मीडिया : टैम और टी.आर.पी लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
मीडिया : टैम और टी.आर.पी लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

रविवार, फ़रवरी 03, 2013

न्यूज चैनलों के डी.एन.ए में है समझदारी के खिलाफ पूर्वाग्रह

सामने आ गई है न्यूज मीडिया खासकर न्यूज चैनलों की अपढ़ता

जानेमाने समाजशास्त्री आशीष नंदी और अभिनेता शाहरुख खान के हालिया भाषण और लेख पर शुरू हुए विवाद में न्यूज मीडिया खासकर टी.वी न्यूज की भूमिका को लेकर गंभीर सवाल उठने लगे हैं कि क्या वे बात का बतंगड बनाते हैं और गैर-जरूरी विवाद पैदा करते हैं? यह भी कि क्या मीडिया जानबूझकर अधिक से अधिक पाठक या दर्शक आकर्षित करने के लिए ये विवाद पैदा करता है?
क्या इसके लिए वह घटनाओं, बयानों, मुद्दों और प्रसंगों को उनके व्यापक सन्दर्भों, परिप्रेक्ष्यों, पृष्ठभूमि और अन्तर्निहित प्रक्रियाओं से काटकर पेश करता है? क्या न्यूज मीडिया खासकर टी.वी न्यूज का सनसनीखेज चरित्र उसकी स्वभावगत विशेषता है?
ये और ऐसे ही अनेकों सवाल एक बार फिर से चर्चाओं में हैं. ताजा प्रसंग में न्यूज मीडिया खासकर न्यूज चैनलों की अपढ़ता और निष्कर्ष निकालने की जल्दबाजी के गंभीर खतरों को लेकर बहस शुरू हो गई है. खासकर इस साल के शुरू में जिस तरह से न्यूज मीडिया खासकर न्यूज चैनलों के एक बड़े हिस्से ने एल.ओ.सी पर भारत-पाकिस्तान की सेनाओं के बीच हुई झड़पों को जिस युद्धोन्मादी अंदाज़ और तेवर में पेश किया, उससे दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ गया और स्थिति हाथ से निकलते-निकलते बची.

इसके बाद समाजशास्त्री आशीष नंदी के बयान और अभिनेता शाहरुख खान के लेख को जिस तरह से सन्दर्भों और परिप्रेक्ष्य से काटकर पेश किया गया, उससे मीडिया की भूमिका को लेकर बहस और तेज हो गई है.

हालाँकि मीडिया खासकर टी.वी न्यूज को लेकर उठनेवाले ये सवाल नए नहीं हैं. उल्लेखनीय है कि बी.बी.सी के महानिदेशक रहे जान बर्ट ने ७० के दशक के मध्य में टेलीविजन न्यूज के बारे में एक बहुत महत्वपूर्ण टिप्पणी की थी कि इसमें समझदारी के विरुद्ध एक पूर्वाग्रह है.
उनके कहने का तात्पर्य यह था कि टी.वी न्यूज में दृश्यों पर अत्यधिक जोर के कारण उसमें उनके विश्लेषण और अर्थ को स्पष्ट करने की क्षमता सीमित होती है. यही कारण है कि टी.वी न्यूज किसी घटना के लिए जिम्मेदार प्रक्रियाओं, उसकी पृष्ठभूमि, सन्दर्भ और बारीकियों के भीतर गहराई से जाने के बजाय उसे बहुत ही सतही स्तर पर पकड़ता और पेश करता है.  
असल में, भारत में मीडिया खासकर टी.वी न्यूज के अंदर सनसनी और विवाद पैदा करने की इस प्रवृत्ति के पीछे बुनियादी कारण उसके आर्थिक-बिजनेस ढाँचे/माडल और न्यूजरूम की सामाजिक-सांस्कृतिक संरचना में निहित है.

हुआ यह है कि पिछले डेढ़ दशकों में देश में न्यूज मीडिया खासकर न्यूज चैनलों की संख्या तेजी से बड़ी है और इसके साथ ही उनके बीच अधिक से अधिक पाठक या दर्शक खींचने की होड़ तेज और तीखी हुई है. इसकी वजह यह है कि उनकी आय और राजस्व का मुख्य स्रोत विज्ञापन हैं जो पाठकों/दर्शकों की संख्या और उनकी सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि पर निर्भर करते हैं.

नतीजा यह कि अधिक से अधिक पाठक (रीडरशिप) और दर्शक (टी.आर.पी) खींचने के लिए उनमें प्रतिस्पर्द्धा बढ़ती जा रही है बल्कि इस होड़ में पत्रकारिता के मूल्य, नियम और एथिक्स को भी ताक में रखने में हिचक नहीं हो रही है.

