सोमवार, नवंबर 05, 2012

इरोम शर्मिला संघर्ष का दूसरा नाम है, उन्हें सलाम कीजिये

लेकिन भारतीय लोकतंत्र बहरा क्यों बना हुआ है?

मणिपुर की राजधानी इम्फाल में इरोम शर्मिला की भूख हड़ताल और पुलिस हिरासत के आज बारह साल पूरे हो गए. चालीस साल की इरोम पिछले १२ साल से पुलिस हिरासत में भूख हड़ताल पर हैं और उन्हें पुलिस हिरासत में ही जबरन नाक से खाना दिया जाता है. वे आज भी आमरण अनशन पर हैं.
वे अपनी इस मांग से पीछे हटने के लिए तैयार नहीं हैं कि जनविरोधी काले कानून- सशस्त्र सेना विशेष अधिकार कानून’ १९५८ (आर्म्ड फोर्सेज स्पेशल पावर एक्ट-अफ्स्पा) को मणिपुर से तुरंत हटाया जाए. वे आज देश में अनथक और समझौता-विहीन संघर्ष, बलिदान और प्रतिबद्धता का दूसरा नाम बन गईं हैं.
लेकिन शर्मनाक अफसोस यह कि दुनिया के ‘सबसे बड़े लोकतंत्र’ के कान पर जूँ तक नहीं रेंगी है. बारह साल लंबे इस शांतिपूर्ण लेकिन अत्यंत पीडाजनक आंदोलन के बावजूद इस ‘महान लोकतंत्र’ की कुम्भकर्णी निद्रा टूटने का काम नहीं ले रही है. इस मामले में इरोम का संघर्ष भारतीय लोकतंत्र के लिए परीक्षा बन गया है और यह कहना कतई गलत नहीं होगा कि वह मणिपुर से लेकर कश्मीर तक इस परीक्षा में पिछले कई सालों से लगातार फेल हो रहा है.

इस तथ्य के बावजूद कि मणिपुर में यह केवल इरोम का व्यक्तिगत संघर्ष नहीं है बल्कि उनके संघर्ष में मणिपुर की अधिकांश महिलाओं और पुरुषों की आवाज़ शामिल हैं. इरोम इस अनूठे संघर्ष की प्रतीक भर हैं.

आखिर हम कैसे भूल सकते हैं कि वर्ष २००४ में जब असम राइफल्स के जवानों ने मणिपुर युवा थांगजाम मनोरमा की बलात्कार के बाद निर्मम तरीके से हत्या कर दी थी. उस शर्मनाक घटना ने पूरे मणिपुर की आत्मा को झकझोर दिया था. लोगों खासकर महिलाओं का गुस्सा सड़कों पर फूट पड़ा था.
उस गुस्से, पीड़ा और बेचैनी का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि दर्जनों महिलाओं ने असम राइफल्स के इम्फाल स्थित कंगला फोर्ट मुख्यालय पर बिलकुल नंगे होकर यह कहते हुए प्रदर्शन किया था कि “असम राइफल्स हमारा बलात्कार करो.” यह एक ऐतिहासिक प्रदर्शन था जिसकी तस्वीरों ने अगले दिन पूरे देश को हिला कर रख दिया था.

इरोम भी ऐसे ही हालत में वर्ष २००० में आमरण अनशन पर बैठीं. उस साल असम राइफल्स के जवानों ने मणिपुर घाटी के मलोम कसबे में बस स्टैंड पर इंतज़ार कर रहे दस निर्दोष लोगों को भून डाला था जिसमें एक ६२ साल की महिला के अलावा राष्ट्रीय बाल वीरता पुरस्कार जीतनेवाला १८ वर्षीय युवा सिनम चंद्रमणि भी शामिल था.
मलोम नरसंहार जैसे मणिपुर की घायल आत्मा पर मरणान्तक प्रहार था जिसने पूरे मणिपुर के साथ-साथ २८ वर्षीया इरोम शर्मिला चानू को भी सड़कों पर उतरने के लिए मजबूर कर दिया. उसके बाद की कहानी एक इरोम के जीवट भरे, अडिग और धैर्यपूर्ण संघर्ष का ऐसा जीवित इतिहास है जो हम अपनी आँखों के सामने बनता हुआ देख रहे हैं.
इरोम की लड़ाई मणिपुर में शांति बहाली की लड़ाई है. यह शांति बिना अफ्स्पा को हटाए, मानवाधिकारों का हनन रोके, लोगों के बुनियादी संवैधानिक अधिकारों को बहाल किये और राजनीतिक प्रक्रिया को शुरू किये संभव नहीं है.

मणिपुर में निर्दोषों का बहुत खून बह चुका है. इन खून के दागों से रंगा भारतीय लोकतंत्र का चेहरा बहुत बदसूरत और भयावह दिखता है. इसके बावजूद भारतीय राज्य अपनी भूलों को सुधारने और मणिपुर में शांति बहाली को एक मौका देने को तैयार नहीं है तो मानना पड़ेगा कि इस लोकतंत्र में न मानवीय आत्मा है, न आत्मविश्वास और न ही साहस.

लेकिन इसके उलट इरोम की १२ साल लंबी भूख हड़ताल में लोकतांत्रिक संघर्षों के प्रति दृढ आस्था, उत्कट आत्मविश्वास, बेमिसाल साहस और एक बेहद मानवीय आत्मा की पीड़ा को देखा-समझा जा सकता है. सच पूछिए तो आज इरोम पूरे देश में लोगों के बुनियादी अधिकारों और हक-हुकूक की लड़ाई के लिए प्रेरणा बन गई हैं.
यही कारण है कि इरोम का संघर्ष अब सिर्फ मणिपुर का संघर्ष नहीं रह गया है और उनकी आवाज़ केवल मणिपुर की आवाज़ नहीं है. इस संघर्ष में देश के कोने-कोने में लड़ रहे लाखों गरीब, मेहनतकश, किसान, आदिवासी, दलित, छात्र-युवा और आमजन खुद को देखते और महसूस करते हैं.
पता नहीं, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को रात में नींद कैसे आती होगी, जब देश की एक बेटी पिछले १२ साल से भूखी है? प्रधानमंत्री जी, क्या लोकतंत्र में लोगों की राय का कोई मतलब नहीं है? क्या भारतीय लोकतंत्र और राष्ट्र राज्य इतना भुरभुरा और कमजोर है कि मणिपुर में अफ्स्पा हटाते ही वह ढह जाएगा?   

