल्टिंग ग्रुप, डेलोइट, प्राइस-हॉउस कूपर्स जैसी बड़ी कारपोरेट कंसल्टिंग कंपनियों और योजना आयोग तक और सी.आई.आई-फिक्की-एसोचैम जैसी औद्योगिक लाबी संगठनों से लेकर गुलाबी अखबारों और मैनेजमेंट गुरुओं के भाषणों, सलाहों, पालिसी दस्तावेजों और कंट्री पेपर्स में इन बड़ी और महत्वाकांक्षी योजनाओं के ब्लू-प्रिंट देख सकते हैं.

हैरानी की बात नहीं है कि नरेन्द्र मोदी की इन घोषणाओं पर शेयर बाजार, देशी-विदेशी कारपोरेट समूहों से लेकर अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसियां तक खुश हैं और मोदी के सत्ता में आने की संभावनाओं को लेकर उत्साहित हैं. कार्पोरेट्स और देशी-विदेशी बड़ी पूंजी को अब सिर्फ मोदी से ही उम्मीदें हैं कि वे नव उदारवादी आर्थिक सुधारों को आगे बढ़ा सकते हैं क्योंकि कांग्रेस/यू.पी.ए की साख भ्रष्टाचार और महंगाई के कारण बहुत नीचे गिर गई है.
देशी-विदेशी कार्पोरेट्स और बड़ी पूंजी को मोदी के रूप में एक ऐसा नेता दिखाई पड़ रहा है जिसकी नव उदारवादी सुधारों को आगे बढ़ाने की प्रतिबद्धता असंदिग्ध है और जो इसे बेहतर तरीके से पैकेज और मार्केट करके लोगों में स्वीकार्य भी बना सकता है.
यही नहीं, कार्पोरेट्स को यह भी भरोसा है कि मोदी ही इन सुधारों और बड़ी इन्फ्रास्ट्रक्चर योजनाओं (पास्को, वेदांता आदि) की राह में रोड़ा बन रहे ‘जल, जंगल और जमीन’ बचाने के जनांदोलनों से राजनीतिक और पुलिसिया तरीके से सख्ती से निपट सकते हैं. मोदी ने जिस तरह से गुजरात में नर्मदा बचाओ आंदोलन को दबाने की कोशिश की या अपने हाल के भाषणों में ‘झोलावालों’ (एन.जी.ओ और जनांदोलनों) को निशाना बनाया है, उससे भी कारपोरेट क्षेत्र आश्वस्त है.

गुजरात में मोदी ने ‘डिलीवर’ करके दिखाया है जबकि यू.पी.ए/कांग्रेस का ‘समावेशी विकास’ का नव उदारवादी माडल अब उस तरह से ‘डिलीवर’ नहीं कर पा रहा है, जैसे उसने २००४ के बाद के शुरूआती पांच-सात वर्षों में ‘डिलीवर’ किया था. यही नहीं, कार्पोरेट्स का भरोसा जीतने के लिए मोदी ने हाल में फिक्की के सम्मेलन में वायदा किया कि वे यू.पी.ए सरकार के राज में शुरू किये गए ‘टैक्स आतंकवाद’ को खत्म करेंगे.

उल्लेखनीय है कि देशी-विदेशी कार्पोरेट्स पिछले काफी दिनों से वोडाफोन से लेकर नोकिया टैक्स विवाद को सरकार का ‘टैक्स आतंकवाद’ बता रहे हैं. मोदी इससे निजात दिलाने का वायदा कर रहे हैं. यह और बात है कि इससे टैक्स कानूनों में मौजूद छिद्रों का लाभ उठानेवाले कार्पोरेट्स को खुली छूट मिल जाएगी. दोहराने की जरूरत नहीं है कि कार्पोरेट्स मोदी से खुश क्यों हैं?
लेकिन उससे बड़ा सवाल यह है कि क्या मोदी अपने आर्थिक दर्शन और योजनाओं/कार्यक्रमों से गरीबों और आम आदमी को अपनी ओर खींच पाएंगे? दूसरे, क्या वे जो वायदे कर रहे हैं, उसे ‘डिलीवर’ कर पाएंगे? यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि बड़ी-बड़ी घोषणाएं करना एक बात है और उसे आर्थिक तौर पर लागू करना बिलकुल दूसरी बात है.
याद रहे कि देश में कई बड़ी इन्फ्रास्ट्रक्चर परियोजनाएं इसलिए ठप्प हैं क्योंकि उनकी आर्थिक-वित्तीय उपयोगिता (वायबिलिटी) पर सवाल उठ गए हैं. उदाहरण के लिए, बुलेट ट्रेन की योजना दुनिया के अधिकांश देशों में नाकाम साबित हुई है.
दूसरी ओर, कांग्रेस/यू.पी.ए ने २०१२ के उत्तरार्ध से खुदरा व्यापार को विदेशी पूंजी के लिए खोलने और पेट्रोलियम उत्पादों से सब्सिडी खत्म करने से लेकर हाल में के.जी. बेसिन गैस की कीमतों और पर्यावरण सम्बन्धी रुकावटों को हटाने के फैसलों के जरिये बड़ी पूंजी को खुश करने और उसका भरोसा जीतने की कोशिश की है लेकिन लगता है कि अब तक काफी देर हो चुकी है.

यही कारण है कि राहुल गाँधी के सी.आई.आई और फिक्की के सम्मेलनों में जाकर कार्पोरेट्स को आश्वस्त करने के बावजूद वे उनका भरोसा नहीं हासिल कर पा रहे हैं. यही नहीं, कांग्रेस की आर्थिकी अपने ही अंतर्विरोधों में उलझकर रह गई है और वह न कार्पोरेट्स का और न आम आदमी का भरोसा जीत पा रही है.

लेकिन असली मुद्दा यह है कि प्रधानमंत्री पद के दोनों दावेदारों की बुनियादी तौर पर एक तरह के आर्थिक दर्शन- नव उदारवादी और कारपोरेटपरस्त सैद्धांतिकी और योजनाओं/कार्यक्रमों के कारण आमलोगों के पास चुनने को वास्तव में बहुत सीमित और संकीर्ण विकल्प रह गया है.   

