बुधवार, जून 12, 2013

आडवाणी का ‘ब्रह्मास्त्र’ और भाजपा का संकट

भारतीय झगड़ा पार्टी बनती बीजेपी के इस संकट के लिए खुद पार्टी और आर.एस.एस नेतृत्व जिम्मेदार हैं

कहते हैं कि राजनीति में एक दिन भी बहुत होता है. खासकर २४ घंटे के चैनलों और मोबाइल युग में तो घंटे और मिनट भी गिने जाने लगे हैं. देश के मुख्य विपक्षी दल- भारतीय जनता पार्टी में भी मिनटों में राजनीति बदल रही है.

गोवा कार्यकारिणी की बैठक के दौरान रविवार को उनके प्रवक्ता शाहनवाज़ हुसैन ने इंतज़ार कर रिपोर्टरों से कहा कि घंटों में नहीं, मिनटों में बड़ा एलान होने जा रहा है. फिर खूब धूम-धड़ाके के साथ एलान हुआ कि गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी २०१४ के आम चुनावों के लिए पार्टी की चुनाव अभियान समिति के अध्यक्ष होंगे.

इससे पहले से ही हर ओर मोदी की जय-जयकार हो रही थी लेकिन पार्टी अध्यक्ष की इस घोषणा के साथ ही पार्टी के सभी नेता खासकर प्रधानमंत्री पद के दूसरे दावेदार मोदी के आगे नतमस्तक दिख रहे थे और मीडिया में अटल-आडवाणी युग के अंत की घोषणा कर दी गई थी.

लेकिन २४ घंटे भी नहीं बीते कि भाजपा की राजनीति में काफी उलटफेर हो गया दिखता है. ‘प्रथम ग्रासे, मक्षिका पाते’ (पहले ही कौर में मक्खी का गिरना) की तर्ज पर पार्टी के वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण आडवाणी ने भाजपा के सभी पदों से इस्तीफा देकर ऐसा ब्रह्मास्त्र चला कि भाजपा नेताओं को सिर छुपाने की जगह नहीं मिल रही थी.
इस्तीफा देते हुए उन्होंने पार्टी नेतृत्व पर यह कहते हुए करारा हमला बोला कि यह अब वो पार्टी नहीं रही जिसे श्यामा प्रसाद मुखर्जी, दीन दयाल उपाध्याय, अटल बिहारी वाजपेयी ने बनाया था. आडवाणी के इस आरोप ने भाजपा खासकर उसके नए नेता नरेन्द्र मोदी को मुंह दिखाने लायक नहीं छोड़ा कि पार्टी में अब निजी हितों और एजेंडे को आगे बढ़ाया जा रहा है.
साफ़ है कि आडवाणी ने एक ही झटके में न सिर्फ चुनाव अभियान समिति के अध्यक्ष बनाए गए नरेन्द्र मोदी की चमक फीकी कर दी बल्कि पार्टी के अंदर जारी सत्ता संघर्ष और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं की लड़ाई को सड़क पर ला दिया है. आडवाणी के इस फैसले से पार्टी के अंदर घमासान और तेज होना तय है.

हालाँकि उन्होंने आर.एस.एस प्रमुख मोहन भागवत के हस्तक्षेप के बाद इस्तीफा वापस ले लिया है लेकिन आडवाणी ने एक बार इस्तीफा देकर और उससे अधिक इस्तीफे के कारण बताकर दांव बहुत ऊँचा कर दिया.

यहाँ से वे किन शर्तों और समझौते के साथ वापस लौटे हैं, इसका खुलासा होना बाकी है. इससे यह तय है कि पार्टी के अंदर सत्ता संघर्ष खत्म नहीं हुआ है और अभी नाटक के पहले अंक का पर्दा गिरा है.  

असल में, आडवाणी के लिए अब खोने को कुछ नहीं है. इसलिए वे पार्टी और आर.एस.एस से आसानी से और बिना बड़ी कीमत वसूले इस्तीफे को वापस करने के लिए राजी हुए होंगे, इसकी सम्भावना कम है.
जाहिर है कि आडवाणी के मोदी के खिलाफ इस तरह खड़ा हो जाने के बाद भाजपा और खासकर आर.एस.एस के सामने अब दो ही विकल्प हैं. एक, वह आडवाणी को जनसंघ के जमाने के नेता बलराज मधोक की तरह किनारे कर दे. दूसरे, उनके साथ समझौते में जाए और उनकी कुछ शर्तों को स्वीकार करे. ये दोनों ही विकल्प आसान नहीं हैं.
दोनों ही विकल्पों के साथ पार्टी के अंदर गुटबाजी और सत्ता संघर्ष के और तेज होने की आशंका है. नाराज आडवाणी पार्टी के अंदर रहें या बाहर, दोनों ही स्थितियों में वे भाजपा के लिए मुश्किलें खड़ी करते रह सकते हैं और मोदी के विजय अभियान के रथ को पंक्चर करने के लिए काफी हैं.
जाहिर है कि जो विश्लेषक अटल-आडवाणी युग के अंत की घोषणा कर रहे थे, उन्हें थोड़ा और इंतज़ार करना पड़ेगा. यही नहीं, जो विश्लेषक गोवा में भारतीय जनता पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक के अंदर और उससे बाहर काफी उठापटक, खींचतान और लाबीइंग के बाद गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को चुनाव अभियान समिति का अध्यक्ष बनाए जाने की घोषणा को पार्टी में मोदी के राज्यारोहण की तरह देख रहे थे, उन्हें भी मिनटों-घंटों-दिनों नहीं बल्कि सप्ताहों इंतज़ार करना पड़ सकता है.

यह सच है कि आडवाणी और उनका गुट मोदी को बहुत लंबे समय तक नहीं रोक पायेगा. लेकिन इतना तय है कि पार्टी में आनेवाले दिनों में काफी उठापटक और नतीजे में, सड़कों पर तमाशा और छीछालेदर दिखाई देगा.

इसकी वजह यह है कि मोदी भाजपा में प्रधानमंत्री पद के आधे दर्जन से ज्यादा उम्मीदवारों के बीच जारी महत्वाकांक्षाओं की तीखी होड़ में एक कदम भले आगे निकल गए हैं लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि पार्टी के अंदर प्रधानमंत्री और सत्ता की संभावित मलाई में हिस्से के लिए जारी खींचतान और उठापटक खत्म हो गई है.
इसके उलट आशंका यह है कि गोवा में निजी महत्वाकांक्षाओं की यह लड़ाई जिस तरह से खुलकर सामने आ गई है, वह आनेवाले दिनों में और अप्रिय शक्ल ले सकती है. खासकर नरेन्द्र मोदी और उनके समर्थक जितने बेसब्र होंगे, खुद को प्रधानमंत्री और एकछत्र नेता के रूप में पेश करने के लिए जितना दबाव बढ़ाएंगे, यह लड़ाई में पार्टी की उतनी ही सार्वजनिक छीछालेदर होगी.
वैसे भी गुटबंदी और आपसी झगडों के कारण बीजेपी को भारतीय झगडा पार्टी कहा जाने लगा है. हालाँकि यह छवि कोई एक दिन में नहीं बनी है. भाजपा चाहे खुद को कितनी भी सबसे अलग पार्टी बताए (पार्टी विथ डिफरेन्स) या अनुशासन और अलग ‘चाल, चरित्र और चेहरे’ की बात करे लेकिन सच यह है कि निजी महत्वाकांक्षाओं पर आधारित गुटबाजी, खेमेबंदी, उठापटक, साजिशों और दुरभिसंधियों का इतिहास बहुत पुराना है.