इस मौके पर मुझे पाश याद रहे हैं :                   
अपनी असुरक्षा से

यदि देश की सुरक्षा यही होती है

कि बिना जमीर होना जिंदगी के लिए शर्त बन जाये

आंख की पुतली में हां के सिवाय कोई भी शब्द

अश्लील हो

और मन बदकार पलों के सामने दंडवत झुका रहे

तो हमें देश की सुरक्षा से खतरा है.

हम तो देश को समझे थे घर-जैसी पवित्र चीज

जिसमें उमस नहीं होती

आदमी बरसते मेंह की गूंज की तरह गलियों में बहता है

गेहूं की बालियों की तरह खेतों में झूमता है

और आसमान की विशालता को अर्थ देता है

हम तो देश को समझे थे आलिंगन-जैसे एक एहसास का नाम

हम तो देश को समझते थे काम-जैसा कोई नशा

हम तो देश को समझते थे कुरबानी-सी वफा

लेकिन गर देश

आत्मा की बेगार का कोई कारखाना है

गर देश उल्लू बनने की प्रयोगशाला है

तो हमें उससे खतरा है

गर देश का अमन ऐसा होता है

कि कर्ज के पहाड़ों से फिसलते पत्थरों की तरह

टूटता रहे अस्तित्व हमारा

और तनख्वाहों के मुंह पर थूकती रहे

कीमतों की बेशर्म हंसी

कि अपने रक्त में नहाना ही तीर्थ का पुण्य हो

तो हमें अमन से खतरा है

गर देश की सुरक्षा को कुचल कर अमन को रंग चढ़ेगा

कि वीरता बस सरहदों पर मर कर परवान चढ़ेगी

कला का फूल बस राजा की खिड़की में ही खिलेगा

अक्ल, हुक्म के कुएं पर रहट की तरह ही धरती सींचेगी

तो हमें देश की सुरक्षा से खतरा है.

रविवार, नवंबर 04, 2012

भारत-चीन व्यापार की चिंताएं और संभावनाएं

प्रतियोगी और पूरक का सम्बन्ध है भारत-चीन के बीच 

भारत और चीन के बीच १९६२ के युद्ध के बाद पिछले ५० वर्षों में बहुत कुछ बदल गया है. गंगा और यांग्त्सी नदियों में बहुत पानी बह चुका है. आज भारत और चीन एशिया की दो ऐसी उभरती हुई अर्थव्यवस्थाएं हैं जिन्होंने पिछले दो दशकों में अपने विशाल घरेलू बाजार और आर्थिक उछाल के कारण पूरी दुनिया का ध्यान खींचा है.
हैरानी की बात नहीं है कि युद्ध की कड़वी यादों, परस्पर अविश्वास और सीमा विवाद के बावजूद पिछले दो-ढाई दशकों में दोनों देशों के बीच आपसी व्यापार तेजी से बढ़ा है. सच यह है कि दोनों देशों के बीच सामान्य होते द्विपक्षीय संबंधों को पारिभाषित करनेवाली सबसे महत्वपूर्ण परिघटना आपसी व्यापार में वृद्धि है.
तथ्य खुद इसकी गवाही देते हैं. आज चीन, भारत का पहले नंबर का व्यापारिक साझीदार बन चुका है जबकि भारत भी चीन के पहले दस बड़े व्यापारिक साझीदारों में से एक है. वर्ष २०१० में भारत ने अपने कुल जिंस/माल निर्यात का ७.९१ प्रतिशत अकेले चीन को निर्यात किया.

हालाँकि यह चीन के कुल माल/जिंस आयात का मात्र १.४ प्रतिशत था लेकिन इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि दोनों देशों खासकर भारत के लिए चीन के साथ आपसी व्यापार को बढ़ाने की कितनी अधिक गुंजाइश मौजूद है. दूसरी ओर, चीन ने अपने कुल जिंस/माल निर्यात का मात्र २.५४ प्रतिशत भारत को निर्यात किया लेकिन यह भारत के कुल माल/जिंस आयात का ११.७७ प्रतिशत बैठता है.

आश्चर्य की बात नहीं है कि ‘इकनामिक एंड पोलिटिकल वीकली’ (३ नवंबर’१२) के एक विशेष रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले एक दशक में दोनों देशों के बीच आपसी व्यापार में इन दोनों देशों के एशियान देशों और दुनिया के अन्य देशों से व्यापार की तुलना में दुगुनी तेज गति से वृद्धि हुई है.
एक अनुमान के अनुसार, दोनों देशों का आपसी व्यापार वर्ष २०१५ तक १०० अरब डालर तक पहुँच जाएगा. वर्ष २०११ में दोनों देशों के बीच आपसी व्यापार ७३.९ अरब डालर का था. उल्लेखनीय है कि दोनों देशों ने आर्थिक सहयोग के लिए एक पांच सालों के समझौते पर दस्तखत किये हैं जिसका मकसद आपसी व्यापार को तेजी से बढ़ाना है.
लेकिन ऐसा भी नहीं है कि दोनों देशों के बीच तेजी से बढ़ते व्यापार को लेकर सब कुछ अच्छा ही अच्छा है. सच यह है कि इसे लेकर कई सवाल, आशंकाएं और चिंताएं भी हैं. उदाहरण के लिए एक बड़ी आशंका और चिंता यही है कि चीन से आनेवाले सस्ते उपभोक्ता सामानों, औद्योगिक उत्पादों और मालों का कहीं भारतीय बाजारों पर कब्ज़ा न हो जाए.

हालाँकि मीडिया के एक हिस्से में चीनी सामानों/उत्पादों को लेकर दिखाया जानेवाला डर अतिरेक से भरा और अंध चीन विरोध से प्रेरित है लेकिन इस सच्चाई से इनकार नहीं किया जा सकता है कि रोजमर्रा के जीवन में इस्तेमाल होनेवाले सस्ते चीनी सामानों से भारतीय बाजार पटता जा रहा है और उनके आगे भारतीय उत्पादकों खासकर लघु और मंझोले उद्योगों के लिए प्रतियोगिता में टिकना मुश्किल होता जा रहा है.

