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गुरुवार, फ़रवरी 21, 2013

चिदंबरम से है 'चमत्कार' की उम्मीद

लेकिन वित्त मंत्री क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों और आवारा पूंजी को खुश करने में जुटे हैं

यह यू.पी.ए-२ सरकार का चौथा और २०१४ के आम चुनावों से पहले का आखिरी पूर्ण बजट है. यू.पी.ए सरकार खासकर कांग्रेस को वित्त मंत्री पी. चिदंबरम से एक चमत्कारिक बजट की उम्मीद है. वैसा ही जैसा उन्होंने २००९ के चुनावों से पहले पेश किया था.
उस लोकलुभावन बजट के सहारे यू.पी.ए और कांग्रेस को चुनावी वैतरणी पार करने में आसानी हो गई थी. कांग्रेस चिदंबरम से उसी चमत्कार को दोहराने की उम्मीद कर रही है. लेकिन वित्त मंत्री अच्छी तरह जानते हैं कि चमत्कारों को दोहराना बहुत मुश्किल होता है क्योंकि चमत्कार बार-बार नहीं होते.
असल में, २००८-०९ और २०१३-१४ के बीच बहुत कुछ बदल चुका है. २००८-०९ में वैश्विक आर्थिक संकट के झटकों के बावजूद अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर ६.७ फीसदी थी और उसके पहले २००७-०८ में वृद्धि दर ९.३ फीसदी तक पहुँच गई थी. लेकिन आज चालू वित्तीय वर्ष २०१२-१३ में वृद्धि दर फिसलकर पिछले एक दशक के सबसे निचले स्तर ५ फीसदी पर पहुँच गई है जबकि पिछले साल (११-१२) भी यह मात्र ६.२ फीसदी थी.

साफ़ है कि अर्थव्यवस्था संकट में है. उद्योग क्षेत्र से लेकर कृषि क्षेत्र और निर्यात से लेकर निवेश तक का प्रदर्शन बद से बदतर होता गया है. यहाँ तक कि सेवा क्षेत्र भी इस सुस्ती का शिकार होता दिख रहा है. इसका सीधा असर रोजगार के नए अवसरों पर पड़ा है. 

यही नहीं, कोढ़ में खाज की तरह पिछले तीन-चार साल से लगातार महंगाई आसमान छू रही है. इसका सीधा असर न सिर्फ गरीबों और मध्य वर्ग के उपभोग पर पड़ा है बल्कि उसकी बचत भी प्रभावित हुई है.
लेकिन यू.पी.ए सरकार न तो अर्थव्यवस्था को संभल पा रही है और न ही महंगाई पर काबू कर पा रही है. सच यह है कि उसने महंगाई के आगे घुटने टेक दिए हैं. जैसे इतना ही काफी नहीं हो, पिछले चार साल में एक के बाद दूसरे घोटालों के भंडाफोड और भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों ने सरकार की साख और इकबाल को पाताल में पहुंचा दिया है.
कहने की जरूरत नहीं है कि किसी वित्त मंत्री के लिए बजट पेश करने की इससे प्रतिकूल परिस्थितियां नहीं हो सकती थीं. इसके बावजूद पी. चिदंबरम से न सिर्फ यू.पी.ए और कांग्रेस पार्टी को चमत्कार की अपेक्षा है बल्कि आमलोगों को भी उनसे राहत और मरहम की उम्मीदें हैं. आम आदमी की इस बजट से एक क्षीण सी उम्मीद यह है कि वित्त मंत्री उसे आसमान छूती महंगाई खासकर खाद्य वस्तुओं की महंगाई से राहत दिलाने के ठोस उपाय करेंगे.

यह बात और है कि पिछले छह महीने में जब से चिदंबरम ने वित्त मंत्रालय संभाला है, आम आदमी की कसमें खानेवाली यू.पी.ए सरकार ने राजकोषीय घाटे को कम करने के नामपर सबसे अधिक बोझ आम आदमी पर ही डाला है.

लेकिन चिदंबरम को अच्छी तरह पता है कि यह चुनावी साल है और उनकी कांग्रेस पार्टी को वोट मांगने वापस उसी आम आदमी के पास जाना है जो महंगाई से लेकर भ्रष्टाचार और अर्थव्यवस्था की बदहाली की मार झेल रहा है. स्वाभाविक तौर पर वह सरकार से बहुत नाराज है. यू.पी.ए सरकार के लिए यह बजट आम आदमी खासकर गरीबों, किसानों और मध्यवर्ग को मनाने और रिझाने का आखिरी मौका है.
लेकिन दूसरी ओर, वित्त मंत्री पर कारपोरेट क्षेत्र और देशी-विदेशी बड़ी पूंजी का भी जबरदस्त दबाव है. यू.पी.ए सरकार से उसकी नाराजगी किसी से छुपी नहीं है. वह सरकार पर ‘नीतिगत लकवे’ का आरोप लगाता रहा है और उसकी विश लिस्ट भी काफी लंबी है.
चिदंबरम उसकी अनदेखी करने का जोखिम नहीं उठा सकते हैं. खासकर कार्पोरेट्स के एक बड़े हिस्से के भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री पद के दावेदार नरेन्द्र मोदी के पक्ष में झुकने के बाद से कांग्रेस में बेचैनी है. कांग्रेस कार्पोरेट्स का भरोसा जीतने के लिए हरसंभव कोशिश कर रही है.

पिछले छह महीनों में कार्पोरेट्स और देशी-विदेशी बड़ी पूंजी के मन-मुताबिक जिस तरह से आर्थिक सुधारों को आगे बढ़ानेवाले ताबड़तोड़ फैसले हुए हैं, उससे साफ़ है कि चिदंबरम चुनावी साल में कार्पोरेट्स और बड़ी पूंजी को खुश रखने का महत्व जानते हैं.

हैरानी की बात नहीं है कि बजट की व्यस्तताओं के बावजूद वित्त मंत्री ने पिछले महीने वैश्विक वित्तीय पूंजी के प्रमुख केन्द्रों- हांगकांग, सिंगापुर, लन्दन और फ्रैंकफर्ट का तूफानी दौरा किया और बड़े कार्पोरेट्स और निवेशकों को व्यक्तिगत तौर पर आश्वस्त करने की कोशिश की कि वे एक ‘जिम्मेदार बजट’ पेश करेंगे.
चिदंबरम के इस बयान की गुलाबी आर्थिक मीडिया में यह व्याख्या की जा रही है कि यह बजट लोकलुभावन नहीं होगा और इसमें सबसे ज्यादा जोर राजकोषीय घाटे को कम करने यानी सरकारी खर्चों को कम करने पर होगा. लेकिन सरकारी खर्चों में कटौती करने पर लोकलुभावन बजट पेश करने की गुंजाइश सीमित हो जाती है. 
खुद वित्त मंत्री ने चालू वित्तीय वर्ष (१२-१३) में राजकोषीय घाटे को जी.डी.पी के ५.३ फीसदी और अगले साल जी.डी.पी के ४.८ फीसदी के अंदर रखने की घोषणा कर रखी है. हालाँकि चिदंबरम ने यह एलान मूडीज, स्टैण्डर्ड एंड पुअर्स और फिच जैसी वैश्विक क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों को खुश करने के लिए किया था।

कारण, वे राजकोषीय घाटे पर अंकुश और आर्थिक सुधारों को तेजी से आगे न बढ़ाने की स्थिति में भारत की निवेश रेटिंग में कटौती करके उसे ‘कबाड़’ श्रेणी (जंक स्टेटस) में डालने की धमकी दे रही थीं. इससे विदेशी पूंजी खासकर संस्थागत निवेशकों (एफ.आई.आई) यानी आवारा पूंजी के देश से पलायन और अर्थव्यवस्था के गहरे संकट में फंसने का खतरा था.