यही नहीं, इस होड़ में एक-दूसरे की नक़ल और एक ही जैसी रिपोर्टिंग की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है. इसकी वजह यह है कि सभी न्यूज चैनलों को लगता है कि अगर उन्होंने धारा के विरुद्ध जाकर रिपोर्टिंग की या मुद्दे उठाये या ख़बरें की तो वे पिछड़ जाएंगे और उनके प्रतिद्वंद्वी सारे दर्शक/पाठक बटोर ले जाएंगे.
यही कारण है कि जैसे एक चैनल किसी विवादस्पद मुद्दे को उठाता है, बाकी भी उसी की ओर लपक पड़ते हैं. दूसरे, दर्शकों/पाठकों का ध्यान लगातार आकर्षित करने के लिए उनपर हमेशा विवादस्पद मुद्दों/घटनाओं/बयानों की खोज का दबाव रहता है.
ऐसे में, जब कोई विवाद या सनसनीखेज घटना नहीं होती है तो वे उससे ‘निर्मित’ (मैन्युफैक्चर) करने तक पहुंच जा रहे हैं. कहने की जरूरत नहीं है कि ताजा मामलों में भी मीडिया ने सनसनी/विवाद को ‘निर्मित’ करने की कोशिश की है.
लेकिन ताजा प्रसंग में न्यूज मीडिया खासकर न्यूज चैनलों की अपढ़ता भी खुलकर सामने आ गई है. यह किसी से छुपा नहीं है है कि मीडिया के अंदर गंभीर पढ़ने-लिखने की प्रवृत्ति कम हुई है और उसमें काम करनेवाले पत्रकारों और संपादकों का रिश्ता भी अकादमिक दुनिया से कमजोर हुआ है.
इसका सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि अखबारों में साहित्य और अकादमिक गतिविधियों की कवरेज लगातार कम से कमतर होती गई है. कवरेज की गुणवत्ता में गिरावट आई है. खासकर न्यूज चैनलों में तो साहित्य और अकादमिक दुनिया एक तरह से अघोषित रूप से प्रतिबंध का शिकार है. शायद ही किसी अखबार या चैनल में साहित्य या अकादमिक जगत को कवर करने के लिए बीट या खास संवाददाता हो.
आश्चर्य नहीं कि जब साहित्य या अकादमिक दुनिया में चलनेवाली बहसों को रिपोर्ट करने की बारी आती है तो मीडिया खासकर चैनलों की सीमाएं खुलकर सामने आ जाती हैं. यही कारण है कि जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में आशीष नंदी के बयान को न सिर्फ सन्दर्भ से काटकर पेश किया गया बल्कि उसे सनसनीखेज बनाने में मीडिया खासकर चैनलों की बड़ी भूमिका था.

यही बात शाहरुख खान के लेख को लेकर भी सामने आई जिसे बिना पूरा सन्दर्भ के पेश किया गया. दोहराने की जरूरत नहीं है कि इन सभी प्रसंगों में मीडिया खासकर न्यूज चैनल खुद विवादों के घेरे में आ गए हैं और उनकी अपढ़ता और सनसनीखेज खबरें निर्मित करने की खतरनाक होती प्रवृत्ति उजागर हुई है.

ऐसा लगता है कि न्यूज चैनल लोगों की समझ को बिगाड़ने के मिशन पर निकल पड़े हैं और समझदारी के खिलाफ पूर्वाग्रह उनके डी.एन.ए में आ गया है. यह समूचे न्यूज मीडिया के लिए खतरे की घंटी है क्योंकि अखबारों में भी धीरे-धीरे चैनलों के नक़ल की प्रवृत्ति बढ़ रही है.
इससे न्यूज मीडिया की विश्वसनीयता सवालों के घेरे में आ गई है. यह उसके भविष्य और उससे अधिक भारतीय लोकतंत्र के लिए अच्छी खबर नहीं है.
('दैनिक हरिभूमि' में 3 फरवरी को प्रकाशित टिप्पणी: http://epaper.haribhoomi.com/Details.aspx?id=8239&boxid=145407968 ) 

मंगलवार, अगस्त 14, 2012

टी.आर.पी गोरखधंधा चालू आहे

लेकिन समस्या की जड़ में टेलीविजन कारोबार का मौजूदा माडल है जो विज्ञापनों पर अति निर्भर है


भारतीय टेलीविजन की दुनिया में चल रही अधिकांश गडबडियों के लिए टेलीविजन रेटिंग प्वाइंट (टी.आर.पी) की मौजूदा व्यवस्था को जिम्मेदार ठहराया जाता रहा है. उसकी आलोचनाएं भी खूब होती रही हैं, उसमें बदलाव की मांग भी उठती रही है और यहाँ तक कि उसका विकल्प खोजने की कोशिशें भी हुई हैं.
लेकिन मजा देखिये कि टी.वी उद्योग में सबसे अधिक चलनेवाले इस सिक्के – टी.ए.एम (टैम) के टी.आर.पी के खोटे होने की चर्चाओं के बावजूद न उसमें कोई खास सुधार हुआ और न ही उसका कोई विकल्प खड़ा हो पाया है. नतीजा यह कि तमाम खामियों, समस्याओं और धोखाधड़ी-बेईमानी जैसे गंभीर आरोपों के बाद भी टैम की टी.आर.पी की तानाशाही जारी है.
इसकी सबसे बड़ी वजह यह रही है कि बिल्ली के गले में घंटी बांधने के लिए कोई तैयार नहीं था. लेकिन अब एन.डी.टी.वी ने यह हिम्मत दिखाई है. एन.डी.टी.वी ने एक अमेरिकी कोर्ट में भारत में टी.आर.पी जारी करने वाली अकेली कंपनी – टैम मीडिया रिसर्च प्राइवेट लिमिटेड की स्वामी कंपनियों- ए.सी निएल्शन और कंटर के खिलाफ धोखाधड़ी और फर्जीवाड़े का आरोप लगाते हुए १.३९ अरब डालर के मुआवजे का मुकदमा ठोंक दिया है.

एन.डी.टी.वी के इस फैसले के बाद टी.वी उद्योग में खासी हलचल है. हालाँकि अभी भी ज्यादातर टी.वी चैनल (प्रसारणकर्ता) या विज्ञापनदाता या विज्ञापन एजेंसियां इस मुद्दे पर खुलकर नहीं बोल रहे हैं लेकिन कुछ प्रभावशाली आवाजें सामने आई हैं.

जैसे प्रसार भारती (दूरदर्शन) के सी.ई.ओ जवाहर सरकार ने भी संकेत दिया है कि वे भी टैम के खिलाफ कार्रवाई पर विचार कर रहे हैं क्योंकि उसकी टी.आर.पी में दूरदर्शन के चैनलों और उनके दर्शकों को अनदेखा किया जाता है. इसी तरह जानी-मानी विज्ञापन एजेंसी- लिंटास की सी.ई.ओ लिन डी-सूजा ने भी टैम और उसकी टी.आर.पी की आलोचना की है.
यही नहीं, एक बार फिर से टैम के विकल्प के बतौर प्रसारकों, विज्ञापनदाताओं और विज्ञापन एजेंसियों की सामूहिक पहल - ब्राडकास्टिंग आडिएंस रिसर्च काउंसिल (बार्क) के तहत टी.वी के लिए एक नई रेटिंग व्यवस्था शुरू करने की प्रक्रिया को तेज करने की बातें होने लगी हैं.
लेकिन अफसोस की बात यह है कि बार्क के तहत एक वैकल्पिक टी.आर.पी व्यवस्था खड़ी करने की बात पिछले चार वर्षों से हो रही है लेकिन सारी कसरत के बाद नौ दिन, चले अढाई कोस की स्थिति बनी हुई है. असल में, टैम की मौजूदा टी.आर.पी व्यवस्था में सबके निहित स्वार्थ इतनी गहराई से जुड़े हुए हैं कि उसकी आलोचनाओं, शिकायतों और उसमें सुधार की मांगों के बावजूद वास्तव में कोई उसमें बदलाव चाहता नहीं है.

