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मंगलवार, जनवरी 08, 2013

इस आन्दोलन ने महिला आन्दोलन को फिर से जिन्दा कर दिया है

यह अराजक भीड़ नहीं, लोकतंत्र की नई उम्मीद है

दिल्ली की वह बहादुर लड़की शरीर और मन पर हुए प्राणान्तक घावों के बावजूद जीना चाहती थी. देश के करोड़ों लोग भी यही चाहते थे. लेकिन वह लड़ते हुए एक शहीद की तरह चली गई. यह सही है कि वह भारतीय समाज में स्त्रियों के खिलाफ होनेवाली बर्बर यौन हिंसा और भेदभाव की पहली शहीद नहीं है और न आखिरी.
उसके जाने के बाद भी दिल्ली, पंजाब, बिहार, गुजरात से लेकर बंगाल तक से स्त्रियों पर यौन हिंसा, बलात्कार और हत्या की खबरें आ रही हैं. अखबारों और चैनलों में अब भी ऐसी ख़बरों की भरमार है. लेकिन इस बार एक बड़ा फर्क है. इस बार अखबारों और न्यूज चैनलों में स्त्रियों पर होनेवाली बर्बर हिंसा की खबरों से ज्यादा जगह और सुर्ख़ियों में उसके विरोध की खबरें हैं.
उस बहादुर लड़की के संघर्ष और शहादत ने देश के लाखों नौजवानों खासकर लड़कियों और आम लोगों में स्त्रियों के खिलाफ होनेवाली बर्बर हिंसा और आपराधिक भेदभाव के खिलाफ लड़ने का जज्बा भर दिया है. दिल्ली से लेकर देश भर के छोटे-बड़े शहरों-कस्बों में हजारों-लाखों युवा और आम नागरिक ‘हमें न्याय चाहिए’ और ‘हमें चाहिए- आज़ादी’ के नारों के साथ सड़कों पर उतर आए हैं.
खासकर दिल्ली में जिस बड़ी संख्या में युवा सड़कों पर और उसमें भी खासकर सत्ता के केन्द्र रायसीना पहाड़ी, विजय चौक और इंडिया गेट से लेकर जंतर-मंतर पर उतरकर प्रदर्शन कर रहे हैं और अपना गुस्सा जाहिर कर रहे हैं और पुलिसिया दमन के बावजूद पीछे हटने को तैयार नहीं हैं, उसने सत्ता प्रतिष्ठान के साथ-साथ समूचे राजनीतिक वर्ग को एक साथ चौंका और डरा दिया है.

हड़बड़ी और घबड़ाहट में केंद्र और दिल्ली सरकार ने कानून में बदलाव और दिल्ली गैंग रेप की जांच के लिए दो न्यायिक आयोग बनाने से लेकर फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाने, दिल्ली में सार्वजनिक बसों की संख्या बढ़ाने जैसे कई फैसले किये हैं.
यही नहीं, प्रधानमंत्री से लेकर गृह मंत्री और कांग्रेस अध्यक्ष तक रोज बलात्कार के खिलाफ कड़े कानून बनाने से लेकर दोषियों को कड़ी से कड़ी सजा दिलाने के वायदे कर रहे हैं. लेकिन लोगों का गुस्सा थमने का नाम नहीं ले रहा है.
इंडिया गेट से लेकर विजय चौक तक हजारों की संख्या में पुलिस और अर्द्ध सैनिक बल तैनात कर सैन्य छावनी बना देने और मेट्रो स्टेशन बंद करने के बावजूद हजारों की संख्या में नौजवान जंतर-मंतर पहुंचकर शांतिपूर्ण तरीके से प्रदर्शन कर रहे हैं. अपना गुस्सा जाहिर करने पहुँच रहे लोगों में छात्र-युवा लड़के और लड़कियों की संख्या सबसे ज्यादा है लेकिन उसमें ४० से ज्यादा उम्र के पुरुषों और महिलाओं की संख्या भी अच्छी-खासी है.
असल में, यह एक इन्द्रधनुषी विरोध प्रदर्शन है जिसमें रैडिकल वामपंथी संगठनों-आइसा, आर.वाई.ए, एपवा और दूसरे वामपंथी संगठन जैसे एस.एफ.आई, एडवा, एन.आई.एफ.डब्ल्यू आदि से लेकर जे.एन.यू छात्रसंघ तक और अस्मिता जैसे सांस्कृतिक संगठन से लेकर और जागोरी जैसे नारीवादी संगठनों तक कई रंगों-विचारों के संगठन हैं तो दूसरी ओर आम आदमी पार्टी से लेकर घोर दक्षिणपंथी ए.बी.वी.पी जैसे संगठन भी हैं.

लेकिन ए.बी.वी.पी जैसे संगठन और बाबा रामदेव जैसे धर्मगुरु को न सिर्फ इस आंदोलन में कोई तवज्जो नहीं मिली है बल्कि लोगों और खासकर युवाओं ने खुद ही अलग-थलग कर दिया है. इसके उलट आइसा-एपवा जैसे रैडिकल-वाम संगठन वहां नेतृत्वकारी भूमिका में हैं और उनके तर्कों और विचारों को सुना जा रहा है.