लेकिन यह घोषणा करके चिदंबरम ने अपने हाथ खुद बाँध लिए हैं. अब उनके लिए यह बहाना बनाना आसान हो गया है कि वे बजट में आम लोगों के लिए बहुत राहत नहीं दे सकते हैं क्योंकि अर्थव्यवस्था की स्थिति अच्छी नहीं है और राजकोषीय घाटे को तुरंत नियंत्रित नहीं किया गया तो वैश्विक क्रेडिट रेटिंग एजेंसियां भारत की रेटिंग गिरा सकती हैं जो अर्थव्यवस्था के लिए घातक साबित हो सकता है.
असल में, वित्त मंत्री की रणनीति यह है कि बजट को लेकर आमलोग ज्यादा उम्मीदें और अपेक्षाएं न पालें और जब लोगों की अपेक्षाएं कम होंगीं तो मामूली राहत देकर भी वाहवाही लूटी जा सकती है.
चिदंबरम इस रणनीति के जरिये एक तीर से दो शिकार करना चाहते हैं. एक ओर वे मध्यवर्ग को टैक्स में मामूली छूट और बचत पर कुछ रियायतें और गरीबों के लिए डायरेक्ट कैश ट्रांसफर और खाद्य सुरक्षा योजना के लिए प्रतीकात्मक प्रावधान करके चुनावी गणित साधने की तैयारी कर रहे हैं.
वहीँ दूसरी ओर, वे सरकारी खर्चों में कटौती खासकर विकास और सामाजिक योजनाओं के बजट में कटौती करके राजकोषीय घाटे में कमी और बड़ी पूंजी खासकर आवारा पूंजी और कार्पोरेट्स को लुभाने के लिए और रियायतें देकर कार्पोरेट्स का समर्थन जुटाने की कोशिश कर रहे हैं.
लेकिन इन दोनों में उनकी प्राथमिकता क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों को खुश करना और कार्पोरेट्स का भरोसा जीतना है. इसके लिए यू.पी.ए सरकार किसी भी हद तक जाने को तैयार है. आर्थिक सुधारों खासकर खुदरा व्यापार को विदेशी पूंजी के लिए खोलने और पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों को बाजार के हवाले करने के फैसलों से वित्त मंत्री यह स्पष्ट कर चुके हैं कि वे किसके प्रति जिम्मेदार हैं?

यह और बात है कि चुनावी मजबूरियों के कारण इसबार बजट भाषण में वे आम आदमी, किसानों, युवाओं, महिलाओं, दलितों-आदिवासियों और अल्पसंख्यकों की खूब दुहाईयाँ देंगे लेकिन बजट में उनके लिए प्रतीकात्मक प्रावधानों से ज्यादा कुछ नहीं होगा.

सच पूछिए तो अगर चुनावों में वोटों के लिए आमलोगों खासकर गरीबों के पास जाने की मजबूरी नहीं होती तो यू.पी.ए और चिदंबरम को आम आदमी और गरीबों की याद भी नहीं आती.
('नेशनल दुनिया' के सम्पादकीय पृष्ठ पर २१ फरवरी को प्रकाशित)               

शुक्रवार, दिसंबर 28, 2012

जादू की छड़ी नहीं है डायरेक्ट कैश ट्रांसफर

असली 'गेम चेंजर' योजना खाद्य सुरक्षा कानून को होना था लेकिन वह कहाँ हैं?

भ्रष्टाचार और घोटालों के गंभीर आरोपों से घिरी और आसमान छूती महंगाई को काबू करने में नाकाम रही यू.पी.ए सरकार को आगामी चुनावों का डर सताने लगा है. इसलिए वह भ्रष्टाचार और महंगाई जैसे मुद्दों को बदलने की हताशापूर्ण कोशिश कर रही है. इसी कोशिश के तहत उसने खूब जोर-शोर से सब्सिडी के नगद हस्तांतरण योजना (कैश ट्रांसफर) की घोषणा की है जो अगले साल जनवरी से देश के ५१ जिलों में लागू की जाएगी.

अगले साल के आखिर तक इसे देश के सभी ६४० जिलों में लागू करने की घोषणा की गई है. इस योजना के तहत शुरुआत में केन्द्र सरकार की २९ विभिन्न योजनाओं के तहत मिलनेवाली पेंशन और स्कालरशिप जैसी राशि सीधे लाभार्थी के बैंक एकाउंट में जाएगी.
वित्त मंत्री पी. चिदंबरम का दावा है कि यह एक ‘खेल बदलनेवाली’ (गेम चेंजर) योजना है. इससे सरकारी सब्सिडी को गरीबों तक पहुंचाने में होनेवाले भ्रष्टाचार, लूट, अनियमितताओं और लालफीताशाही पर रोक लगेगी और लाभार्थियों को सीधा फायदा होगा. यह सुनिश्चित करने के लिए आधार कार्ड की मदद ली जाएगी और जिन लाभार्थियों के पास आधार कार्ड होगा, उन्हें ही कैश ट्रांसफर का फायदा मिलेगा.

यू.पी.ए सरकार को उम्मीद है कि इससे इन योजनाओं में फर्जीवाड़े पर रोक लगेगी, लालफीताशाही कम होने से सरकार पर सब्सिडी का बोझ भी कम होगा, वहीँ दूसरी ओर लाभार्थियों को भी बिना सरकारी दफ्तरों का चक्कर लगाये और सरकारी बाबुओं को घूस खिलाये सीधे पैसा मिलने लगेगा. यह भी कहा जा रहा है कि इस योजना के कारण सभी लाभार्थियों के बैंक खाते खुलेंगे जिससे करोड़ों लोगों को बैंकिंग सुविधाओं का लाभ मिल सकेगा.

हालाँकि वित्त मंत्री ने इस योजना से अभी पी.डी.एस राशन, खाद और किरोसीन-रसोई गैस सब्सिडी को बाहर रखने की बात कही है लेकिन यह संकेत दिया है कि आगे चलकर इन्हें भी कैश ट्रांसफर के तहत लाने पर विचार किया जाएगा.
साफ़ है कि देर-सवेर सरकार पी.डी.एस राशन, उर्वरक और किरोसीन सब्सिडी को भी कैश ट्रांसफर के दायरे में ले आएगी. असल में, यू.पी.ए सरकार का असली मकसद पी.डी.एस राशन, उर्वरक और किरोसीन सब्सिडी को कैश ट्रांसफर के तहत लाना है और इसके लिए बाकी योजनाओं की आड़ ली जा रही है.

तथ्य यह है कि अभी जिन २९ योजनाओं को कैश ट्रांसफर के तहत लाने की घोषणा की गई है, उनमें नया कुछ भी नहीं है. ये सभी योजनाएं पहले से ही कैश ट्रांसफर यानी लाभार्थी को सीधे नगदी मुहैया कराने की योजनाएं हैं. इसमें लाभार्थियों को पहले से ही कैश उनके बैंक खाते में पहुँचता रहा है.

यही नहीं, इन योजनाओं में भ्रष्टाचार और लूट की उतनी शिकायतें नहीं रही हैं, जितनी पी.डी.एस राशन और किरोसीन में रही हैं. इस मायने में यह किसी भी तरह से ‘गेम चेंजर’ योजना नहीं है. सच पूछिए तो यह अत्यंत विवादास्पद आधार पहचानपत्र योजना को बचाने और नया जीवन देने की योजना है. कैश ट्रांसफर को आधार के साथ जोड़कर उसे प्रासंगिक बनाने की कोशिश की गई है.

असल में, ‘गेम चेंजर’ योजना तो खाद्य सुरक्षा कानून हो सकती थी जिसे यू.पी.ए सरकार ने २००९ के आम चुनावों में वायदे के बावजूद न सिर्फ पिछले साढ़े तीन साल लटका रखा है बल्कि उसे सीमित, हल्का, आधा-अधूरा और कमजोर करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी है.
उल्लेखनीय है कि कुछ महीनों पहले तक सरकारी हलकों में खाद्य सुरक्षा विधेयक को ‘गेम चेंजर’ बताया जा रहा था और दावे किये जा रहे थे कि यह कानून मनरेगा और कर्ज माफ़ी जैसी योजनाओं को भी पीछे छोड़ देगा. लेकिन जिस तरह से कैश ट्रांसफर योजना का शोर मचाया जा रहा है, उससे यह आशंका बढ़ती जा रही है कि यू.पी.ए सरकार खाद्य सुरक्षा कानून बनाने के वायदे से पीछे हटने या उसे और टालने का बहाना खोज रही है.
सवाल यह है कि क्या कैश ट्रांसफर योजना सचमुच में, हर मर्ज की दवा यानी ‘गेम चेंजर’ है? असल में, कैश ट्रांसफर योजना कोई ऐसी नई या नायाब योजना नहीं है और न ही देश में पहली बार लागू होने जा रही है. वृद्धावस्था, विधवा पेंशन, आंगनवाडी कर्मियों का मानदेय और छात्रवृत्ति आदि लाभार्थियों को पहले से ही बैंक में नगद या चेक के जरिये मिलती रही हैं.

