शनिवार, फ़रवरी 26, 2011

अर्थव्यवस्था को लेकर खुशफहमी और निश्चिन्तता का माहौल

लेकिन यह समय सावधानी और सतर्कता का है क्योंकि सावधानी हटी नहीं कि दुर्घटना घटी


कुछ वर्षों पहले की बात है. मेक्सिको के राष्ट्रपति अमेरिका की यात्रा पर पहुंचे जहां पत्रकारों ने उनसे पूछा कि उनके देश की अर्थव्यवस्था का क्या हाल है? राष्ट्रपति ने तुर्शी के साथ जवाब दिया कि अर्थव्यवस्था का हाल तो अच्छा है लेकिन लोगों का नहीं. भारतीय अर्थव्यवस्था के सन्दर्भ में भी यह बात काफी हद तक सच है.

यह और बात है कि भारत में सरकार के आला नुमाइंदे इसे आसानी से स्वीकार नहीं करते. खासकर जबसे जी.डी.पी की वृद्धि दर अर्थव्यवस्था के अच्छे या बुरे प्रदर्शन का सबसे बड़ा पैमाना बन गई है और अर्थव्यवस्था के मैनेजरों का जी.डी.पी प्रेम आब्शेसन की हद तक पहुंच गया है. कहने की जरूरत नहीं है कि चालू वित्तीय वर्ष में ८.६ प्रतिशत की वृद्धि दर के बाद हर ओर अर्थव्यवस्था के अच्छे प्रदर्शन का कोरस जारी है.

असल में, इन दिनों भारतीय अर्थव्यवस्था एक ऐसी पहेली बनी हुई है जिसे समझना अच्छे-अच्छों के लिए टेढ़ी खीर बना हुआ है. अगर आप आम आदमी हैं और पिछले दो सालों से लगातार भारी महंगाई की मार से कराह रहे हैं तो यह संभव है कि आप यू.पी.ए सरकार के अर्थव्यवस्था प्रबंधन को कोस रहे हों.

लेकिन अगर आप अर्थशास्त्री या अर्थव्यवस्था के मैनेजरों में हैं तो आपके लिए यह अर्थव्यवस्था का स्वर्ण काल चल रहा है. प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के मुताबिक, चालू वित्तीय वर्ष में अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर ८.६ प्रतिशत रहने की उम्मीद है और अगले वित्तीय वर्ष में इसके ९ प्रतिशत तक पहुंच जाने की सम्भावना है.

खुद प्रधानमंत्री की मानें तो कुछ बाहरी चुनौतियों और समस्याओं के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था बहुत अच्छा प्रदर्शन कर रही है. हाल में न्यूज चैनलों के संपादकों से बातचीत के दौरान उन्होंने मुद्रास्फीति की ऊँची दर के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था के अच्छे प्रदर्शन का बहुत गर्व के साथ उल्लेख किया.

कहने की जरूरत नहीं है कि प्रधानमंत्री से लेकर सरकार के आर्थिक मैनेजरों तक सभी अर्थव्यवस्था के बेहतर प्रदर्शन से न सिर्फ संतुष्ट हैं बल्कि यह मानते हैं कि मुद्रास्फीति की समस्या को छोड़ दिया जाए तो २००७-०८ की वैश्विक मंदी से लडखडाई अर्थव्यवस्था अब पटरी पर आ चुकी है. विश्व बैंक भी इस आकलन से सहमत है.

सच तो यह है कि जी.डी.पी की ८.६ फीसदी की वृद्धि दर से आर्थिक मैनेजरों का आत्मविश्वास इस हद तक बढ़ा हुआ है कि वे १० फीसदी की वृद्धि दर के सपने देखने लगे हैं. एक बार फिर से चीन से प्रतियोगिता और दोहरे अंकों की आर्थिक वृद्धि दर की चर्चाएं शुरू हो गई हैं. यही नहीं, वे वित्त मंत्री से अगले बजट में उन स्टिमुलस उपायों को वापस लेने की सलाह दे रहे हैं जो वैश्विक मंदी से लड़ने के लिए दो-ढाई साल पहले घोषित किए गए थे. साफ है कि सरकार में अर्थव्यवस्था को लेकर एक निश्चिन्तता का माहौल है.

वित्त मंत्री की निश्चिन्तता की वजह यह भी है कि चालू वित्तीय वर्ष में राजकोषीय घाटा बजट अनुमान से कम रहने का अनुमान है. राजस्व वसूली में उल्लेखनीय वृद्धि, थ्री-जी स्पेक्ट्रम की बिक्री से भारी आय और जी.डी.पी में उछाल के कारण उम्मीद है कि इस साल राजकोषीय घाटा जी.डी.पी के ५.५ प्रतिशत के बजट अनुमान के बजाय ५.२ प्रतिशत रहेगा.

यही नहीं, निर्यात में भी उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है. चालू खाते के घाटे में वृद्धि के बावजूद विदेशी मुद्रा के पर्याप्त भंडार के कारण कोई घबराहट नहीं है. यहां तक कि मुद्रास्फीति को लेकर चिंताएं जाहिर करने के बावजूद आर्थिक मैनेजरों को भरोसा है कि मुद्रास्फीति की दर मार्च तक न सिर्फ ७ प्रतिशत के नीचे आ जायेगी बल्कि रबी की अच्छी फसल के बाद खाद्य मुद्रास्फीति भी काबू में आ जायेगी.

लेकिन यह अर्थव्यवस्था को लेकर एक तरह की खुशफहमी है. कई बार इस तरह की खुशफहमी का माहौल जानबूझकर बनाया जाता है. कारण कि इस फीलगुड से अर्थव्यवस्था में निवेशकों का भरोसा बढ़ता है, वे उत्साहित होते हैं, निवेश में वृद्धि होती है और इससे अर्थव्यवस्था को गति मिलती है.

यही नहीं, इस नव उदारवादी अर्थव्यवस्था के अच्छे प्रदर्शन का एक और सूचकांक- शेयर बाजार तो पूरी तरह से फीलगुड और भावनाओं पर ही चलता है. असल में, नव उदारवादी अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी खूबी यह है कि वह फीलगुड और सेंटीमेंट्स पर ज्यादा चलती है क्योंकि उसमें सट्टेबाजी की भूमिका बहुत बढ़ गई है.