बहुत दूर जाने की जरूरत नहीं है. ८० और ९० के दशक में भाजपा के शीर्ष नेतृत्व में अटल बिहारी वाजपेयी और लाल कृष्ण आडवाणी और बाद में आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी के बीच कभी दबे और कभी खुले में यह खींचतान और उठापटक चलती रही है.

यह गुटबाजी, उठापटक, साजिशें और एक-दूसरे को निपटाने की कोशिशें बाद में बिना किसी अपवाद के पार्टी की हर राज्य इकाई और अनुषांगिक संगठनों तक पहुँच गई. यहाँ तक कि खुद पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह इस गुटबंदी और उठापटक के बड़े खिलाड़ी हैं. उत्तर प्रदेश में राजनाथ सिंह बनाम कल्याण सिंह बनाम कलराज मिश्र की लड़ाई ने भाजपा को आसमान से पाताल में पहुंचा दिया.
सच पूछिए तो गुटबंदी और आपसी उठापटक के मामले में भाजपा पूरी तरह से कांग्रेस संस्कृति में रंग चुकी है. खुद गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी इस गुटबंदी और विरोधियों को एन-केन-प्रकारेण निपटाने के माहिर हैं.
कहने की जरूरत नहीं है कि इसी कारण भाजपा के बड़े नेताओं में मोदी के हाथ में पार्टी की कमान सौंपे जाने से घबराहट है. उन्हें पार्टी नेतृत्व में हो रहे इस पीढ़ीगत और वैचारिक-राजनीतिक बदलाव में अपनी जगह को लेकर बेचैनी है. आडवाणी के खुले विद्रोह में ऐसे कई वरिष्ठ नेताओं की आवाज़ को सुना जा सकता है.

यही कारण है कि भाजपा और आर.एस.एस नेतृत्व इसे अनदेखा करने का जोखिम नहीं ले सकता है. सच पूछिए तो वह अपने ही बनाए जाल में फंस गया है. इसके लिए और कोई नहीं बल्कि खुद भाजपा और आर.एस.एस का अलोकतांत्रिक सांगठनिक ढांचा जिम्मेदार है जहाँ बड़े राजनीतिक फैसले पार्टी के अंदर नहीं बल्कि आर.एस.एस के मुख्यालय नागपुर में लिए जाते हैं.

यही नहीं, पार्टी में गुटबंदी-खेमेबाजी का मुख्य स्रोत भी आर.एस.एस और नागपुर ही है जो गुटबंदी और नेताओं के झगड़ों को अपनी पंच की भूमिका और पार्टी पर अपना नियंत्रण बनाए रखने के लिए इस्तेमाल करता है.
          
लेकिन इससे सत्ता की दावेदारी कर रहे देश के प्रमुख विपक्षी दल की दयनीय स्थिति का पता चलता है. माना जाता है कि किसी देश में लोकतंत्र और उसकी मुख्य एजेंसी- पार्टी राजनीति की सेहत का अंदाज़ा लगाना हो तो उसकी सरकार और सत्तारुढ़ पार्टी से ज्यादा बेहतर है, उसके मुख्य विपक्षी दल की सेहत को टटोलना.

देश में मुख्य संसदीय विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी की मौजूदा स्थिति को देखकर भारतीय लोकतंत्र की सेहत के बारे में सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है. इससे पता चलता है कि मुख्यधारा की पार्टी राजनीति सत्ता-लिप्सा और व्यक्तिगत स्वार्थों का साध्य बन गई है और वह देश और लोकतंत्र को कुछ देने की स्थिति में नहीं रह गई है.
 
(दैनिक 'कल्पतरु एक्सप्रेस', आगरा में 11 जून को छपी टिप्पणी)    

शनिवार, जून 08, 2013

आई.सी.यू की ओर बढ़ती अर्थव्यवस्था

आर्थिक संकट से निपटने की यू.पी.ए सरकार की रणनीति से माया मिली, न राम वाली स्थिति पैदा हो रही है


संकट में फंसी भारतीय अर्थव्यवस्था की फिसलन जारी है. जैसीकि आशंका थी, पिछले वित्तीय वर्ष (१२-१३) की चौथी तिमाही (जनवरी से मार्च’१३) में अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर मात्र ४.८ फीसदी रही और पूरे वर्ष में पांच फीसदी दर्ज की गई जोकि आर्थिक वृद्धि दर के मामले में पिछले एक दशक में अर्थव्यवस्था का सबसे फीका और बदतर प्रदर्शन है.
यही नहीं, चौथी तिमाही की ४.८ फीसदी की आर्थिक वृद्धि दर इसलिए और भी निराशाजनक है क्योंकि यह तीसरी तिमाही की वृद्धि दर ४.७ फीसदी की तुलना न के बराबर सुधार की ओर संकेत करती है. इससे न सिर्फ अर्थव्यवस्था के एक गंभीर गतिरुद्धता में फंस जाने का पता चलता है बल्कि उसमें सुधार की उम्मीदों को भी गहरा झटका लगा है.
हालाँकि इसमें हैरानी की कोई बात नहीं है क्योंकि केन्द्रीय सांख्यिकी संगठन (सी.एस.ओ) ने फ़रवरी में जारी पूर्वानुमान में वर्ष १२-१३ में जी.डी.पी वृद्धि दर के पांच फीसदी रहने का संकेत दिया था. लेकिन उस समय अर्थव्यवस्था के सरकारी मैनेजरों ने इससे बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद जाहिर की थी क्योंकि उन्हें चौथी तिमाही में अर्थव्यवस्था में सुधार के संकेत दिखाई दे रहे थे.

उन्हें लग रहा था कि अर्थव्यवस्था तीसरी तिमाही में सबसे निचले स्तर पर पहुँच चुकी है जहाँ से उसमें सुधार होना शुरू हो जाएगा. उनकी उम्मीद की दूसरी वजह यह थी कि पिछले साल अगस्त में पी. चिदंबरम के वित्त मंत्रालय की कमान संभालने के बाद से यू.पी.ए सरकार ने नव उदारवादी आर्थिक सुधारों को आगे बढ़ानेवाले कई बड़े फैसले किये हैं जिसका असर चौथी तिमाही में दिखने की उम्मीद थी.