इन सभी योजनाओं में भ्रष्टाचार और लालफीताशाही से ज्यादा बड़ा और असल मुद्दा यह रहा है कि उनका लाभ अभी भी सीमित लोगों को मिलता है और उसके तहत मिलनेवाली राशि बुनियादी जरूरतों की तुलना में बहुत ही ज्यादा कम है. उदाहरण के लिए, वृद्धावस्था पेंशन के तहत ३०० रूपये प्रति माह और विधवा पेंशन के तहत ३०० रूपये प्रति माह मिलते हैं.

साफ़ है कि कैश ट्रांसफर योजना को ‘गेम चेंजर’ बनाने के लिए यह जरूरी है कि न सिर्फ उसका दायरा बढ़ाया जाए यानी उसे सिर्फ गरीबी रेखा के नीचे रहनेवालों तक सीमित न किया जाए और दूसरे, उसके तहत दी जानेवाली राशि को कम से कम ५००० रूपये प्रति माह किया जाए. लेकिन साफ़ है कि यू.पी.ए सरकार का ऐसा कोई इरादा नहीं है क्योंकि वह तो सब्सिडी कम करने पर तुली हुई है.
इसका सबसे बड़ा सबूत यह है कि यू.पी.ए सरकार ने राजकोषीय घाटे को नियंत्रित करने के लिए हाल में एक रोडमैप जारी किया है जिसमें दावा किया गया है कि राजकोषीय घाटे को चालू वित्तीय वर्ष (१२-१३) में जी.डी.पी के ५.३ फीसदी, अगले वर्ष १३-१४ में जी.डी.पी के ४.८ फीसदी, वर्ष १४-१५ में जी.डी.पी के ४.२ फीसदी, वर्ष १५-१६ में जी.डी.पी के ३.६ फीसदी और वर्ष १६-१७ में जी.डी.पी के ३ फीसदी तक कर दिया जाएगा.
सवाल है कि यह कैसे होगा क्योंकि पिछले वित्तीय वर्ष (११-१२) में राजकोषीय घाटा ५.९ फीसदी रहा था और इस साल इसके जी.डी.पी के ६.१ फीसदी रहने का अनुमान जाहिर किया जा रहा था? इसका उत्तर वित्त मंत्रालय द्वारा गठित केलकर समिति की उस रिपोर्ट में मिलता है जिसे पी. चिदंबरम ने वित्त मंत्रालय संभालने के तुरंत बाद राजकोषीय घाटे को काबू में करने के लिए सुझाव देने के वास्ते बनाया था.
इस समिति ने सुझाव दिया है कि राजकोषीय घाटे को कम करने के लिए सरकार को सब्सिडी खासकर पेट्रोलियम, उर्वरक और खाद्य सब्सिडी में कटौती करना अनिवार्य है. समिति ने इसके लिए डीजल, किरोसीन, रसोई गैस, उर्वरकों और राशन से मिलनेवाले गेहूं-चावल आदि की कीमतों में बढ़ोत्तरी की सिफारिश की है और इस तरह इन सब्सिडी को जी.डी.पी के मौजूदा २.२ फीसदी से घटाकर चालू वित्तीय वर्ष १२-१३ में जी.डी.पी का २ फीसदी, १३-१४ में जी.डी.पी का १.७ और १४-१५ में १.५ फीसदी करने को कहा है.

कहने की जरूरत नहीं है कि यू.पी.ए सरकार ने इन सिफारिशों को मान लिया है और इसका सबूत यह है कि सरकार ने पेट्रोलियम उत्पादों से लेकर उर्वरकों की कीमतों में बढ़ोत्तरी की है. यही नहीं, खाद्य सुरक्षा विधेयक को किनारे कर दिया है. इसके अलावा खुद वित्त मंत्री ने एक प्रेस कांफ्रेंस में इन सिफारिशों को स्वीकार करने का एलान किया है.
साफ़ है कि यू.पी.ए सरकार का असली इरादा सब्सिडी के ‘बोझ’ (वह इसे बोझ ही मानती है) को कम करने का है. कैश ट्रांसफर योजना इसी मकसद के साथ लाई गई है. असल में, इस साल मार्च में बजट से पहले पेश आर्थिक सर्वेक्षण में सब्सिडी के बढ़ते बोझ से निपटने के लिए कैश ट्रांसफर योजना को आगे बढ़ाने की सिफारिश की गई थी. यही नहीं, सर्वेक्षण में भी इसे ‘गेम चेंजर’ योजना बताया गया था.
यह भी किसी से छुपा नहीं है कि नव उदारवादी आर्थिक सुधारों के पैरोकार पिछले कई सालों से सब्सिडी में कटौती के उपाय के बतौर कैश ट्रांसफर योजना की जोरशोर से पैरवी करते रहे हैं. इसकी प्रेरणा उन्हें विश्व बैंक से मिली है जो वर्षों से न सिर्फ राजकोषीय घाटे को कम करने के लिए भारत पर दबाव डालता रहा है बल्कि इसके लिए विनिवेश से लेकर सब्सिडी के बोझ को न्यूनतम करने पर जोर देता रहा है.

इसके लिए विश्व बैंक की ओर से दिए अनेक सुझावों में एक सुझाव कैश ट्रांसफर का भी रहा है. लेकिन इसका मुख्य उद्देश्य न तो सामाजिक सुरक्षा के दायरे को बढ़ाना और उसे प्रतीकात्मक के बजाय वास्तविक बनाना रहा है और न ही सब्सिडी वितरण में भ्रष्टाचार-धांधली खत्म करना और उसे वास्तविक लाभार्थियों तक पहुंचाना है.

इसके उलट इसका असली मकसद सब्सिडी में कटौती है. उदाहरण के लिए कैश ट्रांसफर योजना को ही लीजिए जिसे हर मर्ज की दवा की तरह पेश किया जा रहा है. आखिर इससे क्या बदलनेवाला है? कैश ट्रांसफर के साथ आधार कार्ड को जोड़ देने से क्या बदल जाएगा?
असल में, आधार कार्ड सिर्फ एक पहचानपत्र भर है जो किसी भी व्यक्ति की पहचान बताता है. लेकिन अधिकांश सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के साथ असल समस्या यह है कि वे लक्षित समूहों खासकर गरीबी रेखा के नीचे रहनेवालों तक सीमित हैं. लेकिन असली मुद्दा और विवाद तो इस गरीब रेखा की परिभाषा और गरीबों की पहचान का है. पिछले साल योजना आयोग की ओर से दी गई गरीब और गरीबी की परिभाषा एक त्रासद मजाक से ज्यादा नहीं थी.
मुश्किल यह है कि योजना आयोग की उस गरीबी रेखा के आधार पर ही विभिन्न योजनाओं के लाभार्थियों की पहचान की जा रही है. साफ़ है कि आधार कार्ड गरीबों की पहचान नहीं करेगा क्योंकि गरीबों की पहचान तो राज्य सरकारें करेंगी और उनके लिए योजना आयोग ने हर राज्य में एक कृत्रिम सीमा बाँध दी है.

इस कारण आधार कार्ड कोई जादू की छड़ी नहीं बनने जा रही है जिससे गरीबों की सही-सही पहचान हो जाए. राज्य सरकार और जिला प्रशासन जिसे गरीब घोषित करेगा, उसे उसकी आधार कार्ड की पहचान के आधार पर इन योजनाओं का सीमित लाभ मिलेगा.