कहने की जरूरत नहीं है कि चीन आज दुनिया की सबसे बड़ी मैन्युफैक्चरिंग फैक्ट्री बन चुका है. खासकर श्रम केंद्रित-निर्यातोन्मुख मैन्युफैक्चरिंग में उसका कोई जवाब नहीं है और उसने एक ऐसी ‘इकनामी आफ स्केल’ हासिल कर ली है जिसका मुकाबला करना मुश्किल है.
आश्चर्य नहीं कि चीन आज दुनिया भर में अपने सस्ते सामानों/उत्पादों खासकर दैनिक जरूरत के सामानों/उत्पादों आदि के लिए जाना जाता है और उससे मुकाबला करना सभी के लिए मुश्किल हो रहा है. इसका नतीजा यह हुआ है कि दुनिया की अधिकांश बड़ी कंपनियों (भारतीय कंपनियों सहित) ने चीन में अपनी औद्योगिक ईकाइयां लगा ली हैं और खुद की ब्रांडिंग के साथ सामानों को निर्यात कर रही हैं और अपने घरेलू बाजारों में बेच रही हैं.
जाहिर है कि इसके कारण भारत समेत दुनिया के कई देशों में घरेलू उद्योगों के सामने कड़ी चुनौती खड़ी हो गई है. भारत में कई उद्योगों में खासकर लघु-मंझोली औद्योगिक ईकाइयों के बंद होने का खतरा बढ़ता जा रहा है. कई बंद हो चुकी हैं. इससे लाखों श्रमिकों के रोजगार पर संकट मंडरा रहा है और हजारों बेरोजगार हो चुके हैं. इसे नजरंदाज़ करना मुश्किल है.

लेकिन इसके साथ ही यह भी सच है कि भारतीय अर्थव्यवस्था का यह वि-औद्योगिकीकरण सिर्फ चीनी वस्तुओं/उत्पादों के कारण नहीं बल्कि दुनिया के अन्य देशों से भी हो रहे सस्ते आयात के कारण है और व्यापक अर्थों में यह भूमंडलीकरण की प्रक्रिया का नतीजा है.

दूसरे, भारत-चीन व्यापार के बीच तेजी से बढ़ते व्यापार में एक पेंच भारत के सन्दर्भ में बढ़ता व्यापार घाटा है. वर्ष २०१० में चीन से व्यापार में भारत का व्यापार घाटा (आयात की तुलना में निर्यात का अंतर) बढ़कर २१.२५ अरब डालर तक पहुँच गया.
हालाँकि चीन को भारत का निर्यात १८.७७ अरब डालर रहा जो वर्ष २००९ की तुलना में ८१ फीसदी की बढ़ोत्तरी दर्शाता है लेकिन इस बढ़ोत्तरी के बावजूद दोनों देशों के बीच व्यापार में व्यापार संतुलन चीन के पक्ष में झुका हुआ है. यह दोनों देशों के बीच बढ़ते व्यापारिक तनाव की वजह भी बन रहा है. इसके कारण चीन से हो रहे आयात पर अंकुश लगाने की मांग भी जोर पकड़ रही है.
लेकिन इन समस्याओं और असंतुलन के बावजूद दोनों देशों के बीच बढ़ते व्यापार में संभावनाएं और उम्मीदें भी बहुत हैं. सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि बढ़ते व्यापार के कारण दोनों देशों में राजनीतिक संबंध सामान्य हो रहे हैं. आपसी कटुता और अविश्वास कम हुआ है.

दूसरे, आपसी व्यापार में वृद्धि से दोनों देशों की अर्थव्यवस्थाओं को फायदा हो रहा है. आज जब पूरी दुनिया में आपसी और क्षेत्रीय व्यापार को आगे बढ़ाने के लिए व्यापारिक समझौते हो रहे हैं और गठबंधन हो रहे हैं, उस समय दो तेजी से उभरती अर्थव्यवस्थाएं एक-दूसरे से अलग नहीं रह सकती हैं. उससे दोनों को नुकसान होगा.

तीसरे, भारत-चीन के बीच बढ़ते व्यापार का एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि भारत और चीन जहाँ कई क्षेत्रों में कड़े प्रतियोगी हैं, वहीं कई क्षेत्रों में उनके वे एक दूसरे के पूरक भी हैं और कई और क्षेत्रों में उनकी ताकत अलग-अलग भी है. जैसे चीन अगर मैन्युफैक्चरिंग के क्षेत्र में वैश्विक ताकत है तो भारत सेवा क्षेत्र में तेजी से उभर रहा है.
इसी तरह चीन सूचना तकनीक-कंप्यूटर के क्षेत्र में हार्डवेयर के निर्यात में आगे है तो भारत साफ्टवेयर में आगे है. इन क्षेत्रों में एक-दूसरे के सहयोगी हो सकते हैं. ऐसे में, यह दोनों देशों के हक में है कि आपसी व्यापार में मौजूद असंतुलन और विसंगतियों को दूर करते हुए एक-दूसरे के सहयोग-समर्थन पर आधारित व्यापार को और प्रोत्साहित करें ताकि उसका फायदा दोनों देशों की जनता को मिल सके.
यह इसलिए भी जरूरी है कि इस मामले में पीछे लौटने का विकल्प दोनों देशों के पास नहीं है. गंगा और यांग्त्सी में बहते हुए पानी की तरह उन्हें आगे ही बहना होगा. 

('राष्ट्रीय सहारा' के हस्तक्षेप परिशिष्ट में 3 नवम्बर को प्रकाशित टिप्पणी)                    

गुरुवार, नवंबर 01, 2012

कारपोरेट पूंजी की चाकर बन गई राजनीति को जनसंघर्षों के जरिये मुक्त कराना जरूरी

गरीबों की जरूरतों और आकांक्षाओं की पूर्ति के लिए अर्थनीति का राजनीति के मातहत होना जरूरी है
तीसरी और आखिरी क़िस्त  
इसकी वजह किसी से छुपी नहीं है. आर्थिक सुधार के इन वर्षों में कृषि को उसके हाल पर छोड़ दिया गया. किसानों को न सिर्फ खाद, बिजली और बीज आदि की बढ़ी कीमतें चुकानी पड़ी, उन्हें उनकी उपज का उचित और लाभकारी मूल्य नहीं मिला बल्कि उन्हें डब्ल्यू.टी.ओ के बाद बाजार में सस्ते विदेशी कृषि उत्पादों से मुकाबला करना पड़ा.
इसका सबसे बुरा प्रभाव नगदी फसलों के किसानों पर पड़ा है. यही नहीं, आर्थिक सुधारों के तहत सब्सिडी कटौती के कारण कृषि में सरकारी निवेश घटा और उसके कारण कृषि की उत्पादकता वृद्धि में भी गिरावट आ रही है. आश्चर्य नहीं कि जिन वर्षों में जी.डी.पी की वृद्धि दर औसतन ८ फीसदी के आसपास थी, उन वर्षों में भी कृषि की वृद्धि दर औसतन मात्र २ फीसदी के आसपास थी.
नतीजा यह कि जी.डी.पी में कृषि का योगदान घटते-घटते १४.८ फीसदी से भी कम रह गया है जबकि कृषि पर अब भी देश की ५४ फीसदी आबादी निर्भर है. इसका अर्थ यह हुआ कि देश में जी.डी.पी के रूप में पैदा होनेवाली कुल समृद्धि में सिर्फ १४.८ फीसदी हिस्सा ही कृषि क्षेत्र में आता है लेकिन उसपर देश की कुल ५४ फीसदी से अधिक लोगों की आजीविका निर्भर है.