लेकिन ताजा रिपोर्टों से साफ़ है कि अर्थव्यवस्था अभी भी आई.सी.यू में पड़ी हुई है. सी.एस.ओ के मुताबिक, वर्ष २०१२-१३ में औद्योगिक उत्पादन की वृद्धि दर मात्र एक फीसदी और उसमें सबसे महत्वपूर्ण विनिर्माण क्षेत्र (मैन्युफैक्चरिंग) की वृद्धि दर मात्र १.२ फीसदी रही.
क्रेडिट रेटिंग एजेंसी- क्रिसिल के अनुसार, मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र का यह प्रदर्शन पिछले दशक का सबसे बदतर प्रदर्शन है. क्रिसिल के मुताबिक, यह १९९१-९२ के संकट की याद दिलाता है जब औद्योगिक उत्पादन की वृद्धि दर गिरकर मात्र ०.६ फीसदी और मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र की वृद्धि दर नकारात्मक (-)०.८ फीसदी रह गई थी.
चिंता की बात यह भी है कि न सिर्फ जनवरी से मार्च की तिमाही में बल्कि चालू वित्तीय वर्ष के पहले महीने- अप्रैल में आठ मूल ढांचागत उद्योगों की वृद्धि दर मात्र २.३ फीसदी दर्ज की गई है जोकि पिछले साल इसी अवधि में दर्ज की गई ५.७ फीसदी की वृद्धि दर की आधी से भी कम है.

यही नहीं, इस सप्ताह जारी एच.एस.बी.सी की पी.एम.आई रिपोर्ट के मुताबिक, बीते मई महीने में औद्योगिक गतिविधियों में सुधार तो दूर अप्रैल की तुलना में मामूली गिरावट के संकेत हैं. पी.एम.आई औद्योगिक इकाइयों के मैनेजरों से मांग सम्बन्धी सर्वेक्षण के आधार पर तैयार किया जाता है और वह मई महीने में पिछले ५० महीने के सबसे निचले स्तर पर पहुँच चुका है.

लेकिन संकट सिर्फ औद्योगिक क्षेत्र तक सीमित नहीं है. इसका असर अर्थव्यवस्था के दूसरे क्षेत्रों खासकर सेवा क्षेत्र पर भी पड़ा है. यहाँ तक कि कृषि क्षेत्र का प्रदर्शन भी बीते वित्तीय वर्ष में वर्ष ११-१२ की तुलना में लगभग आधी रह गई है. कृषि की वृद्धि दर वर्ष १२-१३ में १.९ फीसदी रही जबकि उससे पहले के वर्ष में ३.६ फीसदी दर्ज की गई थी.
यही हाल निर्यात में बढ़ोत्तरी का है जिसमें चालू वित्तीय वर्ष के पहले महीने- अप्रैल में मात्र १.६८ फीसदी (डालर में) की वृद्धि दर्ज की गई है. उल्लेखनीय है कि पिछले वित्तीय वर्ष १२-१३ में निर्यात की वृद्धि दर में (-) १.८ फीसदी की गिरावट और आयात में ०.४ फीसदी की बढ़ोत्तरी दर्ज की गई जिसके कारण न सिर्फ व्यापार घाटे में बढ़ोत्तरी दर्ज की गई बल्कि सबसे अधिक चिंताजनक वृद्धि चालू खाते के घाटे में हुई है जो बढ़कर जी.डी.पी के ५.१ फीसदी तक पहुँच गई है.
खुद वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने अपने बजट भाषण में स्वीकार किया है कि चालू खाते के घाटे में हुई वृद्धि सबसे बड़ी चुनौती है. चालू खाते के घाटे में भारी वृद्धि के कारण डालर के मुकाबले रूपये पर दबाव बना हुआ है.

हालाँकि इस बीच मुद्रास्फीति की दर में नरमी आई है लेकिन वह अब भी सरकार और रिजर्व बैंक के अनुमानों से कहीं ज्यादा ऊँचाई पर बनी हुई है. वर्ष २०१२-१३ में थोक मूल्य सूचकांक पर आधारित मुद्रास्फीति की दर ७.४ फीसदी और खाद्य वस्तुओं की मुद्रास्फीति दर ८.१ फीसदी रही.

कहने की जरूरत नहीं है कि महंगाई पर काबू पाने में नाकामी यू.पी.ए सरकार की अर्थव्यवस्था के प्रबंधन में सबसे बड़ी विफलता साबित हुई है.

इसकी कीमत आम आदमी के साथ-साथ अर्थव्यवस्था को भी चुकानी पड़ी है. असल में, पिछले चार सालों से लगातार ऊँची महंगाई की दर से निपटने में नाकाम रही यू.पी.ए सरकार ने हाथ खड़े कर दिए और यह जिम्मा रिजर्व बैंक को सौंप दिया.
नतीजा, रिजर्व बैंक ने मुद्रास्फीति को काबू में लाने के लिए ब्याज दरों में लगातार वृद्धि की जिसका सीधा असर निवेश पर पड़ा. निवेश में कमी आने के कारण आर्थिक वृद्धि की दर में गिरावट दर्ज की गई है जोकि लुढ़ककर पिछले एक दशक के सबसे निचले स्तर पर पहुँच गई है. इसके बावजूद मुद्रास्फीति पूरी तरह से काबू में नहीं आई है.
इस तरह ‘माया मिली, न राम’ की स्थिति पैदा हो गई है. उल्टे ऊँची मुद्रास्फीति की दर के साथ आर्थिक वृद्धि में गिरावट की स्थिति के कारण अर्थव्यवस्था के मुद्रास्फीति जनित मंदी (स्टैगफ्लेशन) में फंसने की आशंका बढ़ती जा रही है.
जैसे इतना ही काफी नहीं था. एक के बाद दूसरे भ्रष्टाचार के मामलों के खुलासे ने यू.पी.ए सरकार की साख पाताल में पहुंचा दी. यही नहीं, अर्थव्यवस्था की स्थिति में सुधार की रही-सही उम्मीदों पर यू.पी.ए सरकार के अंदर आर्थिक सुस्ती से निपटने की रणनीति पर मतभेदों, खींचतान और अनिर्णय ने पानी फेर दिया.

आखिरकार जब सरकार की नींद खुली और उसने घबराहट और जल्दबाजी में फैसले करने शुरू किये तो वह अर्थव्यवस्था को उन्हीं नव उदारवादी आर्थिक सुधारों की दवा की बड़ी खुराक से ठीक करने की कोशिश करने लगी जिसके कारण अर्थव्यवस्था बीमार हुई है और जिसकी सफलता को लेकर पूरी दुनिया में सवाल उठाये जा रहे हैं.