यही नहीं, आगे चलकर सरकार का इरादा राशन और उर्वरक सब्सिडी को भी इसके तहत लाने का है जिसका मतलब होगा कि पी.डी.एस की मौजूदा व्यवस्था को खत्म करके सरकार अनाज के बजाय सीधे लोगों को उतना पैसा दे देगी जिससे वे खुले बाजार से अपनी पसंद का अनाज खरीद लें. कहने की जरूरत नहीं है कि अगर ऐसा हुआ तो एक ओर सरकार को किसानों से न्यूनतम समर्थन मूल्य पर अनाज खरीदने से मुक्ति मिल जाएगी क्योंकि जब पी.डी.एस राशन नहीं तो अनाज खरीदने की क्या जरूरत है?
दूसरी ओर, गरीबों को खुले बाजार की दया पर छोड़ दिया जाएगा क्योंकि राशन के बदले जितना नगद देगी, उससे खुले बाजार में उन्हें पी.डी.एस से मिलनेवाले अनाज का दस प्रतिशत अनाज भी नहीं मिल पायेगा.
यही स्थिति उर्वरकों के मामले में भी होगी. साफ़ है कि इससे किसानों और गरीबों दोनों को नुकसान होगा. निश्चय ही, इससे अनाज के कारोबार में लगी बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों, देशी कंपनियों और बड़े व्यापारियों को फायदा होगा. आश्चर्य नहीं कि कैश ट्रांसफर योजना का समर्थन सबसे ज्यादा वे ही कर रही हैं.

('समकालीन जनमत' के दिसंबर अंक के लिए लिखी टिप्पणी)

गुरुवार, जुलाई 19, 2012

रिकार्डतोड़ अनाज भण्डार के बीच आसमान छूती महंगाई

नीतिगत लकवे के कारण महंगाई बढ़ रही है    

आंकड़ों के बारे में आपने यह मसल जरूर सुनी होगी- झूठ, महाझूठ और आंकड़े! इन दिनों महंगाई के आंकड़ों पर यह मसल कुछ ज्यादा ही सटीक बैठती है. आम आदमी आसमान छूती महंगाई की मार से भले त्रस्त हो लेकिन मुद्रास्फीति के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, मई की तुलना में जून महीने में थोक मूल्य सूचकांक (डब्ल्यू.पी.आई) पर आधारित महंगाई की दर में मामूली कमी दर्ज की गई है और मुद्रास्फीति दर मई के ७.५५ फीसदी से घटकर ७.२५ फीसदी हो गई है.
जाहिरा तौर पर मंत्रियों और अर्थव्यवस्था के मैनेजरों के चेहरों पर मुस्कराहट लौट आई है लेकिन अधिकांश विश्लेषक मुद्रास्फीति दर में आई गिरावट से हैरान है क्योंकि वे उसमें मामूली बढोत्तरी की आशंका जता रहे थे. समाचार एजेंसी रायटर्स के एक सर्वेक्षण में विश्लेषकों और अर्थशास्त्रियों ने जून में मुद्रास्फीति की दर ७.६२ फीसदी रहने का अनुमान लगाया था.
सवाल है कि यह चमत्कार कैसे हुआ? असल में, इसका वास्तविक महंगाई से कम और सांख्यकी से ज्यादा संबंध है. सच पूछिए तो यह एक सांख्यिकीय चमत्कार है. पिछले साल की ऊँची मुद्रास्फीति दर के कारण इस साल की वृद्धि प्रतिशत में कम दिखाई देती है. इसे अर्थशास्त्र में हाई बेस प्रभाव यानी आधार वर्ष में ऊँची दर का असर कहते हैं. चूँकि पिछले वर्ष जून महीने में थोक मुद्रास्फीति दर ९.५१ फीसदी थी, इसलिए इस साल की बढोत्तरी तुलनात्मक रूप से खासी कम दिखाई दे रही है.

दूसरी बात यह है कि मुद्रास्फीति के ताजा आंकड़े अस्थाई हैं और दो महीने बाद जारी होनेवाले मुद्रास्फीति के संशोधित आंकड़ों में आमतौर पर बढोत्तरी का रुझान देखा गया है. जैसे जून के थोक मुद्रास्फीति दर के साथ-साथ अप्रैल महीने की मुद्रास्फीति की दर (अस्थाई) को ७.२३ फीसदी से संशोधित करके ७.५० फीसदी कर दिया गया है. इसका अर्थ यह हुआ कि दो महीने बाद जून के मुद्रास्फीति के वास्तविक आंकड़े मौजूदा दर से ऊँचे रह सकते हैं.

तीसरी बात यह है कि जून महीने के थोक मुद्रास्फीति के आंकड़ों की अगर बारीकी से छानबीन की जाए तो साफ़ है कि खाद्य मुद्रास्फीति की दर अभी भी न सिर्फ ऊँची बनी हुई है बल्कि मई की तुलना में जून में उसमें बढ़ोत्तरी भी हुई है. मई में खाद्य मुद्रास्फीति की दर १०.७४ फीसदी थी जो जून महीने में बढ़कर १०.८१ फीसदी हो गई है.
इसमें भी सबसे चौंकानेवाली बात यह है कि जून महीने में चावल की कीमतों में ६.७ फीसदी, गेहूं में ७.४६ फीसदी, दालों में ६.८२ फीसदी और सब्जियों में २०.४८ फीसदी की बढ़ोत्तरी दर्ज की गई है. इससे साफ़ है कि खाद्य वस्तुओं में महंगाई की आग सिर्फ सब्जियों-फलों तक सीमित नहीं है बल्कि आम आदमी की थाली के सबसे बुनियादी अनाजों- गेहूं-चावल-दाल की कीमतों में भी भभक रही है.
खाद्यान्नों की यह महंगाई इसलिए ज्यादा हैरान करनेवाली है क्योंकि इस समय सरकार के गोदामों में रिकार्ड ८.२ करोड़ टन अनाज का भण्डार है. वैसे सरकार के पास केवल ६.४ करोड़ टन अनाज के भंडारण की व्यवस्था है. मजे की बात यह है कि इस साल सरकार ने ३.८ करोड़ टन गेहूं की खरीद की है. इसका अर्थ यह हुआ कि कोई १.८ करोड़ टन अनाज असुरक्षित भण्डारण के कारण बर्बाद या खराब हो सकता है.

इसके बावजूद यू.पी.ए सरकार इस अनाज भण्डार का इस्तेमाल महंगाई से लड़ने में करने में नाकाम रही है. वह चाहती तो इस अनाज भण्डार से महंगाई खासकर खाद्यान्नों की महंगाई पर अंकुश लगा सकती थी. लेकिन इसके उलट अनाज का यह रिकार्डतोड़ भण्डार खाद्यान्नों की महंगाई की बड़ी वजह बन गया है.

असल में, यह यू.पी.ए सरकार के खाद्य प्रबंधन की नाकामी है. वह इस तरह कि इस समय सरकार खुद सबसे बड़ा जमाखोर बन गई है. जब सरकार खुद ६८२ लाख टन अनाज दबा कर बैठ जाएगी तो बाजार में एक कृत्रिम किल्लत पैदा होना तय है जिसका फायदा खाद्यान्नों के बड़े व्यापारी और बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ उठा रही हैं.
यू.पी.ए सरकार चाहती तो वह इस अनाज भण्डार का इस्तेमाल करते हुए न सिर्फ खाद्य सुरक्षा कानून को तुरंत लागू करके अनाज को जरूरतमंदों तक पहुंचा सकती थी बल्कि उसे नियंत्रित और सस्ती कीमतों पर खुले बाजार में उतारकर अनाजों की महंगाई को काबू में कर सकती थी. कहने की जरूरत नहीं है कि अनाजों की महंगाई पर अंकुश से सब्जियों की महंगाई पर भी अंकुश लगाने में मदद मिलती क्योंकि इससे मुद्रास्फीति की अपेक्षाओं पर अंकुश लगता और सट्टेबाज-मुनाफाखोर हताश होते.
लेकिन यू.पी.ए सरकार इसके लिए तैयार नहीं है, भले ही अनाज खुले में सड़ या बर्बाद हो जाए या उसे चूहे खा जाएँ. सरकार की इस अनिच्छा और उदासीन रवैये के पीछे एकमात्र कारण राजकोषीय घाटे को कम करने और इसके लिए खाद्य सब्सिडी को कम से कम रखने की जिद है.