लेकिन अर्थव्यवस्था को लेकर यह खुशफहमी और आत्मविश्वास जो अति आत्मविश्वास में बदलता जा रहा है, न सिर्फ आम आदमी पर बहुत भारी पड़ रही है बल्कि अर्थव्यवस्था के लिए भी घातक साबित हो सकती है. दोहराने की जरूरत नहीं है कि महंगाई खासकर खाद्य वस्तुओं की महंगाई अभी भी बेकाबू है और लगता नहीं है कि यू.पी.ए सरकार इसे काबू करने की कोशिश भी कर रही है.

उसने यह जिम्मा रिजर्व बैंक को सौंप दिया है. उसकी दिलचस्पी सिर्फ मुद्रास्फीति के आंकड़ों में है और वह आंकड़ों में महंगाई कम करने की कसरत जरूर कर रही है. लेकिन आंकड़ों में कम होती महंगाई, उंचे बेस प्रभाव के कारण है और वास्तव में, महंगाई कम नहीं हो रही है. उल्टे, विश्व खाद्य संगठन से लेकर विश्व बैंक तक खाद्य वस्तुओं की कीमतों में और बढ़ोत्तरी की चेतावनी दे रहे हैं.

इसलिए महंगाई को लेकर सरकार का मौजूदा निश्चिन्तता का रवैया आम आदमी के साथ-साथ राजनीतिक और आर्थिक रूप से उसे भी भारी पड़ सकता है. दूसरे, सरकार अर्थव्यवस्था के अच्छे प्रदर्शन के अति-आत्मविश्वास में स्टिमुलस पैकेज को वापस लेने और आर्थिक सुधारों की प्रक्रिया को तेज करने की तैयारी कर रही है.

उदाहरण के लिए, ऐसी चर्चा है कि वित्त मंत्री बजट में उत्पाद करों में दो फीसदी की छूट को वापस ले सकते हैं. साथ ही, डीजल की कीमतों को भी नियंत्रण मुक्त किए जाने के कयास लगाये जा रहे हैं. लेकिन ये दोनों फैसले महंगाई की आग में घी डालने की तरह साबित हो सकते हैं.

इसके अलावा, वित्त मंत्री ने इसी अति-आत्मविश्वास में अगर राजकोषीय घाटे को एक सीमा से ज्यादा कम करने के लिए स्टिमुलस को पूरी तरह से वापस लेने और योजना बजट में कटौती पर जोर दिया तो इसका नकारात्मक असर न सिर्फ विभिन्न विकास और कल्याणकारी योजनाओं पर पड़ेगा बल्कि वृद्धि दर भी प्रभावित हो सकती है.

उल्लेखनीय है कि अर्थव्यवस्था की मौजूदा उच्च वृद्धि दर और बेहतर प्रदर्शन की एक बड़ी वजह यह स्टिमुलस और सामाजिक कल्याण की योजनाओं पर बढ़ा व्यय और उसके कारण बढनेवाला राजकोषीय घाटा भी है. यह इसलिए भी जरूरी है कि अर्थव्यवस्था के अच्छे प्रदर्शन का लाभ आम आदमी को नहीं मिल पा रहा है.

इसके अलावा, वित्त मंत्री को यह नहीं भूलना चाहिए कि वैश्विक अर्थव्यवस्था के साथ जुड़ी अनिश्चिन्तताएं अभी भी खत्म नहीं हुई हैं. ऐसे हालात में, सावधानी हटी नहीं कि दुर्घटना घटी. कहने की जरूरत नहीं है कि अर्थव्यवस्था के लिहाज से यह समय खुशफहमी और निश्चिन्तता का नहीं बल्कि सावधानी और सतर्कता का है.


('राष्ट्रीय सहारा' के हस्तक्षेप में २६ फरवरी को प्रकाशित)

शुक्रवार, फ़रवरी 25, 2011

खाद्य सुरक्षा का मजाक बनाने पर तुली है सरकार

खाद्य सुरक्षा की राह में कौन अटका रहा है रोड़े




खाद्य सुरक्षा विधेयक के मसौदे पर यू.पी.ए सरकार और एन.ए.सी के बीच खींचतान जारी है. इस सिलसिले में सबसे ताजा उदाहरण यह है कि एन.ए.सी द्वारा सरकार को भेजे गए खाद्य सुरक्षा विधेयक के मसौदे की जांच कर रही समिति के मुखिया और प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के अध्यक्ष सी. रंगराजन ने साफ तौर पर कह दिया है कि एन.ए.सी का प्रस्ताव अव्यावहारिक है और इसे लागू करना संभव नहीं है.

कहने को रंगराजन समिति के इस निष्कर्ष से ‘हैरान’ एन.ए.सी अब अपना जवाब तैयार करने में लगी है लेकिन उसके रक्षात्मक रवैये से साफ है कि वह अब पीछे हटने और सरकार की चिंताओं को भी ध्यान में रखने के नामपर लीपापोती की तैयारी कर रही है.

साफ है कि खाद्य सुरक्षा के प्रावधानों को हल्का और सीमित करने की जमीन तैयार की जा रही है. रंगराजन समिति की रिपोर्ट से साफ है कि सरकार एन.ए.सी द्वारा खाद्य सुरक्षा को लेकर सुझाये गए सीमित प्रस्तावों को भी मानने के लिए तैयार नहीं है. जबकि एन.ए.सी ने पहले ही खाद्य सुरक्षा विधेयक के मसौदे को सरकार के मंत्रियों और अफसरों से चर्चा के बाद काफी हल्का और सीमित कर दिया है. इसके बावजूद रंगराजन समिति ने जिन आधारों पर उसके प्रस्ताव को ख़ारिज किया है, उससे स्पष्ट है कि उसने एन.ए.सी की लंबी-चौड़ी कसरत और सीमित प्रस्ताव को भी कोई खास भाव नहीं दिया.