असल में, यू.पी.ए सरकार ने अर्थव्यवस्था की हालत सुधारने के लिए एक ओर बड़ी पूंजी खासकर विदेशी पूंजी के लिए दरवाजे खोलने से लेकर नियमों/शर्तों को उदार बनाने तक और दूसरी ओर, बड़ी विदेशी वित्तीय पूंजी को खुश करने के लिए राजकोषीय घाटे में कमी यानी सरकारी खर्चों और सब्सिडी में कटौती जैसे किफायतशारी (आस्ट्रिटी) के उपायों को आगे बढ़ाना शुरू कर दिया.
इसके तहत ही वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने राजकोषीय घाटे पर अंकुश लगाने के लिए न सिर्फ पिछले वित्तीय वर्ष के बजट में भारी कटौती की बल्कि चालू साल के बजट में भी बहुत मामूली वृद्धि की है.
लेकिन इसका नतीजा उल्टा हुआ है. आर्थिक वृद्धि को लेकर सी.एस.ओ के ताजा अनुमान से साफ़ है कि आर्थिक वृद्धि दर में गिरावट की एक वजह सरकारी खर्चों में भारी कटौती भी है. दरअसल, जब अर्थव्यवस्था की हालत खस्ता हो और आर्थिक वृद्धि गिर रही हो, उस समय सरकारी खर्चों खासकर सार्वजनिक निवेश में कटौती का उल्टा असर होता है.

इसकी वजह यह है कि आर्थिक विकास को तेज करने के लिए निवेश जरूरी है और जब आर्थिक अनिश्चितता और वैश्विक संकट के कारण निजी क्षेत्र निवेश के लिए आगे न आ रहा हो, उस समय सार्वजनिक निवेश में कटौती से स्थिति और बिगड़ जाती है. भारतीय अर्थव्यवस्था के साथ भी यही होता दिखाई दे रहा है.

इससे एक बार फिर ‘माया मिली, न राम’ वाली स्थिति पैदा हो रही है. आर्थिक वृद्धि में गिरावट का सीधा असर सरकार के टैक्स राजस्व पर पड़ेगा और टैक्स वसूली कम होने से राजकोषीय घाटे में बढ़ोत्तरी तय है. इस तरह न आर्थिक विकास को गति मिल पाएगी और न राजकोषीय घाटे में कोई कमी आ पाएगी. यह एक दुश्चक्र है.
माना जाता है कि इस दुश्चक्र को तोड़ने के लिए राजकोषीय घाटे पर अंकुश लगाने की चिंता छोड़कर आर्थिक वृद्धि को गति देने के लिए सार्वजनिक निवेश खासकर ढांचागत और सामाजिक क्षेत्र में भारी बढ़ोत्तरी करनी चाहिए.
इससे अर्थव्यवस्था में रोजगार के अवसर बढ़ेंगे और उसके साथ मांग बढ़ेगी जिसे पूरा करने के लिए निजी निवेश भी आगे आएगा. इससे आर्थिक गतिरुद्धता भंग होगी.
यह कोई समाजवादी फार्मूला नहीं है बल्कि यह पूंजीवादी आर्थिक सैद्धांतिकी में  कींसवादी अर्थशास्त्र है जिसे १९३० के दशक की महामंदी से निपटने के लिए जान मेनार्ड कींस ने पेश किया था.

लेकिन मुश्किल यह है कि नव उदारवादी आर्थिक सैद्धांतिकी के व्यामोह में फंसे प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री से लेकर अर्थव्यवस्था के मैनेजरों तक को यह भरोसा है कि खुदरा व्यापार को विदेशी पूंजी के लिए खोलने से लेकर विदेशी पूंजी को तमाम रियायतें देने जैसे आर्थिक सुधारों को तेजी से आगे बढ़ानेवाले फैसलों से देश में विदेशी निवेश तेजी से आएगा और उससे अर्थव्यवस्था एक बार फिर तेजी से दौड़ने लगेगी.

कहने की जरूरत नहीं है कि यू.पी.ए सरकार बड़ा जोखिम ले रही है. वह अर्थव्यवस्था के साथ एक बड़ा दाँव खेल रही है जिसमें हालिया वैश्विक उदाहरणों को देखते हुए कामयाबी की सम्भावना कम दिखाई दे रही है.
लेकिन अगर वह सफल भी हुई तो यह भारतीय अर्थव्यवस्था को विदेशी पूंजी का और बड़ा मोहताज बना देगी.
('राष्ट्रीय सहारा' के हस्तक्षेप में 8 जून को प्रकाशित टिप्पणी)                     


बुधवार, जून 05, 2013

आइ.पी.एल : गुड़ खाकर गुलगुले से परहेज

कल तक आई पी एल के गुणगान में जुटे चैनलों को 'सत्य' का इलहाम काफी देर से हुआ है  

आई.पी.एल में मैच फिक्सिंग और सट्टेबाजी के खुलासे के बाद से भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बी.सी.सी.आई) के अध्यक्ष और आई.पी.एल टीम- चेन्नई सुपर किंग्स के मालिक एन. श्रीनिवासन मीडिया से बहुत नाराज हैं. उन्हें लगता है कि मैच फिक्सिंग मामले में ‘मीडिया ट्रायल’ हो रहा है. उनकी नाराजगी की वजह किसी से छुपी नहीं है.

श्रीनिवासन के दामाद और चेन्नई सुपर किंग्स के प्रिंसिपल (सी.ई.ओ) रहे गुरुनाथ मैयप्पन सट्टेबाजी और मैच फिक्सिंग रैकेट में शामिल होने के आरोपों में पुलिस के हत्थे चढ़ चुके हैं. जाहिर है कि श्रीनिवासन पर इस्तीफा देने और बी.सी.सी.आई पर चेन्नई सुपर किंग्स का लाइसेंस खत्म करने का दबाव बढ़ता जा रहा है.

लेकिन श्रीनिवासन को लगता है कि यह मांग सिर्फ मीडिया से आ रही है. उन्होंने एलान कर दिया है कि मीडिया उन्हें इस्तीफा देने के लिए मजबूर नहीं कर सकता है. लेकिन वे भूल रहे हैं कि यही मीडिया है जिसने आई.पी.एल को आई.पी.एल बनाया है.
न्यूज चैनलों और अखबारों ने शुरू से आई.पी.एल को जिस तरह हाथों-हाथ लिया, उसे जितनी कवरेज दी और सबसे बढ़कर उसकी चमक-दमक के पीछे छिपी गडबडियों और गलाजत को अनदेखा किया, उससे आई.पी.एल को एक विश्वसनीयता मिली. यह चैनल और मीडिया ही था जिसने आई.पी.एल को भारत के अपने पहले सफल लीग की तरह प्रचारित और प्रतिष्ठित किया.
इसलिए आई.पी.एल को मिले ‘मीडिया हाइप’ का मजा ले चुके श्रीनिवासन अब ‘मीडिया ट्रायल’ की शिकायत किस मुंह से कर रहे हैं? मीठा-मीठा गप और कड़वा-कड़वा थू, यह कैसे चलेगा?