इसका कोई समझदार अर्थशास्त्रीय या राजनीतिक तर्क नहीं है लेकिन नव उदारवादी आर्थिक सैद्धांतिकी के प्रति अतिरिक्त व्यामोह और बड़ी देशी-विदेशी पूंजी को खुश रखने के लिए यू.पी.ए सरकार जिद पर अड़ी हुई है. वह न सिर्फ गरीबों को सस्ती दरों पर अनाज देने में आनाकानी कर रही है बल्कि वाजिब दामों पर बाजार में अनाज उतारने से भी हिचकिचा रही है.

कहने की जरूरत नहीं है कि मनमोहन सिंह सरकार के इस ‘नीतिगत लकवे’ का फायदा अनाजों के बड़े सट्टेबाज और जमाखोर उठा रहे हैं. यही नहीं, गोदामों में रिकार्डतोड़ अनाज रखने के कारण उसके रखरखाव पर भारी खर्च हो रहा है और अनाज सड़ और बर्बाद भी हो रहा है, उसके कारण सरकार का खाद्य सब्सिडी का बजट बढ़ता ही जा रहा है.
दूसरी ओर, खाद्य वस्तुओं की महंगाई भी बेकाबू बनी हुई है. सच पूछिए तो ‘रिकार्डतोड़ अनाज भण्डार और ऊँची खाद्य मुद्रास्फीति दर’ की मौजूदा परिघटना एक पहेली बन चुकी है. लेकिन यह पहेली वास्तव में, यू.पी.ए सरकार की नव उदारवाद नीतियों की ऐसी नाकामी है जिसकी असली कीमत आम आदमी को चुकानी पड़ रही है.
इस सबके बीच इस साल मॉनसून के धोखा देने की बढ़ती आशंका और उसके कारण खाद्य वस्तुओं की कीमतों पर बढ़ते दबाव ने अपना रंग दिखाना शुरू कर दिया है. पिछले दस दिनों में सब्जियों की कीमतों में जो उछाल दिखा है, वह जल्दी ही खाद्यान्नों की कीमतों में भी दिखाई पड़ने लगेगी. सट्टेबाज और जमाखोर सरकार के रूख पर नजर लगाये हैं.

अगर वह अब भी अपने नीतिगत लकवे से बाहर नहीं निकली तो उसका सबसे अधिक फायदा अनाजों के व्यापार में लगी बड़ी देशी-विदेशी कम्पनियाँ और व्यापारी उठाएंगे और आमलोग उसकी कीमत चुकायेंगे. इस मायने में पिछले कुछ दिनों में सब्जियों/खाद्यान्नों की कीमतों में हुई भारी बढ़ोत्तरी यू.पी.ए सरकार के लिए खतरे की घंटी है.

इसलिए उसे जून के मुद्रास्फीति के भ्रामक आंकड़ों में राहत महसूस करने और झूठे दावे करने के बजाय पिछले कुछ दिनों में सब्जियों से लेकर खाद्यान्नों की कीमतों में आई बेतहाशा उछाल को लेकर सतर्क और सक्रिय होना चाहिए.
अगर उसने इस रिकार्डतोड़ अनाज भण्डार का अब भी इस्तेमाल नहीं किया तो पूछा जाना चाहिए कि आम आदमी के पैसे से बना यह अनाज भण्डार किस दिन और काम के लिए है?
('दैनिक भास्कर', नई दिल्ली के 17 जून के अंक में आप-एड पर प्रकाशित लेख)                      

                              

सोमवार, जून 04, 2012

आर्थिक सुधार अंधी गली के आखिरी मुहाने पर पहुँच गए हैं

इस आर्थिक संकट की जड़ें नव उदारवादी अर्थनीति में हैं

भारतीय अर्थव्यवस्था संकट में है. अर्थव्यवस्था के लगभग सभी संकेतक उसकी पतली होती हालत की ओर इशारा कर रहे हैं. ऐसा नहीं है कि यह संकट अचानक आया है. इस संकट के संकेत लंबे अरसे से दिख रहे हैं.
लेकिन यू.पी.ए-2 सरकार इन संकेतों को न सिर्फ नजरंदाज करती रही बल्कि अपने अंदरूनी अंतर्विरोधों के कारण उससे निपटने के लिए जरूरी स्पष्ट और ठोस फैसला करने में नाकाम रही है.
यू.पी.ए के आर्थिक मैनेजर मानें या न मानें लेकिन यह एक कड़वी सच्चाई है कि सत्ता में तीन साल पूरे कर चुकी यू.पी.ए-2 सरकार की सबसे बड़ी नाकामी अर्थव्यवस्था के कुप्रबंधन के रूप में सामने आई है.