कहने की जरूरत नहीं है कि बड़े और ताकतवर प्रसारक और उनके चैनल इस व्यवस्था के सबसे बड़े लाभार्थी हैं. उनकी टी.आर.पी हमेशा अच्छी आती है और उनमें ही यह क्षमता और शक्ति है कि वे टी.आर.पी की खामियों और गडबडियों को अपने पक्ष में इस्तेमाल कर सकें. इसलिए वे नहीं चाहते हैं कि इसमें कोई बदलाव हो.

हैरानी की बात नहीं है कि दबी जुबान से यह भी चर्चा हो रही है कि जब तक एन.डी.टी.वी इस व्यवस्था में टी.आर.पी चार्ट में ऊपर रहा, उसने कोई शिकायत नहीं की लेकिन पिछले दो-ढाई साल से टी.आर.पी चार्ट में फिसलने के बाद उसे टैम और उसकी टी.आर.पी में कमियां और खामियां और यहाँ तक कि धोखाधड़ी और फर्जीवाडा भी दिखने लगा.
हालाँकि एन.डी.टी.वी का दावा है कि वह २००४ से ही टैम से शिकायत कर रहा है और उसे टी.आर.पी व्यवस्था में सुधार की सलाह दे रहा है लेकिन वायदों के बावजूद जब कोई सुधार नहीं हुआ और उल्टे स्थितियां बद से बदतर होती चली गईं तो उसे मजबूरी में न्यूयार्क के कोर्ट में हर्जाने का मुकदमा करना पड़ा है.
बहरहाल, इस मुकदमे का फैसला चाहे जो हो लेकिन इसने टैम और उसकी टी.आर.पी व्यवस्था को गंभीर चुनौती दी है. टैम और उसके क्रियाकलापों पर फिर से सवाल उठने लगे है. इसकी वजह यह है कि टी.वी उद्योग में टी.आर.पी ही वह करेंसी है जिसपर पूरा कारोबार आधारित है और कोई १२००० करोड़ रूपये के विज्ञापनों का फैसला होता है जिससे चैनलों का भाग्य और भविष्य तय होता है.

माना जाता है कि टी.आर.पी से टी.वी दर्शकों की पसंद-नापसंद का पता चलता है. इससे यह पता चलता है कि सबसे अधिक लोकप्रिय कार्यक्रम और चैनल कौन है? किसी कार्यक्रम को कितने दर्शकों ने कितनी देर तक देखा? चैनल और उसके कार्यक्रमों की लोकप्रियता के आधार पर ही विज्ञापनदाता उसे विज्ञापन देते हैं जो फिलहाल चैनलों की आय का मुख्य स्रोत है.

चूँकि चैनलों को मिलनेवाले विज्ञापनों और उसकी दर का फैसला इसी टी.आर.पी रेटिंग के आधार पर होता है, इसलिए चैनलों के लिए यह जीवन-मरण का मुद्दा बन जाता है. हालाँकि विज्ञापनदाता कुछ और भी कारकों का ध्यान में रखते हैं लेकिन उनमें सबसे अधिक महत्व टी.आर.पी का ही है. इस कारण जिस चैनल और कार्यक्रम की जितनी अधिक टी.आर.पी, उसकी उतनी अधिक आमदनी.
नतीजा यह कि चैनलों में ऊँची टी.आर.पी रेटिंग के लिए अंधी होड़ सी चल रही है और सारा जोर अधिक से अधिक दर्शकों का ध्यान आकर्षित करने की ओर है. टी.आर.पी किसी चैनल और किसी कार्यक्रम की सफलता का एकमात्र पैमाना बन गया है और कार्यक्रम निर्माताओं से लेकर संपादकों की सारी उर्जा टी.आर.पी कमाने में ‘सफल’ कार्यक्रम बनाने में लग रही है.
इसके कारण कार्यक्रमों में सृजनात्मकता, प्रयोगधर्मिता, नयापन, विविधता और बहुलता के बजाय टी.आर.पी के पैमाने पर सफल ‘फार्मूलों’ की नक़ल, दोहराव और एकरूपता बढ़ जाती है. आश्चर्य नहीं कि सभी चैनलों पर एक जैसे सीरियल या रीयलिटी शो आदि की बाढ़ आई हुई है.

इसी तरह से टी.आर.पी के दबाव में न्यूज चैनलों के संपादक ख़बरों को मनोरंजक बनाने लगते हैं और पत्रकारिता के एथिक्स को परे रखकर ख़बरों को सनसनीखेज बनाकर, बढ़ा-चढ़ाकर और नाटकीय बनाकर पेश करने लगते हैं. यही नहीं, ख़बरों के साथ ‘खेलने और उसे तानने’ से लेकर खबर गढ़ने और बनाने की कोशिशें होने लगी हैं. यह सब टी.आर.पी के नाम पर होता है.