यही कारण है कि एन.ए.सी के एक महत्वपूर्ण सदस्य ज्यां द्रेज को सार्वजनिक तौर पर स्वीकार किया है कि एन.ए.सी अब नेशनल एडवाइजरी काउन्सिल नहीं बल्कि नोशनल यानी दिखावटी एडवाइजरी काउन्सिल बनती जा रही है. उल्लेखनीय है कि एन.ए.सी ने खाद्य सुरक्षा के मुद्दे पर सबसे पहले भोजन के अधिकार को एक सार्वभौम कानूनी अधिकार बनाने की घोषणा से शुरुआत की थी लेकिन इस सवाल पर खुद एन.ए.सी के अंदर और बाहर सरकार के प्रतिनिधियों के साथ मतभेद होने के कारण पीछे हटते हुए उसने बीच का एक प्रस्ताव तैयार किया जिसमें देश की कुल ७५ फीसदी आबादी को सीमित खाद्य सुरक्षा मुहैया कराने का प्रावधान किया था.

इस प्रस्ताव में भी एन.ए.सी ने इस कानून के तहत खाद्य सुरक्षा के लाभार्थियों को दो समूहों में बाँट दिया था. पहले समूह को प्राथमिक समूह कहा गया जिसमें ग्रामीण क्षेत्रों की ४६ प्रतिशत और शहरी क्षेत्रों की २८ प्रतिशत आबादी शामिल करने का प्रस्ताव था जिन्हें हर महीने तीन रूपये किलो चावल, दो रूपये किलो गेहूं और एक रूपये किलो मोटा अनाज के भाव से ३५ किलोग्राम खाद्यान्न देने का प्रावधान किया गया था. दूसरी ओर, सामान्य समूह में ग्रामीण क्षेत्रों से ४४ फीसदी और शहरी क्षेत्रों से २२ फीसदी आबादी को हर महीने खाद्यान्नों के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एम.एस.पी) की आधी कीमत पर २० किलोग्राम खाद्यान्न देने का प्रस्ताव किया गया था.

कहने की जरूरत नहीं है कि एन.ए.सी का यह प्रस्ताव भी उम्मीदों से काफी कम और बहुत सीमित था. प्राथमिक और सामान्य समूह का विभाजन काफी हद तक मौजूदा गरीबी रेखा के नीचे (बी.पी.एल) और ऊपर (ए.पी.एल) के विभाजन की लाइन पर ही था. यहां तक कि योजना आयोग तेंदुलकर समिति की रिपोर्ट के बाद बी.पी.एल परिवारों की संख्या में १० से १५ फीसदी तक बढ़ोत्तरी करने पर राजी हो गया था.

इसी तरह, सामान्य समूह को ऊँची कीमत पर और वह भी सिर्फ २० किलोग्राम अनाज देने का प्रस्ताव खाद्य सुरक्षा का मजाक उड़ने जैसा ही था. लेकिन एन.ए.सी के इस सीमित और आधा-अधूरे प्रस्ताव का उससे भी बड़ा मजाक यू.पी.ए सरकार द्वारा नियुक्त रंगराजन समिति ने उड़ाया है.

रंगराजन समिति का कहना है कि यह प्रस्ताव लागू करना संभव नहीं है क्योंकि लाभार्थियों को कानूनी अधिकार देने के लिए जरूरी अनाज उपलब्ध नहीं है. समिति के मुताबिक, इस अधिकार को एन.ए.सी के सुझावों के अनुसार लागू करने के लिए २०१४ में ७.४ करोड़ टन अनाज की जरूरत होगी जबकि खादयान्नों की पैदावार और खरीद के मौजूदा ट्रेंड के आधार पर सरकार के पास अधिकतम ५.७६ करोड़ टन अनाज ही उपलब्ध होगा.

समिति का यह भी तर्क है कि भोजन का कानूनी अधिकार देने के बाद सरकार को अपना वायदा हर हाल में यहां तक कि लगातार दो सालों तक सूखा पड़ने की स्थिति में भी पूरा करने में सक्षम होना चाहिए. समिति के अनुसार, मौजूदा परिस्थितियों में आयात के जरिये इस कानूनी वायदे को पूरा करना संभव नहीं है.

समिति का यह भी कहना है कि इस वायदे को पूरा करने के लिए सरकार द्वारा भारी मात्रा में अनाज की खरीद से खुले बाजार में अनाजों की कीमतें बढ़ जाएंगी. इन तर्कों के आधार पर रंगराजन समिति का सुझाव है कि खाद्य सुरक्षा का कानूनी अधिकार सिर्फ ग्रामीण क्षेत्रों की ४६ फीसदी और शहरी इलाकों की २८ फीसदी आबादी को दिया जाए जो कि एन.ए.सी के कथित प्राथमिक समूह के करीब है.

दोहराने की जरूरत नहीं है कि भोजन के अधिकार के सीमित और आधे-अधूरे प्रस्ताव पर भी रंगराजन समिति के तर्कों में नया कुछ भी नहीं है. इस तरह की राय नव उदारवादी आर्थिक सुधार के समर्थक और पैरोकार बहुत पहले से व्यक्त करते रहे हैं. वे भोजन के सार्वभौम अधिकार के विरोध को जायज ठहराने के लिए जानबूझकर अनाज और इस कारण सब्सिडी की मांग को इतना अधिक बढ़ा-चढाकर दिखाते रहे हैं कि वह असंभव दिखने लगे.

जबकि सच्चाई यह है कि न सिर्फ देश में अनाज की कोई कमी नहीं है बल्कि सरकार चाहे तो इस अधिकार को लागू करने के लिए जरूरी अनाज खरीद सकती है. इसके लिए उसे सिर्फ अनाज खरीद के मौजूदा दायरे को और बढ़ाना होगा. इससे न सिर्फ किसानों को बिचौलियों से निजात मिलेगी बल्कि उनकी फसलों की उचित कीमत भी मिल पायेगी. इससे किसानों को पैदावार बढ़ाने का प्रोत्साहन भी मिलेगा.

दूसरे, सरकार के बड़े पैमाने पर अनाज खरीदने से कीमतें बढ़ने की आशंका इसलिए बेमानी है क्योंकि अनाज खरीदकर अगर उसे लोगों तक पहुँचाया गया तो कीमतें बढेंगी नहीं, उल्टे उनपर लगाम लगेगी. कीमतें तब बढ़ती हैं जब सरकार अनाज दबाकर बैठ जाती है जैसीकि जमाखोरी उसने अभी कर रखी है.