लेकिन सबसे उल्लेखनीय बात यह है कि इन संगठनों और उनके कार्यकर्ताओं से कई गुना ज्यादा संख्या में आम नौजवान खासकर लड़कियां और महिलाएं हैं जो खुद वहां पहुँच रही हैं. इनका किसी राजनीतिक संगठन या पार्टी से संबंध नहीं है. वे सभी गुस्से में हैं. उन्हें लगता है कि ‘बस, अब बहुत हो चुका.’ सबके अपने पीड़ादायक अनुभव हैं जो उन्हें उस बहादुर लड़की से जोड़ते हैं, उसकी पीड़ा और बलात्कारियों के खिलाफ संघर्ष में साझीदार बनाते हैं और लड़ने का हौसला और साहस देते हैं.

कहने की जरूरत नहीं है कि इन सभी लड़कियों-महिलाओं और उनके पुरुष साथियों और परिवारजनों ने चाहे वह घर की बंद चहारदीवारी हो या घर के बाहर कालोनी-मुहल्ले की सड़क या बस स्टैंड या खुद बस-मेट्रो या बाजार/शापिंग माल्स या आफिस या स्कूल-कालेज-यूनिवर्सिटी या कोई और सार्वजनिक स्थान- लगभग हर दिन, कम या ज्यादा अश्लील फब्तियां, यौन उत्पीडन और अत्याचार अंदर जमा होते गुस्से के बावजूद डरकर और चुपचाप झेला है.
लेकिन दिल्ली गैंग रेप की बर्बरता ने उस डर को तोड़ दिया. उन हजारों-लाखों युवाओं खासकर लड़कियों को यह समझ में आ चुका है कि लड़ने और घरों से बाहर निकलकर अपनी आवाज़ बुलंद करने के अलावा और कोई विकल्प नहीं है.
उनका वर्षों से जमा गुस्सा फूट पड़ा है. उस गुस्से में शुरुआत में बदले की भावना भी दिखी जो न्याय की मांग करते हुए बलात्कारियों को फांसी की सजा और उनका रासायनिक बधियाकरण करने और कड़े से कड़े कानूनों की मांग कर रही थी.

लेकिन धीरे-धीरे इसमें वह विवेक और तार्किकता बढ़ रही है जो न्याय का मतलब बदला नहीं समझती है, जो यौन हिंसा का समाधान फांसी में नहीं देखती हैं, जो कड़े कानूनों और चप्पे-चप्पे पर पुलिस तैनात करने से परे जाकर सरकार, पुलिस, कोर्ट और कानूनों पर हावी उस पुरुषसत्ता और पुरुषवादी सोच को निशाने पर ले रही हैं जो लड़कियों और महिलाओं के खिलाफ हिंसा और यौन अत्याचारों को कभी घर से बाहर निकलने, कभी फैशन और कपड़ों और कभी संस्कारों आदि के नामपर जायज ठहराने की कोशिश करते हैं. वे ऐसे किसी कुतर्क और बहाने को स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं.

आश्चर्य नहीं कि जंतर-मंतर पर हो रहे विरोध प्रदर्शनों में सबसे ज्यादा युवा खासकर लड़कियां और महिलाएं उस गोलबंदी के साथ बैठने और नारे लगाने और गीत गाने में जुट रही हैं जिसकी अगुवाई वे प्रगतिशील-वाम संगठन कर रहे हैं जिसमें बलात्कारियों को फांसी की मांग के बजाय यह नारा लग रहा है कि ‘हमें क्या चाहिए- बेख़ौफ़ आज़ादी, घर में आज़ादी, रात में-दिन में घूमने-फिरने, आने-जाने की आज़ादी, काम करने की आज़ादी, स्कूल-कालेज जाने की आज़ादी, सिनेमा जाने की आज़ादी, प्रेम करने की आज़ादी...आज़ादी-आज़ादी.’ इस प्रक्रिया में उन हजारों युवाओं का राजनीतिकरण हो रहा है और उन्हें स्त्रियों के खिलाफ बढ़ती हिंसा को देखने और समझने की दृष्टि मिल रही है. 
यहाँ ‘व्यक्तिगत, राजनीतिक बन रहा है और राजनीति, व्यक्तिगत मामला बन रही है (पर्सनल इज पोलिटिकल, पोलिटिकल इज पर्सनल).’ माफ कीजियेगा, वे भीड़ नहीं हैं क्योंकि वे एक उद्देश्य के साथ सड़कों पर उतरे हैं. वे ‘अराजकता के कद्रदान’ (कोनोसुर आफ एनार्की) तो कतई नहीं हैं क्योंकि यह सरकार और प्रशासन की अपराधियों-माफियाओं के साथ मिलकर पैदा की हुई अराजकता के खिलाफ एक न्यायपूर्ण व्यवस्था बहाल करने की मांग का आंदोलन है.