इससे सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि कृषि क्षेत्र की स्थिति कितनी बद से बदतर होती जा रही है. उसपर एक तो करेला, उसपर नीम चढ़े की तरह पिछले कुछ वर्षों में किसानों से विकास के नामपर उद्योग, सेज, हाईवे, बिजलीघर, रीयल इस्टेट आदि बनाने के लिए ८० लाख हेक्टेयर से अधिक जमीन जबरदस्ती ली गई है. योजना आयोग की एक रिपोर्ट कहती है कि यह कोलंबस के बाद दुनिया में जमीन की सबसे बड़ी लूट है.

लेकिन यह लूट सिर्फ जमीन तक सीमित नहीं है. सच यह है कि आर्थिक सुधारों के नामपर उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण की आड़ में खुले बाजार को जिस तरह से आगे बढ़ाया गया है, उसमें ‘जल-जंगल-जमीन से लेकर प्राकृतिक संसाधनों’ की कारपोरेट लूट ने सभी रिकार्ड तोड़ दिए हैं.
असल में, देश में डालर अरबपतियों और करोड़पतियों की संख्या यूँ ही नहीं बढ़ रही है. यह कोई जादू नहीं है. यह वास्तव में आर्थिक सुधारों से ज्यादा आर्थिक सुधारों के नामपर बड़ी देशी-विदेशी पूंजी को दी जा रही रियायतें, छूट और सार्वजनिक प्राकृतिक संसाधनों के बेलगाम हस्तान्तरण के कारण संभव हुआ है. अकेले २-जी और कोयला आवंटन में कोई ३.६२ लाख करोड़ रूपयों से अधिक की सार्वजनिक संपत्ति बड़ी कंपनियों और नेताओं के रिश्तेदारों/करीबियों को बाँट दी गई.
हैरानी की बात नहीं है कि आर्थिक सुधारों के नामपर यह कहते हुए कि पैसे पेड पर नहीं उगते, सब्सिडी कटौती का सारा बोझ आम आदमी और गरीबों पर डाला जा रहा है, उस समय देश के कार्पोरेट्स, बड़े निवेशकों, अमीरों, उच्च मध्य और मध्य वर्ग को टैक्स छूटों, रियायतों और कटौतियों के जरिये सालाना कोई ५.१५ लाख करोड़ से अधिक की सब्सिडी दी जा रही है.

तर्क यह दिया जाता है कि यह देश के ‘तेज विकास’ के लिए जरूरी है. लेकिन इस ‘तेज विकास’ का हाल यह है कि यह ‘रोजगारविहीन विकास’ (जाब्लेस ग्रोथ) है. खुद सरकारी रिपोर्टें कह रही है हैं कि देश में तेज जी.डी.पी वृद्धि दर के बावजूद रोजगार वृद्धि की दर बहुत मामूली या नगण्य है. संगठित क्षेत्र लगातार सिकुड़ रहा है.

नए रोजगार के अवसर असंगठित क्षेत्र में पैदा हुए हैं जहाँ वेतन-सेवाशर्तों आदि के मामले में श्रम कानूनों की खुलेआम धज्जियाँ उड़ाई जा रही है. ठेका और अस्थाई श्रमिकों की तादाद बढ़ी है और उन्हें जिन बदतर स्थितियों में काम करना पड़ता है, उसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती है.

च पूछिए तो आज नव उदारवादी आर्थिक सुधारों की असलियत खुल चुकी है. खासकर देश के करोड़ों गरीबों, किसानों, श्रमिकों, आदिवासियों, दलितों, पिछडों और अल्पसंख्यकों ने अपने कड़वे अनुभवों से जान लिया है कि आर्थिक सुधारों की कीमत उन्हें चुकानी पड़ रही है लेकिन इसकी मलाई मुट्ठी भर अमीर-अभिजात्य लोग उड़ा रहे हैं.
यही कारण है कि पिछले कुछ वर्षों में देश के हर कोने में किसान, आदिवासी, दलित और गरीब ‘जल-जंगल-जमीन और खनिजों’ की लूट के खिलाफ डटकर खड़ा हो गया है. किसान और आदिवासी किसी भी नए प्रोजेक्ट के लिए जमीन देने को तैयार नहीं हैं और वे लड़ने और मरने-मारने पर उतारू हैं. श्रमिकों की बेचैनी फूटने लगी है. मारुति में श्रमिकों का आंदोलन अपवाद नहीं है.
और तो और आर्थिक सुधारों का मुखर समर्थक रहा मध्य और निम्न मध्य वर्ग का भी एक बड़ा हिस्सा अब इसके खिलाफ आवाज़ बुलंद करने लगा है. भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना आंदोलन इस प्रवृत्ति की एक मिसाल है.

यही नहीं, खुदरा व्यापार में विदेशी पूंजी को इजाजत देने के मुद्दे पर जिस तरह से मध्यवर्गीय व्यापारियों का एक बड़ा हिस्सा सड़कों पर उतर आया है, उससे साफ़ हो गया है कि देश में नव उदारवादी आर्थिक सुधारों के समर्थकों की संख्या दिन पर दिन घटती जा रही है. इसलिए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह चाहे जितने दावे करें लेकिन सच्चाई पर पर्दा डालना अब संभव नहीं रह गया है.                                 