साफ है कि सरकार की मंशा वास्तविक और व्यापक खाद्य सुरक्षा कानून लागू करने की नहीं है. वह अधिक से अधिक थोड़े-बहुत फेरबदल के साथ मौजूदा प्रावधानों को ही खाद्य सुरक्षा के नामपर थोपना चाहती है.

('समकालीन जनमत' के फरवरी अंक में प्रकाशित)

मंगलवार, फ़रवरी 22, 2011

क्रिकेट मैनिया

 प्रधानमंत्री चाहें तो चैन की नींद सो सकते हैं


विश्व कप क्रिकेट का तमाशा शुरू हो चुका हैं. चैनल और अखबार क्रिकेटमय हो चुके हैं. कहने की जरूरत नहीं है कि अगले दो महीनों तक मीडिया में सिर्फ क्रिकेट होगा और कुछ नहीं. वैसे कुछ दिलजलों का कहना है कि विश्व कप के तुरंत बाद उससे भी बड़ा तमाशा आई.पी.एल शुरू हो जायेगा. मतलब यह कि अगले चार महीनों तक चैनल एक मैनिया की तरह क्रिकेट ओढ़-बिछा-पका-खा और परोस रहे होंगे.

इसके संकेत अभी से मिलने लगे हैं. सभी समाचार चैनलों और खासकर हिंदी समाचार चैनलों और अख़बारों में विश्व कप क्रिकेट की कवरेज छाने लगी है. चैनलों पर इस शुरूआती कवरेज से साफ है कि उन्होंने इसके लिए जबरदस्त तैयारी की है. सभी एक से एक नायाब आइडिया के साथ दर्शकों को खींचने, प्रतिस्पर्धी चैनल को पछाड़ने और अपनी टी.आर.पी बढ़ाने की होड़ में जुटे हुए हैं. ऐसा लगता है कि जैसे चैनलों के बीच भी एक विश्व कप हो रहा है.

चैनलों के इस विश्व कप में जीत के लिए चैनल वह हर फार्मूला और तिकडम आजमा रहे हैं जिससे वह दर्शकों गुड़ की मक्खी की तरह अपनी ओर खींच और खुद से चिपका सकें. आखिर सवाल टी.आर.पी का है?

असल में, समाचार चैनलों की मुश्किल यह है कि विश्व कप के दौरान असली क्रिकेट एक्शन तो ई.एस.पी.एन-स्टार स्पोर्ट्स और दूरदर्शन पर होगा. जाहिर है कि सबसे ज्यादा दर्शक भी वहीँ होंगे. साफ है कि समाचार चैनलों को दर्शकों के लिए खेल चैनलों से लड़ना पड़ेगा. यह आसान लड़ाई नहीं है.

कहा जाता है कि जैसे प्यार और जंग में सब कुछ जायज है, वैसे ही चैनलों की लड़ाई में भी सब कुछ जायज है. नतीजा, इस लड़ाई में समाचार चैनल हर दांव आजमा रहे हैं. अगर एक्शन और उत्तेजना खेल चैनलों पर है तो समाचार चैनलों पर भी कम ड्रामा नहीं है.

वैसे भी ड्रामा रचने में समाचार चैनलों का कोई जवाब नहीं है. इस ड्रामे की खास बात यह है कि यह क्रिकेट राष्ट्रवाद से सना-पगा हुआ है. हमेशा की तरह से समाचार चैनल एक बार फिर क्रिकेट राष्ट्रवाद को जगाने में लग गए हैं. यह उनका सबसे बड़ा दांव है.

आश्चर्य नहीं कि समाचार चैनलों पर भारत की जीत की संभावनाओं को लेकर जोरशोर से हवा बनाई जाने लगी है. हवा बनानेवाली भाषा खेल की कम और युद्ध की अधिक लगती है. १९८३ की जीत को याद किया जा रहा है. चैनलों पर ‘सचिन को विश्व कप का तोहफा, सहवाग का तूफान, युसूफ पठान का कोहराम, धोनी का धमाका, युवराज का जादू, भज्जी की फिरकी, जहीर का जलवा’ जैसी रिपोर्टों और आधे-आधे घंटे के कार्यक्रमों की बाढ़ सी आ गई है.

इनमें भारतीय टीम के सभी खिलाडियों का खूब गुणगान किया जा रहा है. पूर्व क्रिकेट खिलाड़ी चैनलों पर एक्सपर्ट बनकर बैठे हुए हैं और वे भी इस ड्रामे में और उत्तेजना भरने की कोशिश कर रहे हैं. इन रिपोर्टों, विश्लेषणों और कार्यक्रमों को देखकर ऐसा लगता है कि जैसे विश्व कप सिर्फ एक औपचारिकता भर है और कप तो भारतीय टीम को ही जीतना है. गरज यह कि चैनलों की यह क्रिकेट देशभक्ति पूरे शबाब पर है.

लेकिन इस क्रिकेट राष्ट्रवाद का दबाव भारतीय टीम महसूस करने लगी है. चैनलों और पूरे भारतीय मीडिया ने टीम पर अपेक्षाओं का ऐसा दबाव पैदा कर दिया है कि खिलाडियों के लिए स्वाभाविक होकर खेलना संभव नहीं रह गया है. इसकी वजह यह है कि यह भारतीय टीम के खिलाडियों को भी पता है कि जो मीडिया और चैनल आज उनके गुणगान में जमीन-आसमान एक किए हुए हैं, उनकी एक भी नाकामी उन्हें ‘मैच का मुजरिम’ बनाने में देर नहीं लगायेगी.

समाचार चैनलों पर फैसला बिल्कुल लाइव होता है. इधर टीम के विकेट गिर रहे होंगे, उधर चैनल पर ब्रेकिंग न्यूज चल रहा होगा : ‘मेमने बन गए शेर, पिद्दी साबित हुए धोनी के रणबांकुरे’ आदि-आदि. इस मायने में चैनलों का सचमुच कोई जवाब नहीं है. वे टीम की जीत और हार में कोई फर्क नहीं करते हैं. टीम जीत गई तो बल्ले-बल्ले, स्टूडियो में ही भांगड़ा शुरू कर देंगे और हार गई तो खाल खींचने और सूली पर लटकाने में देर नहीं करेंगे. किसी को आसमान में चढ़ाना और फिर जमीन पर पटकना कोई चैनलों से सीखे.