('राष्ट्रीय सहारा' के हस्तक्षेप में 25 जनवरी को प्रकाशित टिप्पणी)

गुरुवार, अक्टूबर 31, 2013

बढ़ती महंगाई छीन रही है गरीबों के मुंह से निवाला

सरकार माने या न माने लेकिन सीधा रिश्ता है महंगाई और भूख के बीच

एक बार फिर से तेज आर्थिक विकास के दावों और उछलते शेयर बाजार की खबरों के बीच वैश्विक भूख सूचकांक में भारत की ६३वें स्थान पर मौजूदगी और दुनिया में भूखमरी के शिकार लोगों में एक चौथाई के भारत में होने की रिपोर्ट एक रुटीन खबर की तरह आई और चली गई.
लगा नहीं कि इस रिपोर्ट से कहीं कोई बेचैनी हुई और नीति नियंताओं को कोई शर्म महसूस हुई. इस मुद्दे पर हर ओर छाई एक ‘षड्यंत्रपूर्ण चुप्पी’ को समझना मुश्किल नहीं है.  
यहाँ तक कि हर रात प्राइम टाइम में ‘देश की अंतरात्मा’ की नई ‘आवाज़’ बन गए टी.वी एंकरों ने भी नीति नियंताओं को कटघरे में खड़ा करने और ‘देश उनसे जानना चाहता है’ (नेशन वांट्स टू नो) की तर्ज पर तीखे सवाल पूछने की जरूरत नहीं समझी. ठीक भी है कि खाए-पीये-अघाये उच्च मध्यवर्ग और उनके नुमाइंदे एंकरों के लिए २१ करोड़ भारतीयों की भूख कोई बड़ा मुद्दा नहीं है.

हैरानी की बात नहीं है कि जब यह रिपोर्ट आई कि भूखमरी के सूचकांक में भारत सब सहारा अफ्रीका के इथियोपिया, सूडान, चाड और नाइजर जैसे देशों की कतार में खड़ा है, उसी के आसपास एक और रूटीन खबर आई और चली गई कि थोक मूल्य सूचकांक पर आधारित मुद्रास्फीति यानी महंगाई की वृद्धि दर बढ़कर ६.४६ प्रतिशत पहुँच गई है जोकि पिछले सात महीने की सबसे ऊँची दर है. इसमें खाद्य वस्तुओं की महंगाई वृद्धि दर वास्तव में आसमान छू रही है और १८ फीसदी तक पहुँच गई है.
हालाँकि यू.पी.ए सरकार इसे स्वीकार नहीं करेगी लेकिन इन दोनों खबरों के बीच सीधा संबंध है. आसमान छूती महंगाई और भूखमरी सूचकांक पर भारत के लगातार शर्मनाक प्रदर्शन के बीच गहरा संबंध है.

असल में, महंगाई गरीबों पर अतिरिक्त टैक्स की तरह है जो उनसे उनकी रही-सही क्रयशक्ति भी छीन लेती है. महंगाई बाजार की वह व्यवस्था है जिसके जरिये गरीबों को बाजार से बाहर कर दिया जाता है. इसके कारण उसकी बढ़ी हुई कमाई भी उसकी भूख मिटाने में नाकाम रहती है और भोजन उसकी पहुँच से और बाहर हो जाता है. 

लेकिन लगातार ऊँची महंगाई और भूख के बीच इस सीधे रिश्ते को नीति नियंता स्वीकार नहीं करते हैं. इस मुद्दे पर उनकी उलटबांसियां हैरान करनेवाली है. भारतीय अर्थव्यवस्था के मैनेजरों और नीति नियंताओं का दावा है कि महंगाई खासकर खाद्य वस्तुओं की महंगाई इसलिए बढ़ रही है क्योंकि गरीबों की आय बढ़ी है और इस कारण खाद्य वस्तुओं की मांग पर दबाव बढ़ा है और महंगाई बढ़ रही है.
याद कीजिए, कुछ वर्ष पहले अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज बुश ने एक बहुत हास्यास्पद बयान में कहा था कि दुनिया भर में खाद्यान्नों की कीमतें इसलिए बढ़ रही हैं क्योंकि भारत-चीन में लोग ज्यादा खाने लगे हैं.
कहने की जरूरत नहीं है कि भारत में भी बुश के बहुतेरे प्रशंसक हैं खासकर अर्थव्यवस्था के मैनेजरों में. आश्चर्य नहीं कि जब यह तथ्य सामने रखा गया कि भारत में प्रति व्यक्ति अनाजों की उपलब्धता लगातार घट रही है तो इसी से मिलता-जुलता तर्क दिया गया था कि आय बढ़ने के साथ लोगों के खानपान के तरीकों और रुचियों में बदलाव आया है और लोग रोटी-चावल-दाल के बजाय अब प्रोटीन की चीजें जैसे दूध-अंडे-मांस-मछली ज्यादा खा रहे हैं.

यह तर्क फ्रेंच महारानी मैरी की उस मानसिकता से अलग नहीं है जिसमें उसने लोगों को रोटी न मिलने की शिकायत पर केक खाने की सलाह दी थी.

तथ्य यह है कि खुद सरकार की रिपोर्ट बताती है कि ग्रामीण गरीबों के भोजन में कुल कैलोरी और प्रोटीन के उपभोग में कमी आई है. इसी तरह आंकड़े बताते हैं कि प्रति व्यक्ति अनाजों और दलों की उपलब्धता में लगातार गिरावट आई है.
उदाहरण के लिए, १९८७-९१ के बीच औसतन प्रति व्यक्ति अनाज की उपलब्धता ४४० ग्राम और दाल ४० ग्राम थी जो २००७-१० के बीच औसतन ४०४ ग्राम और ३६ ग्राम रह गई है. हालाँकि ये आंकड़े भी सच्चाई बयान नहीं करते क्योंकि इसमें निजी व्यापारियों के पास उपलब्ध अनाजों को जोड़ने के अलावा संपन्न वर्गों के अति उपभोग को भी शामिल किया गया है.
दरअसल, सच्चाई यह है कि पिछले दो दशकों में ऊँची वृद्धि दर के साथ ऊँची महंगाई दर ने लोगों के मुंह से निवाला छीन लिया है. इन वर्षों में गरीबों की आय में जो मामूली वृद्धि हुई, वह भी ऊँची महंगाई ने लील ली है.

यही कारण है कि ऊँची वृद्धि दर के बावजूद देश में न सिर्फ कुपोषण कम नहीं हो रहा है बल्कि बाल मृत्यु दर भी ऊँची बनी हुई है और भारत भूखमरी सूचकांक में सब सहारा देशों के साथ खड़ा है.

हैरानी की बात यह है कि अंतर्राष्ट्रीय बाजार में गेहूं की कीमतों में १६ फीसदी, चावल में २३ और मक्के में ३५ फीसदी की गिरावट दर्ज की गई लेकिन भारत में रिकार्ड अनाज पैदावार और सरकारी गोदामों में रिकार्ड अनाज भण्डार के बावजूद खादयान्नों की कीमतों में कोई गिरावट नहीं आई है.