वे विजय चौक और इंडिया गेट पर भारतीय संविधान या संसद या राष्ट्रपति भवन या नार्थ-साउथ ब्लाक को ध्वस्त करने भी नहीं पहुंचे थे और न ही उनका इरादा राजधानी और सत्ता के शीर्ष पर कोई अराजकता पैदा करना था.
यही नहीं, सरकारी और प्रशासनिक संवेदनहीनता से नाराजगी और गुस्से के बावजूद वे तालिबानी न्याय के पक्ष में नहीं हैं. अलबत्ता वे सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोगों की नींद में खलल जरूर डालना चाहते हैं. वे उनकी शांति जरूर भंग करना चाहते हैं.
यह भी सच है कि वे समूचे राजनीतिक वर्ग और सत्ताधारियों से नाराज हैं. उन्हें लगता है और सौ फीसदी सही लगता है कि दिल्ली की वह बहादुर लड़की उस बस में गैंग रेप का विरोध करती और लड़ती हुई इसलिए मारी गई क्योंकि अपराधी-लम्पट तत्वों, भ्रष्ट पुलिस और परिवहन विभाग और उनके सबसे बड़े संरक्षक सत्ता के शीर्ष पर बैठे नेताओं और राजनीतिक पार्टियों को आमलोगों की कोई परवाह नहीं है.
अफसोस की बात यह है कि इस जनउभार और धीरे-धीरे उसके आंदोलन बनने का स्वागत करने के बजाय कई उदार बुद्धिजीवी उससे भयभीत नजर आ रहे हैं. उन्हें यह एक अराजक भीड़ लग रही है जिसकी आक्रामकता और जल्दबाजी में वे फासीवादी आहट देख रहे हैं. उन्हें इसमें कानून के राज और व्यवस्था के प्रति खुला तिरस्कार और मखौल दिख रहा है.

उन्हें यह भय सता रहा है कि देश भीड़तंत्र की ओर बढ़ रहा है जोकि देश में पिछले कई दशकों और अनेकों बलिदानों के बाद खड़ा किये गए लोकतांत्रिक व्यवस्था को तहस-नहस कर देगा. उन्हें यह चिंता है कि इस भीड़ की हिम्मत बढ़ती जा रही है, उसने जैसे ‘अव्यवस्था’ फैलाने और ‘हुक्मउदूली’ करने का लाइसेंस हासिल कर लिया है और अपनी शर्तों पर अपनी मांगें मनवाने की कोशिश कर रही है.

सचमुच, उदार बुद्धिजीवियों की इस चिंता से चिंतित होने और सतर्क होने का समय आ गया है. सवाल यह है कि वे कैसा लोकतंत्र चाहते हैं? वे कैसी व्यवस्था के पक्ष में खड़े हैं? ये सवाल इसलिए बहुत महत्वपूर्ण हैं क्योंकि एक ऐसे समय में जब देश में सत्ता-कार्पोरेट्स गठजोड़ की ओर से लोकतांत्रिक अधिकारों खासकर अभिव्यक्ति की आज़ादी, विरोध के अधिकार, संगठन बनाने के अधिकार आदि पर संगठित हमले बढ़ रहे हैं और खुद लोकतंत्र का दायरा सिकुड़ता-संकुचित होता जा रहा है, उस समय दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र को अपने ही नागरिकों और उनके सड़क पर उतरने से डर क्यों लग रहा है?
क्या लोकतंत्र का मतलब सिर्फ पांच साल पर होनेवाले चुनाव हैं? क्या नागरिकों का काम हर पांच साल पर उपलब्ध विकल्पों में एक सरकार चुन देना भर है? जाहिर है कि लोकतंत्र का मतलब नागरिकों का राजकाज के मुद्दों पर चुप रहना नहीं बल्कि सक्रिय भागीदारी है.

इस सक्रिय भागीदारी का एक लोकप्रिय रूप विरोध करने का अधिकार भी है. विरोध का अधिकार लोकतंत्र की आत्मा है. इस मायने में दिल्ली में गैंग रेप के खिलाफ भड़के गुस्से और लोगों खासकर युवा लड़के-लड़कियों का सड़क पर उतरना और विरोध जाहिर करना लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत है. उसने विरोध करने के अधिकार को फिर से बहाल करने की कोशिश की है. 

वे इन विरोध प्रदर्शनों में एक नागरिक के दायित्वबोध के साथ पहुँच रहे हैं. वे वहां भारतीय लोकतंत्र के एक सजग और सक्रिय नागरिक की तरह पहुँच रहे हैं और सत्ता प्रतिष्ठान और राजनीतिक वर्ग से हिसाब मांग रहे हैं.
यही नहीं, उन्हें वहां पहुंचकर विरोध जताने और अपनी आवाज़ उठाने की ताकत का अहसास हुआ है.  युवाओं के इस विरोध और आंदोलन ने एक भ्रष्ट, जड़, संवेदनहीन व्यवस्था को झकझोर दिया है. इस आंदोलन ने सत्ता में बैठे नेताओं की जवाबदेही की मांग करके लोकतंत्र को कमजोर नहीं बल्कि मजबूत किया है. इस आंदोलन ने अपनी तीव्रता के कारण बहुत छोटी अवधि में कई कामयाबियां हासिल की हैं.
इसकी सबसे बड़ी कामयाबी यह है कि इसने स्त्रियों के खिलाफ बढ़ती हिंसा से लेकर उनकी आज़ादी, सम्मान और सुरक्षा से जुड़े मसलों को पहली बार राष्ट्रीय राजनीति के एजेंडे पर सबसे उपर पहुंचा दिया है.

याद कीजिए, इससे पहले कब देश में स्त्रियों के खिलाफ हिंसा और उनकी आज़ादी और सुरक्षा के मुद्दे राष्ट्रीय स्तर पर इतनी शिद्दत से चर्चा और बहस में आए थे? इससे पहले सत्ता प्रतिष्ठान और राजनीतिक वर्ग कब महिलाओं के मुद्दों पर इतने फैसले और घोषणाएं करने के लिए मजबूर हुआ था?