ऐसा लगता है कि यू.पी.ए सरकार की अर्थव्यवस्था पर से पकड़ बिलकुल छूट चुकी है. नतीजा सबके सामने है- राजनीतिक रूप से ज्वलनशील महंगाई पिछले तीन साल बेकाबू है, जी.डी.पी की वृद्धि दर गिर रही है, औद्योगिक उत्पादन की दर नकारात्मक हो चुकी है, शेयर बाजार और उससे अधिक रूपया लुढ़कने के नए रिकार्ड बना रहा है, व्यापार घाटे के साथ चालू खाते का घाटा खतरे की सीमा को लांघ चुका है, निवेश गिर रहा है और नए रोजगार पैदा नहीं हो रहे हैं.
साफ़ है कि आर्थिक हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं. लेकिन प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री से लेकर अर्थव्यवस्था के मैनेजरों तक का दावा है कि अर्थव्यवस्था के मूल तत्व मजबूत हैं और मौजूदा आर्थिक मुश्किलें वैश्विक अर्थव्यवस्था खासकर यूरोपीय देशों की अर्थव्यवस्थाओं के संकट के कारण हैं.
लेकिन यह सच्चाई से आँख चुराना और अपनी नाकामियों पर पर्दा डालने की तरह है. यह एक हद तक ठीक है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था खासकर यूरोपीय अर्थव्यवस्थाओं के गहरे संकट में फंसे होने का असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर भी पड़ रहा है लेकिन उससे बड़ा सच यह है कि अर्थव्यवस्था के मौजूदा संकट के लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार वे नव उदारवादी आर्थिक नीतियां हैं जो न सिर्फ भारत में बल्कि पूरी दुनिया में पिट रही हैं.
आश्चर्य नहीं कि इन दिनों पूरी दुनिया में कारपोरेट और वित्तीय पूंजीवाद को आगे बढ़ानेवाली नव उदारवादी अर्थनीति को लेकर न सिर्फ गंभीर सवाल उठाये जा रहे हैं बल्कि संकट को बढ़ाने और स्थिति को और बदतर बनाने में उसकी भूमिका को भी रेखांकित किया जा रहा है.
लेकिन मुश्किल यह है कि यू.पी.ए-2 सरकार और खासकर उसके आर्थिक मैनेजर नव उदारवादी आर्थिक नीतियों से इस कदर सम्मोहित हैं कि वे उससे इतर देखने और उसके विकल्पों पर विचार करने के लिए तैयार नहीं हैं. यहाँ तक कि वे यह भी मानने को तैयार नहीं हैं कि मौजूदा वैश्विक और घरेलू आर्थिक संकट के लिए नव उदारवादी आर्थिक सैद्धांतिकी जिम्मेदार है.
इसका नतीजा यह हुआ है कि वे अर्थव्यवस्था के मौजूदा संकट का ठीकरा वैश्विक आर्थिक संकट पर फोड़ने के बावजूद उसका समाधान उन्हीं नव उदारवादी आर्थिक नीतियों और उनपर आधारित आर्थिक सुधारों में ढूंढा जा रहा है जिनके कारण यह संकट आया है.
सच पूछिए तो भारतीय अर्थव्यवस्था का मौजूदा संकट अर्थनीति के स्तर पर नए और वैकल्पिक विचारों की कमी का नतीजा है. उदाहरण के लिए, महंगाई और खादयान्न प्रबंधन के मुद्दे को हो लीजिए जिसके कारण पूरी अर्थव्यवस्था और राजनीति डगमगाई हुई है.
पिछले तीन सालों से मुद्रास्फीति की लगातार ऊँची दर के कारण न सिर्फ अर्थव्यवस्था पटरी से उतरती हुई दिखाई दे रही है बल्कि यू.पी.ए सरकार को उसकी भारी राजनीतिक कीमत भी चुकानी पड़ी है. यह महंगाई मुख्यतः खाद्यान्नों और दूध-सब्जियों की ऊँची कीमतों के कारण है जो धीरे-धीरे फैलकर व्यापक हो गई है.
कहने की जरूरत नहीं है कि खाद्य वस्तुओं की इस महंगाई का सबसे प्रमुख कारण कृषि क्षेत्र की भारी उपेक्षा है जिसे ९० के आर्थिक सुधारों के दशक में अपने हाल पर छोड़ दिया गया. इस दौरान यह मान लिया गया कि कृषि क्षेत्र के बिना भी सिर्फ सेवा और उद्योग क्षेत्र की बदौलत अर्थव्यवस्था ८-१० फीसदी की तेज रफ़्तार से दौड़ सकती है.
यह तथ्य है कि ८-९ फीसदी की तेज आर्थिक वृद्धि के दौर में भी कृषि की विकास दर सिर्फ २ से ३ फीसदी के बीच झूलती रही. इससे अर्थव्यवस्था के मैनेजरों को यह भ्रम हो गया कि नई भारतीय अर्थव्यवस्था कृषि क्षेत्र को बाईपास करके सेवा और उद्योग क्षेत्र के हाईवे पर तेज रफ़्तार से दौड़ सकती है.
लेकिन उन्हें अंदाज़ा नहीं था कि भारत जैसे देश में कृषि की उपेक्षा करके अर्थव्यवस्था लंबे समय तक हाईवे पर तेज नहीं दौड़ सकती है. उसे ब्रेक लगना ही है. खाद्य वस्तुओं की महंगाई वही ब्रेक है जिसने अर्थव्यवस्था को जबरदस्त झटका दिया है.
असल में, हुआ यह कि सरकार ने इस मुद्रास्फीति को काबू में करने का जिम्मा रिजर्व बैंक को दे दिया जिसने ब्याज दरों में डेढ़ सालों में १३ बार से ज्यादा बार वृद्धि करके उसे काबू में करने की कोशिश की लेकिन ताजा आंकड़ों से साफ़ है कि महंगाई अभी भी काबू में नहीं आई है क्योंकि उसकी वजहें कहीं और हैं. अलबत्ता, ऊँची ब्याज दरों के कारण अर्थव्यवस्था की रफ़्तार जरूर धीमी पड़ती जा रही है क्योंकि इससे निवेश पर बुरा असर पड़ा है.
यही नहीं, नव उदारवादी नीतियों के असर में सरकार ने खाद्य कुप्रबंधन का नया रिकार्ड बना दिया है. यह किसी पहेली से कम नहीं है कि इस साल रिकार्ड कृषि उत्पादन और सरकार के गोदामों में रिकार्ड खाद्यान्न भण्डार के बावजूद खाद्य वस्तुओं की महंगाई आसमान छू रही है.
यू.पी.ए सरकार इस साल रिकार्ड कृषि उत्पादन को अपनी उपलब्धि बताते नहीं थक रही है लेकिन वही रिकार्ड उत्पादन उसके लिए सबसे बड़ा सिरदर्द और अभिशाप बनता दिख रहा है. वजह यह कि इस साल जून के आखिर में सरकारी गोदामों में कोई ७.५ करोड़ टन अनाज का रिकार्ड भण्डार होगा लेकिन उसमें से कोई १.५ करोड़ टन अनाज बाहर खुले में पड़ा होगा.
कहने की जरूरत नहीं है कि यह खाद्यान्न प्रबंधन के स्तर पर नीतियों का दिवालियापन है कि एक ओर सरकार के भंडारों में न्यूनतम बफर नार्म के तीन गुने से ज्यादा अनाज होगा और इस तरह सरकार सबसे बड़ा जमाखोर बन जाएगी और दूसरी ओर, खुले बाजार में अनाजों की किल्लत होगी, ऊँची महंगाई होगी, मुनाफाखोर पैसे बनायेंगे, करोड़ों लोग भूखे पेट सोयेंगे लेकिन सरकारी भंडारों में अनाज सड़ेगा.
लेकिन यू.पी.ए सरकार के आर्थिक मैनेजर इस अनाज को गरीबों में बांटने या उसे एक सार्वभौम खाद्य सुरक्षा कानून के तहत सभी नागरिकों के लिए सस्ती दरों पर उपलब्ध कराने के लिए तैयार नहीं हैं. यहाँ तक कि एक सीमित और आधे-अधूरे खाद्य सुरक्षा विधेयक को भी जान-बूझकर लटकाए रखा गया है.
इसकी वजह यह है कि सरकार को लगता है कि मुफ्त में या सस्ती दरों पर लोगों को अनाज उपलब्ध कराने से खाद्य सब्सिडी बढ़ जाएगी जिससे सरकार का राजकोषीय घाटा बढ़ जाएगा. नव उदारवादी अर्थनीति में राजकोषीय घाटा को जी.डी.पी के तीन फीसदी के दायरे में रखना सबसे बड़ी और पहली प्राथमिकता होती है, इसलिए सरकार अनाज इकठ्ठा करने का रिकार्ड बनाती जा रही है लेकिन उसे जरूरतमंदों और भूखे लोगों तक पहुंचाने के लिए तैयार नहीं है.
लेकिन इसका नतीजा यह हुआ है कि एक ओर खुले बाजार में कृत्रिम किल्लत पैदा हो गई है जिसका फायदा अनाजों के बड़े व्यापारी और कम्पनियाँ उठा रही हैं, महंगाई आसमान छू रही है और दूसरी ओर, गोदामों में अनाजों को रखने और उनकी देखभाल में होनेवाला खर्च बढ़ता जा रहा है जिसके कारण साल-दर-साल खाद्य सब्सिडी और राजकोषीय घाटा दोनों बढते जा रहे हैं.
यह नव उदारवादी आर्थिक नीतियों के प्रति अति व्यामोह का नतीजा है. इसके कारण माया मिली, न राम वाली स्थिति पैदा हो गई है. लेकिन इसके बावजूद इन नीतियों का मोह नहीं छूट रहा है. आश्चर्य नहीं कि यू.पी.ए सरकार मौजूदा आर्थिक संकट की दवा उन्हीं नव उदारवादी आर्थिक सुधारों के नए डोज में खोज रही है जिनके कारण यह संकट पैदा हुआ है.
लेकिन सच यह है कि नव उदारवादी आर्थिक सुधार खुद एक गंभीर संकट में फंस गए हैं. इन नीतियों के कारण बढे भ्रष्टाचार और सार्वजनिक संसाधनों की कारपोरेट लूट के खिलाफ लोगों का गुस्सा बढ़ता जा रहा है. इसका सबसे बड़ा सुबूत यह है कि पूरे देश में इन नीतियों के खिलाफ एक विद्रोह जैसा माहौल है खासकर गरीब किसान और आदिवासी उद्योगों और खनन के लिए जमीन देने को तैयार नहीं हैं.
यहाँ तक कि इन नीतियों का सबसे बड़ा समर्थक माना जानेवाला मध्यवर्ग भी बेचैन और गुस्से में है. साफ़ है कि आर्थिक सुधार अंधी गली के आखिरी मुहाने पर पहुँच गए हैं. आगे रास्ता बंद है. यू.पी.ए सरकार इस सच्चाई को जितनी जल्दी समझ लेगी, अर्थव्यवस्था के लिए उतना ही अच्छा होगा. अन्यथा यह संकट और बढ़ेगा और नए-नए रूपों में सामने आएगा.
सबसे बड़ा खतरा यह है कि इस आर्थिक संकट के राजनीतिक संकट में तब्दील होने के आसार बढते जा रहे हैं. लेकिन अगर यू.पी.ए सरकार और उसके आर्थिक मैनेजर यह सोच रहे हैं कि आर्थिक-राजनीतिक संकट बढ़ने से उन्हें यह कहकर आर्थिक सुधारों का नया डोज देने में आसानी हो जाएगी कि अब इन कठोर फैसलों के अलावा और कोई उपाय नहीं है तो वे भूल कर रहे हैं.
उन्हें यह जोखिम बहुत भारी पड़ सकता है. उन्हें यूरोप में ध्वस्त हो रही सरकारों के हश्र से सबक लेना चाहिए.