ताजा रिपोर्टों के मुताबिक, महंगाई कम करने के सरकार के तमाम दावों के बावजूद उपभोक्ता मूल्य सूचकांक लगातार दोहरे अंकों के आसपास बना हुआ है और सितम्बर महीने में यह बढ़कर ९.८४ प्रतिशत तक पहुँच गया है.
यही नहीं, खेतिहर श्रमिकों और ग्रामीण श्रमिकों के लिए खुदरा महंगाई की दर सितम्बर महीने में १२ फीसदी से ऊपर दर्ज की गई है. इस महंगाई दर खासकर खाद्य वस्तुओं की महंगाई के साथ सबसे खास बात यह है कि पिछले चार-पांच सालों से यह लगातार दोहरे अंकों में बनी हुई है.
इसकी सबसे अधिक कीमत जाहिर है कि गरीबों खासकर पहले से भूखमरी के शिकार लोगों को उठानी पड़ रही है. इसका सबूत यह है कि गरीबों और निम्न मध्यवर्ग के कुल आय और उपभोग का बड़ा हिस्सा भोजन पर खर्च करना पड़ रहा है. इस कारण लोगों को अपनी बचत से लेकर बच्चों की शिक्षा और स्वास्थ्य पर खर्च में कटौती करनी पड़ रही है.

आश्चर्य नहीं कि चुनावों के मद्देनजर हो रहे सभी जनमत सर्वेक्षणों में आमलोग सबसे बड़े मुद्दों में की सूची में महंगाई को सबसे ऊपर बता रहे हैं. दोहराने की जरूरत नहीं है कि यह महंगाई लोगों को इसलिए ज्यादा चुभ और परेशान कर रही है क्योंकि इसमें खाद्य वस्तुओं की महंगाई की सबसे बड़ी भूमिका है और यह गरीबों की बड़ी संख्या को भूखमरी की ओर ढकेल रही है.          

इस सिलसिले में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भोजन के अधिकार के कानून और गरीबों की बड़ी संख्या को सस्ती दरों पर अनाज मुहैया कराने के दावों के बावजूद यह सबक याद रखना जरूरी है कि खाद्य वस्तुओं की ऊँची महंगाई पर रोक नहीं लगाई गई तो शोध बताते हैं कि पीडीएस का अनाज चोरबाजारी के जरिये बाजार में पहुँचने लगता है और नतीजे में, खाद्यान्नों की उठान भी गिर जाती है.
दूसरी ओर, गरीबों को उसी अनाज की ऊँची कीमत चुकानी पड़ती है. साफ़ है कि महंगाई खासकर खाद्य वस्तुओं की महंगाई पर लगाम लगाये बगैर गरीबों को भूखमरी की मार से बचा पाना मुश्किल है.       
( 'शुक्रवार' के ३१ अक्टूबर के अंक में प्रकाशित)

शुक्रवार, जुलाई 05, 2013

किसके लिए बढ़ाई गईं हैं गैस की कीमतें?

आम उपभोक्ताओं को इसकी भारी कीमत चुकानी होगी जबकि रिलायंस चांदी नहीं सोना काटेगी

पहली क़िस्त

यह किसी से छुपा नहीं है कि यू.पी.ए सरकार कार्पोरेट्स और बड़ी विदेशी पूंजी को खुश करने और उसका भरोसा जीतने के लिए बेचैन है. जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आ रहे हैं, उसकी यह बेचैनी बढ़ती जा रही है. कार्पोरेट्स और बड़ी विदेशी पूंजी को खुश करने के लिए वह किसी भी हद तक जाने को तैयार है.
इसका ताजा सबूत यह है कि खुद सरकार के अंदर बिजली और उर्वरक मंत्रालय के अलावा कई वरिष्ठ मंत्रियों की आपत्तियों और विरोध को ठुकराते हुए उसने प्राकृतिक गैस की कीमतों को दोगुना करने का फैसला किया है. इस फैसले के मुताबिक, अगले साल एक अप्रैल से प्राकृतिक गैस की कीमत मौजूदा ४.२ डालर प्रति एम.बी.टी.यू (मिलियन ब्रिटिश थर्मल यूनिट) से १०० फीसदी बढ़कर ८.४ डालर प्रति एम.बी.टी.यू हो जाएगी.
मजे की बात यह है कि खुद पेट्रोलियम मंत्रालय ने गैस की कीमत ६.७७ डालर प्रति एम.बी.टी.यू प्रस्तावित किया था लेकिन मंत्रिमंडल ने कई कदम आगे बढ़कर उसे ८.४२ डालर प्रति एम.बी.टी.यू करने का फैसला किया.

यही नहीं, इसके बाद हर तीन महीने पर कीमतों की समीक्षा होगी जिसका एक ही अर्थ है कि कीमतें आगे भी बढ़ती रहेंगी और हैरानी नहीं होगी, अगर २०१५ तक ये १४-१५ डालर प्रति एम.बी.टी.यू तक पहुँच जाएँ.

ऐसा मानने की वजह यह है कि घरेलू प्राकृतिक गैस की कीमतें तय करने के लिए यू.पी.ए सरकार ने प्रधानमंत्री के आर्थिक सलाहकार सी. रंगराजन समिति की सिफारिशों को स्वीकार कर लिया है जिसने गैस की कीमतें अंतर्राष्ट्रीय कीमतों और आयातित गैस की कीमतों के बराबर करने का फार्मूला पेश किया है.

यह फार्मूला कुछ ऐसा है, जैसे भारत में पैदा होनेवाले अनाजों और फलों-सब्जियों की कीमत अंतर्राष्ट्रीय कीमतों या अमेरिका/यूरोप की कीमतों के बराबर कर दिया जाए. उदाहरण के लिए, अमेरिका में इस समय टमाटर अगर लगभग २ डालर प्रति किलो है तो भारत में उसकी कीमत १२० रूपये प्रति किलो कर दी जाए.
हैरानी की बात यह है कि यह फार्मूला सुझानेवाले अर्थशास्त्री सी. रंगराजन की घरेलू गैस की कीमतें तय करने के बारे में कोई विशेषज्ञता नहीं है. ‘द हिंदू’ के संपादकीय पृष्ठ पर एक लेख में उर्जा मामलों के जाने-माने विशेषज्ञ सूर्य पी. सेठी ने घरेलू गैस की कीमतों को तय करने के रंगराजन समिति के फार्मूले को ‘खुला मजाक’ बताया था. उनका तर्क था कि घरेलू गैस की कीमतें घरेलू उत्पादन लागत, मांग और आपूर्ति के आधार पर तय होनी चाहिए.           
इसके बावजूद सरकार ने ९ महीने बाद लागू होनेवाली गैस की कीमतों को जिस जल्दबाजी में दोगुना बढ़ाने का फैसला किया है, उससे उसकी असली मंशा साफ़ हो जाती है. आश्चर्य नहीं कि इस फैसले के तुरंत बाद कई सप्ताहों से पस्त चल रहे शेयर बाजार में अचानक ५१२ अंकों का उछाल दर्ज किया गया. खासकर मुकेश अम्बानी की कंपनी रिलायंस के अलावा अन्य सरकारी तेल-गैस कंपनियों के शेयरों की कीमतों में खासी तेजी देखी गई.