कहने की जरूरत नहीं है कि राजनीतिक विमर्श में महिला और युवा वोटरों की बढ़ती चर्चाओं के बावजूद महिलाओं के मुद्दे राजनीतिक पार्टियों के घोषणापत्रों में अब भी सबसे आखिर में और चलताऊ अंदाज़ जगह पाते रहे हैं.
लेकिन इस आंदोलन के बाद राजनीतिक पार्टियों के लिए महिलाओं के मुद्दों को नजरंदाज कर पाना मुश्किल होगा. इस अर्थ में इस आंदोलन दूसरी सबसे बड़ी कामयाबी यह है कि इसने संकीर्ण जातिवादी, क्षेत्रीय और सांप्रदायिक अस्मिताओं का निषेध करते हुए स्त्री अस्मिता की जोरदार दावेदारी की है.
इसने एक बलात्कार को दूसरे बलात्कार के खिलाफ खड़ा करने, एक आंदोलन को दूसरे के खिलाफ खड़ा करने और एक मुद्दे के विरुद्ध दूसरे मुद्दे को खड़ा करने की संकीर्ण अस्मितावादी बुद्धिजीवियों की कोशिशों को भी नाकाम कर दिया है.
इस आंदोलन की तीसरी बड़ी कामयाबी यह है कि लंबे अरसे बाद किसी आंदोलन में इतनी बड़ी संख्या में और मुखरता के साथ मध्यम और निम्न-मध्यमवर्गीय महिलाएं खासकर युवा छात्राएं/लड़कियां विरोध प्रदर्शनों में सड़कों पर उतरी हैं.

उन्होंने जिस तरह से पुलिस के डंडों, आंसू गैस और वाटर कैनन का सामना किया, वह नई भारतीय स्त्री की के आगमन की सूचना है. अन्ना हजारे के नेतृत्ववाले भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में इतनी बड़ी संख्या में महिलाएं नहीं आईं थीं.

इस आंदोलन की चौथी कामयाबी यह है कि इसने महिला आंदोलन को पुनर्जीवित कर दिया है. इसने महिलाओं को भयमुक्त किया है. उनका आत्मविश्वास बढ़ा है. उन्हें अब घर की चहारदीवारी में बंद करना मुश्किल है. उनपर अब नैतिकता और इज्जत की रक्षा के नामपर भांति-भांति की पाबंदियां थोपना आसान नहीं होगा. वे अब और खुलकर अपनी इच्छाएं जाहिर कर सकेंगी और चुनाव की स्वतंत्रता का इस्तेमाल करेंगी. इस तरह पितृ-सत्ता को चुनौती बढ़ेगी.
हालाँकि पितृ-सत्ता के खिलाफ यह लड़ाई बहुत लंबी और कठिन है लेकिन इस आंदोलन ने जिस तरह से महिला आंदोलन को नई ताकत, उर्जा और गति दी है, उससे यह उम्मीद बढ़ी है कि पितृ-सत्ता के खिलाफ आंदोलन को नया आवेग मिलेगा.
क्या अब भी कहना जरूरी है कि भारतीय लोकतंत्र के लिए इस आंदोलन से डरने के बजाय इससे आश्वस्त और आशान्वित होने की जरूरत है? सच पूछिए तो इस आंदोलन ने भारतीय लोकतंत्र और समाज को और बेहतर और जीवंत बनाने में मदद की है.

उस अनाम बहादुर लड़की की बलात्कारियों के खिलाफ लड़ाई के बावजूद भी लोग अगर घरों-कालेजों-दफ्तरों से बाहर नहीं निकलते तो यकीन मानिए वह भारतीय लोकतंत्र के अंदर बढ़ते संवेदनहीनता के अँधेरे को और गहरा करता, सत्ता और अपराधियों के गठजोड़ का खौफ और बढ़ जाता और लोगों की लाचारी और हताशा और बढ़ती जाती.

इस आंदोलन ने लोगों की इस लाचारी और हताशा को तोड़ा है और साफ़ कर दिया है कि लोकतंत्र में लोगों से उपर कुछ भी नहीं है. 

('जनसत्ता' में सम्पादकीय पृष्ठ पर 4 जनवरी को प्रकाशित लेख का पूर्ण रूप)                  


रविवार, जनवरी 06, 2013

सामन्ती-ब्राह्मणवादी भारत के बैकलैश के प्रतिनिधि हैं भागवत

‘बलात्कार की संस्कृति’ के पोषक स्त्रियों की आज़ादी और बराबरी की मांग से बौखला गए हैं    

बलात्कारियों के छुपे हमदर्द अब बाहर निकलने लगे हैं. वैसे तो उनके हमदर्द हर जगह मिल जाएंगे लेकिन भारतीय संस्कृति और नैतिकता के स्वयंभू ठेकेदार भगवा ध्वजाधारियों से बड़ा और संगठित हमदर्द उनका और कोई नहीं है. यह तथ्य एक बार फिर साबित हो रहा है.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आर.एस.एस) के सर संघचालक मोहन राव भागवत के उस बयान को इसी सन्दर्भ में देखा जाना चाहिए जिसमें उन्होंने दावा किया है कि बलात्कार भारत में नहीं, ‘इंडिया’ में होते हैं. उन्होंने यह भी कहा बताते हैं कि बलात्कार गांवों और जंगलों में नहीं होते हैं.