यह सही है कि जब से श्रीसंथ सहित तीन खिलाड़ियों और विंदू दारा सिंह और मय्प्पन की ‘स्पाट फिक्सिंग’ और सट्टेबाजी के आरोपों में गिरफ्तारी हुई है, मीडिया ने ऐसे सिर आसमान पर उठा रखा है, जैसे उसे आई.पी.एल की चमक के पीछे छिपी बजबजाहट के बारे में आज पता चला है.

सवाल यह है कि आज जो चैनल/अखबार आई.पी.एल की चीरफाड़ में जुटे हुए हैं, वे कल तक उस गलाजत से आँखें क्यों मूंदे हुए थे?

क्या चैनलों को यह पता नहीं था कि जैसे हर चमकती चीज सोना नहीं होती, आई.पी.एल भी शुरू से ही क्रिकेट से ज्यादा पैसे और ग्लैमर के कारण चमक रहा था? सच यह है कि मीडिया को यह सब मालूम था. लेकिन चैनल खुद भी इसी ‘चमक’ से अभिभूत थे.
यहाँ तक कि अधिकांश चैनलों पर क्रिकेट के एक्सपर्ट वे पूर्व खिलाड़ी हैं, जिनपर फिक्सिंग के आरोप लग चुके हैं. मजे की बात यह है कि वे अब खिलाड़ियों के लालच और उनमें नैतिकता की बढ़ती कमी पर ‘ज्ञान’ देते हैं. यही नहीं, आई.पी.एल में सट्टेबाजी की पोस्टमार्टम कर रहे चैनल/अखबार कल तक खुद मैच से पहले सट्टा बाजार में टीमों के भाव बताया करते थे.
इसे कहते हैं, गुड़ खाकर गुलगुले से परहेज. इसका सबूत यह है कि आई.पी.एल में फिक्सिंग के आरोपों में एन. श्रीनिवासन का सिर मांग रहे अखबार/चैनल उस आई.पी.एल पर कोई सवाल नहीं उठा रहे हैं जिसे कालेधन को सफ़ेद करने के लिए ही खड़ा किया गया है. सट्टेबाजी और नतीजे में फिक्सिंग उसके मूल चरित्र में है.

सवाल है कि अगर आई.पी.एल को खत्म कर दिया जाए तो क्रिकेट का क्या नुकसान होगा? लेकिन यह सवाल कोई चैनल या अखबार नहीं उठाएगा क्योंकि आई.पी.एल को टेलीविजन यानी मनोरंजन उद्योग के लिए ही बनाया गया है. उसमें बड़े टीवी समूहों (जिनमें न्यूज चैनल भी शामिल हैं) का हजारों करोड़ रूपया लगा हुआ है और सभी को विज्ञापनों से भारी कमाई हो रही है.  

जाहिर है कि चैनल बेवकूफ नहीं हैं कि अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारें. वे तो सिर्फ श्रीनिवासन का सिर दिखाकर दर्शकों को भरोसा दिलाना चाहते हैं कि आई.पी.एल में अब सब ठीक-ठाक है. वैसे ही जैसे ललित मोदी के बाद राजीव शुक्ल को आई.पी.एल कमिश्नर और श्रीनिवासन को बोर्ड अध्यक्ष बनाने के बाद हो गया था.                 
('तहलका' के 15 जून के अंक में प्रकाशित टिप्पणी)

मंगलवार, जून 04, 2013

शेखर गुप्ता जी, मीडिया के तालाब को सिर्फ छोटी मछलियाँ नहीं गन्दी कर रही हैं

यहाँ तो सगरे कूप में भांग पड़ी है 
 
दूसरी और आखिरी क़िस्त 
 जाहिर है कि इसके कारण मीडिया उद्योग के पिरामिड के शीर्ष पर बैठे इन मुट्ठी भर कारपोरेट मीडिया समूहों के मालिकों और उनके चुनिंदा संपादकों/पत्रकारों की ताकत और प्रभाव में भी भारी इजाफा हुआ है. उनकी प्रधानमंत्री से लेकर कैबिनेट मंत्रियों और अफसरों तक और शासक पार्टियों के शीर्ष नेताओं से लेकर बड़े उद्योगपतियों तक सीधी पहुँच है.
 
इनकी पहुँच और प्रभाव का कुछ अंदाज़ा इस तथ्य से भी लगाया जा सकता है कि इनमें से कई मीडिया मालिक और पत्रकार विभिन्न पार्टियों की ओर से और कुछ ‘सामाजिक-सांस्कृतिक-साहित्यिक’ योगदान के कोटे से राज्यसभा में नामांकित सदस्य हैं.
इनके बढ़ते प्रभाव का अंदाज़ा नीरा राडिया के टेप्स से भी चलता है जिसमें इन समूहों के जाने-माने पत्रकार लाबीइंग से लेकर कारपोरेट के इशारे पर लिखते/बोलते और फिक्सिंग करते हुए पाए गए.
इस मीडिया उद्योग के पिरामिड के मध्य में वे क्षेत्रीय/भाषाई कारपोरेट मीडिया समूह हैं जो हाल के वर्षों में तेजी से फले-फूले हैं और अपनी क्षेत्रीय सीमाओं से भी बाहर निकले हैं. इसके साथ ही उन्होंने अखबार के साथ-साथ टी.वी, रेडियो और इंटरनेट में भी पाँव फैलाया है.

कहने की जरूरत नहीं है कि ये बहुत महत्वाकांक्षी हैं और इन्होंने स्थानीय शासक वर्ग में अपनी पैठ और प्रभाव के बलपर अपने कारोबार को फैलाया है. वे मीडिया के अलावा दूसरे कारोबारों में भी घुस रहे हैं ताकि बड़े कारपोरेट मीडिया समूहों के मुकाबले टिक सकें.

यही नहीं, इनमें से कई ने मौके की नजाकत को समझते हुए बड़े कारपोरेट मीडिया समूहों के साथ गठजोड़ में चले गए हैं.  