इससे अनुमान लगाना मुश्किल नहीं है कि इस फैसले से किसे फायदा होगा और सबसे अधिक खुश कौन होगा? यहाँ यह उल्लेख करना भी जरूरी है कि मुकेश अम्बानी की रिलायंस पिछले दो साल से यू.पी.ए सरकार पर गैस की कीमतों को बढ़ाने की मांग को लेकर जबरदस्त दबाव बनाए हुए थी.

इसके लिए उसने देश में गैस की भारी किल्लत और उसके कारण अनेकों गैस आधारित बिजलीघरों के ठप्प पड़े रहने के बावजूद कृष्णा-गोदावरी (के.जी.) बेसिन से गैस का उत्पादन घटाकर महज १९ प्रतिशत तक कर दिया था. यही नहीं, रिलायंस के दबाव का अंदाज़ा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि इस मांग का विरोध कर रहे तत्कालीन पेट्रोलियम मंत्री जयपाल रेड्डी को पिछले साल के मंत्रिमंडल फेरबदल में हटाकर विज्ञान और तकनीकी मंत्री बना दिया गया था.
उसी दिन यह तय हो गया था कि यू.पी.ए सरकार मुकेश अम्बानी की मांग को पूरा करने में ज्यादा समय नहीं लगायेगी. उम्मीद के मुताबिक, नए पेट्रोलियम मंत्री वीरप्पा मोइली पिछले छह महीने से इस एकसूत्री मुहिम में जुटे हुए थे और रिलायंस को छप्पर फाड़ मुनाफे की गारंटी करनेवाले इस फैसले के पक्ष में दलीलें तैयार कर रहे थे.  
इस फैसले के पक्ष में यू.पी.ए सरकार और मोइली की सबसे बड़ी दलील यह है कि इससे प्राकृतिक गैस की खोज और उत्पादन के क्षेत्र में निवेश खासकर विदेशी बढ़ेगा जिससे गैस के उत्पादन में वृद्धि होगी और आयात पर निर्भरता कम होगी.

लेकिन सच ठीक इसके उलट है. अखबारी रिपोर्टों के मुताबिक, खुद मंत्रिमंडल की बैठक में पूर्व पेट्रोलियम मंत्री जयपाल रेड्डी ने इस फैसले का विरोध करते हुए कहा कि इस फैसले के कारण सरकार समेत आम लोगों पर पड़नेवाला बोझ निश्चित है लेकिन इसके संभावित फायदे अनिश्चित हैं. यह बोझ मामूली नहीं है.

सी.पी.आई सांसद गुरुदास दासगुप्ता के मुताबिक, अकेले रिलायंस की के.जी बेसिन गैस की बढ़ी कीमतों के कारण बिजली और उर्वरक के मद में सरकार पर पांच वर्षों (२०१४-२०१९) में ९६००० करोड़ रूपये की सब्सिडी का बोझ पड़ेगा.

कहने की जरूरत नहीं है कि भविष्य में गैस की कीमतों में और बढ़ोत्तरी के साथ सब्सिडी का बोझ भी बढ़ता जाएगा. लेकिन राजकोषीय घाटा कम करने के लिए सब्सिडी में कटौती की मौजूदा नीति के मद्देनजर सरकार आखिरकार यह बोझ आम उपभोक्ताओं पर ही डालेगी जिसका अर्थ होगा- यात्रा भाड़े से लेकर बिजली और खाद की दरों में भारी बढ़ोत्तरी.
एक मोटे आकलन के मुताबिक, ताजा वृद्धि के लागू होने पर गैस से बननेवाली बिजली में प्रति यूनिट दो रूपये की वृद्धि होगी जबकि यूरिया ६००० रूपये टन यानी प्रति किलो ६ रूपया महंगा हो जाएगा. इसी तरह सी.एन.जी की कीमतों में न्यूनतम ३० फीसदी की बढ़ोत्तरी तय है.
स्वतंत्र आकलनों के मुताबिक, गैस की बढ़ी हुई कीमतों के बाद गैस से बननेवाली बिजली की कीमत प्रति यूनिट लगभग ५.४० रूपये से लेकर ६.४० पैसे प्रति यूनिट तक पहुँच सकती है. सवाल यह है कि क्या बिजली की यह भारी कीमत आम उपभोक्ता चुका पाएंगे?

वित्त मंत्री पी. चिदंबरम का तर्क है कि आम उपभोक्ता चाहता है कि बिजली न होने से अच्छा है कि थोड़ी महँगी ही सही लेकिन बिजली मिले. लेकिन लगता है, चिदम्बरम बहुत धूम-धाम के साथ शुरू हुए एनरान के दाभोल प्रोजक्ट को भूल गए जो इसलिए फ्लाप साबित हुआ क्योंकि उसकी बिजली बहुत महँगी थी और राज्य बिजली बोर्ड महँगी बिजली खरीदकर सस्ती बिजली बेचने के कारण दिवालिया होने के कगार पर पहुँच गया.

आशंका यह है कि घरेलू गैस की कीमतों में भारी वृद्धि के बाद गैस से चलनेवाले ज्यादातर बिजलीघर महँगी बिजली के कारण एनरान की गति को प्राप्त होंगे या फिर इसकी कीमत आम उपभोक्ता को चुकानी होगी.

(साप्ताहिक 'शुक्रवार' के ताजा अंक में प्रकाशित टिप्पणी की पहली क़िस्त। कल पढ़िए अगली क़िस्त) 

शनिवार, जून 08, 2013

आई.सी.यू की ओर बढ़ती अर्थव्यवस्था

आर्थिक संकट से निपटने की यू.पी.ए सरकार की रणनीति से माया मिली, न राम वाली स्थिति पैदा हो रही है


संकट में फंसी भारतीय अर्थव्यवस्था की फिसलन जारी है. जैसीकि आशंका थी, पिछले वित्तीय वर्ष (१२-१३) की चौथी तिमाही (जनवरी से मार्च’१३) में अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर मात्र ४.८ फीसदी रही और पूरे वर्ष में पांच फीसदी दर्ज की गई जोकि आर्थिक वृद्धि दर के मामले में पिछले एक दशक में अर्थव्यवस्था का सबसे फीका और बदतर प्रदर्शन है.
यही नहीं, चौथी तिमाही की ४.८ फीसदी की आर्थिक वृद्धि दर इसलिए और भी निराशाजनक है क्योंकि यह तीसरी तिमाही की वृद्धि दर ४.७ फीसदी की तुलना न के बराबर सुधार की ओर संकेत करती है. इससे न सिर्फ अर्थव्यवस्था के एक गंभीर गतिरुद्धता में फंस जाने का पता चलता है बल्कि उसमें सुधार की उम्मीदों को भी गहरा झटका लगा है.
हालाँकि इसमें हैरानी की कोई बात नहीं है क्योंकि केन्द्रीय सांख्यिकी संगठन (सी.एस.ओ) ने फ़रवरी में जारी पूर्वानुमान में वर्ष १२-१३ में जी.डी.पी वृद्धि दर के पांच फीसदी रहने का संकेत दिया था. लेकिन उस समय अर्थव्यवस्था के सरकारी मैनेजरों ने इससे बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद जाहिर की थी क्योंकि उन्हें चौथी तिमाही में अर्थव्यवस्था में सुधार के संकेत दिखाई दे रहे थे.