('राष्ट्रीय सहारा' के हस्तक्षेप में पिछली 23 मई को प्रकाशित टिप्पणी) 

शुक्रवार, फ़रवरी 17, 2012

क्या प्रणब मुखर्जी की नींद भोजन के अधिकार कानून से उड़ी हुई है?

सवाल भूखों की दो जून की रोटी के लिए जी.डी.पी के १.३ फीसदी खर्च का है

दूसरी और आखिरी किस्त

सवाल यह है कि यह जानते हुए भी कि बजट में सब्सिडी में कटौती के बावजूद वास्तविकता में उसमें बढोत्तरी हो रही है, प्रणब मुखर्जी इतने परेशान क्यों हैं कि उनकी नींद उड़ गई है? असल में, वे इस सब्सिडी को लेकर उतने परेशान नहीं हैं जितने खाद्य सब्सिडी को लेकर बेचैन हैं.

उनकी नींद इस बात से उड़ी हुई है कि आनेवाले बजट में प्रस्तावित खाद्य सुरक्षा कानून के मद्देनजर खाद्य सब्सिडी का बजट बढ़ना तय है. मोटे अनुमानों के मुताबिक, खाद्य सुरक्षा कानून के लागू होने की स्थिति में खाद्य सब्सिडी के मौजूदा ६० हजार करोड़ रूपये के बजट में कोई २५ से ३५ हजार करोड़ रूपये की वृद्धि हो सकती है.


हालांकि वित्त मंत्री ने राजनीतिक संकोच में यह खुलकर नहीं कहा है लेकिन यह किसी से छुपा नहीं है कि वित्त मंत्रालय खाद्य सब्सिडी में इस ‘भारी वृद्धि’ को लेकर खुश नहीं है. सच यह है कि खाद्य सब्सिडी में वृद्धि के डर से खाद्य सुरक्षा कानून का खुद यू.पी.ए सरकार के अंदर दबे-छुपे खासा विरोध हो रहा है.

कृषि मंत्री शरद पवार तो अपनी नाखुशी कई मौकों पर खुलकर जाहिर कर चुके हैं. यही कारण है कि पिछले डेढ़-दो सालों में इस प्रस्तावित कानून को अमल में आने से रोकने और उसे कमजोर और सीमित करने की हरसंभव कोशिश की गई है.

हैरानी की बात नहीं है कि यू.पी.ए-२ सरकार का खाद्य सुरक्षा का यह सबसे महत्वाकांक्षी कानून/कार्यक्रम पिछले ढाई सालों से विभिन्न मंत्रालयों/समितियों के खींचतान में फंसा रहा. इस दौरान इसे रोकने और कमजोर करने की भरपूर कोशिश की गई. इसके लिए सबसे अधिक खाद्य सब्सिडी के बजट में संभावित ‘भारी बढोत्तरी’ को मुद्दा बनाया गया.

यहाँ तक कि इसके खिलाफ एक व्यापक कुप्रचार अभियान शुरू कर दिया गया जिसमें बहुत सोचे-समझे तरीके से खाद्य सुरक्षा के कानून के लागू होने के बाद खाद्य सब्सिडी के बजट में दो से तीन गुनी वृद्धि के आकलन पेश किये जाने लगे. सरकार के एक बड़े अफसर तो इसका बजट छह लाख करोड़ रूपये तक ले गए.

कहने की जरूरत नहीं है कि खाद्य सब्सिडी में ‘भारी वृद्धि’ के इन काल्पनिक अनुमानों के पीछे असली मकसद वित्तीय घाटे में भारी बढ़ोत्तरी और इस कारण ‘वित्तीय ध्वंस’ का हौव्वा खड़ा करना था ताकि खाद्य सुरक्षा कानून को रोका और लटकाया जा सके. हालांकि इसमें नया कुछ भी नहीं है.

इससे पहले भी ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून और किसानों की कर्ज माफ़ी के मुद्दे पर भी इसी तरह का अभियान चलाया गया था. इस बार निशाने पर खाद्य सुरक्षा कानून है. चिंता की बात यह है कि इस अभियान में प्रधानमंत्री के बाद अब खुद वित्त मंत्री भी शामिल हो गए हैं.

मजे की बात यह है कि खुद कृषि मंत्रालय के खाद्य और सार्वजनिक वितरण विभाग का अनुमान है कि इस कानून को लागू करने में मौजूदा बजट प्रावधान की तुलना में सिर्फ २७ हजार करोड़ रूपये अधिक खर्च होंगे. यही नहीं, ज्यादातर तार्किक अनुमानों में इस कानून को लागू करने के लिए अधिकतम ९५ हजार करोड़ से लेकर १.१० लाख करोड़ रूपये खर्च होने का आकलन है.

यह रकम जी.डी.पी के १.४ फीसदी के आसपास बैठती है. सवाल यह है कि क्या खुद को दुनिया की एक बड़ी आर्थिक महाशक्ति के रूप में पेश कर रहा देश अपने भूखे लोगों के लिए दो जून के भोजन के लिए भी जी.डी.पी का १.४ फीसदी खर्च नहीं कर सकता है?

सवाल यह भी उठता है कि क्या वित्त मंत्री की नींद कभी इस तथ्य से भी उड़ती है कि देश में सरकारी आंकड़ों के मुताबिक कोई ३० करोड़ से अधिक भारतीय ऐसे हैं जिन्हें एक जून भी भरपेट भोजन नहीं मिलता है? क्या उन्हें भी प्रधानमंत्री की तरह यह राष्ट्रीय शर्म महसूस होती है कि देश में कोई ४२ फीसदी बच्चे कुपोषण (भूख का दूसरा नाम) के शिकार हैं?

क्या वित्त मंत्री को इस बात से बेचैनी होती है कि देश में कोई ७८ फीसदी लोग प्रतिदिन २० रूपये से कम की आय पर गुजर करने को मजबूर हैं? क्या उनकी नींद इस बात से भी उड़ती है कि आसमान छूती महंगाई के बीच आम आदमी कैसे जी रहा है?

कहना मुश्किल है कि इन और इन जैसे अनेकों कड़वी सच्चाइयों से वित्त मंत्री की नींद पर असर पड़ता है या नहीं लेकिन इतना तय है कि ये किसी भी संवेदनशील इंसान की नींद उड़ाने के लिए काफी हैं.

गाँधी जी ने कहा था कि कोई भी फैसला करने से पहले सबसे आखिरी पायदान पर खड़े आदमी की सोचो कि क्या वह उसके आंसू पोंछ पायेगा? क्या प्रणब मुखर्जी को गाँधी की यह जंत्री याद है? बजट का इंतज़ार कीजिये.

('जनसत्ता' के १५ फरवरी के अंक में सम्पादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित लेख की दूसरी किस्त)

शुक्रवार, दिसंबर 30, 2011

खाद्य सुरक्षा के नाम पर भूखों को फिर ठेंगा

भोजन के अधिकार की आड़ में पी.डी.एस को ठिकाने लगाने की तैयारी  


पहली किस्त

काफी ना-नुकुर, खींचतान और दांवपेंच के बाद आख़िरकार यू.पी.ए सरकार ने खाद्य सुरक्षा विधेयक संसद में पेश कर दिया. पिछले दो सालों से अधिक समय से सरकार के अंदर और बाहर इस कानून के मसौदे को लेकर बहस चल रही थी. दूसरी ओर, देश भर में खाद्य सुरक्षा यानी सभी नागरिकों को भोजन के अधिकार की मांग को लेकर आंदोलन तेज हो रहे थे.