इन क्षेत्रीय/भाषाई मीडिया समूहों के लिए उनके कारोबारी हित सबसे ऊपर हैं और मुनाफे के लिए वे किसी भी समझौते को तैयार रहते हैं. हैरानी की बात नहीं है कि हाल के वर्षों में बिना किसी अपवाद के लगभग सभी राज्यों में क्षेत्रीय/भाषाई मीडिया समूहों और राज्य सरकारों के बीच संबंध अत्यधिक ‘मधुर’ बने रहे हैं.
इसकी सबसे बड़ी वजह राज्य सरकारों से मिलनेवाला विज्ञापन राजस्व और दूसरे कारोबारी फायदे रहे हैं. इस कारण ये मीडिया समूह राज्य सरकारों को नाराज नहीं करना चाहते हैं. यही नहीं, कई क्षेत्रीय मीडिया समूहों की क्षेत्रीय शासक दलों के साथ गहरी निकटता बन गई है क्योंकि इन दलों के शीर्ष नेता और मीडिया समूहों के मालिक या तो एक हैं या उनके कारोबारी हित गहरे जुड़ गए हैं.
इसका एक और उल्लेखनीय पहलू यह है कि हाल के वर्षों में कई राज्यों में उनके ताकतवर नेताओं/मुख्यमंत्रियों/दलों ने जनमत को प्रभावित करने में मीडिया के बढ़ते महत्व को समझते हुए परोक्ष या सीधे मीडिया में निवेश किया है और अखबार और खासकर न्यूज चैनल शुरू किये हैं.

यही नहीं, पंजाब, तमिलनाडु, छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में तो शासक दलों ने टी.वी वितरण यानी केबल उद्योग पर कब्ज़ा जमा लिया है और उसके जरिये चैनलों की बाहें मरोड़ते रहते हैं. दूसरी ओर, कई राज्यों में कमजोर सरकारों/मुख्यमंत्रियों को ताकतवर क्षेत्रीय मीडिया समूह विज्ञापन से लेकर दूसरे कारोबारी फायदों के लिए ब्लैकमेल करते भी दिख जाते हैं.

मीडिया उद्योग के पिरामिड के सबसे निचले हिस्से में हैं छोटी-मंझोली वे मीडिया कम्पनियाँ जिनके पीछे वैध-अवैध तरीके से रीयल इस्टेट, चिट फंड, लाटरी, ठेकेदारी, नर्सिंग होम/निजी विश्वविद्यालयों, डांस बार से लेकर अंडरवर्ल्ड तक से कमाई गई पूंजी लगी है.
इनका असली मकसद मीडिया कारोबार से ज्यादा न्यूज मीडिया को अपने वैध-अवैध धंधों को पुलिस/प्रशासन/सरकार से बचाने और सार्वजनिक जीवन में साख बटोरने के लिए इस्तेमाल करना है. ये मीडिया कम्पनियाँ घाटे के बावजूद कैसे चलती रहती हैं, इस रहस्य का सीधा संबंध उनके दूसरे वैध-अवैध कारोबार के फलने-फूलने के साथ जुड़ा हुआ है.
आश्चर्य नहीं कि इन मीडिया कंपनियों के मालिक उसका इस्तेमाल नेताओं/अफसरों तक पहुँचने और उनसे लाबीइंग के लिए करते हैं.
यही नहीं, इन मीडिया कंपनियों में काम करनेवाले ज्यादातर वरिष्ठ पत्रकारों और संपादकों को भी पत्रकारिता से मालिकों के कारोबारी हितों को आगे बढ़ाने के लिए दलाली करनी पड़ती है. इन मीडिया समूहों में संपादक/ब्यूरो चीफ जैसे पदों पर पहुँचने की सबसे बड़ी योग्यता पत्रकारों की सत्तासीन पार्टी के साथ नजदीकी और उनके संपर्क/पहुँच होते हैं.

सारदा समूह को ही लीजिए जिसके चैनलों/अखबारों के सी.ई.ओ कुणाल घोष पेशे से पत्रकार होने के बावजूद समूह के शीर्ष पर इसलिए पहुँच पाए कि उनके तृणमूल के शीर्ष नेतृत्व के साथ नजदीकी संबंध थे. हैरानी की बात नहीं है कि कुणाल घोष तृणमूल के राज्यसभा सांसद भी बन गए.

लेकिन सारदा ऐसी अकेली कंपनी नहीं है जो अपने अवैध धंधों पर पर्दा डालने, उसे एक विश्वसनीयता देने और सरकार/सत्तारुढ़ पार्टी के साथ नजदीकी का फायदा उठाने के लिए अखबार/चैनल चला रही थी. देश में ऐसे अखबारों/चैनलों की संख्या सैकड़ों में है.
क्या यह सिर्फ संयोग है कि देश में इस समय केन्द्र सरकार ने ८२५ चैनल के लाइसेंस दिए हुए हैं जिनमें लगभग आधे न्यूज चैनल हैं? जाहिर है कि इन न्यूज चैनलों में से लगभग आधे ऐसे ही कारोबारियों के चैनल हैं जिनके धंधे और आमदनी के स्रोत साफ़ नहीं हैं.
हालाँकि वे घाटे में चल रहे हैं, वहां काम करने की परिस्थितियां बहुत खराब हैं, तनख्वाह तक समय पर नहीं मिलती है और पत्रकारिता से इतर कामों का दबाव रहता है लेकिन उनकी ‘कामयाबी’ देखकर ऐसे ही दूसरे कारोबारियों की मीडिया के धंधे में उतरने की लाइन लगी हुई है.
हालाँकि मीडिया उद्योग के पिरामिड के शीर्ष से लेकर नीचे तक यानी बड़ी कारपोरेट मीडिया कंपनियों से लेकर छोटी-मंझोली कंपनियों तक सभी कम या बेशी पत्रकारिता के नामपर खबरों की खरीद-फरोख्त के धंधे में लगी हुई हैं, भांति-भांति के समझौते करके अपने दूसरे कारोबारी हितों को आगे बढ़ाने में जुटी हुई हैं और पाठकों-दर्शकों की आँख में धूल झोंकने में शामिल हैं.

लेकिन बड़ी कारपोरेट मीडिया कम्पनियाँ इसका सारा दोष पिरामिड के निचले और कुछ हद तक मध्य हिस्से की मीडिया कंपनियों पर डालकर अपना दामन बचाने की कोशिश कर रही हैं.

पिछले दिनों कोलकाता में इंडियन चैंबर आफ कामर्स की एक सभा में जी समूह के मालिक सुभाष चंद्रा ने शिकायती लहजे में कहा कि पुलिस से बचने के लिए आज मीडिया कारोबार में बिल्डर्स, हिस्ट्री शीटर्स आ रहे हैं. (http://www.thehoot.org/web/Does-owning-media-help-/6761-1-1-10-true.html )

दूसरी ओर, ‘इंडियन एक्सप्रेस’ के संपादक शेखर गुप्ता ने भी अपने एक लेख ‘मेरे पास मीडिया है’ (http://www.indianexpress.com/news/national-interest-mere-paas-media-hai/1108319/ ) में दोष फिक्सर-कारोबारियों पर मढते हुए अपनी साख बचाने के लिए बड़ी कारपोरेट मीडिया कंपनियों को सचेत किया है.
लेकिन सवाल यह है कि क्या कुछ चिट फंड, रीयल इस्टेट, डांस बार आदि धंधे करनेवाले मीडिया कारोबार में आ गए हैं और मीडिया के पवित्र सरोवर को गन्दा कर रहे हैं या फिर मुद्दा ‘सगरे कूप में भांग’ पड़ने की है?
अगर मुद्दा सिर्फ कुछ मछलियों के तालाब को गन्दा करने का है तो साफ़-सुथरी और गंभीर पत्रकारिता करनेवाले बड़े मीडिया समूह ऐसी मछलियों का पर्दाफाश क्यों नहीं करते हैं? वे ऐसी मीडिया कंपनियों की कारगुजारियों पर चुप क्यों रहते हैं?
आखिर शेखर गुप्ता के पास कौन सी ऐसी जादुई ताबीज है जिससे वे बता सकते हैं कि मीडिया कारोबार का कौन सा कारोबारी गंभीर और साफ़-सुथरी पत्रकारिता करने के लिए इस धंधे में है या आ रहा है और कौन पुलिस/प्रशासन से बचने और सरकार से अनुचित फायदे लेने के लिए आया है?