उन्हें लग रहा था कि अर्थव्यवस्था तीसरी तिमाही में सबसे निचले स्तर पर पहुँच चुकी है जहाँ से उसमें सुधार होना शुरू हो जाएगा. उनकी उम्मीद की दूसरी वजह यह थी कि पिछले साल अगस्त में पी. चिदंबरम के वित्त मंत्रालय की कमान संभालने के बाद से यू.पी.ए सरकार ने नव उदारवादी आर्थिक सुधारों को आगे बढ़ानेवाले कई बड़े फैसले किये हैं जिसका असर चौथी तिमाही में दिखने की उम्मीद थी.

लेकिन ताजा रिपोर्टों से साफ़ है कि अर्थव्यवस्था अभी भी आई.सी.यू में पड़ी हुई है. सी.एस.ओ के मुताबिक, वर्ष २०१२-१३ में औद्योगिक उत्पादन की वृद्धि दर मात्र एक फीसदी और उसमें सबसे महत्वपूर्ण विनिर्माण क्षेत्र (मैन्युफैक्चरिंग) की वृद्धि दर मात्र १.२ फीसदी रही.
क्रेडिट रेटिंग एजेंसी- क्रिसिल के अनुसार, मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र का यह प्रदर्शन पिछले दशक का सबसे बदतर प्रदर्शन है. क्रिसिल के मुताबिक, यह १९९१-९२ के संकट की याद दिलाता है जब औद्योगिक उत्पादन की वृद्धि दर गिरकर मात्र ०.६ फीसदी और मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र की वृद्धि दर नकारात्मक (-)०.८ फीसदी रह गई थी.
चिंता की बात यह भी है कि न सिर्फ जनवरी से मार्च की तिमाही में बल्कि चालू वित्तीय वर्ष के पहले महीने- अप्रैल में आठ मूल ढांचागत उद्योगों की वृद्धि दर मात्र २.३ फीसदी दर्ज की गई है जोकि पिछले साल इसी अवधि में दर्ज की गई ५.७ फीसदी की वृद्धि दर की आधी से भी कम है.

यही नहीं, इस सप्ताह जारी एच.एस.बी.सी की पी.एम.आई रिपोर्ट के मुताबिक, बीते मई महीने में औद्योगिक गतिविधियों में सुधार तो दूर अप्रैल की तुलना में मामूली गिरावट के संकेत हैं. पी.एम.आई औद्योगिक इकाइयों के मैनेजरों से मांग सम्बन्धी सर्वेक्षण के आधार पर तैयार किया जाता है और वह मई महीने में पिछले ५० महीने के सबसे निचले स्तर पर पहुँच चुका है.

लेकिन संकट सिर्फ औद्योगिक क्षेत्र तक सीमित नहीं है. इसका असर अर्थव्यवस्था के दूसरे क्षेत्रों खासकर सेवा क्षेत्र पर भी पड़ा है. यहाँ तक कि कृषि क्षेत्र का प्रदर्शन भी बीते वित्तीय वर्ष में वर्ष ११-१२ की तुलना में लगभग आधी रह गई है. कृषि की वृद्धि दर वर्ष १२-१३ में १.९ फीसदी रही जबकि उससे पहले के वर्ष में ३.६ फीसदी दर्ज की गई थी.
यही हाल निर्यात में बढ़ोत्तरी का है जिसमें चालू वित्तीय वर्ष के पहले महीने- अप्रैल में मात्र १.६८ फीसदी (डालर में) की वृद्धि दर्ज की गई है. उल्लेखनीय है कि पिछले वित्तीय वर्ष १२-१३ में निर्यात की वृद्धि दर में (-) १.८ फीसदी की गिरावट और आयात में ०.४ फीसदी की बढ़ोत्तरी दर्ज की गई जिसके कारण न सिर्फ व्यापार घाटे में बढ़ोत्तरी दर्ज की गई बल्कि सबसे अधिक चिंताजनक वृद्धि चालू खाते के घाटे में हुई है जो बढ़कर जी.डी.पी के ५.१ फीसदी तक पहुँच गई है.
खुद वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने अपने बजट भाषण में स्वीकार किया है कि चालू खाते के घाटे में हुई वृद्धि सबसे बड़ी चुनौती है. चालू खाते के घाटे में भारी वृद्धि के कारण डालर के मुकाबले रूपये पर दबाव बना हुआ है.

हालाँकि इस बीच मुद्रास्फीति की दर में नरमी आई है लेकिन वह अब भी सरकार और रिजर्व बैंक के अनुमानों से कहीं ज्यादा ऊँचाई पर बनी हुई है. वर्ष २०१२-१३ में थोक मूल्य सूचकांक पर आधारित मुद्रास्फीति की दर ७.४ फीसदी और खाद्य वस्तुओं की मुद्रास्फीति दर ८.१ फीसदी रही.

कहने की जरूरत नहीं है कि महंगाई पर काबू पाने में नाकामी यू.पी.ए सरकार की अर्थव्यवस्था के प्रबंधन में सबसे बड़ी विफलता साबित हुई है.

इसकी कीमत आम आदमी के साथ-साथ अर्थव्यवस्था को भी चुकानी पड़ी है. असल में, पिछले चार सालों से लगातार ऊँची महंगाई की दर से निपटने में नाकाम रही यू.पी.ए सरकार ने हाथ खड़े कर दिए और यह जिम्मा रिजर्व बैंक को सौंप दिया.
नतीजा, रिजर्व बैंक ने मुद्रास्फीति को काबू में लाने के लिए ब्याज दरों में लगातार वृद्धि की जिसका सीधा असर निवेश पर पड़ा. निवेश में कमी आने के कारण आर्थिक वृद्धि की दर में गिरावट दर्ज की गई है जोकि लुढ़ककर पिछले एक दशक के सबसे निचले स्तर पर पहुँच गई है. इसके बावजूद मुद्रास्फीति पूरी तरह से काबू में नहीं आई है.
इस तरह ‘माया मिली, न राम’ की स्थिति पैदा हो गई है. उल्टे ऊँची मुद्रास्फीति की दर के साथ आर्थिक वृद्धि में गिरावट की स्थिति के कारण अर्थव्यवस्था के मुद्रास्फीति जनित मंदी (स्टैगफ्लेशन) में फंसने की आशंका बढ़ती जा रही है.
जैसे इतना ही काफी नहीं था. एक के बाद दूसरे भ्रष्टाचार के मामलों के खुलासे ने यू.पी.ए सरकार की साख पाताल में पहुंचा दी. यही नहीं, अर्थव्यवस्था की स्थिति में सुधार की रही-सही उम्मीदों पर यू.पी.ए सरकार के अंदर आर्थिक सुस्ती से निपटने की रणनीति पर मतभेदों, खींचतान और अनिर्णय ने पानी फेर दिया.

