शनिवार, मार्च 01, 2008

आर्थिक सर्वेक्षण का राजनीतिक अर्थशास्त्र...

चुनावों से पहले कांग्रेस वामपंथियों से पीछा छुड़ाने की तैयारी में..?

 

ताजा आर्थिक सर्वेक्षण की मानें तो अर्थव्यवस्था के साथ सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा है. उसके मुताबिक अर्थव्यवस्था की तस्वीर न सिर्फ गुलाबी है बल्कि उसका दावा है कि वह उच्च विकास दर के स्थायी दौर में पहुंच गई है.

चुनाव वर्ष होने के कारण यह स्वाभाविक भी है कि मनमोहन सिंह सरकार अर्थव्यवस्था की ऊंची विकास दर का श्रेय लेने की कोशिश करें. हालांकि सर्वेक्षण में यह तथ्य दबी जुबान से स्वीकार किया गया है कि चालू वित्तीय वर्ष में अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर पिछले वर्ष की तुलना में लुढ़ककर 8.7 प्रतिशत रह जाने का अनुमान है.

 

यही नहीं, सर्वेक्षण में यह भी स्वीकार किया गया है कि तमाम कोशिशों के बावजूद कृषि क्षेत्र के प्रदर्शन में सुधार नहीं हो रहा है. चालू वित्तीय वर्ष में कृषि विकास दर पिछले वर्ष के 3.8 प्रतिशत से गिरकर मात्र 2.6 फीसदी रह जाने का अनुमान है.

 

कृषि क्षेत्र की लगातार बद से बदतर होती स्थिति का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि दसवीं पंचवर्षीय योजना 2002-2007 के दौरान जब अर्थव्यवस्था नौ प्रतिशत की औसत दर से कुलांचे भर रही थी तो कृषि मात्र ढाई फीसदी की कछुए की विकास दर से घिसट रही थी.

 

स्थिति यह हो गई है कि सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में कृषि का योगदान 2001-02 के 24 फीसदी से लुढ़कता हुआ चालू वित्तीय वर्ष में मात्र 17.5 फीसदी रह गया है. जिस कृषि क्षेत्र पर देश की दो तिहाई आबादी की आजीविका निर्भर करती है, उसके हिस्से जीडीपी का मात्र 1/6 से भी कम आता है.

 

इसी तरह सर्वेक्षण मजबूरी में यह भी स्वीकार करता है कि उद्योग क्षेत्र के प्रदर्शन में भी गिरावट आई है. दूसरी ओर, वह बढ़ती महंगाई का भी जिक्र करता है. लेकिन अर्थव्यवस्था की इन सभी कमजोर पहलुओं के उल्लेख के बावजूद सर्वेक्षण का कहना है कि चिंता की कोई बात नहीं है. उसका कहना है कि यह स्थिति बदल सकती है, बशर्ते सरकार व्यापक आर्थिक सुधारों का रास्ता साफ करे. कहने की जरूरत नहीं है कि यह कहते हुए ताजा आर्थिक सर्वेक्षण अर्थव्यवस्था की रफ्तार में आई गिरावट को बहाना बनाकर सुधारों की अगली खेप लोगों के गले उतारना चाहता है.

 

यूपीए सरकार के पिछले चार सर्वेक्षणों की तुलना में ताजा सर्वेक्षण बहुत आगे बढ़कर व्यापक आर्थिक सुधारों की वकालत करता है. सर्वेक्षण में कहा गया है कि फैक्ट्री कानून में संशोधन करके काम के घंटों को प्रति सप्ताह 48 घंटे से बढ़ाकर 60 घंटे कर दिया जाए. जरूरत पड़ने पर इसे बढ़ाकर 72 घंटे भी करने की सिफारिश की गई है बशर्ते प्रतिदिन दो अतिरिक्त घंटों के लिए ओवरटाईम दिया जाए.

 

यही नही वामपंथी दलों को चिढ़ाने वाले अंदाज में सर्वेक्षण में बीमा क्षेत्र में विदेशी निवेश की सीमा 49 फीसदी तक बढ़ाने और चीनी, उर्वरक और दवा क्षेत्र को विनियंत्रित करने के साथ ही कोयला खनन क्षेत्र में निजी क्षेत्र की भागीदारी सुनिश्चित करने की सिफारिश की गई है. इसके साथ ही पिछले दरवाजे से विनिवेश और निजीकरण की भी कोशिश की गई है. सर्वेक्षण का कहना है कि मुनाफे में चल रही सभी गैर-नवरत्न कंपनियों को शेयर बाजार में सूचीबद्ध करने के लिए पांच से दस प्रतिशत शेयर बेचे जाने चाहिए.

 

यह सचमुच आश्चर्य की बात है कि यूपीए सरकार का पांचवां आर्थिक सर्वेक्षण न्यूनतम साझा कार्यक्रम के दायरे को लांघते हुए ऐसी सिफारिशें करता है जो वामपंथियों के साथ-साथ उसके कई घटक दलों को भी मंजूर नहीं है. आखिर सर्वेक्षण अर्थव्यवस्था का लेखा-जोखा होने के साथ-साथ सरकार की आर्थिक सोच और दर्शन की भी झलक देता है.