क्या यह सच नहीं है कि न्यूज मीडिया के धंधे के बड़े खिलाडी ज्यादा व्यवस्थित, सृजनात्मक और प्रबंधकीय नवोन्मेष के साथ खबरें बेचते या तोड़ते-मरोड़ते हैं जबकि छोटे-मंझोले खिलाडी वह कला नहीं सीख पाए हैं और इसलिए बहुत भद्दे तरीके से खबरों का धंधा करते हैं? उनकी चोरी जल्दी ही पकड़ी भी जाती है.

सबसे बड़ी बात यह है कि दर्शकों/पाठकों में उनकी साख न के बराबर है, इसलिए वे व्यापक पाठक/दर्शक समूह को बहुत नुकसान नहीं पहुंचा पाते हैं लेकिन जिन बड़े अखबारों/चैनलों पर सबसे अधिक पाठकों/दर्शकों का भरोसा है, वे खबरों का सौदा करके जब उन्हें अँधेरे में रखते हैं या उनकी आँखों में धूल झोंकते हैं, तो वे आम पाठकों/दर्शकों और उनके साथ व्यापक जन समुदाय और उनके हितों को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाते हैं.

क्या यह अब भी बताने की जरूरत है कि सारदा समूह के न्यूज चैनलों और जी न्यूज की पत्रकारिता में लोकतंत्र के लिए ज्यादा बड़ा खतरा कौन है?

('कथादेश' के जून'13 अंक में प्रकाशित टिप्पणी की आखिरी क़िस्त। पहली क़िस्त आप 24 मई को पढ़ चुके हैं)  

सोमवार, जून 03, 2013

राजनीति या बंदूक: किसके हाथ में है कमान?

अराजक सैन्य दुस्साहसवाद भारी पड़ सकता है माओवादी राजनीति पर 

भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) अगर देश और समाज में रैडिकल बदलाव लाने के उद्देश्य से बनी एक राजनीतिक पार्टी है तो उसे इस सवाल का जवाब देना होगा कि छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले में कांग्रेस नेताओं के काफिले पर हमले और २७ कांग्रेस नेताओं, कार्यकर्ताओं और सुरक्षाकर्मियों की हत्या से उसे राजनीतिक रूप से क्या हासिल हुआ है?
खुद पार्टी ने एक प्रेस विज्ञप्ति में इस हमले की जिम्मेदारी लेते हुए दावा है कि उसने बस्तर के ‘हजारों निर्दोष आदिवासियों पर सलवा जुडूम के जरिये जुल्म ढानेवाले कांग्रेस नेता महेंद्र कर्मा और राज्य में जनविरोधी नीतियों को लागू करनेवाले कांग्रेस नेताओं का सफाया करके बदला लिया है.’
सवाल यह है कि क्या यह ‘बदला लेनेवाली’ भाषा एक रैडिकल बदलाव के लिए आम जनता को गोलबंद करके राजनीतिक-वैचारिक लड़ाई लड़नेवाली कम्युनिस्ट पार्टी की भाषा है या किसी अराजक-कठमुल्ला आतंकवादी संगठन की भाषा?

उससे ज्यादा बड़ा और महत्वपूर्ण सवाल यह है कि व्यापक जनतांत्रिक आन्दोलनों और राजनीतिक पहलकदमियों से अलग-थलग इस तरह की सैन्य कार्रवाइयों की ‘राजनीति’ क्या है?

यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि ऐसी कोई भी सैन्य कार्रवाई चाहे जितनी धमाकेदार हो और उसका तात्कालिक प्रभाव चाहे जितना नाटकीय हो लेकिन अगर उसके पीछे की राजनीति सिर्फ ‘वर्ग-शत्रुओं से बदला लेने’ यानी ‘सफाया लाइन’ तक सीमित है तो उसकी परिणति एक तरह के अराजक राबिनहुडवाद में ही होनी तय है.

मुश्किल यह है कि बहुतेरे मध्यवर्गीय क्रांतिकारियों के लिए ‘रोमांटिक’ लेकिन अपने मूल चरित्र में अराजक राबिनहुडवाद से सबसे ज्यादा नुकसान रैडिकल बदलाव की राजनीति को ही होता है.

इसकी वजह यह है कि यह सैन्यवादी राबिनहुडवाद गरीब जनता को लोकतांत्रिक जनसंघर्षों में उतरने और कारपोरेट लूट और सरकारों की जनविरोधी नीतियों और कार्यक्रमों के खिलाफ जन प्रतिरोध खड़ा करने से रोकता है.

वे न सिर्फ बंदूक और सैन्य दलम पर निर्भर होते चले जाते हैं बल्कि अन्याय और जुल्म के खिलाफ लड़ाई में मूकदर्शक बनकर रह जाते हैं. यही नहीं, ‘बदला लेने और सफाया’ करने की राजनीति से हिंसा-प्रतिहिंसा का जो दौर शुरू होता है, उसमें आम गरीबों के जनसंघर्षों और लोकतांत्रिक पहलकदमियों के लिए भी जगह और सम्भावना और भी खत्म होती चली जाती है.

छत्तीसगढ़ से लेकर झारखण्ड और पश्चिम बंगाल तक माओवादी राजनीति की समस्या यह है कि वह आम गरीब जनता खासकर आदिवासियों को प्रतिरोध आंदोलन में उतारने और बड़े जनसंघर्ष खड़ा करने में नाकाम रही है. वह ऐसा करने में इसलिए नाकाम रही है क्योंकि उसकी वैचारिकी में बंदूक उसकी राजनीति पर हावी हो गई है.
इसके कारण जहाँ भी गरीब लोगों ने जल-जंगल-जमीन और खनिजों की कारपोरेट लूट और अन्याय के खिलाफ लड़ने की पहल की और जनसंघर्षों में उतरे, वहां भी माओवादी पार्टी की सैन्य कार्रवाइयों ने उन जनतांत्रिक आन्दोलनों को बहुत नुकसान पहुँचाया है. उदाहरण के लिए, पश्चिम बंगाल में लालगढ़ और जंगलमहल के आंदोलन को लीजिए, जहाँ भाकपा (माओवादी) की सैन्य कार्रवाइयों ने एक बड़े जन-उभार की संभावनाओं को खत्म कर दिया.
यह सच है कि रैडिकल बदलाव की नक्सल राजनीति खासकर माओवादी पार्टियों में ‘वर्ग-शत्रुओं के सफाए’ की यह लाइन नई नहीं है लेकिन नक्सलबाड़ी उभार के बाद पिछले पैंतालीस वर्षों में गंगा से गोदावरी तक में बहुत पानी बह चुका है.