आखिरकार जब सरकार की नींद खुली और उसने घबराहट और जल्दबाजी में फैसले करने शुरू किये तो वह अर्थव्यवस्था को उन्हीं नव उदारवादी आर्थिक सुधारों की दवा की बड़ी खुराक से ठीक करने की कोशिश करने लगी जिसके कारण अर्थव्यवस्था बीमार हुई है और जिसकी सफलता को लेकर पूरी दुनिया में सवाल उठाये जा रहे हैं.

असल में, यू.पी.ए सरकार ने अर्थव्यवस्था की हालत सुधारने के लिए एक ओर बड़ी पूंजी खासकर विदेशी पूंजी के लिए दरवाजे खोलने से लेकर नियमों/शर्तों को उदार बनाने तक और दूसरी ओर, बड़ी विदेशी वित्तीय पूंजी को खुश करने के लिए राजकोषीय घाटे में कमी यानी सरकारी खर्चों और सब्सिडी में कटौती जैसे किफायतशारी (आस्ट्रिटी) के उपायों को आगे बढ़ाना शुरू कर दिया.
इसके तहत ही वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने राजकोषीय घाटे पर अंकुश लगाने के लिए न सिर्फ पिछले वित्तीय वर्ष के बजट में भारी कटौती की बल्कि चालू साल के बजट में भी बहुत मामूली वृद्धि की है.
लेकिन इसका नतीजा उल्टा हुआ है. आर्थिक वृद्धि को लेकर सी.एस.ओ के ताजा अनुमान से साफ़ है कि आर्थिक वृद्धि दर में गिरावट की एक वजह सरकारी खर्चों में भारी कटौती भी है. दरअसल, जब अर्थव्यवस्था की हालत खस्ता हो और आर्थिक वृद्धि गिर रही हो, उस समय सरकारी खर्चों खासकर सार्वजनिक निवेश में कटौती का उल्टा असर होता है.

इसकी वजह यह है कि आर्थिक विकास को तेज करने के लिए निवेश जरूरी है और जब आर्थिक अनिश्चितता और वैश्विक संकट के कारण निजी क्षेत्र निवेश के लिए आगे न आ रहा हो, उस समय सार्वजनिक निवेश में कटौती से स्थिति और बिगड़ जाती है. भारतीय अर्थव्यवस्था के साथ भी यही होता दिखाई दे रहा है.

इससे एक बार फिर ‘माया मिली, न राम’ वाली स्थिति पैदा हो रही है. आर्थिक वृद्धि में गिरावट का सीधा असर सरकार के टैक्स राजस्व पर पड़ेगा और टैक्स वसूली कम होने से राजकोषीय घाटे में बढ़ोत्तरी तय है. इस तरह न आर्थिक विकास को गति मिल पाएगी और न राजकोषीय घाटे में कोई कमी आ पाएगी. यह एक दुश्चक्र है.
माना जाता है कि इस दुश्चक्र को तोड़ने के लिए राजकोषीय घाटे पर अंकुश लगाने की चिंता छोड़कर आर्थिक वृद्धि को गति देने के लिए सार्वजनिक निवेश खासकर ढांचागत और सामाजिक क्षेत्र में भारी बढ़ोत्तरी करनी चाहिए.
इससे अर्थव्यवस्था में रोजगार के अवसर बढ़ेंगे और उसके साथ मांग बढ़ेगी जिसे पूरा करने के लिए निजी निवेश भी आगे आएगा. इससे आर्थिक गतिरुद्धता भंग होगी.
यह कोई समाजवादी फार्मूला नहीं है बल्कि यह पूंजीवादी आर्थिक सैद्धांतिकी में  कींसवादी अर्थशास्त्र है जिसे १९३० के दशक की महामंदी से निपटने के लिए जान मेनार्ड कींस ने पेश किया था.

लेकिन मुश्किल यह है कि नव उदारवादी आर्थिक सैद्धांतिकी के व्यामोह में फंसे प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री से लेकर अर्थव्यवस्था के मैनेजरों तक को यह भरोसा है कि खुदरा व्यापार को विदेशी पूंजी के लिए खोलने से लेकर विदेशी पूंजी को तमाम रियायतें देने जैसे आर्थिक सुधारों को तेजी से आगे बढ़ानेवाले फैसलों से देश में विदेशी निवेश तेजी से आएगा और उससे अर्थव्यवस्था एक बार फिर तेजी से दौड़ने लगेगी.

कहने की जरूरत नहीं है कि यू.पी.ए सरकार बड़ा जोखिम ले रही है. वह अर्थव्यवस्था के साथ एक बड़ा दाँव खेल रही है जिसमें हालिया वैश्विक उदाहरणों को देखते हुए कामयाबी की सम्भावना कम दिखाई दे रही है.
लेकिन अगर वह सफल भी हुई तो यह भारतीय अर्थव्यवस्था को विदेशी पूंजी का और बड़ा मोहताज बना देगी.
('राष्ट्रीय सहारा' के हस्तक्षेप में 8 जून को प्रकाशित टिप्पणी)                     


गुरुवार, मई 30, 2013

कैसिनो अर्थतंत्र में क्रिकेट ही नहीं, सब कुछ है ‘फिक्स’

सट्टेबाजों के हवाले है शेयर बाजार और जिंस बाजार से लेकर क्रिकेट और आर्थिक नीतियाँ तक 

शुरू से ही पानी की तरह बहते पैसे, ग्लैमर, रंगीन पार्टियों, खिलाड़ियों की बोली और ‘हितों के टकराव’ के कारण विवादों में घिरी रही इंडियन प्रीमियर लीग (आई.पी.एल) एक बार फिर ‘मैच फिक्सिंग’ और ‘स्पाट फिक्सिंग’ के आरोपों के कारण सुर्ख़ियों में है. इस मामले में हर दिन नए खुलासे हो रहे हैं और उसके साथ ही कुछ बड़ी मछलियाँ भी पकड़ में आ गईं हैं.
इससे आई.पी.एल की चमक-दमक के पीछे छिपे बड़ी पूंजी, मनोरंजन उद्योग, कालेधन, सट्टेबाजी और माफिया गिरोहों के असली खेल पर से थोड़ा सा पर्दा हटा है लेकिन इससे ज्यादा की उम्मीद मत कीजिए क्योंकि इससे आगे वह ‘ब्लैक होल’ है जिससे यह पूरी व्यवस्था निकली और बनी है.   
इसलिए आई.पी.एल में ‘फिक्सिंग या स्पाट फिक्सिंग’ के खेल से बहुत हैरान होने की जरूरत नहीं है और न ही खिलाड़ियों से लेकर टीम प्रबंधकों/मालिकों के ‘फिक्सर’ में बदलने पर इतना चौंकने की जरूरत है. सच यह है कि राजनीति से लेकर अर्थव्यवस्था तक और खेलों से लेकर मीडिया तक हर जगह ‘फिक्सिंग’ और ‘फिक्सरों’ का बोलबाला है.