भागवत ने अपने भाषण में किसी भ्रम की गुंजाइश को खत्म करने के लिए यह स्पष्ट किया कि शहरों में लोग पश्चिमी संस्कृति का अनुकरण कर रहे हैं जिसके कारण महिलाओं के खिलाफ अपराध बढ़ रहे हैं.
जाहिर है कि भागवत दिल्ली गैंग रेप की ओर इशारा कर रहे थे क्योंकि उनकी निगाह में पश्चिमी संस्कृति में डूबी राजधानी दिल्ली और उसमें रात के नौ बजे अपने दोस्त के साथ सिनेमा देखकर लौट रही वह बहादुर लड़की पश्चिमी संस्कृति से प्रेरित ‘इंडिया’ के प्रतिनिधि हैं.
अगर अब भी कोई शक की गुंजाइश रह गई तो उसे भगवा ब्रिगेड के एक और संस्कृति-रक्षक और मध्यप्रदेश के उद्योगमंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने यह कहकर पूरा कर दिया कि महिलाओं को ‘लक्ष्मण रेखा’ नहीं लांघना चाहिए क्योंकि सीता की तरह लक्ष्मण रेखा लांघने पर सीताहरण भी होता है.

विजयवर्गीय के मुताबिक, महिलाओं के लिए ‘लक्ष्मण रेखा’ भारतीय संस्कृति है. भागवत के बचाव में उतरे भाजपा प्रवक्ता रविशंकर प्रसाद ने लीपापोती करते हुए तर्क दिया कि संघ प्रमुख भारतीय संस्कारों, परंपरा और मूल्यों का उल्लेख कर रहे थे जिसमें महिलाओं के सम्मान को सबसे उपर स्थान दिया जाता है.
सवाल यह है कि क्या यह दिल्ली गैंग रेप जैसी बर्बर और शर्मनाक घटना को परोक्ष रूप से स्वाभाविक ठहराने और बलात्कार के लिए उस बहादुर लड़की को ही दोषी बताने की कोशिश नहीं है? असल में, यह भारतीय संस्कृति की आड़ में ‘बलात्कार की संस्कृति’ का बचाव है. ‘बलात्कार की संस्कृति’ उसे कहते हैं जिसमें बलात्कार का संस्कृति, परंपरा, संस्कार से भटकाव लेकर कपड़े, चालचलन आदि बहानों से बचाव किया जाता है और बलात्कार के लिए पीड़िता को ही दोषी ठहराने की कोशिश की जाती है.
कहने की जरूरत नहीं है कि सामंती पुरुष-सत्तात्मक भारतीय समाज में ‘बलात्कार की संस्कृति’ आम है और उसकी आड़ में बलात्कार को इस या उस बहाने उचित ठहराने वालों की कमी नहीं है. आमतौर पर बलात्कार की किसी भी घटना के बाद सबसे पहले महिला के चाल-चलन, कपड़ों, आधुनिकता पर सवाल उठाये जाते हैं और उसे ही दोषी ठहराने की कोशिश की जाती है. गोया उसने ही बलात्कार का न्यौता दिया हो.

यही नहीं, ‘बलात्कार की संस्कृति’ का इस कदर बोलबाला है कि बलात्कार के मामलों को दबाने या छुपाने की कोशिश की जाती है क्योंकि उसके सामने आने से महिला और उससे अधिक उसके परिवार की ‘इज्जत’ जाने का खतरा है.

इसी से जुड़ा ‘बलात्कार की संस्कृति’ का दूसरा पहलू यह है कि बलात्कार को पुरुषसत्ता एक हथियार की तरह इस्तेमाल करती है. पुरुष वर्चस्व को बनाए रखने के लिए बलात्कार के बर्बर हथियार का सहारा लिया जाता है और उसके जरिये न सिर्फ स्त्री यौनिकता को नियंत्रित किया जाता है बल्कि सामंती दबदबे को बनाए रखने की कोशिश की जाती है. स्त्री यौनिकता पर नियंत्रण के जरिये ही स्त्री और सामंती-ब्राह्मणवादी समाज में अवर्णों यानी दलितों-पिछडों-आदिवासियों-अल्पसंख्यकों की अधीनता सुनिश्चित होती है.
आश्चर्य नहीं कि मोहन भागवत के सामंती-मध्ययुगीन ‘भारत’ में गांवों में सबसे अधिक बलात्कार होते हैं जिनमें सामंती-ब्राह्मणवादी दबदबे और वर्चस्व को बनाए रखने और उसे साबित करने के लिए दलित-पिछड़े समुदाय की महिलाओं को निशाना बनाया जाता है.

यही नहीं, पिछले कुछ दशकों में सामंती-ब्राह्मणवादी सत्ता संरचना को दलित-पिछड़े समुदायों की ओर से चुनौती देने पर सबक सिखाने और बदले की कार्रवाई में दलितों-पिछडों के नरसंहार, आगजनी से लेकर स्त्रियों के साथ सामूहिक बलात्कार जैसी बर्बर घटनाओं की लंबी श्रृंखला है.