सरकार पर नैतिक और राजनीतिक दोनों दबाव थे. सचमुच इससे अधिक शर्म की बात और क्या हो सकती है कि जी.डी.पी की तेज रफ़्तार और भारत के आर्थिक और सैन्य महाशक्ति बनने के दावों के बीच देश में गंभीर भूखमरी के शिकार लोगों की कुल तादाद बढ़कर २७ करोड़ से अधिक पहुँच गई है?

यही नहीं, दुनिया भर में भूखमरी के शिकार लोगों की कुल आबादी का एक चौथाई से ज्यादा हिस्सा अकेले भारत में रहता है. आश्चर्य नहीं कि वैश्विक भूख सूचकांक (हंगर इंडेक्स) पर ८४ देशों में भारत कई अत्यधिक गरीब अफ़्रीकी और एशियाई देशों से भी नीचे ६७ वें स्थान पर है.

विडम्बना देखिए कि पिछले डेढ़-दो दशकों खासकर १९९० से २००५ के बीच तेज वृद्धि दर के कारण जहां भारत के जी.डी.पी का आकार दुगुना हो गया और प्रति व्यक्ति आय में तिगुनी वृद्धि दर्ज की गई, उसी दौरान देश में गंभीर भूखमरी के शिकार लोगों की तादाद में कमी आने के बजाय उनकी संख्या में लगभग ६.५ करोड़ की और बढोत्तरी हो गई.

हालात कितने गंभीर हैं, इसका अंदाज़ा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि देश में कोई ४८ फीसदी बच्चे और ४० फीसदी वयस्क भरपेट और पर्याप्त पोषणयुक्त भोजन न मिलने के कारण कुपोषण के शिकार हैं. कहने की जरूरत नहीं है कि इस कानून से देश के उन करोड़ों लोगों को बहुत उम्मीदें और अपेक्षाएं थीं जो आज़ादी के ६३ साल बाद आज भी भूखे पेट सोने के लिए मजबूर हैं.

लेकिन इतनी उम्मीदों, सरकार के भारी-भरकम दावों और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी की व्यक्तिगत दिलचस्पी के बाद जो विधेयक संसद में पेश किया गया है, उसका मकसद कहीं से भी सबको भोजन का मौलिक अधिकार देना नहीं है.

इसके उलट सच यह है कि खाद्य सुरक्षा का यह विधेयक न सिर्फ बहुत सीमित, आधा-अधूरा, विसंगतियों और अंतर्विरोधों से भरा हुआ है बल्कि यह देश में खाद्य असुरक्षा बढ़ानेवाला कानून साबित होगा. यही नहीं, खाद्य सुरक्षा के नाम पर यह भूखे लोगों का मजाक उड़ानेवाला विधेयक है जिसका असली मकसद खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने की आड़ में खादयान्नों के कारोबार से जुड़ी बड़ी देशी-विदेशी कंपनियों की मदद करना है.

इस कानून के जरिये सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पी.डी.एस) में सुधार के नाम पर उसे पूरी तरह बर्बाद करने की तैयारी कर ली गई है जिससे सबसे ज्यादा फायदा बड़ी बहुराष्ट्रीय खाद्यान्न कंपनियों को होगा.

असल में, यू.पी.ए सरकार इसके लिए बहुत दिनों से मौका खोज रही थी. यह किसी से छुपा नहीं है कि पी.डी.एस में सुधार के नाम पर उसे समेटने और बंद करने की कोशिशें लंबे समय से चल रही थीं. पी.डी.एस में सुधार की आड़ में उसे पहले ही लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली (टी.पी.डी.एस) में बदलकर कमजोर और खोखला किया जा चुका है.

इसी नव उदारवादी एजेंडे को आगे बढाने के लिए अब खाद्य सुरक्षा विधेयक को एक मौके की तरह इस्तेमाल किया गया है जिसमें यह प्रावधान किया गया है कि इस कानून को लागू करने के लिए सभी राज्यों को पी.डी.एस में सुधार करना होगा.

इसमें कोई दो राय नहीं है कि पी.डी.एस व्यवस्था में जितना भ्रष्टाचार और अराजकता है, उसे देखते हुए उसमें सुधार की और उसे भ्रष्टाचारमुक्त, प्रभावी और जन नियंत्रण में लाने की सख्त जरूरत है. लेकिन सरकार का इरादा उसमें सुधार करके उसे सशक्त और प्रभावी बनाने का नहीं है. इसके उलट वह पी.डी.एस में सुधार के बहाने उसमें अत्यंत विवादास्पद आधार पहचानपत्र (यूनिक आइडेंटिफिकेशन नंबर) को घुसेड़ना चाहती है.

लेकिन इस विधेयक में सबसे खतरनाक प्रावधान यह किया गया है कि केन्द्र सरकार जिस दिन से और जिस क्षेत्र में अनाज की जगह कैश ट्रान्सफर, फ़ूड कूपन जैसी योजनाओं को लागू करना चाहेगी, राज्य सरकारों को उसे लागू करना होगा.

साफ़ है कि सरकार का असली इरादा लोगों को पी.डी.एस के माध्यम से अनाज मुहैया कराके खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करना नहीं बल्कि कैश ट्रांसफर और फ़ूड कूपन के बहाने खाद्यान्न के बड़े व्यापारियों और बड़ी कंपनियों को मोटे मुनाफे की गारंटी करना है.

यह किसी से छुपा नहीं है कि पहले एन.डी.ए और अब यू.पी.ए सरकार पिछले कई वर्षों से राशन लाभार्थियों को अनाज के बजाय नकद पैसा या फ़ूड कूपन देने की पेशकश करते रहे हैं जिसका इस्तेमाल करके वह खुले बाजार से अपनी पसंद का अनाज खरीद ले.

ऊपर से देखने पर यह योजना बहुत आकर्षक लगती है कि लाभार्थी को राशन की दूकान और उसमें मिलनेवाले घटिया अनाज से मुक्ति मिल जायेगी और वह अपनी सुविधा और पसंद से अनाज खरीद सकता है.

लेकिन सच यह है कि सुधार के नाम पर गरीबों और भूखमरी से जूझ रहे लोगों को भ्रष्ट पी.डी.एस के बजाय खुले बाजार की मनमानी के भरोसे छोड़ा जा रहा है. आखिर कितने गरीब खुले बाजार से फ़ूड कूपन या नकद से अपनी इच्छा या पसंद से अनाज खरीद पाएंगे?

दूसरी ओर, एक बड़ा सवाल यह भी है कि अगर सरकार कैश ट्रांसफर या फ़ूड कूपन को आगे बढ़ाने जा रही है तो उसके अपने अनाज भण्डार का क्या होगा? अगर सरकार पी.डी.एस से अनाज का वितरण नहीं करना चाहती है तो उसे किसानों से न्यूनतम समर्थन मूल्य पर अनाज खरीदने और अनाज भण्डार रखने की भी क्या जरूरत है?

मतलब साफ़ है. सरकार का असली मकसद न सिर्फ पी.डी.एस को खत्म करना है बल्कि वह किसानों से न्यूनतम समर्थन मूल्य पर अनाज खरीदने की जिम्मेदारी से भी मुक्ति चाहती है. इस तरह वह किसानों को भी बाजार और बड़े अनाज व्यापारियों और कंपनियों के रहमो-करम पर छोड़ना चाहती है.

कहने की जरूरत नहीं है कि इससे सबसे ज्यादा खुशी अनाज के कारोबार से जुड़े बड़े व्यापारियों और देशी-विदेशी कंपनियों को होगी. लेकिन इसका अर्थ यह भी है कि किसानों और राशन लाभार्थियों दोनों को बाजार के भरोसे छोडकर सरकार वास्तव में देश की खाद्य सुरक्षा को दांव पर लगाने जा रही है.

यही इस विधेयक की असलियत है. सच यह है कि खाद्य सुरक्षा विधेयक में नया कुछ भी नहीं है. इसमें मौजूदा व्यवस्था को ही नए नाम से पेश कर दिया गया है.
 
बाकी कल...
 
('समकालीन जनमत' के जनवरी'१२ के अंक में प्रकाशित टिप्पणी की पहली किस्त)