इस बीच, वैश्विक स्तर पर भी और देश में भी वाम-क्रांतिकारी राजनीति में बहुत कुछ बदल गया है. राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय राजनीतिक परिस्थितियों में बहुत बदलाव आया है. इस बीच, दुनिया भर में खासकर लातिन अमेरिका और दक्षिण पूर्वी एशिया में शासक वर्गों के तीखे हमलों के कारण माओवादी पार्टियों और आन्दोलनों को भारी नुकसान उठाना पड़ा है और वे ढलान पर हैं.

दूसरी ओर, नेपाल में नेकपा (माओवादी) ने न सिर्फ हथियार डालकर खुली लोकतांत्रिक राजनीति में दखल देने का ऐतिहासिक फैसला किया बल्कि चुनाव लड़कर सत्ता में भागीदारी भी की है. लेकिन भारत में लगता है कि भाकपा (माओवादी) ने दुनिया भर और खुद देश के अनुभवों से कोई खास सबक नहीं सीखा है.
उसकी सशस्त्र क्रान्ति की लाइन पर अत्यधिक जोर और उसके कारण बंदूक पर अति निर्भरता ने उसकी राजनीति को न सिर्फ पीछे ढकेल दिया है बल्कि राजनीतिक रूप से भी वह अलग-थलग पड़ गई है. यही नहीं, इसके कारण वह पुलिस और अर्द्ध सैनिक बलों के साथ एक ऐसे घिसाव-थकाव की लड़ाई में फंस गई है जहाँ उसे रणनीतिक और सैन्य रूप से भी ज्यादा नुकसान उठाना पड़ रहा है.
क्या यह सच नहीं है कि भाकपा (माओवादी) की केन्द्रीय समिति के आधे से अधिक सदस्य या तो गिरफ्तार कर लिए गए हैं या मारे गए हैं? यही नहीं, भारतीय राज्य ने माओवाद के खिलाफ जिस तरह से युद्ध छेड दिया है, उसका मुकाबला सिर्फ सैन्य प्रतिकार या गुरिल्ला युद्ध से नहीं किया जा सकता है. ऐसा कोई भी मुकाबला आत्मघाती होगा.

इस युद्ध का जवाब सिर्फ आम जनता की एकजुटता और जन-प्रतिरोध से ही दिया जा सकता है.

लेकिन छत्तीसगढ़ के ताजा सैन्य हमले को देखकर लगता है कि भाकपा (माओवादी) अपनी सैन्य ताकत को लेकर अति-आत्मविश्वास का शिकार हो गई है.

ऐसे ही, अति-आत्मविश्वास के कारण श्रीलंका में एल.टी.टी.ई (लिट्टे) का सफाया हो गया जबकि लिट्टे की सैन्य ताकत और लड़ने की तैयारी भाकपा (माओवादी) से कई गुना ज्यादा थी.

दूर जाने की जरूरत नहीं है. इसी सैन्य दुस्साहसवाद के कारण खुद भाकपा (माओवादी) को जिस तरह से आंध्र प्रदेश में बड़े धक्के लगे और वहां से पीछे हटना पड़ा, वह किसी से छुपा नहीं है. यही नहीं, पश्चिम बंगाल में लालगढ़ में कोटेश्वर राव उर्फ किशनजी के अर्द्धसैनिक बलों के हाथों मारे जाने और पूरे आंदोलन को धक्के की घटना भी बहुत पुरानी नहीं है.

कहने की जरूरत नहीं है कि भारतीय राज्य न तो सैन्य रूप से और न ही राजनीतिक रूप से इतना कमजोर है कि उसे देश के एक छोटे से इलाके में गुरिल्ला टुकडियों और ‘मुक्त क्षेत्र’ की ताकत के बल पर परास्त किया जा सके.

सच पूछिए तो कांग्रेस नेताओं पर इस तरह से हमला और उनकी हत्या करके भाकपा (माओवादी) खुद ही शासक वर्गों के ट्रैप में फंस गई है जो माओवादी आंदोलन को कुचलने के लिए और अधिक सैन्य ताकत के इस्तेमाल का बहाना तलाश रहा था.
इस तरह उसने खुद ही सैन्य दमन को आमंत्रित किया है और शासक वर्ग की पार्टियों को एकजुट कर दिया है. यह अराजक सैन्य दुस्साहसवाद उसे बहुत भारी पड़ सकता है. साफ़ है कि माओवादी राजनीति हिंसा-प्रतिहिंसा की एक अंधी गली में फंस गई है. उसकी राजनीति पर बंदूक के हावी होने और राजनीति के पीछे चले जाने के कारण पार्टी कोई भी राजनीतिक पहल नहीं कर पा रही है.
यहाँ तक कि कई क्षेत्रों और इलाकों में भाकपा (माओवादी) के राजनीतिक नेतृत्व का अपनी सशस्त्र गुरिल्ला टुकडियों पर नियंत्रण नहीं रह गया है. इस तरह के कई हथियारबंद दस्ते न सिर्फ वसूली दस्ते में पतित हो गए हैं बल्कि कुछ एक-दूसरे का ही खून बहाने पर उतर आए हैं. झारखण्ड में कुछ दस्ते तो पुलिस और अर्द्ध सैनिक बलों के एजेंट बन गए हैं.

लेकिन इसमें हैरानी की बात नहीं है. बंदूक पर अति निर्भरता के कारण ऐसा कई और आन्दोलनों के साथ पहले भी हो चुका है. पिछले कुछ महीनों में खुद भाकपा (माओवादी) के अंदर से जिस तरह की बहसें (जैसे उडीसा में राज्य सचिव सब्यसाची पांडा के विद्रोह) सामने आईं हैं, उससे साफ़ है कि माओवादी राजनीति के अंतर्विरोध बढ़ते जा रहे हैं.
 
अफसोस यह है कि इसपर पुनर्विचार करने के बजाय इसे सुकमा हमले जैसी धमाकेदार सैन्य कार्रवाइयों से ढंकने की कोशिश की जा रही है. लेकिन इससे अंतत: रैडिकल बदलाव की राजनीति का ही नुकसान हो रहा है.                      

('राष्ट्रीय सहारा' के 1 जून के अंक में 'हस्तक्षेप' में प्रकाशित टिप्पणी)