मतलब यह कि चैनलों को इससे कोई खास मतलब नहीं है कि भारतीय टीम जीतती है या हारती है. उन्हें तो जीत और हार दोनों से टी.आर.पी बटोरनी है. इसके लिए जीत और हार दोनों में दर्शकों की भावनाओं को भडकाना जरूरी है. भावनाओं में बहुत मुनाफा है. चैनलों के लिए मुनाफे का खेल सबसे बड़ा खेल है. वे इस खेल में पारंगत हो गए हैं. यह और बात है कि इस खेल की कीमत खेल, खिलाड़ी, टीम, दर्शक और देश सभी चुका रहे हैं.

कहने की जरूरत नहीं है कि क्रिकेट सिर्फ एक खेल नहीं रह गया है. यह अब खेल से ज्यादा एक विशाल उद्योग और कारोबार बन गया है. इसमें अरबों रूपये दांव पर लगे हुए हैं. चैनल भी इस कारोबार के हिस्सेदार हैं. जाहिर है कि जब खेल, खेल नहीं रहा तो खिलाड़ी भी कारोबारी अधिक हो गए हैं.

लेकिन इस खेल की सबसे बड़ी कीमत तो दर्शकों और देश को चुकानी पड़ेगी क्योंकि अगले चार महीनों तक देश-समाज के सभी मुद्दे और सवाल नेपथ्य में धकेल दिए जाएंगे. प्राइम टाइम पर भ्रष्टाचार, महंगाई और कुशासन का शोर नहीं होगा.

प्रधानमंत्री चाहें तो अगले चार महीनों तक चैन की नींद सो सकते हैं.

('तहलका' के २८ फरवरी'११ अंक में प्रकाशित : http://www.tehelkahindi.com/stambh/diggajdeergha/forum/826.html

गुरुवार, फ़रवरी 17, 2011

वनाधिकार कानून को अंगूठा


वनाधिकार कानून का मजाक उड़ाने पर तुली हुई है यू.पी.ए सरकार


हालांकि वनाधिकार कानून को लागू हुए चार साल से अधिक का समय गुजर गया है लेकिन जमीन पर इस कानून का कहीं अता-पता नहीं है. हालत कितनी गंभीर है, इसका अंदाज़ा सिर्फ इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि अभी तक ११ राज्यों ने इस कानून को लागू नहीं किया है. यही नहीं, जिन राज्यों में यह कानून लागू भी किया गया है, वहां भी इसका लाभ जंगलवासियों और आदिवासियों को नहीं मिल रहा है. वास्तव में, ऐसा लगता ही नहीं है कि जंगलों पर आदिवासियों का अधिकार सुनिश्चित करनेवाला कोई कानून भी पास हुआ है.

यहां तक कि खुद केन्द्र सरकार के आदिवासी मामलों के मंत्रालय और वन और पर्यावरण मंत्रालय द्वारा एन.सी. सक्सेना की अध्यक्षता में गठित एक संयुक्त समिति ने स्वीकार किया है कि वनाधिकार कानून को ठीक तरीके से लागू नहीं किया गया है. समिति के अनुसार, इस कानून का मुख्य उद्देश्य जंगलों के देखभाल में सामुदायिक भागीदारी को बढ़ाना था लेकिन जंगल के संसाधनों के सामुदायिक प्रबंधन की दिशा में पहल न के बराबर हुई है.

सक्सेना समिति के मुताबिक, इस कानून के तहत आदिवासी मामलों के मंत्रालय ने जिन २९ लाख दावों का निपटारा किया है, उनमें से सिर्फ १.६ प्रतिशत मामलों में सामुदायिक अधिकार को मान्यता दी है है. उसमें भी जंगल से निकलनेवाले उत्पादों पर अधिकार शामिल नहीं है.

यही नहीं, इस समिति ने यह भी पाया कि अधिकांश राज्यों में जंगल की भूमि पर आदिवासियों और जंगलवासियों के व्यक्तिगत अधिकार और रिहाइश के अधिकार के दावों के नामंजूर कर दिया जाता है. इस कानून के तहत जंगलों के संसाधनों जैसे वनोत्पादों, तालाबों और चरागाहों पर सामुदायिक अधिकार को भी मान्यता नहीं दी जा रही है.

कहने की जरूरत नहीं है कि इस कानून को लागू करने में आदिवासी मामलों के मंत्रालय के ढीले-ढाले रवैये के अलावा वन और पर्यावरण मंत्रालय का नकारात्मक रवैया भी काफी हद तक जिम्मेदार है. असल में, कानून बन जाने के बावजूद इन मंत्रालयों और उनके अफसरों की मानसिकता अभी भी बदली नहीं है.

इसके अलावा, जिला प्रशासन, पुलिस विभाग, वन विभाग के अफसरों, ठेकेदारों और माफियाओं का गठजोड़ भी जंगलों पर से अपने कब्जे और लूट को छोड़ने के लिए तैयार नहीं है. ये निहित स्वार्थी तत्व हरगिज नहीं चाहते हैं कि जंगलों के प्रबंधन में आदिवासियों को शामिल किया जाए और न ही वह आसानी से जंगलों के संसाधनों को आदिवासियों को सौपने के लिए तैयार है.

जाहिर है कि उन्हें राज्य सरकारों का भी पूरा संरक्षण भी हासिल है. राज्य सरकारें राजस्व के स्रोत के नामपर वनोत्पादों की खरीद-बिक्री पर अपना अधिकार नहीं छोड़ना चाहती है. लेकिन वास्तविकता यह है कि तेंदू पत्ते से लेकर अधिकांश वनोत्पादों के व्यापार को नियंत्रित करने के नाम पर राज्य सरकारें आदिवासियों के खुले शोषण का जरिया बन गई हैं.

असल में, वनाधिकार कानून को जिस तरह से बनाया गया है और उसे लागू किया जा रहा है, उसमें इस कानून का यही हश्र होना था. अधिकांश मामलों में आदिवासियों और अन्य जंगलवासियों के लिए यह साबित करना बहुत मुश्किल हो रहा है कि वे उस जमीन पर ७५ साल से रह रहे हैं. अधिकांश आदिवासी कचहरी और वकीलों के चक्कर काट रहे हैं. इसके बावजूद उनके अधिकारों को नकारने में देर नहीं लगाई जा रही है. सवाल है कि आदिवासी कागज-पत्र आदि कहां से लायें? होना तो यह चाहिए था कि जंगल विभाग और जिला प्रशासन खुद ऐसे कागजात आदि जुटाएं.