लेकिन जिस टी.आर.पी को टी.वी उद्योग और कारोबार की करेंसी मान लिया गया है, वह खुद अवैज्ञानिक, त्रुटिपूर्ण और जोड़तोड़ की शिकार है. मौजूदा टी.आर.पी व्यवस्था के साथ सबसे बड़ी समस्या यह है कि इसपर टैम का एकाधिकार है. उसकी किसी से प्रतियोगिता नहीं है और जाहिर है कि इसके कारण उसकी मनमानी सी चलती है.
यही नहीं, एकाधिकार होने के कारण उसमें जोड़तोड़ की गुंजाइश भी काफी बढ़ जाती है. इसके साथ दूसरी सबसे बड़ी और बुनियादी समस्या यह है कि भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश के १५ करोड़ से अधिक टी.वी घरों की पसंद को जानने के लिए टैम ने जो सैम्पल साइज चुनी है, वह न सिर्फ ऊंट के मुंह में जीरे के बराबर है बल्कि वह उसकी विविधता को भी व्यक्त नहीं करता है.
उल्लेखनीय है कि १५ करोड़ टी.वी घरों की पसंद बताने के लिए टैम ने देश के एक लाख की आबादी वाले २६५ शहरों और उससे कम आबादी वाले महाराष्ट्र के कस्बों में सिर्फ ८१६० घरों में पीपुलमीटर लगाये हैं. सबसे हैरानी की बात यह है कि देश के गाँवों में कोई पीपुलमीटर नहीं है और न ही पूरे उत्तर पूर्व या कश्मीर जैसे राज्य में कोई पीपुलमीटर है.

इस तरह गाँवों के कोई ६.२ करोड़ दर्शकों की पसंद के कोई मायने नहीं हैं. यही नहीं, सबसे ज्यादा पीपुलमीटर देश के मेट्रो शहरों खासकर मुंबई और दिल्ली में हैं. मजे की बात यह है कि इन ८१६० पीपुलमीटर से आए नतीजों को ही देश के १५ करोड़ टी.वी घरों की पसंद बता दिया जाता है.

कहने की जरूरत नहीं है कि मौजूदा टी.आर.पी व्यवस्था में पीपुलमीटर की सीमित संख्या और उसके कुछ खास इलाकों तक सीमित होने के कारण उसमें जोड़तोड़ और हेराफेरी करने की गुंजाइश बढ़ जाती है. यही नहीं, सैम्पल साइज छोटा होने के कारण पीपुलमीटर लगे कुछ घरों तक पहुँचने और उन्हें प्रभावित करने पर रेटिंग को अपने पक्ष में मोड़ा जा सकता है.
एन.डी.टी.वी ने टैम के खिलाफ अपनी अपील में यह शिकायत की है कि टैम के साथ काम करनेवाले कुछ कर्मचारियों ने एन.डी.टी.वी के अधिकारियों से कहा था कि अगर वे पैसे खर्च करने को तैयार हों तो पीपुलमीटर लगे घरों को प्रभावित किया जा सकता है. वैसे यह शिकायत करनेवाला एन.डी.टी.वी पहला चैनल नहीं है बल्कि कई साल पहले सी.एन.बी.सी चैनल ने एक स्टिंग आपरेशन में इस गोरखधंधे का खुलासा किया था.
हालाँकि नियमानुसार यह जानकारी बिलकुल गोपनीय होती है कि किन घरों में पीपुलमीटर लगा हुआ है. इसके बावजूद ऐसी शिकायतें आती रहती हैं जिससे टी.आर.पी व्यवस्था की पूरी साख सवालों के घेरे में रही है. हैरानी की बात यह है टैम ने कुछ साल पहले वायदा किया था कि वह पीपुलमीटर की संख्या बढ़ाकर ३०००० करेगा लेकिन वह अपने वायदे को पूरा करने में नाकाम रहा है.

आरोप है कि जानबूझकर पीपुलमीटर की संख्या नहीं बढ़ाई जा रही है क्योंकि उस स्थिति में उसके नतीजों में जोड़तोड़ करना मुश्किल हो जायेगा. इसके अलावा इस पूरी व्यवस्था के लाभार्थी भी नहीं चाहते हैं कि मौजूदा व्यवस्था में कोई सुधार हो. बड़े प्रसारकों के अलावा वे विज्ञापनदाता और विज्ञापन एजेंसियां भी नहीं चाहती हैं कि यह व्यवस्था बदले क्योंकि उनकी दिलचस्पी सभी भारतीय दर्शकों की पसंद जानने के बजाय महानगरीय और संपन्न टी.वी घरों की पसंद जानने में ज्यादा है.

असल में, टी.आर.पी की बुनियादी खामी यह है कि यह दर्शकों के लिए नहीं बल्कि विज्ञापनदाताओं और विज्ञापन एजेंसियों के लिए तैयार किया जाता है जिनकी दिलचस्पी उन दर्शकों में सबसे ज्यादा होती है जिनके पास क्रयशक्ति हो, जो आमदनी में उपरी पायदान पर हों और खर्च करने के लिए तत्पर हों.
इस कारण टैम जैसी कम्पनियाँ सैम्पल साइज का चुनाव करते हुए विज्ञापनदाताओं की इस इच्छा का सबसे अधिक ख्याल रखती हैं. दूसरी ओर, विज्ञापनदाताओं का ध्यान खींचने के लिए चैनल भी अमीरों और मध्यमवर्ग की रुचियों, जरूरतों और आकांक्षाओं का सबसे अधिक ध्यान रखते हैं. स्वाभाविक तौर पर चैनलों के कंटेंट में इन वर्गों के सरोकारों, रुचियों और जरूरतों की सबसे अधिक झलक दिखाई पड़ती है.       
असल में, समस्या की जड़ में टी.वी उद्योग का वह कारोबारी माडल है जो अपनी आय के लिए विज्ञापनों पर अति निर्भर है. लेकिन विज्ञापन मिलने की शर्त ऊँची टी.आर.पी है और वह भी खाते-पीते मध्यमवर्ग से होनी चाहिए.

नतीजा यह कि टी.आर.पी का पूरा गोरखधंधा वास्तव में व्यावसायिक टेलीविजन का एक ऐसा दुश्चक्र बन गया है जिससे मौजूदा बिजनेस माडल के तहत निकलना मुश्किल ही नहीं बल्कि नामुमकिन जैसा दिखता है. यहाँ यह उल्लेख करना जरूरी है कि दुनिया के उन सभी विकसित पूंजीवादी देशों में जहाँ टी.वी उद्योग का बिजनेस माडल विज्ञापनों से होनेवाली आय पर अति निर्भर है, वहां टी.आर.पी को लेकर कमोबेश ऐसी ही समस्याएं और गडबडियां हैं.