लेकिन सामंती-ब्राह्मणवादी ‘भारतीय संस्कृति’ के रक्षक भगवा ब्रिगेड ने न सिर्फ इसका कभी विरोध नहीं किया बल्कि कई मौकों पर वे सामंती गुंडा गिरोहों की अगुवाई करते दिखाई दिए हैं. उनके लिए यह कभी भारतीय संस्कृति, परंपरा या संस्कार या फिर स्त्री का अपमान नहीं लगा. यही नहीं, भगवा ध्वजधारियों ने खुद भी बलात्कार को एक हथियार की तरह इस्तेमाल किया है.
इसका प्रमाण भगवा ब्रिगेड के आदर्श राज्य गुजरात में २००२ के राज्य प्रायोजित नरसंहार में देखने को मिला था जब मुस्लिम समुदाय को सबक सिखाने के लिए कई जगहों पर महिलाओं के साथ सामूहिक बलात्कार की घटनाएँ हुई थीं. यह भी किसी से छुपा नहीं है कि उन बलात्कारियों की अगुवाई विहिप-बजरंग दल के गुंडों ने की थी.
साफ़ है कि भगवा ब्रिगेड को न सिर्फ बलात्कार से कोई आपत्ति या परहेज नहीं है बल्कि सबक सिखाने के लिए अपने ‘आदर्श भारत’ में वह इसका इस्तेमाल करने से भी नहीं हिचकिचाता है. लेकिन मामला सिर्फ ‘विधर्मियों’ यानी हिंदू राष्ट्र के दुश्मनों को सबक सिखाने तक सीमित नहीं है. भगवा ब्रिगेड उन सभी स्त्रियों के खिलाफ भी है जो घर की चाहरदीवारी से बाहर शिक्षा और कामकाज के लिए निकल रही हैं या सामंती बंधनों को तोड़कर आज़ादी और बराबरी की मांग कर रही हैं.

याद रहे, भगवा ब्रिगेड के ए.बी.वी.पी-बजरंग दल-विहिप-श्रीराम सेने जैसे संगठनों ने पिछले कई वर्षों से ‘भारतीय संस्कृति’ की रक्षा के नामपर स्त्रियों के जींस पहनने, पब जाने, वैलेंटाइन डे मनाने से लेकर विधर्मियों-विजातियों से प्रेम करने के खिलाफ हिंसक मुहिम छेड रखी है.     
खुद संघ प्रमुख मोहन भागवत सिलचर के बाद अब इंदौर में कहा है कि स्त्री-पुरुष के बीच एक सामाजिक सौदा (कांट्रेक्ट) है कि स्त्री घर-बच्चों को संभालेगी और पुरुष कमाकर उनका भरण-पोषण करेगा. अगर स्त्री इस कांट्रेक्ट को तोडती है, पुरुष उसे छोड़ सकता है. इसी तरह अगर पुरुष इस कांट्रेक्ट को पूरा नहीं कर पाता है तो स्त्री उसे छोड़ सकती है और नए कांट्रेक्ट के लिए जा सकती है. भागवत की हाँ में हाँ मिलाते हुए विश्व हिंदू परिषद के नेता अशोक सिंघल ने भी पश्चिमी संस्कृति को कोसा है जिसके कारण भारतीय संस्कृति की पवित्रता दूषित हो रही है.
इन ताजा बयानों से साफ़ है कि भगवा ब्रिगेड दिल्ली गैंग रेप की बर्बर घटना के बाद दिल्ली और देश भर में भड़के आंदोलन में महिलाओं की आज़ादी और बराबरी की मांग से कितना घबराया और बौखलाया हुआ है. जाहिर है कि उसे इस मांग में न सिर्फ आदर्श भारतीय संस्कृति के लिए गंभीर खतरा दिखाई दे रहा है बल्कि उसके हिंदू राष्ट्र के प्रोजेक्ट की बुनियाद भी लडखडाने लगी है.

लेकिन बात सिर्फ इतनी नहीं है. भगवा ब्रिगेड के ये बयान उस सामंती-ब्राह्मणवादी ‘भारत’ की बेचैनी और बैकलैश की अभिव्यक्ति भी हैं जो दिल्ली से लेकर देश के तमाम शहरों में महिलाओं के साथ बड़ी संख्या में छात्र-युवाओं और आम लोगों के सड़कों पर उतरकर आज़ादी और बराबरी की मांग की प्रतिक्रिया में पैदा हुई हैं.

कहने की जरूरत नहीं है कि मोहन भागवतों, विजयवर्गियों, सिंघलों से लेकर अभिजीत मुखर्जियों तक के बयानों में वही सामंती-ब्राह्मणवादी भारत पलटवार कर रहा है जिसने स्त्रियों के खिलाफ बलात्कार को एक हथियार की तरह इस्तेमाल किया है.
लेकिन संघ प्रमुख के बयानों के बाद भगवा ब्रिगेड इस सामंती-ब्राह्मणवादी भारत के मुख्य प्रवक्ता के रूप में उभरा है. इस मायने में उसमें और तालिबान से लेकर खाप पंचायतों और देवबंदी मुल्लाओं में कोई बुनियादी फर्क नहीं है.
उन सबकी राय में अद्दभुत समानता है कि स्त्री की जगह सिर्फ घर के अंदर और घरेलू कामों तक सीमित है. यही उनकी आदर्श भारतीय संस्कृति की लक्ष्मण रेखा है जिसके अंदर स्त्रियों को सबसे ज्यादा शारीरिक और यौन हिंसा का सामना करना पड़ता है और जिसे आज गांवों-कस्बों और शहरों में करोड़ों स्त्रियां लांघ रही हैं, तोड़ रही हैं और चुनौती दे रही हैं.

वे घर की चाहरदीवारी के भीतर के अंधेरों-घुटन और यौन हिंसा से बाहर आज़ादी की हवा में सांस लेना चाहती हैं और ले रही हैं. वे इस आज़ादी को गंवाने के लिए तैयार नहीं हैं. उन्होंने सड़कों पर उतरकर बलात्कारियों और उनके खुले-छुपे समर्थकों को खुली चुनौती दी है.