इस अर्थ में नव उदारवादी आर्थिक सैद्धांतिकी को चुनौती मिलने लगी है. लेकिन उसे मुकम्मल चुनौती देने के लिए जरूरी है कि अर्थनीति को राजनीति के मातहत लाने की वैकल्पिक राजनीति को आगे बढ़ाया जाए.
आखिर राजनीति क्या है? राजनीति और कुछ नहीं बल्कि समाज के विभिन्न वर्गों की जरूरतों, आकांक्षाओं और इच्छाओं की अभिव्यक्ति का माध्यम है. लेकिन नव उदारवादी आर्थिक सैद्धांतिकी के जो समर्थक अर्थनीति को राजनीति से अलग रखने की मांग करते हैं, वे असल में, उसे आम लोगों की जरूरतों, आकांक्षाओं और इच्छाओं से अलग रखने की मांग करते हैं.
लेकिन आम लोगों खासकर इस देश के बहुसंख्यक गरीबों और हाशिए पर पड़े लोगों की जरूरतों, इच्छाओं और आकांक्षाओं की पूर्ति के लिए अर्थनीति का राजनीति के मातहत होना जरूरी है.
लेकिन इसके लिए जरूरी है कि कारपोरेट और बड़ी आवारा पूंजी की चाकर बन गई राजनीति को जनसंघर्षों के जरिये उनके कब्जे से मुक्त कराया जाए और उसे फिर से गरीबों की आवाज़ बनाया जाए. साफ़ है कि वैकल्पिक और जनोन्मुखी अर्थनीति के लिए वैकल्पिक राजनीति जरूरी है. यह भी तय है कि वह वैकल्पिक राजनीति जनसंघर्षों से ही निकलेगी.

(लखनऊ से प्रकाशित 'समकालीन सरोकार' के नवम्बर अंक में प्रकाशित लेख की तीसरी और आखिरी क़िस्त)   

बुधवार, अक्टूबर 31, 2012

कार्पोरेट्स के इशारे पर चल रही हैं सरकारें

सरकार, नौकरशाही और संसद में कार्पोरेट्स से सीधे और परोक्ष रूप से जुड़े मंत्रियों, अफसरों और सांसदों की संख्या बढ़ रही है  
 
दूसरी क़िस्त 
आश्चर्य नहीं कि संसद और विधानसभाओं में निर्वाचित प्रतिनिधियों में करोड़पतियों-अरबपतियों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है. यही नहीं, आज राज्यसभा और लोकसभा में ऐसे निर्वाचित प्रतिनिधियों की संख्या भी तेजी से बढ़ रही है जो सीधे-सीधे किसी न किसी बड़े कारपोरेट समूह के मुखिया हैं या उसके प्रमुख अधिकारी रहे हैं या सीधे तौर पर जुड़े रहे हैं. बात यहीं नहीं खत्म नहीं होती.
राजनीति पर बड़ी पूंजी का नियंत्रण किस हद तक बढ़ गया है, इसका अनुमान इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि सरकार में अपने समर्थक मंत्रियों और अफसरों की नियुक्ति के लिए कारपोरेट समूह जमकर लाबीइंग कर रहे हैं और कामयाब भी हो रहे हैं. ऐसे उदाहरणों की कमी नहीं है जिनमें देशी-विदेशी कारपोरेट समूह केन्द्र और राज्यों में अपनी पसंद के मंत्रियों और मुख्यमंत्रियों की नियुक्ति और उन्हें अनुकूल मंत्रालय दिलवाने में कामयाब हुए हैं.
यह किसी से छुपा नहीं है कि पिछले दो दशकों में सरकार चाहे किसी भी पार्टी या गठबंधन की रही हो लेकिन इन कारपोरेट समूहों के समर्थक मंत्रियों और अफसरों की तादाद बढ़ती ही गई है. आश्चर्य नहीं कि राजनीति को आज देश में ८० फीसदी गरीबों और हाशिए पर पड़े लोगों की चिंता नहीं रह गई है. वह अमीरों और बड़ी पूंजी के हितों को आगे बढ़ाने और उनकी रक्षा में जुटी हुई है.

यही कारण है कि पिछले कुछ सालों में केन्द्रीय बजट में बड़ी पूंजी और अमीरों को करों में छूट, रियायतों और प्रोत्साहन के जरिये २२ लाख करोड़ रूपये से अधिक की सौगात देने में कोई हिचकिचाहट नहीं हुई. अकेले इस साल के बजट में बड़ी पूंजी और अमीरों को लगभग ५ लाख करोड़ रूपये की छूट दी गई है.
लेकिन जब भी गरीबों के लिए खाद्य सुरक्षा और उन्हें भोजन का अधिकार देने की बात होती है, राजनीति और बड़ी पूंजी को सब्सिडी और वित्तीय घाटे की चिंता सताने लगती है. हालांकि इसमें सिर्फ ७५ हजार से अधिकतम एक लाख करोड़ रूपये खर्च होने का आकलन है लेकिन हंगामा ऐसा होता है कि जैसे पूरा खजाना लुट रहा हो.
साफ है कि राजनीति और राजनेता अब गाँधी जी की वह जंत्री भूल चुके हैं जिसमें उन्होंने कहा था कि ‘कोई भी फैसला करने से पहले यह जरूर सोचो कि उससे सबसे गरीब भारतीय की आंख के आंसू पोंछने में कितनी मदद मिलेगी.’ कारण यह कि खुद राजनीति की आंख का पानी सूख चुका है और उसने बड़ी पूंजी नियंत्रित अर्थतंत्र के आगे घुटने टेक दिए हैं.
यह सही है कि इन नव उदारवादी आर्थिक सुधारों के कारण पिछले दो दशकों में आर्थिक विकास यानी जी.डी.पी की वृद्धि दर में तेजी आई है और वह औसतन ७ से ८ फीसदी के बीच रही है. यह भी सही है कि इसके साथ भारी आर्थिक समृद्धि आई है.

लेकिन इनसे ज्यादा बड़ा सच यह है कि इस आर्थिक समृद्धि का सबसे बड़ा हिस्सा बड़ी देशी-विदेशी कंपनियों, बड़े निवेशकों, टाप मैनेजरों, अमीरों, शहरी मध्य और उच्च मध्यवर्ग और ग्रामीण कुलकों के अलावा नेताओं-अफसरों-दलालों-माफियाओं-ठेकेदारों की जेब में गया है.

हालाँकि इनकी संख्या देश की कुल आबादी के ३ से ५ फीसदी भी नहीं होगी लेकिन उनके घरों, रहन-सहन और जीवनशैली में जो समृद्धि और तड़क-भड़क आई है, वह अभूतपूर्व है. उनमें और दुनिया के सबसे विकसित देशों के अमीरों की जीवनशैली और उपभोग में कोई खास फर्क नहीं है.