ऐसे में, अगर टैम के पीपुलमीटर बढ़ाकर तीस हजार भी कर दिए जाएँ या एक वैकल्पिक रेटिंग एजेंसी खड़ी कर दी जाए तो भी चैनलों पर टी.आर.पी का दबाव कम होनेवाला नहीं है और न ही उस दबाव से पैदा होनेवाली गडबडियां खत्म होनेवाली हैं.

दरअसल, दुनिया के विकसित देशों खासकर यूरोप में व्यावसायिक टी.वी की सीमाओं, कमियों और खामियों के विकल्प के बतौर सार्वजनिक धन से चलनेवाला लोक प्रसारक टेलीविजन (पब्लिक ब्राडकास्टर) है जो कार्यक्रमों में विविधता और बहुलता के अलावा सामाजिक जिम्मेदारियों को ध्यान में रखकर प्रसारण करता है.
लेकिन मुश्किल यह है कि भारत में पब्लिक ब्राडकास्टर के बतौर दूरदर्शन और आकाशवाणी प्राइवेट टी.वी चैनलों और रेडियो स्टेशनों के हास्यास्पद नक़ल भर बनकर रह गए हैं. उनमें और निजी चैनलों में कंटेंट के मामले में फर्क करना मुश्किल है.
कारण यह है कि पब्लिक ब्राडकास्टर होते हुए भी दूरदर्शन टी.आर.पी की अंधी दौड़ में फंस गया है और विज्ञापनदाताओं को आकर्षित करने के लिए उन्हीं फार्मूलों को अपनाता दिखता है जो प्राइवेट चैनलों की पहचान बन गए हैं.
(साप्ताहिक 'शुक्रवार' के ताजा अंक में प्रकाशित लेख) 

शुक्रवार, फ़रवरी 11, 2011

टी.आर.पी के गुलाम

समस्या टी.आर.पी नहीं बल्कि व्यावसायिक टी.वी के मुनाफा आधारित बिजनेस माडल में है 

दूसरी और आखिरी किस्त

सच यह है कि इस प्रक्रिया में चैनल एक तरह से टी.आर.पी के गुलाम बन जाते हैं. किसी एक सप्ताह की टी.आर.पी के आधार पर किसी कार्यक्रम की गुणवत्ता तय होने लगती है. कार्यक्रम निर्माताओं के पास कोई स्वायत्तता नहीं रह जाती है. ऐसे अनेकों उदाहरण हैं जब टी.आर.पी में गिरावट के कारण किसी कार्यक्रम की कहानी की दिशा, उसके पात्रों के चरित्र चित्रण या प्रस्तुति में उलटफेर करना पड़ा है. इसी तरह, टी.आर.पी की दृष्टि से सफल कार्यक्रमों की नक़ल या प्रतिरूप सभी चैनलों पर छा जाते हैं जिसका सबसे पहला शिकार विविधता और बहुलता होती है.

यही कारण है कि कई समाचार चैनलों के संपादक यह मांग करते रहे हैं कि जैसे अख़बारों की पाठक संख्या का सर्वेक्षण हर छह महीने पर आता है, उसी तरह से टी.वी चैनलों की रेटिंग भी छह महीने पर आनी चाहिए. खुद समिति के मुताबिक, इससे अनावश्यक रूप से एयरटाइम का जिन्सीकरण होता है और इससे प्रसारक और विज्ञापनदाता दोनों तात्कालिक टी.आर.पी बढ़ोत्तरी के पीछे भागने लगते हैं.

लेकिन समिति ने टी.आर.पी व्यवस्था की इस अपर्याप्तता और विसंगतियों का समाधान सैम्पल साइज को बढ़ाने में खोजा है. समिति ने सिफारिश की है कि अगले पांच वर्षों में पीपुल मीटर्स की संख्या को बढ़ाकर तीस हजार तक ले जाया जाए. समिति के मुताबिक इन अतिरिक्त २२००० मीटर्स को लगाने का खर्च लगभग ६६० करोड़ रूपये आएगा जिसे टी.वी उद्योग से एक सालाना फ़ीस के रूप में वसूला जा सकता है. समिति ने टैम और अन्य रेटिंग एजेंसी को टी.वी उद्योग से जुड़े प्रसारकों, विज्ञापन दाताओं और विज्ञापन एजेंसियों का प्रतिनिधित्व करनेवाली संस्था ब्राडकास्ट आडिएंस रिसर्च काउन्सिल- बार्क की निगरानी में लाने की भी सिफारिश की है.

समिति ने इसके अलावा, केबल, टेरेस्ट्रियल, डी.टी.एच, आई.पी.टी.वी और अन्य तकनीकों को भी टी.आर.पी के दायरे में लाने की सिफारिश की है. समिति का मानना है कि रेटिंग की घोषणा प्रतिदिन के बजाय साप्ताहिक आधार पर ही होनी चाहिए और बार्क चाहे तो इसे पाक्षिक भी कर सकता है. समिति ने यह भी सिफारिश की है कि हितों का टकराव टालने के लिए रेटिंग एजेंसियों, प्रसारकों, विज्ञापन दाताओं और विज्ञापन एजेंसियों के बीच क्रास मीडिया निवेश नहीं होना चाहिए.

समिति ने टी.आर.पी व्यवस्था की निगरानी के लिए गठित की जानेवाली संस्था- बार्क में एक उच्च स्तरीय समिति गठित करने की भी सिफारिश की है जिसमें विशेषज्ञों, नागरिक समाज के प्रतिनिधियों को शामिल किया जाना चाहिए. समिति ने टी.आर.पी संग्रह की पूरी प्रक्रिया और उसके नतीजों को सार्वजनिक करने की भी सिफारिश की है ताकि उन्हें स्वतंत्र रूप से जांचा-परखा जा सके.