लेकिन भागवत और उनकी भगवा ब्रिगेड और खाप जैसे उनके संगी-साथी आसानी से हार माननेवाले नहीं हैं. वे दिल्ली से लेकर देश भर में बलात्कार और महिलाओं के खिलाफ हिंसा के खिलाफ उतरे लाखों युवाओं खासकर महिलाओं को वापस घर की चाहरदीवारी में बंद करने की हरसंभव कोशिश करेंगे.
आश्चर्य नहीं होगा अगर वैलेंटाइन डे आते-आते भगवा ब्रिगेड के बजरंगी-श्रीराम सेने पश्चिमी संस्कृति का प्रतिकार करने के नामपर युवा लड़के-लड़कियों पर हमले करते और उन्हें अपमानित करते नजर आएं.
लेकिन क्या वे इतिहास के पहिये को आगे बढ़ने से रोक पाएंगे? दिल्ली से लेकर देश भर में बलात्कार की संस्कृति के खिलाफ उठी आवाजों का सन्देश साफ है- भागवत जैसों के लिए घर में बैठने का समय आ गया है.                                    

सोमवार, दिसंबर 24, 2012

नौजवानों के इस आन्दोलन में बहुत संभावनाएं हैं

 लोगों में वर्षों से जमा गुस्सा फूट पड़ा है और यह सत्ता प्रतिष्ठान के खिलाफ 'नो कान्फिडेंस' है 

दिल्ली गैंग रेप के खिलाफ भड़के गुस्से और नौजवानों-महिलाओं के शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन को समझने में नाकाम रहे सत्ता प्रतिष्ठान ने वही किया जो लोगों का विश्वास और उनसे कनेक्ट खो चुकी सरकारें करती हैं. ‘आम आदमी’ की सरकार का अहंकार उसके सिर चढ़कर बोल रहा है. रविवार की शाम दिल्ली पुलिस ने विरोध प्रदर्शन में शामिल युवा छात्रों, छात्राओं, महिलाओं और आम नागरिकों पर जिस तरह से बर्बरता से लाठीचार्ज किया, आंसूगैस के गोले दागे और वाटर कैनन का इस्तेमाल किया, उसे जनतंत्र में किसी भी तरह से जायज नहीं ठहराया जा सकता है. आखिर इंडिया गेट पर मौजूद उन महिलाओं, छात्राओं और आम नागरिकों का कसूर क्या था? क्या शांतिपूर्ण प्रदर्शन अपराध है?

शर्म की बात यह है कि इस लाठीचार्ज-आंसूगैस को यह कहकर जायज ठहराया जा रहा है कि लोग हिंसक हो गए थे, पत्थर फेंक रहे थे और आगजनी कर रहे थे. लेकिन यह सिर्फ बहाना है. उसने वही किया, जो वह सबसे शर्मनाक और बर्बर तरीके से करती रही है. असल में, पुलिस इस कार्रवाई का पूर्वाभ्यास पहले से कर रही थी. सबसे पहले उसने १९ दिसंबर को मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के घर पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे आइसा, आर.वाई.ए और एपवा जैसे वाम छात्र-युवा-महिला संगठनों पर लाठीचार्ज किया, वाटर कैनन का इस्तेमाल किया; फिर २२ दिसंबर को विजय चौक पर युवा छात्र-छात्राओं पर कई बार लाठीचार्ज किया गया और आंसू गैस-वाटर कैनन छोड़ा गया.

रविवार की शाम तो जैसे सबक सिखाने के इरादे से पुलिस और सी.आर.पी.एफ आदि युवा छात्र-छात्राओं पर टूट पड़े. उन्हें बुरी तरह से पीटा गया. न्यूज चैनलों पर पूरे देश ने देखा कि पुलिस की लाठियों से युवा लड़कियां और महिलाएं भी नहीं बच सकीं. पत्रकारों को भी पीटा गया, उनके कैमरे तोड़े गए और उनपर निशाना बनाकर वाटर कैनन चलाया गया. यहाँ तक कि अभिभावकों को भी नहीं छोड़ा गया. अगर प्रदर्शनकारियों में शामिल चुनिन्दा शरारती तत्वों ने गडबडी करने की कोशिश की भी तो पुलिस ने गुस्सा शांतिपूर्ण तरीके से प्रदर्शन कर रहे छात्रों-युवाओं पर निकाला.
ठीक है कि पुलिस जन आन्दोलनों के साथ इससे भी बर्बर बर्ताव करती है. आज ही मणिपुर में बलात्कार के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे लोगों पर फायरिंग में एक पत्रकार की मौत की खबर है. ऐसे सैकड़ों मामले हैं जिसमें कश्मीर से लेकर उत्तर पूर्व तक और देश के हर राज्य में कभी अपने अधिकारों, कभी मानवाधिकार मुद्दों और कभी शांतिपूर्ण विरोध कर रहे लोगों पर पुलिस फायरिंग में निर्दोष लोग मारे गए हैं. असल में, उसकी ट्रेनिंग यही है. उसे जनता को दबा कर रखने के लिए आतंक का पर्याय बनाया गया है. उसका यही जनविरोधी चेहरा है जिसके कारण आम लोग खासकर महिलाएं हिंसा की शिकायतें लेकर थानों में जाने से डरती हैं.