लेकिन दूसरी ओर देश की बड़ी आबादी खासकर छोटे-मंझोले और भूमिहीन किसानों असंगठित श्रमिकों, आदिवासियों, दलितों, पिछडों, अल्पसंख्यकों की स्थिति में कोई खास सुधार नहीं हुआ है बल्कि उल्टे उनकी स्थिति बद से बदतर हुई है.
इसके कारण अमीर और गरीब के बीच की खाई और तेजी से बढ़ी है और आर्थिक-सामाजिक गैर बराबरी कई गुना बढ़ गई है. सरकारी संगठन- एन.एस.एस.ओ के ६६ वें दौर (२००९-१०) के सर्वेक्षण के मुताबिक, अकेले यू.पी.ए- एक के कार्यकाल (२००४-२००९) में शहरी और ग्रामीण परिवारों के उपभोग व्यय में अंतर ९१ फीसदी तक पहुँच गया है.
उल्लेखनीय है कि इन वर्षों में जी.डी.पी की औसत वृद्धि दर ८.६४ प्रतिशत रही जोकि एक रिकार्ड है. यही नहीं, यू.पी.ए सरकार ने मनरेगा जैसी योजनाएं भी शुरू कीं, इसके बावजूद स्थिति में कोई खास सुधार नहीं हुआ है.

यही नहीं, एन.एस.एस.ओ के ताजा सर्वेक्षण (२०११-१२) के मुताबिक, ग्रामीण क्षेत्रों में आय के मामले में उपरी १० फीसदी और निचली १० फीसदी आबादी के बीच की कमाई में वृद्धि का अनुपात बढ़कर ६.९ हो गया है जबकि शहरों में इस अंतर का अनुपात बढ़कर १० से अधिक हो गया है.

इस बढ़ती गैर बराबरी का अंदाज़ा यू.पी.ए सरकार द्वारा गठित अर्जुन सेनगुप्ता समिति की रिपोर्ट से भी होता है जिसके अनुसार, देश में ७८ फीसदी आबादी २० रूपये से कम के उपभोग पर गुजारे के लिए मजबूर है.

यही नहीं, पिछले साल अक्टूबर में जब योजना आयोग ने ग्रामीण इलाके में २६ रूपये और शहरी इलाके में ३२ रूपये प्रतिदिन से अधिक खर्च करनेवालों को गरीबी रेखा से बाहर कर दिया था तो देश में भारी हंगामा मचा था लेकिन सुप्रीम कोर्ट में इस साल दाखिल संशोधित हलफनामे में योजना आयोग ने इसे और घटाकर ग्रामीण इलाके में २२.४२ रूपये और शहरी इलाके में २८.३५ रूपये प्रतिदिन से अधिक खर्च करनेवालों को गरीबी रेखा से बाहर कर दिया है.
कहने की जरूरत नहीं है कि यह गरीबी रेखा नहीं बल्कि भूखमरी रेखा है. साफ़ है कि आंकड़ों में गरीबी घटाई जा रही है लेकिन सच्चाई यह है कि इन दो दशकों में आर्थिक सुधारों और तेज आर्थिक वृद्धि दर के बावजूद देश में गरीबों की वास्तविक संख्या में बढ़ोत्तरी हुई है.  
दूसरी ओर, देश में आबादी एक छोटे से हिस्से के पास आई समृद्धि ने भी सारे रिकार्ड तोड़ दिए हैं. ‘फ़ोर्ब्स’ पत्रिका के मुताबिक, देश में डालर अरबपतियों की संख्या ५५ तक पहुँच चुकी है. डालर अरबपतियों की कुल संख्या के मामले में भारत दुनिया के तमाम देशों में अमेरिका, रूस और चीन के बाद चौथे स्थान पर है.

यही नहीं, केपजेमिनी और रायल बैंक आफ कनाडा की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में डालर लखपतियों (दस लाख डालर या ५.६ करोड़ रूपये से अधिक संपत्ति) की संख्या पिछले साल १.२५ लाख थी. हालाँकि यह संख्या वास्तविकता से काफी कम है क्योंकि यह शेयर बाजार और आधिकारिक स्रोतों पर निर्भर है लेकिन इसके बावजूद डालर लखपतियों के मामले में भारत दुनिया के टाप देशों की सूची में है.

हैरानी की बात नहीं है कि देश के एक छोटे से हिस्से के उपभोग का स्तर दुनिया के टाप अमीरों से मुकाबला कर रहा है. यही कारण है कि दुनिया भर के सभी टाप लक्जरी ब्रांड्स और उनके उत्पाद देश के बड़े शहरों के शापिंग माल्स में उपलब्ध हैं. उनके लिए अब लन्दन, पेरिस या न्यूयार्क जाने की जरूरत नहीं है. बड़े शहरों की सड़कों पर दौड़ रही नई और मंहगी कारों और एस.यू.वी को देखकर यह कहना मुश्किल है कि भारत एक विकासशील देश है जहाँ एक तिहाई आबादी को भरपेट भोजन भी नसीब नहीं है.
लेकिन भारतीय अरबपतियों और अमीरों का उपभोग अश्लीलता की हदें भी पार करता जा रहा है. डालर अरबपतियों में से एक मुकेश अम्बानी ने मुंबई में एक अरब डालर यानी ५४०० करोड़ रूपये का २७ मंजिला घर बनवाया है. यही नहीं, उन्होंने अपनी पत्नी को २५० करोड़ रूपये का निजी हवाई जहाज उपहार में दिया जबकि छोटे भाई अनिल अम्बानी ने अपनी पत्नी टीना अम्बानी को ४०० करोड़ रूपये की लक्जरी नौका उपहार में दी है.
विजय माल्या के किस्से सबको पता हैं. जाहिर हैं कि ये अपवाद नहीं हैं. ऐसे अमीरों की संख्या बढ़ती जा रही है. लेकिन दूसरी ओर ऐसे भारतीयों की संख्या भी बढ़ती जा रही है जिनकी बुनियादी जरूरतें भी पूरी नहीं हो रही हैं. एक तिहाई से अधिक भारतीय भूखमरी के शिकार हैं. पांच वर्ष से कम उम्र के ४१ फीसदी बच्चे कुपोषण के शिकार हैं जिसका मतलब है कि वे कभी भी स्वस्थ-कामकाजी जीवन नहीं जी पायेंगे. मातृ मृत्यु और शिशु मृत्यु दर के मामले में भारत का रिकार्ड कई पडोसी देशों से भी बदतर है.