हालांकि एन.ए.सी ने इस कानून को ठीक तरीके नहीं लागू किए जाने पर दोनों मंत्रालयों की खिंचाई की है लेकिन खुद एन.ए.सी का रवैया भी बहुत चलताऊ सा है. एन.ए.सी ने इस कानून को लागू करने के लिए इन मंत्रालयों को कई सुझाव भी दिए हैं. लेकिन यू.पी.ए सरकार के रवैये से लगता नहीं है कि इस मुद्दे पर उसके रूख में कोई बदलाव आया है.

उल्टे वन और पर्यावरण मंत्रालय एन.सी सक्सेना की रिपोर्ट को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है. यही नहीं, वन मंत्रालय एन.ए.सी के इस सुझाव से कतई सहमत नहीं है कि जंगलों पर आदिवासियों के अधिकार को मान्यता देने के लिए उनसे ७५ साल की रिहाइश के सबूत मांगने पर बहुत जोर नहीं देना चाहिए.

साफ है कि यू.पी.ए सरकार ने वनाधिकार कानून को एक सजावटी कानून बनाने का फैसला कर लिया है. यही कारण है कि एन.ए.सी के सुझावों के बावजूद सरकार में कोई खास हलचल या सक्रियता नहीं दिख रही है.

कल पढ़िए खाद्य सुरक्षा बिल पर जारी रस्साकशी पर...

(समकालीन जनमत के फरवरी'११ अंक में प्रकाशित)



बुधवार, फ़रवरी 16, 2011

एन.ए.सी बनाम यू.पी.ए सरकार : समझिए इस नूराकुश्ती को

क्या कांग्रेस मनमोहन सिंह से पीछा छुड़ाने का बहाना तलाश रही है?

कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के नेतृत्ववाले राष्ट्रीय सलाहकार परिषद (एन.ए.सी) और कांग्रेस की अगुवाई वाली यू.पी.ए सरकार के बीच तनातनी बढ़ती जा रही है. पिछले डेढ़ महीने में खाद्य सुरक्षा कानून के मसौदे और सूचना के अधिकार में संशोधन से लेकर कई और महत्वपूर्ण आर्थिक, सामाजिक और कानूनी मुद्दों पर दोनों के बीच का टकराव सार्वजनिक रूप से खुलकर सामने आ गया है.

मीडिया के एक हिस्से में इस तकरार को सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह के बीच के टकराव के रूप में भी पेश किया जा रहा है. सच जो भी हो लेकिन ऊपर से देखने पर कम से कम ऐसा जरूर लगता है, गोया मनमोहन सिंह के नेतृत्ववाली यू.पी.ए सरकार एक रास्ते जा रही है जबकि सोनिया गांधी के नेतृत्व में एन.ए.सी और कुछ हद तक कांग्रेस पार्टी भी दूसरी दिशा में जा रहे हैं.

लेकिन एन.ए.सी और सरकार के बीच इस तकरार और टकराव में कितनी हकीकत है और कितना फ़साना? हालांकि इस तकरार में कोई नई बात नहीं है. पहले भी खासकर यू.पी.ए-एक के कार्यकाल में विभिन्न मुद्दों पर सरकार और एन.ए.सी के बीच तकरार और खींचतान चलती रही है. लेकिन पहले के उस तकरार में दिखावा ज्यादा और वास्तविकता कम थी.

वह वास्तव में, एक तरह की मिली-जुली कुश्ती ज्यादा थी जिसका मकसद न सिर्फ विपक्ष का स्पेस भी अपने पास रखना था बल्कि यू.पी.ए सरकार पर कांग्रेस अध्यक्ष के प्राधिकार को स्थापित करना और सरकार के कुछ अच्छे फैसलों और कदमों की क्रेडिट उन्हें देनी थी. कहने की जरूरत नहीं है कि यू.पी.ए के पिछले कार्यकाल में यह रणनीति काफी कारगर रही.

लेकिन एक ऐसे समय में जब खुद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और यू.पी.ए सरकार के साथ-साथ कांग्रेस पार्टी भी भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों और महंगाई रोकने में नाकामी के कारण चौतरफा हमलों से घिरी हुई है और गहरे राजनीतिक संकट से गुजर रही है, उस समय इस तरह के खुले टकराव की बात थोड़ी हैरान करनेवाली जरूर है. लेकिन बारीकी से देखिए तो इसमें हैरान करनेवाली कोई बात नहीं है.

इसमें कोई दो राय नहीं है कि यह मूलतः अभी भी नूराकुश्ती ही है. खाद्य सुरक्षा से लेकर मनरेगा के तहत न्यूनतम मजदूरी देने तक जैसे टकराव के कई मुद्दों पर बुनियादी रूप से एन.ए.सी के इक्का-दुक्का सदस्यों को छोड़कर बहुमत सदस्यों और मनमोहन सिंह सरकार की राय में कोई बड़ा फर्क नहीं है. लेकिन यह भी उतना ही सच है कि यह पहलेवाली नूराकुश्ती से कई मायनों में अलग भी है.

असल में, इस टकराव और तकरार के पीछे कई कारण हैं. सबसे महत्वपूर्ण कारण यह लगता है कि कांग्रेस का एक बड़ा हिस्सा गंभीरता से मनमोहन सिंह से पीछा छुड़ाना चाहता है. पिछले कुछ महीनों में एक के बाद एक भ्रष्टाचार के बड़े-बड़े मामलों ने इस सरकार की जो भी थोड़ी-बहुत चमक और साख थी, उसे उतार दिया है. इन मामलों में सरकार के साथ-साथ कांग्रेस की भी खूब भद पिटी है.

इसी तरह, महंगाई से निपटने में नाकामी के कारण भी सरकार और पार्टी को चौतरफा आलोचनाओं का सामना करना पड़ रहा है. पार्टी के एक हिस्से का मानना है कि वैसे भी मनमोहन सिंह को राहुल गांधी के लिए गद्दी छोडनी ही है तो यह बेहतर होगा कि पार्टी इस सरकार के खिलाफ बन रहे सत्ता विरोधी रुझानों के मद्देनजर अभी से दूरी बनानी शुरू कर दे.