सवाल यह है कि क्या इन सिफारिशों से टी.आर.पी के कारण पैदा होनेवाली कई बुनियादी समस्याएं और गडबडियां दूर हो जाएंगी? निश्चय ही, सिर्फ टी.आर.पी मीटर्स की संख्या को चौगुना कर देने और उसमें ग्रामीण क्षेत्रों और अन्य उपेक्षित राज्यों को भी शामिल भर कर लिए जाने भर से न तो टी.आर.पी का अवांछित दबाव कम होनेवाला है और न ही उसके दबाव के कारण कंटेंट के स्तर होनेवाली गडबडियां दूर होनेवाली है. उल्टे इस बात की आशंका अधिक है कि मीटर्स की संख्या बढ़ने से उसे और ज्यादा महत्व मिलने लगेगा जिसके कारण कार्यक्रमों फार्मेट से लेकर उसके स्वरुप, सिक्वेंस और ट्रीटमेंट में टी.आर.पी की घुसपैठ और बढ़ जायेगी.

असल में, टी.आर.पी व्यवस्था के साथ सबसे बुनियादी समस्या यह है कि यह व्यावसायिक टेलीविजन और उसके मुनाफे के साथ अभिन्न रूप से जुड़ी व्यवस्था है. व्यावसायिक टेलीविजन मुनाफे के लिए चलता है और फ़िलहाल, प्रसारकों के मुनाफे का मुख्य स्रोत विज्ञापनों से होनेवाली आय है. स्वाभाविक तौर पर विज्ञापनदाता उस चैनल या कार्यक्रम को ज्यादा और ऊँची कीमत पर विज्ञापन देता है जिसके पास सबसे अधिक दर्शक होते हैं.

कहा भी जाता है कि टी.वी के कार्यक्रमों के पीछे मुख्य उद्देश्य अधिक से अधिक दर्शक जुटाकर विज्ञापनदाताओं को बेच देना होता है. यही नहीं, विज्ञापनदाता यह भी देखता है कि उसके दर्शक समाज के किन वर्गों से आते हैं. जाहिर है कि उनकी प्राथमिकता उन दर्शकों की होती है जिनके पास इतनी क्रयशक्ति है कि वे उन उत्पादों और सेवाओं को खरीद पायें.

टी.आर.पी के मौजूदा ढांचे में बड़े महानगरों और समृद्ध राज्यों में अधिक पीपुल मीटर्स का लगा होना इसी जरूरत को पूरा करने के लिए है. वास्तव में, टी.आर.पी व्यवस्था उन विज्ञापन दाताओं के लिए ही बनाई गई है जो चाहते हैं कि विज्ञापन पर खर्च होनेवाला उनका पैसा बेकार न जाए. लेकिन सबसे अधिक हैरानी की बात यह है कि इस समिति ने टी.आर.पी की मौजूदा व्यवस्था में कई बड़ी कमियों और गडबडियों की शिकायतों को सही मानते हुए भी समाधान की बहुत सीमित और सतही पेशकश की है. यह टी.आर.पी की मौजूदा व्यवस्था के अंदर ही कुछ प्रक्रियागत सुधारों के जरिये उसे और सशक्त और प्रभावी बनाने की कोशिश है.

आश्चर्य नहीं कि समिति ने टी.आर.पी के कंटेंट पर पड़नेवाले नकारात्मक प्रभावों पर सिवाय इसके कुछ नहीं कहा है कि चैनल कंटेंट के मामले में स्व-नियमन और अनुशासन का पालन करें. लेकिन सवाल है कि जब तक चैनलों मुनाफे के लिए विज्ञापन और उससे जुड़े टी.आर.पी पर आश्रित हैं तो स्व-नियमन की परवाह कौन करता है? जाहिर है कि इससे रेटिंग की तानाशाही कमजोर नहीं पड़ेगी.

इस पूरी बहस की सबसे बड़ी त्रासदी यही है. दरअसल, उसे टी.वी रेटिंग की व्यवस्था से कोई शिकायत नहीं है. उसे सिर्फ टैम की रेटिंग प्रणाली की कमियों-खामियों से शिकायत है. लेकिन समस्या सिर्फ टैम की रेटिंग तक सीमित नहीं है बल्कि इस तरह की किसी भी रेटिंग व्यवस्था की यह अन्तर्निहित विकृति है जिसका उद्देश्य विज्ञापनदाताओं के लिए टार्गेट आडिएंस खोजना है. याद रहे, इस रेटिंग व्यवस्था का मूल मकसद विज्ञापनदाता के लिए उन दर्शकों की तलाश है जिनके पास उसके उत्पादों/सेवाओं को खरीदने की सामर्थ्य है.

जाहिर है कि जब तक समृद्ध और उपभोक्ता दर्शकों की पसंद-नापसंद को ध्यान में रखकर रेटिंग होगी और उसे आकर्षित करने के लिए कार्यक्रम बनाये जायेंगे, रेटिंग के दलदल से बाहर निकलना संभव नहीं है. चाहे टैम हो या बार्क- समस्या हल होनेवाली नहीं है. असल में, मूल मुद्दा टैम का नहीं, टी.वी रेटिंग का विकल्प खोजने का है या कहें कि विज्ञापन आय पर निर्भर टी.वी को विज्ञापनों और मुनाफे की जकडबंदी से बाहर निकालने का है.

समाप्त
('कथादेश' के फरवरी'११ में प्रकाशित)

मंगलवार, फ़रवरी 08, 2011

टी.आर.पी का धोखा

सुधार नहीं, मौजूदा टी.वी रेटिंग व्यवस्था का विकल्प खोजिये  

पहली किस्त


बहुतेरे विश्लेषक ही नहीं, संपादक भी टेलीविजन चैनलों पर कंटेंट के गिरते स्तर और उससे जुड़ी अधिकांश समस्याओं के लिए उनकी रेटिंग की मौजूदा व्यवस्था को जिम्मेदार मानते हैं. चैनलों में यह आम धारणा है और बहुत हद तक सही है कि टी.वी कार्यक्रमों की लोकप्रियता मापने के लिए इस्तेमाल होनेवाली टेलीविजन रेटिंग प्वाइंट्स (टी.आर.पी) की मौजूदा व्यवस्था के कारण चैनलों, प्रसारकों और कार्यक्रम निर्माताओं पर अधिक से अधिक रेटिंग बटोरने का दबाव बहुत ज्यादा बढ़ गया है.