आश्चर्य नहीं कि तेज विकास दर और समृद्धि की बरसात के बावजूद भारत वर्ष २०११ में मानव विकास के मामले में संयुक्त राष्ट्र मानव विकास रिपोर्ट में दुनिया के १८७ देशों में १३४ वें स्थान पर था जबकि उसके पहले २०१० में भारत १६९ देशों की सूची में ११९ वें स्थान पर था.

इस मायने में नव उदारवादी आर्थिक सुधारों ने भारत को सचमुच दो हिस्सों – इंडिया और भारत में बाँट दिया है. आर्थिक सुधारों का असली फायदा इंडिया और उसके मुट्ठी भर अमीरों, उच्च और मध्य वर्ग को मिला है जबकि इस ‘इंडिया’ के बेलगाम उपभोग की असली कीमत ८० फीसदी भारतीयों और देश के जल-जंगल-जमीन और प्राकृतिक संसाधनों को चुकानी पड़ रही है.
यह किसी से छुपा नहीं है कि इन दो दशकों में जब देश “तेजी से तरक्की कर रहा था”, वरिष्ठ पत्रकार पी. साईंनाथ के मुताबिक, सोलह वर्षों (१९९५-२०१०) में कोई २.५ लाख से ज्यादा किसान बढ़ते कृषि संकट के कारण आत्महत्या करने को मजबूर हुए. खासकर २००२ से २००६ के बीच औसतन हर साल १७५०० किसानों ने आत्महत्या की है.
जारी.....

मंगलवार, अक्टूबर 30, 2012

आर्थिक उदारीकरण के दो दशक और इस दौर की राजनीति

कारपोरेट पूंजी की चाकर बन गई है राजनीति

पहली क़िस्त

भ्रष्टाचार और घोटालों के बीच फंसी कांग्रेस के नेतृत्ववाली यू.पी.ए सरकार ने इसकी काट और खासकर बड़ी देशी-विदेशी पूंजी का समर्थन हासिल करने के लिए एक झटके में आर्थिक सुधारों को आगे बढानेवाले कई बड़े लेकिन अत्यंत विवादास्पद फैसलों की घोषणा कर दी है.
इनमें एक ओर खुदरा व्यापार को विदेशी पूंजी के लिए खोलने से लेकर बीमा और पेंशन क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफ.डी.आई) को बढ़ाने जैसे फैसले हैं तो दूसरी ओर, राजकोषीय घाटा कम करने के नामपर डीजल और रसोई गैस, उर्वरकों आदि की कीमतों में भारी वृद्धि का फैसला शामिल है.
कहने की जरूरत नहीं है कि इन फैसलों का कारपोरेट मीडिया में खूब स्वागत हुआ है. शेयर बाजार में बहुत दिनों बाद रौनक लौट आई है और बाजार बम-बम है. बड़ी देशी-विदेशी कंपनियों के सी.ई.ओ से लेकर फिक्की-एसोचैम-सी.आई.आई और मुद्रा कोष जैसे बड़े देशी-विदेशी औद्योगिक-वाणिज्यिक लाबी संगठन और वैश्विक संस्थाएं इन फैसलों का खुलकर स्वागत कर रही हैं.

कल तक जो लाबी संगठन और कारपोरेट मीडिया मनमोहन सिंह सरकार को आर्थिक सुधारों को आगे बढ़ा पाने में नाकाम रहने के लिए आड़े हाथों ले रहे थे और सरकार को ‘नीतिगत लकवे’ का शिकार बता रहे थे, उनका सुर रातों-रात बदल गया है. वे सरकार के साहस और दूरदृष्टि की प्रशंसा करते हुए अफसोस जाहिर कर रहे हैं कि ये फैसले काफी पहले ही हो जाने चाहिए थे.

हालाँकि इन फैसलों को ‘जनविरोधी और देश-हित’ के खिलाफ बताते हुए यू.पी.ए गठबंधन में शामिल तृणमूल कांग्रेस और डी.एम.के और उसे बाहर से समर्थन दे रहे समाजवादी पार्टी और बसपा से लेकर मुख्य विपक्षी दल भाजपा और वामपंथी मोर्चे तक ने विरोध किया है. तृणमूल कांग्रेस ने तो सरकार से समर्थन तक वापस ले लिया है.
लेकिन इनमें एक हद तक वामपंथियों के सैद्धांतिक विरोध को छोड़कर भाजपा समेत बाकी सभी पार्टियों का विरोध अवसरवादी और दिखावटी ज्यादा है. उदाहरण के लिए, भाजपा नव उदारवादी आर्थिक नीतियों की कट्टर समर्थक रही है और उसके नेतृत्ववाली एन.डी.ए सरकार के कार्यकाल में ही पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों को विनियंत्रित करके बाजार के हवाले करने से लेकर बीमा क्षेत्र में विदेशी पूंजी को इजाजत दी गई थी.
यहाँ तक कि २००४ के आम चुनावों से पहले एन.डी.ए सरकार खुदरा व्यापार को भी विदेशी पूंजी के लिए खोलने की तैयारी कर चुकी थी. आश्चर्य नहीं कि वह अब भी बीमा क्षेत्र में पूंजी निवेश बढ़ाने का आज भी समर्थन कर रही है.
जहाँ तक गैर भाजपा-गैर कांग्रेस दलों की बात है तो उनमें वामपंथी मोर्चे की पिछली राज्य सरकारों के राजनीतिक-वैचारिक स्खलनों को छोड़ दिया जाए तो वामपंथी मोर्चा नव उदारवादी आर्थिक सुधारों की सैद्धांतिक और राजनीतिक विरोधी रहा है लेकिन उसके अलावा बाकी सभी अन्य दलों की आर्थिक नीति अस्पष्ट, अवसरवादी और आमतौर पर आर्थिक सुधारों को आगे बढ़ानेवाली रही है.

ये पार्टियां जब भी राज्यों में या केन्द्र में सरकार में आईं हैं, उन्होंने नव उदारवादी आर्थिक सुधारों को आगे बढ़ाने में कोई कोर कसर नहीं उठा रखी है. यहाँ तक कि वाम मोर्चे की राज्य सरकारों ने भी वैचारिक विरोध के बावजूद वही सब किया जो दूसरी राज्य सरकारें कर रही थीं. पश्चिम बंगाल की पिछली वाम मोर्चे की सरकार ने तो सिंगुर और नंदीग्राम में किसानों की जमीन छीनने के लिए पुलिसिया दमन के भी रिकार्ड तोड़ दिए.