आश्चर्य नहीं कि आज बड़ी देशी-विदेशी पूंजी के पक्ष में अर्थनीति ‘फिक्स’ की जा रही है, इस या उस कारपोरेट समूह के पक्ष में नीतियां ‘फिक्स’ की जा रही हैं, बड़े आर्थिक फैसले कंपनियों के हक में ‘फिक्स’ किये जा रहे हैं और यहाँ तक कि कोर्ट के फैसले भी ‘फिक्स’ करवाने के दावे किये जा रहे हैं.   

इन आरोपों को इस तथ्य से भी बल मिलता है कि बड़ी पूंजी और कम्पनियाँ अपने अनुकूल नीतियों और फैसलों को प्रभावित करने के लिए बाकायदा लाबीइंग करके मंत्रिमंडल से लेकर नौकरशाही तक में अपने अनुकूल नेताओं और अफसरों को ‘फिक्स’ करवा रही हैं.
याद कीजिए, नीरा राडिया टेप्स को जिसमें नेता, उद्योगपति, अफसर और संपादक/पत्रकार किस तरह मंत्री से लेकर कोर्ट और नीतियों से लेकर फैसलों तक को अपने मुताबिक ‘फिक्स’ करने के लिए लाबीइंग करते सुनाई पड़ते हैं. उसके बाद पिछले कुछ सालों में स्पेक्ट्रम से लेकर कोयला खदानों और हाईवे से लेकर एयरपोर्ट के ठेकों के आवंटन पर नजर डालिए, आपको ‘फिक्सिंग’ और लाबीइंग के बढ़ते दबदबे का अंदाज़ा हो जाएगा.      
हैरानी की बात नहीं है कि इनदिनों जब पूरा देश आई.पी.एल में ‘फिक्सिंग’ की सनसनी में डूबा हुआ है, उसी समय केन्द्रीय मंत्रिमंडल पेट्रोलियम मंत्रालय की सिफारिश पर प्राकृतिक गैस की कीमत ‘फिक्स’ करने पर विचार कर रहा है. प्रस्ताव यह है कि गैस की कीमतें ४.२ डालर प्रति एम.बी.टी.यू से २.५ डालर प्रति एम.बी.टी.यू यानी कोई ५९.५ फीसदी बढ़ाकर ६.७ डालर प्रति एम.बी.टी.यू कर दिया जाए.

वैसे सी.पी.आई सांसद गुरुदास दासगुप्ता का आरोप है कि पेट्रोलियम मंत्री वीरप्पा मोइली का प्रस्ताव इसे ४.२ डालर प्रति एम.बी.टी.यू से लगभग दुगुना बढ़ाकर पहले साल ८ डालर, दूसरे साल १० डालर, तीसरे साल १२ डालर और अगले दो सालों तक १४ डालर प्रति एम.बी.टी.यू करने की है ताकि मुकेश अम्बानी की रिलायंस को हजारों करोड़ रूपये का छप्परफाड मुनाफा हो सके.  

एक मोटे अनुमान के मुताबिक, गैस की कीमतों में प्रति एक डालर की बढ़ोत्तरी से जहाँ उर्वरक कारखानों पर ३१५५ करोड़ रूपये और बिजलीघरों पर १००४० करोड़ रूपये का अतिरिक्त बोझ पड़ेगा, वहीँ गैस कंपनियों को हजारों करोड़ का अतिरिक्त मुनाफा होगा.
सवाल यह है कि सरकार गैस की कीमतें ‘फिक्स’ करने के लिए इतनी बेचैन क्यों हैं? हालाँकि मोइली का दावा है कि इससे सरकारी टेक कंपनियों को सबसे ज्यादा फायदा होगा लेकिन तथ्य यह भी है कि इससे रिलायंस का मुनाफा कई गुना बढ़ जाएगा.
यह भी किसी से छुपा नहीं है कि रिलायंस पिछले एक-डेढ़ साल से गैस की कीमतें बढ़ाने के लिए जबरदस्त लाबीइंग कर रहा है. आरोप है कि रिलायंस के दबाव के आगे झुकने से इनकार करने के कारण पूर्व पेट्रोलियम मंत्री जयपाल रेड्डी को कुर्सी गंवानी पड़ी.
लेकिन गैस की कीमतों में बढ़ोत्तरी के लिए चल रही लाबीइंग कोई अपवाद नहीं है. यह सिर्फ एक उदाहरण है फैसलों और नीतियों की ‘फिक्सिंग’ का. असल में, जब पूरी भारतीय अर्थव्यवस्था ही कैसिनो अर्थतंत्र में बदल दी गई है जहाँ पैसे से पैसा बनानेवाले सट्टेबाज ही नीतियां और फैसले तय कर रहे हों, वहां लाबीइंग और फिक्सिंग अपवाद नहीं रह गए हैं बल्कि नियम बन गए हैं.

हैरानी की बात नहीं है कि आज अर्थतंत्र के सबसे बड़े सूचक- शेयर बाजार से लेकर जिंस बाजार तक सट्टेबाजों के कब्जे में हैं और आर्थिक नीतियों से लेकर बजट तक पर उनका दबाव साफ़ देखा जा सकता है.

लेकिन बड़ी देशी-विदेशी पूंजी की अगुवाई में चल रही इस संगठित और कानूनी सट्टेबाजी को अर्थव्यवस्था के लिए जरूरी माना जाता है और इन सट्टेबाजों को खुश करने के लिए वित्त मंत्री से लेकर पूरी सरकार तक क्या-क्या नहीं करते हैं?  