कांग्रेस के इस हिस्से को खुद सोनिया गांधी का भी आशीर्वाद हासिल है. लेकिन वह खुलकर सामने नहीं आना चाहती हैं. आखिर सत्ता की मलाई को कौन छोड़ना चाहता है? लेकिन वह यह भी चाहती हैं कि माखनचोर का इल्जाम उनपर न लगे. कांग्रेस नेतृत्व की मुश्किल यह भी है कि वह प्रधानमंत्री पद से मनमोहन सिंह को इतनी आसानी से हटा भी नहीं सकती है.

२००९ के चुनावों में जीत का श्रेय कुछ हद तक मनमोहन सिंह और उनकी छवि को भी दिया गया था. यह भी सही है कि २००९ के बाद कई मामलों में प्रधानमंत्री के बतौर वे अपने प्राधिकार को इस्तेमाल करके नव उदारवादी सुधारों को आगे बढ़ाने की कोशिश करते भी दिख रहे हैं. इससे भी पार्टी और एन.ए.सी के सदस्यों के साथ तकरार को बढ़ावा मिल रहा है.

दरअसल, २००९ के चुनावों में कांग्रेस की सीटों में ठीक-ठाक बढ़ोत्तरी और यू.पी.ए-दो के सत्ता में आने के बाद पार्टी और सरकार में नव उदारवादी आर्थिक सुधारों के समर्थकों ने मान लिया कि उन्हें सुधारों को जोरशोर से आगे बढ़ाने का खुला लाइसेंस मिल गया है. लेकिन पार्टी के अंदर एक प्रभावी हिस्से और बाहर एन.ए.सी जैसे शुभचिंतकों का मानना था कि आर्थिक सुधारों के मामले में फूंक-फूंककर कदम बढ़ाये जाएं और सरकार की दिशा कुलमिलाकर मध्य-वाम ही रखी जाए क्योंकि यह जीत राजनीतिक तौर पर इसी मध्य-वाम लाइन और नव उदारवादी अर्थनीति की मार से त्रस्त जनता को राहत देनेवाली मनरेगा जैसी योजनाओं के कारण ही संभव हो पाई है.

कहने की जरूरत नहीं है कि देशी-विदेशी बड़ी पूंजी भी इस मौके का इस्तेमाल करके कई रुके हुए आर्थिक सुधारों के फैसलों पर आगे बढ़ने का दबाव बनाए हुए है. हैरानी की बात नहीं है कि यू.पी.ए-दो सरकार ने शुरुआत में नव उदारवादी सुधारों को आगे बढ़ाने की दिशा में ही कदम उठाये जिसका सबसे बड़ा सबूत २००९ और उसके बाद २०१० के आम बजट हैं.

यही नहीं, गृह मंत्री पी. चिदंबरम ने भी प्रधानमंत्री के समर्थन से सुधारों की राह में रोड़ा बन रहे माओवादियों को नेस्तनाबूद करने के लिए बहुत जोरशोर से आपरेशन ग्रीन हंट शुरू कर दिया. उधर, मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल जैसे कई अति उत्साही मंत्री सुधारों को तेज करने के अभियान उतर पड़े.

सच यह है कि इन सुधारों और फैसलों को कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी का समर्थन भी हासिल है लेकिन यह भी सच है कि जैसे-जैसे आपरेशन ग्रीन हंट और वेदांता, पास्को और अन्य बड़ी परियोजनाओं के खिलाफ जन विरोध बढ़ने लगा, कांग्रेस के एक हिस्से में बेचैनी बढ़ने लगी. उसके लिए यह मौका सुधार समर्थक नेताओं से हिसाब बराबर करने का भी था.

इसी बीच, नई सरकार के कई सुधार समर्थक मंत्रियों के कुछ कारपोरेट समूहों के लिए खुले पक्षपात और उन्हें जमकर रेवडियाँ बांटने से नाराज कारपोरेट समूहों में भी बेचैनी बढ़ रही थी. नतीजा, जल्दी ही टेलीकाम से लेकर सी.डब्ल्यू.जी तक एक के बाद एक घोटाले सामने आने लगे और पूरी मनमोहन सिंह सरकार अंदर और बाहर से हमलों से घिर गई.

यही नहीं, सरकार एक बड़े कारपोरेट युद्ध में भी फंस गई. ऐसा लगता है कि कांग्रेस नेतृत्व इसके लिए मानसिक रूप से तैयार नहीं था. यही समय था जब कांग्रेस के एक हिस्से ने भी सोनिया गांधी की मौन सहमति के साथ सरकार से दूरी बढ़ाने की रणनीति पर अमल शुरू कर दिया. यहां तक कि सरकार और सुधारों के प्रति खुद युवराज राहुल गांधी के सुर भी थोड़े अलग और बदले हुए लगने लगे.

दोहराने की जरूरत नहीं है कि राहुल गांधी को राजनीतिक रूप से तैयार कर रहे और उनकी छवि गढ़ने में जुटे रणनीतिकारों की रणनीति भी यही है कि राहुल की एक गरीब समर्थक छवि गढ़ने के लिए जरूरी है कि उन्हें सरकार की छवि खासकर उन फैसलों से अलग रखा जाए जिनको लेकर विवाद और जन विरोध हो.

इसी रणनीति के तहत पिछले कुछ महीनों में एन.ए.सी को भी सक्रिय किया गया है. एन.ए.सी के जरिये कांग्रेस नेतृत्व दो राजनीतिक मकसद साधने में लगा है. पहला, इसके जरिये खुद की सरकार से अलग एक गरीब और आम आदमी समर्थक छवि बनाई जाए. इसके लिए खाद्य सुरक्षा से लेकर वनाधिकार कानून जैसे मुद्दों को उठाया जाए और उन्हें लागू करने का राजनीतिक श्रेय सरकार के बजाय खुद लिया जाए.