सच पूछिए तो पिछले डेढ़-दो दशकों में आर्थिक नीति के मामले में शासक वर्ग की राजनीतिक पार्टियों के बीच कोई फर्क नहीं बचा है. वे सभी नव उदारवादी आर्थिक सुधारों और उदारीकरण-निजीकरण-भूमंडलीकरण की समर्थक हैं. खासकर कांग्रेस और भाजपा के बीच तो यह साबित करने की होड़ रहती है कि उन दोनों में आर्थिक उदारीकरण का सबसे पक्का और सक्रिय समर्थक कौन है.
राष्ट्रीय राजनीति में इन दोनों दलों की अगुवाई में ही दो राजनीतिक गठबंधन- एन.डी.ए और यू.पी.ए हैं जो बारी-बारी से पिछले १४ सालों से सत्ता में हैं और अधिकांश क्षेत्रीय दल इन्हीं दोनों गठबंधनों में आना-जाना करते रहे हैं. दोहराने की जरूरत नहीं है कि इन डेढ़ दशकों में और उससे पहले संयुक्त मोर्चे की सरकार के दौरान भी सभी सरकारों ने आँख मूंदकर नव उदारवादी आर्थिक नीतियों को लागू किया.
उल्लेखनीय है कि नव उदारवादी आर्थिक सैद्धांतिकी का एक बहुत महत्वपूर्ण पहलू यह है कि वह अर्थनीति को राजनीति से अलग रखने की वकालत करती है. वह साफ़ तौर पर वकालत करती है कि राजनीति को अर्थनीति में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए और अर्थनीति को स्वतंत्रता से काम करने देना चाहिए.

असल में, नव उदारवादी आर्थिक सैद्धांतिकी में बाजार की सर्वोच्चता को स्वीकार किया गया है और माना जाता है कि राज्य को बाजार में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए यानी राजनीति को अर्थनीति से दूर रहना चाहिए. इसे सुनिश्चित करने के लिए अर्थव्यवस्था में राज्य की भूमिका लगातार सीमित करने की कोशिश की गई है और बाजार को अधिक से अधिक छूट दी गई है.

भारत में भी आर्थिक उदारीकरण और सुधारों की प्रक्रिया के मूल में यही सैद्धांतिकी है. यही कारण है कि सरकार चाहे जिस भी पार्टी या गठबंधन, झंडे और रंग की हो लेकिन उसकी अर्थनीति में कोई बदलाव नहीं आता. अलबत्ता उसकी भाषा में कुछ दिखावटी बदलाव जरूर दिखाई देते हैं लेकिन बुनियादी तौर पर उसमें कोई अंतर नहीं है.
यही नहीं, इस दौर में नव उदारवादी अर्थनीति के मुताबिक आर्थिक सुधारों को आगे बढ़ानेवाले फैसलों और नीति-निर्णयों में बाजार और बड़ी पूंजी का पूरी तरह से नियंत्रण हो गया है. चाहे वह प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद हो या योजना आयोग या विभिन्न मुद्दों पर गठित समितियां- आप हर महत्वपूर्ण नीति निर्माण और निर्णय की जगह पर नव उदारवादी अर्थशास्त्रियों, बड़े कारपोरेट समूहों के प्रमुखों/मालिकों को बैठे देख सकते हैं.
इसके अलावा विश्व बैंक-मुद्रा कोष और डब्ल्यू.टी.ओ के रूप में वैश्विक आवारा पूंजी की प्रतिनिधि संस्थाएं हैं जो हर महत्वपूर्ण मुद्दे पर सरकारों को सलाह/निर्देश देती रहती हैं. अर्थनीति निर्माण और नीति-निर्णयों में उनकी जबरदस्त घुसपैठ है.

आश्चर्य की बात नहीं है कि पिछले दो दशकों में देश के प्रधानमंत्रियों, वित्त मंत्रियों, वित्त मंत्रियों के आर्थिक सलाहकारों और योजना आयोग के उपाध्यक्षों में से कई विश्व बैंक या मुद्रा कोष के पूर्व मुलाजिम रहे हैं. इन सबने मिलकर अर्थनीति को राजनीति से अलग और स्वतंत्र करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है.
यही नहीं, नव उदारवादी अर्थनीति के दबदबे के कारण अर्थनीति में आए दक्षिणपंथी झुकाव का असर राजनीति पर भी दिखने लगा है और भारतीय राजनीति में भी इस दक्षिणपंथी झुकाव को साफ़ देखा जा सकता है.

मार्क्स ने कभी कहा था कि ‘राजनीति, अर्थतंत्र का संकेंद्रित रूप है.’ इस अर्थ में उदारीकरण और भूमंडलीकरण के पिछले दो दशकों में अर्थव्यवस्था के साथ-साथ भारतीय राजनीति का भी ‘चाल, चरित्र और चेहरा’ काफी हद तक बदल गया है. यह बदलाव सिर्फ नेताओं, पार्टियों और मुद्दों के स्तर पर ही नहीं बल्कि भारतीय राजनीति के चरित्र और अंतर्वस्तु के मामले भी साफ देखा जा सकता है.
भारतीय राजनीति में सबसे बड़ा बदलाव यह आया है कि भारतीय अर्थव्यवस्था पर जैसे-जैसे देशी-विदेशी बड़ी पूंजी का नियंत्रण बढ़ता गया है, तेज रफ़्तार से बढ़ती अर्थव्यवस्था से निकलनेवाली समृद्धि मुट्ठी भर लोगों के हाथ में सिमटती गई है और पहले से हाशिए पर पड़े वर्गों जैसे गरीबों, किसानों, आदिवासियों और दलितों को और हाशिए पर धकेल दिया गया है, वैसे-वैसे राजनीति पर भी अमीरों का दबदबा बढ़ता गया है और उसके साथ राजनीति की मुख्यधारा से गरीब और कमजोर वर्ग और उनके मुद्दे बाहर होते गए हैं.
(लखनऊ से सुभाष राय और हरे प्रकाश उपाध्याय के संपादन में प्रकाशित 'समकालीन सरोकार' के नवम्बर अंक में प्रकाशित हो रहे लम्बे लेख की पहली क़िस्त...कल दूसरी क़िस्त और विस्तार से आप उस पत्रिका में पढ़ें)