ऐसे में, आई.पी.एल में ४० हजार करोड़ रूपये की सट्टेबाजी पर इतना हाय-तौबा क्यों मचाया जा रहा है? जबकि यह सिर्फ कानूनी सट्टेबाजी बाजार का विस्तार और वास्तव में, उसका अंडरवर्ल्ड है. लेकिन ‘अंडरवर्ल्ड’ की गुंजाइश वहीँ पैदा होती है जहाँ उसका खुला बाजार भी हो. कंसल्टिंग फर्म- के.पी.एम.जी के मुताबिक, देश में कोई तीन लाख करोड़ रूपये का गैरकानूनी सट्टा बाजार है.
लेकिन यह शेयर बाजार से लेकर मुद्रा-जिंस बाजार और रीयल इस्टेट तक फैले लाखों करोड़ रूपये के कानूनी सट्टेबाजी बाजार का बहुत छोटा हिस्सा है. इस कानूनी सट्टेबाजी के बाजार का अंदाज़ा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि अकेले मुंबई शेयर बाजार में शेयरों के वायदा कारोबार का दैनिक टर्नओवर २८६५४ करोड़ रूपये का है. वर्ष २०१२-१३ में शेयरों के वायदा कारोबार का कुल टर्नओवर ७१६३५७६ करोड़ रूपये रहा.
यही नहीं, एन.एस.ई में करेंसी के वायदा कारोबार का दैनिक टर्नओवर लगभग २०१४० करोड़ रूपये रहा और वर्ष १२-१३ में दिसंबर तक उसका कुल टर्नओवर ३७२५८४२ करोड़ रूपये तक पहुँच गया.

लेकिन जिंस बाजार ने सबको पीछे छोड़ दिया है जहाँ वर्ष ११-१२ में कुल १४०२६ सौदे हुए जिनकी कीमत १,८१,२६,१०४ करोड़ रूपये थी जबकि वर्ष १२-१३ (१ अप्रैल से ३० दिसंबर तक) में कुल १०११९ सौदे हुए जिनकी कीमत १,१६,२६,८४२ करोड़ रूपये थी.

इसमें वास्तविक सौदे कम और सट्टेबाजी के जरिये पैसे से पैसे बनानेवाले सौदे ज्यादा थे. इस सट्टेबाजी का अनुमान इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि वर्ष ११-१२ में एम.सी.एक्स में ७३ करोड़ टन (कुल कीमत २४,६३३ अरब रूपये) के कच्चे तेल के वायदा सौदे हुए लेकिन इसमें एक बैरल कच्चे तेल की भी डिलीवरी नहीं हुई.

इस तरह शेयर बाजार से लेकर करेंसी बाजार और फिर जिंस बाजार तक हर जगह वायदा कारोबार में लाखों करोड़ रूपये की सट्टेबाजी हो रही है. इसमें बड़े देशी-विदेशी निवेशक सभी शामिल हैं और यह पूरी तरह से कानूनी है.
सच पूछिए तो शेयर बाजार आज मुट्ठी भर बड़े देशी और खासकर विदेशी संस्थागत निवेशकों (एफ.आई.आई) की धुन पर ही नाचता है. वे उसे जब चाहते हैं, चढाते हैं, जब चाहते हैं, गिराते हैं और इस तरह वह एक कैसिनो में बदल चुका है.
इसका अनुमान इस तथ्य से भी लगाया जा सकता है कि वास्तविक निवेश के लिए वित्तीय वर्ष १२-१३ में दिसंबर तक आई.पी.ओ के जरिये शेयर बाजार से सिर्फ ६०४३ करोड़ रूपये ही जुटाया जा सका.         
लेकिन मामला सिर्फ शेयर बाजार या जिंस बाजार और उसमें जारी सट्टेबाजी तक सीमित नहीं है बल्कि उसकी बढ़ती ताकत और आर्थिक नीतियों को प्रभावित करने की लगातार बढ़ती क्षमता का है. आज स्थिति यह हो गई है कि अर्थनीति शेयर बाजार को देखकर और उसके मुताबिक बनती है. बाजार के बड़े खिलाड़ियों के प्रतिनिधि के बतौर रेटिंग एजेंसियां सरकार पर बड़ी पूंजी के हितों के अनुकूल सुधारों को आगे बढ़ाने का दबाव बनाए रखती हैं.

सरकारों का तर्क है कि उनकी बात स्वीकार करने के अलावा और कोई विकल्प नहीं है. वे उनको नाराज करने का जोखिम नहीं उठा सकती हैं. कहने की जरूरत नहीं है कि पिछले साल यू.पी.ए सरकार ने इसी बहाने खुदरा कारोबार को विदेशी पूंजी के लिए खोलने से लेकर बीमा और पेंशन कारोबार में विदेशी पूंजी का हिस्सा बढ़ाने और उसकी इजाजत देने जैसे कई फैसले किये थे.

क्या ये फैसले ‘फिक्स’ नहीं थे? बड़ी पूंजी समर्थित आर्थिक सुधारों को आगे न बढ़ाने पर रेटिंग एजेंसी देश की निवेश की रेटिंग गिराने की धमकी दे, कारपोरेट मीडिया उसे लेकर देश में घबराहट का माहौल पैदा करे और सरकार ‘कोई विकल्प नहीं है’ का तर्क देते हुए ‘राष्ट्रहित’ में उसे मान ले, इससे ज्यादा ‘फिक्स’ और क्या हो सकता है?
लेकिन ऐसे ‘फिक्सरों’ की कमी नहीं है. यह एक संगठित उद्योग बन चुका है. इन्हें राजनीतिक पार्टियों से लेकर लाबीइंग कंपनियों तक में देखा जा सकता है. सत्ता के गलियारों में उनकी पैठ बहुत ऊपर तक है.
यहाँ तक कि वे सरकार के थिंक टैंक तक में बैठे हुए हैं. लेकिन मूल बात यह है कि ये सभी बिना किसी अपवाद के इस या उस कारपोरेट समूह के हितों को आगे बढ़ाने में जुटे रहते हैं. उनमें से कई विश्व बैंक और मुद्रा कोष की सेवा कर चुके हैं और कई का बड़े कारपोरेट समूहों से परोक्ष या सीधा संबंध है.
जाहिर है कि आई.पी.एल आसमान से नहीं टपका है और न ही धरती फाड़कर पैदा हुआ है. यह इसी राजनीतिक-आर्थिक व्यवस्था की पैदाइश है जिसमें अर्थतंत्र एक बड़े कैसिनो में बदल चुका है और जिससे हर साल लाखों करोड़ रूपये का काला धन निकल रहा है. आखिर वह काला धन कहाँ जाएगा?

दोहराने की जरूरत नहीं है कि आई.पी.एल इसी कालेधन को खपाने और सट्टेबाजी के एक संगठित अंडरवर्ल्ड को एक लोकप्रिय प्लेटफार्म उपलब्ध कराने के लिए शुरू किया गया है. सट्टेबाजी उसकी मूल संरचना में निहित है. वह खिलाड़ियों और खेल प्रेमियों से ज्यादा फिक्सरों का टूर्नामेंट है.

उसमें वही हो रहा है जिसके लिए उसे शुरू किया गया था. उसपर अब हैरानी और चिंता क्यों? अगर चिंता ही करनी है तो गैस की कीमतें जिस तरह से ‘फिक्स’ हो रही हैं, उसपर कीजिए.

('शुक्रवार' के नए अंक में प्रकाशित टिप्पणी)