इस कारण वे कार्यक्रमों की गुणवत्ता से अधिक रेटिंग बढ़ाने के टोटकों पर ध्यान देते हैं. इसका नतीजा यह हो रहा है कि सभी व्यावसायिक यहां तक कि सार्वजनिक चैनलों पर भी बिना किसी के अपवाद के रेटिंग के लिहाज से सफल कार्यक्रमों की नक़ल से लेकर सफल विषयों के दोहराव, सतही, छिछले और अश्लील कार्यक्रमों की बाढ़ सी आ गई है.

यही नहीं, हाल के वर्षों में चैनलों और कार्यक्रम निर्माताओं में अधिक से अधिक टी.आर.पी बटोरने की ऐसी अंधी होड़ शुरू हुई है कि उसमें सामाजिक-मानवीय मूल्यों, नैतिकता, पत्रकारीय एथिक्स और मूल्यों की सबसे अधिक अनदेखी हो रही है. सबसे अधिक हैरानी की बात यह है कि चैनलों की इस प्रतियोगिता से कार्यक्रमों की गुणवत्ता में बेहतरी नहीं आ रही है जबकि माना यह जाता है कि प्रतियोगिता से गुणवत्ता में सुधार आता है.

उल्टे हो यह रहा है कि चैनलों के कार्यक्रमों में नयापन, प्रयोग, सुरुचि और विविधता के लिए जगह लगातार कम होती जा रही है. इस मामले में चैनल और कार्यक्रम निर्माता जोखिम लेने और प्रयोग करने के बजाय टी.आर.पी के तयशुदा फार्मूलों पर चलना पसंद करते हैं.

यही कारण है कि टी.आर.पी मापने की मौजूदा व्यवस्था को लेकर शिकायतें बढ़ती ही जा रही हैं. सार्वजनिक मंचों से लेकर संसद तक में इस मुद्दे पर बहस हुई और हो रही है. इन शिकायतों के कारण ही पिछले कुछ वर्षों में दूरसंचार नियामक आयोग- ट्राई और सूचना तकनीक मंत्रालय की संसदीय स्टैंडिंग कमिटी ने इस व्यवस्था की जांच-पड़ताल की और उनकी रिपोर्टें भी आ चुकी हैं.

लेकिन इसके बावजूद व्यवस्था में कोई खास बदलाव नहीं आया है. पिछले वर्ष सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने टी.आर.पी की मौजूदा व्यवस्था की समीक्षा और उसमें सुधार के उपाय सुझाने के लिए फिक्की के महासचिव अमित मित्र की अध्यक्षता में एक उच्च स्तरीय समिति का गठन किया था जिसने अपनी रिपोर्ट इस साल जनवरी के दूसरे सप्ताह में पेश कर दी है.

इस रिपोर्ट में समिति ने टी.आर.पी की मौजूदा व्यवस्था में कई बड़ी गडबडियों और खामियों की बात स्वीकार की है और माना है कि इसमें सुधार की जरूरत है. समिति ने टी.आर.पी व्यवस्था में सिर्फ दो निजी कंपनियों खासकर ए.सी-निएल्सन/टैम के दबदबे और एकाधिकार पर चिंता प्रकट करने के अलावा टी.आर.पी के सैम्पल आकार की अपर्याप्तता, पारदर्शिता और विश्वसनीयता के अभाव जैसे मुद्दों को उठाया है.

समिति ने सबसे अधिक जोर मौजूदा टी.आर.पी व्यवस्था में रेटिंग की माप के लिए इस्तेमाल किए जा रहे सैम्पल साइज को बढ़ाने पर दिया है. समिति के मुताबिक, भारत जैसे देश के आकार और विविधता के मुकाबले टी.आर.पी की मौजूदा सैम्पल साइज काफी सीमित और कम है. 

समिति के अनुसार, ५० करोड़ से ज्यादा दर्शकों की पसंद का वास्तविक आकलन सिर्फ ८००० पीपुल मीटर से नहीं किया जा सकता है. भारत में टी.वी. रेटिंग के व्यवसाय की सबसे बड़ी और लगभग एकाधिकार की स्थिति रखनेवाली कंपनी टैम के मुताबिक, देश में कुल २२.३ करोड़ घर हैं जिनमें से कुल १३.८ करोड़ घरों में टी.वी है. इनमें से १०.३ करोड़ टी.वी घरों में केबल और सेटेलाईट उपलब्ध है जबकि दो करोड़ टी.वी घरों में डिजिटल टी.वी उपलब्ध है.

इसी तरह, देश में कुल टी.वी घरों में ६.४ करोड़ शहरी इलाकों में और सात करोड़ ग्रामीण क्षेत्रों हैं. लेकिन इससे अधिक हैरानी की बात क्या होगी कि जिस टी.वी रेटिंग के आधार पर चैनलों और उनके कार्यक्रमों की लोकप्रियता का आकलन किया जाता है, उसके ८००० पीपुल मीटरों में एक भी मीटर ग्रामीण क्षेत्रों में नहीं है?

यही नहीं, पूरे जम्मू-कश्मीर, असम को छोड़कर पूरे उत्तर पूर्व में कोई पीपुल मीटर नहीं है. इसका अर्थ यह हुआ कि इन क्षेत्रों के दर्शकों की पसंद कोई मायने नहीं रखती है. लेकिन उससे भी अधिक चौंकानेवाली बात यह है कि अधिकांश पीपुल मीटर देश के आठ बड़े महानगरों तक सीमित हैं जहां कुल २६९० मीटर लगे हुए हैं. इस तरह, सिर्फ आठ महानगरों में कुल पीपुल मीटर्स के ३३.६ प्रतिशत लगे हुए हैं.