सच पूछिए तो देश भर में फूटा नौजवानों यह गुस्सा इस पुलिस के खिलाफ है जो लोगों की रक्षक के बजाय अपराधियों का गिरोह बनती जा रही है. जहाँ किसी आम नागरिक की सुनवाई नहीं होती, जहाँ अपराधियों, दलालों, पैसे और सत्ता के रसूख की चलती है, जो हर तरह के अवैध और गैर-कानूनी कामों का मुख्य केन्द्र बन गया है. यह गुस्सा उस नागरिक प्रशासन के खिलाफ भी है जो निहायत असंवेदनशील और भ्रष्ट है जो लोगों के नौकर के बजाय उनका मालिक बन बैठा है, जिस तक आम लोगों का पहुंचना संभव नहीं है और जो पुलिस की तरह अंदर से सड़ चुका है.

लेकिन यह गुस्सा सबसे अधिक उस राजनीतिक सत्ता प्रतिष्ठान के खिलाफ है जिसकी साख पाताल छू रही है, जिसका आम आदमी की तकलीफों से कोई लेना-देना नहीं रह गया है और जिसके आश्वासनों पर भरोसा खत्म हो गया है. नतीजा, लोगों के सब्र का बाँध टूट रहा है. दिल्ली गैंग रेप के साथ लोगों खासकर युवाओं को लग रहा है कि अब बस, बहुत हो चुका. लेकिन भ्रम में मत रहिये, यह सिर्फ दिल्ली गैंग रेप के खिलाफ भडका गुस्सा नहीं है बल्कि इसके पीछे वर्षों से जमा होती लाचारी, अपमान, पीड़ा, क्षोभ और चिढ़ है.
इस गुस्से में गूंजती इन्साफ की मांग में एक साथ कई आवाजें हैं: न जाने कब से हर दिन, सुबह-शाम कभी घर में, कभी सड़क पर, कभी मुहल्ले में, कभी बस-ट्रेन में, कभी बाजार में अपमानित होती स्त्री की पीड़ा है. इसमें खाप पंचायतों के हत्यारों के खिलाफ गुस्सा है. इसमें वैलेंटाइन डे और पब में जाने पर लड़कियों के कपड़े फाड़ने और उनके साथ मारपीट करनेवाले श्रीराम सेनाओं और बजरंगियों को चुनौती है. इसमें स्त्रियों के “चाल-चलन” को नियंत्रित करने के लिए बर्बरता की हद तक पहुँच जानेवाले धार्मिक ठेकेदारों और ‘संस्कृति पुलिस’ के खिलाफ खुला विद्रोह है.

इसमें कभी दहेज, कभी लड़की पैदा करने, कभी छेड़खानी का विरोध करने और कभी जाति बाहर विवाह करने की जुर्रत करनेवाली स्त्रियों को जिन्दा जलाने, हत्या करने, उनपर तेज़ाब फेंकने और बलात्कार से उनका मनोबल तोड़ने की अंतहीन और बर्बर कोशिशों के खिलाफ खुला प्रतिकार है.

इस गुस्से और इन्साफ की मांग के साथ खड़े और लड़ते नौजवान ही उस पितृ-सत्तात्मक व्यवस्था और उसके दमनात्मक औजारों जैसे पुलिस को बदल सकते हैं. इससे ही संसद बदलेगी, कानून बदलेंगे, पुलिस-कोर्ट बदलेंगे और सबसे बढ़कर यह पितृ-सत्तात्मक व्यवस्था बदलेगी जिसने स्त्रियों को अब तक गुलाम और उपभोग की एक वस्तु भर बना रखा है.

यही कारण है कि इस आंदोलन में बहुत संभावनाएं हैं. इससे क्रांति नहीं होने जा रही है. यह क्रांति के लिए नहीं बल्कि इस सड़ती व्यवस्था के खिलाफ भडका गुस्सा और उसमें सुधार का आंदोलन है. याद रखिये, चुनावों में सरकारें बदलती हैं लेकिन इसके उलट आन्दोलनों में समाज बदलता और बनता है. सिर्फ चुनावों से सरकारें बदलनेवाले लोकतंत्र धीरे-धीरे प्राणहीन और लोगों से कटते जाते हैं. विरोध और आंदोलन इसीलिए लोकतंत्र की प्राणशक्ति हैं क्योंकि वे यथास्थिति को चुनौती देते हैं, लोगों को अपने अधिकारों के प्रति जागरूक बनाते हैं, लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं में लोगों को भागीदार बनाते हैं, लोगों का राजनीतिक प्रशिक्षण करते हैं, उनकी चेतना के स्तर को उन्नत करते हैं और उन्हें अपने हकों के लिए लड़ना सिखाते हैं.   
सत्ता के शीर्ष पर बैठे नेता और बहुतेरे संपादक-पत्रकार जो यह सवाल कर रहे हैं कि आंदोलनकारियों की सभी मांगे मान ली गई हैं, फिर भी वे आंदोलन क्यों कर रहे हैं, वे असल में, युवाओं के गुस्से को समझ नहीं पा रहे हैं. यह सिर्फ दिल्ली गैंग रेप के खिलाफ भडका गुस्सा नहीं है. यह गुस्सा बहुत गहरा है और राजनीतिक सत्ता प्रतिष्ठान के खिलाफ बढ़ते अविश्वास से निकला है. आश्चर्य नहीं कि इस गुस्से की लपटें पूरे देश में दिखाई दे रही हैं. इसे आश्वासनों से टाला नहीं जा सकता है और न ही इसे लाठीचार्ज और दमन से दबाया या भटकाया जा सकता है.