दूसरा, इससे राजनीतिक एजेंडा बदलने में भी मदद मिलेगी. भ्रष्टाचार और महंगाई जैसे मुद्दों पर फंसी सरकार और कांग्रेस पार्टी हर कोशिश कर रहे हैं कि मुद्दा बदले. उन्हें लगता है कि अगर एन.ए.सी द्वारा उठाये गए मुद्दों पर चर्चा होगी तो कांग्रेस नेतृत्व को अपनी छवि चमकाने में मदद मिलेगी.

लेकिन एन.ए.सी के सुझावों पर जारी इस तकरार का एक लाभ सरकार को भी है. यह किसी से छुपा नहीं है कि मनमोहन सिंह सरकार खासकर उसके नव उदारवादी सुधार समर्थक खाद्य सुरक्षा आदि मुद्दों पर एन.ए.सी के प्रस्तावों को लेकर उत्साहित नहीं है. हालांकि सरकार और सुधार समर्थक लाबी को खुश करने के लिए एन.ए.सी ने खाद्य सुरक्षा के प्रावधानों को बहुत कमजोर कर दिया है.

इसके बावजूद सरकार एन.ए.सी के प्रस्ताव को अव्यवहारिक मानती है. वह न सिर्फ उसे एन.ए.सी द्वारा प्रस्तावित प्रावधानों के साथ लागू नहीं करना चाहती है बल्कि वह उसे रंगराजन समिति द्वारा सुझाये संशोधनों के साथ भी लागू करने की जल्दी में नहीं है. एन.ए.सी के साथ तकरार के कारण उसे इसे अभी और टालने का बहाना मिल गया है.

ध्यान रहे कि कांग्रेस और यू.पी.ए ने २००९ के चुनावों में खाद्य सुरक्षा का कानूनी अधिकार देने का वायदा किया था. लेकिन पौने दो साल गुजरने के बावजूद सरकार और एन.ए.सी के बीच अभी भी उसके मसौदे पर बहस चल रही है. साफ है कि यह इसे जब तक संभव हो सके टालने की रणनीति है. कहने की जरूरत नहीं है कि परोक्ष रूप से कांग्रेस अध्यक्ष भी इस खेल में शामिल हैं.

यह तथ्य किसी से छुपा नहीं है कि जब भी कांग्रेस अध्यक्ष ने किसी भी मुद्दे पर स्टैंड लिया, सरकार को झुकते देर नहीं लगी है. सवाल है कि अगर सोनिया गांधी की इन मुद्दों के प्रति इतनी प्रतिबद्धता है तो वे साफ स्टैंड लेकर सरकार पर दबाव क्यों नहीं डालती हैं? वे अगर चाहें तो इन सुझावों पर दाएं-बाएं कर रही सरकार तुरंत सीधे रास्ते पर आ सकती है.

लेकिन नहीं, जानबूझकर मुद्दे को लटकाया और खींचा जा रहा है ताकि एक तरफ सरकार अपने वित्तीय घाटे को कम करने के कठमुल्लावादी एजेंडे को आगे बढ़ा सके और दूसरी ओर, सोनिया गांधी खुद को गरीबनवाज साबित कर सकें. सबसे अधिक अफसोस की बात यह है कि इस पूरी तकरार और खींचतान का एक नतीजा यह हुआ है कि खाद्य सुरक्षा से लेकर आर.टी.आई और मनरेगा के तहत न्यूनतम मजदूरी जैसे मुद्दे भी विवादस्पद हो गए हैं.

जबकि ऐसे मुद्दों में विवाद की कोई खास गुंजाइश नहीं है. यह भी एक सोची-समझी रणनीति है. असल में, किसी मुद्दे को विवादस्पद बना देने का फायदा यह है कि इससे उस मुद्दे के प्रति न सिर्फ लोगों में भ्रम, संशय और संदेह पैदा हो जाते हैं बल्कि जनमत भी प्रभावित होता है.

इस मामले में भी यही हो रहा है. उदाहरण के लिए, खाद्य सुरक्षा के मुद्दे पर एन.ए.सी और प्रधानमंत्री द्वारा नियुक्त रंगराजन समिति के बीच मतभेद और टकराव के कारण खाद्य सुरक्षा को लेकर मध्य वर्ग और लोगों में यह भ्रम और संशय बढ़ रहा है कि इसे एन.ए.सी के कहे मुताबिक लागू करना संभव नहीं है और न ही यह वांछनीय है.

ऐसे में, अगर एन.ए.सी और खाद्य सुरक्षा के अधिकार के लिए लड़नेवाले संगठन इस मुद्दे पर अड़ते हैं तो सरकार को यह प्रचार करने का मौका मिल जायेगा कि इन संगठनों के अड़ियल रूख के कारण खाद्य सुरक्षा के कानून को लागू करने में कठिनाई आ रही है.

यह और बात है कि इस मुद्दे पर सरकार का रवैया सबसे अधिक अड़ियल है. लेकिन इस पूरे विवाद के कारण सरकार को न सिर्फ इस अत्यंत महत्वपूर्ण मुद्दे को और हल्का और कमजोर करने का तर्क और मौका मिल रहा है बल्कि एन.ए.सी के भी पीछे हटने की जमीन तैयार हो रही है. असल में, जब भी किसी मुद्दे पर विवाद बढ़ता है तो बीच का रास्ता लेने का माहौल बनने लगता है. कई बार विवाद इसी उद्देश्य से खड़े भी किए जाते हैं.

आश्चर्य नहीं कि अगले कुछ दिनों में खाद्य सुरक्षा और अन्य मुद्दों पर बीच का रास्ता लेने का माहौल बनाया जायेगा और सोनिया गांधी के नेतृत्व में एन.ए.सी को इसे स्वीकार करने के लिए तैयार कर लिया जायेगा. एन.ए.सी पहले ही इस मुद्दे पर जिस तरह से काफी पीछे हट चुकी है, उसे और पीछे हटने में शायद ही कोई गुरेज होगा.

यह बात और है कि इस समझौते में खाद्य सुरक्षा का कानून न सिर्फ और पिलपिला, बेमानी और नई बोतल में पुरानी शराब होकर रह जायेगा. लेकिन नूराकुश्ती का नतीजा और हो भी क्या सकता है?

आगे दो किस्तों में पढ़िए खाद्य सुरक्षा और वनाधिकार कानून के बारे में....

(समकालीन जनमत के फरवरी'११ अंक में प्रकाशित)