इसमें भी दिल्ली और मुंबई में कुल टी.वी मीटर्स के १३.५ फीसदी मीटर्स लगे हुए हैं जबकि इन दोनों शहरों में देश की सिर्फ दो प्रतिशत आबादी रहती है. इसी तरह, देश के पश्चिमी हिस्सों खासकर गुजरात (अहमदाबाद सहित) और महाराष्ट्र (मुंबई छोड़कर) में कुल पीपुल मीटर्स के १९ फीसदी मीटर्स लगे हुए हैं.

टी.वी रेटिंग की मौजूदा व्यवस्था में जहां अकेले पुणे में १८० पीपुल मीटर्स लगे हुए हैं, वहीँ पूरे बिहार में सिर्फ १५० मीटर्स लगे हैं. इसी तरह, दिल्ली में कुल ५४० पीपुल मीटर्स लगे हैं, वहीँ पूरे मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में कुल ४५० मीटर्स लगे हैं. जाहिर है कि टी.आर.पी की मौजूदा व्यवस्था में इस तरह की भारी विसंगतियाँ हैं.

आश्चर्य नहीं कि टी.आर.पी व्यवस्था की जांच करते हुए ट्राई ने भी स्वीकार किया था कि “ रेटिंग की मौजूदा व्यवस्था मुख्यतः केबल घरों पर आधारित है. चूँकि केबल घरों की बड़े पैमाने पर अंडर रिपोर्टिंग होती है, इसलिए ८००० घरों पर आधारित रेटिंग की व्यवस्था अत्यधिक अपर्याप्त है. इसके अलावा चूँकि लगभग ६० फीसदी टी.वी सेट्स अभी भी ब्लैक एंड व्हाइट हैं, जिनसे दर्शकों की पसंद के बारे में सही अनुमान लगा पाना बहुत संदेहास्पद है.

इसी तरह, चैनलों की मौजूदगी भी देश के सभी क्षेत्रो में एक सामान नहीं है. इस सबसे रेटिंग की मौजूदा प्राविधि की सीमाएं अस्पष्ट होती हैं. इसका नतीजा यह हो रहा है कि जिन चैनलों की ग्रामीण इलाकों या दर्शकों के कुछ हिस्सों में अधिक पैठ होगी, वे रेटिंग की मौजूदा व्यवस्था में नुकसान में रहते हैं. मुख्यतः शहरी दर्शक ही चैनलों की रेटिंग और उनके कार्यक्रमों का शेड्यूल तय कर रहे हैं.”

इसके अलावा, समिति टी.वी उद्योग की इन शिकायतों से भी सहमत दिखती है कि टैम और ए-मैप की मौजूदा रेटिंग व्यवस्था में पारदर्शिता और विश्वसनीयता का भी अभाव है. सैम्पल की गोपनीयता के नाम पर रेटिंग एजेंसियों की मौजूदा व्यवस्था में उनके आंकड़ों की शुद्धता की जांच और उस प्रक्रिया का मूल्यांकन संभव नहीं है. टैम पर यह आरोप अक्सर लगते रहे हैं कि उसके द्वारा बरती जानेवाली गोपनीयता के आवरण में उसके आंकड़ों को बड़े प्रसारक प्रभावित करते हैं. यह भी आरोप लगते रहे हैं कि पीपुल मीटर्स के पैनल की जानकारी कुछ बड़े चैनलों/प्रसारकों को मुहैया कर दी जाती है जो उसका फायदा संबंधित दर्शकों की पसंद को मैनीपुलेट करके उठाते हैं.

यही नहीं, रेटिंग एजेंसियों के स्वामित्व और उनमें क्रास मीडिया निवेश के कारण हितों के टकराव (कनफ्लिक्ट आफ इंटरेस्ट) के सवाल भी उठते रहे हैं. यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है कि अगर रेटिंग एजेंसी में प्रसारकों या विज्ञापन एजेंसियों का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष शेयर होगा या रेटिंग एजेंसी का प्रसारकों, कार्यक्रम निर्माता कंपनियों या विज्ञापन एजेंसियों में हिस्सेदारी होगी तो निश्चय ही, हितों के टकराव होगा और उससे रेटिंग की विश्वसनीयता प्रभावित होगी.

इसके अलावा, समिति ने इस चिंता का भी उल्लेख किया है कि रेटिंग व्यवसाय में एकाधिकार की स्थिति के कारण पीपुल मीटर की कीमत बहुत अधिक है. रिपोर्ट के अनुसार, एक पीपुल मीटर की कीमत लगभग डेढ़ लाख रूपये है. आरोप है कि पीपुल मीटर की इस अत्यधिक कीमत के जरिये संबंधित कंपनी अपनी विदेशी पैरेंट कंपनी को अनुचित तरीके (ट्रांसफर प्राइसिंग) से लाभ पहुंचा रही है.

समिति ने इस मुद्दे पर भी चिंता जाहिर की है कि टी.आर.पी के आंकड़ों को जारी करने की अवधि और बारंबारता (फ्रीक्वेंसी) को हर मिनट, हर घंटे, हर दिन और हर सप्ताह करके उसे शेयर बाजार की तरह बना दिया गया है. उल्लेखनीय है कि अभी टैम मीडिया साप्ताहिक आधार पर जबकि ए-मैप दैनिक आधार पर टी.आर.पी रेटिंग जारी करते हैं.

इसके कारण, चैनलों और कार्यक्रम निर्माताओं पर हर सप्ताह रेटिंग में आनेवाले उतार-चढाव के अनुसार अपनी रणनीति में बदलाव करना पड़ता है. प्रसारकों और कार्यक्रम निर्माताओं पर न सिर्फ टी.आर.पी में बढ़त को बनाए रखने और कमी को सुधारने का दबाव रहता है बल्कि उनके पास कार्यक्रमों में प्रयोग करने की कोई गुंजाइश भी नहीं रह जाती है.
जारी.....
('कथादेश' के फरवरी'११ अंक में प्रकाशित)