 

ऐसे में, सवाल यह है कि क्या यूपीए खासकर कांग्रेस चुनावों से पहले वामपंथियों से नाता तोड़ने की तैयारी में है. आज चिदंबरम के बजट से यह साफ हो जाएगा कि वामपंथी दलों और यूपीए की दोस्ती कितने दिन चलेगी....?

आर्थिक सर्वेक्षण: आर्थिक सुधारों के भारी डोज की सिफारिश...

क्या यूपीए वामपंथी दलों से पीछा छुड़ाने की तैयारी कर रही है?

 

ऐसा लगता है कि यूपीए सरकार ने वामपंथी दलों से पीछा छुड़ाने का मन बना लिया है. पहले राष्ट्रपति के अभिभाषण में अमेरिका के साथ परमाणु करार समझौते की कामयाबी की उम्मीद जाहिर करके वामपंथी दलों को उकसाने का कोशिश की गई. और अब अपने पांचवें आर्थिक सर्वेक्षण में व्यापक आर्थिक सुधारों की वकालत के जरिए मनमोहन सिंह सरकार ने वामपंथी दलों को चिढ़ाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी है.

 

आर्थिक सर्वेक्षण में सिफरिश की गई है कि फैक्ट्री कानून में संशोधन करके मौजूदा प्रति सप्ताह 48 घंटे काम को बढ़ाकर प्रति सप्ताह 60 घंटे कर दिया जाए. इसका अर्थ यह हुआ कि यूपीए सरकार मौजूदा प्रतिदिन आठ घंटे काम के समय को बढ़ाकर दस घंटे करना चाहती है. यही नहीं, इसके साथ ही वह यह भी चाहती है कि मौसमी मांग को पूरा करने के लिए इसे प्रतिदिन बढ़ाकर बारह घंटे करने की इजाजत भी दी जाए. इन अतिरिक्त दो घंटों के लिए ओवरटाईम दिया जा सकता है.

 

कहने की जरूरत नहीं है कि वामपंथी पार्टियां इसे कभी भी स्वीकार नहीं कर सकती हैं. यह सीधे-सीधे वामपंथी दलों को चुनौती देने की तरह है. लेकिन आर्थिक सर्वेक्षण यहीं नहीं रुकता है. पिछले वर्षों से अलग इस साल वह आर्थिक सुधारों के पक्ष में न सिर्फ बहुत मुखर है बल्कि आक्रामक तरीके से उन्हें आगे बढ़ाने की सिफारिश करता है.

 

आर्थिक सर्वेक्षण यह भी सिफारिश करता है कि बीमा क्षेत्र में विदेशी निवेश को बढ़ाकर 49 फीसदी कर दिया जाना चाहिए. उसका यह भी कहना है कि चीनी, उर्वरक और दवाओं को मूल्य नियंत्रण से बाहर कर दिया जाना चाहिए. इसके साथ ही कोयला खनन के क्षेत्र में निजी भागीदारी की अनुमति दी जानी चाहिए.

 

सर्वेक्षण एक कदम आगे बढ़कर मुनाफा दे रही सार्वजनिक क्षेत्र की गैर-नवरत्न कंपनियों को शेयर बाजार में लिस्ट करने के लिए पांच से लेकर दस फीसदी शेयर बेचने की सिफारि करता है. कहने की जरूरत नहीं है कि यह पिछले दरवाजे से विनिवेश और निजीकरण की वकालत है.

 

आश्चर्य की बात तो यह है कि वित्तमंत्री पी चिदंबरम द्वारा पेश आर्थिक सर्वेक्षण यूपीए सरकार के न्यूनतम साझा कार्यक्रम की हदों को पार करते हुए व्यापक आर्थिक सुधारों की सिफारिश करता है.

 

आर्थिक सर्वेक्षण सिर्फ  अर्थव्यवस्था के साल भर के कामकाज का लेखा-जोखा भर नहीं होता है. उसे किसी भी सरकार की आर्थिक सोच और दर्शन का प्रतिबिंब माना जाता है. ऐसे में, यह सचमुच हैरत की बात है कि ताजा आर्थिक सर्वेक्षण न्यूनतम कार्यक्रम को पूरी तरह से ठेंगा दिखाता नजर आता है.

 

सवाल यह है कि ताजा सर्वेक्षण के जरिए वित्त मंत्रालय क्या संदेश देना चाहता है ? यह माना जाता है कि बजट से ठीक पहले आर्थिक सर्वेक्षण आम बजट के लिए मंच तैयार करता है. परंपरा के अनुसार सर्वेक्षण में उठाए गए मुद्दों और सिफारिशों के अनुसार वित्तमंत्री को बजट तैयार करना चाहिए. लेकिन क्या इसका अर्थ यह है कि आज जब वित्तमंत्री आम बजट पेश करेंगे तो उस पर सर्वेक्षण का असर दिखाई देगा ?

 

क्या वह इसी धमाकेदार अंदाज में आर्थिक सुधारों के पैकेज को आगे बढ़ाएगा ? मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों में यह संभव नहीं दिखाई देता. मनमोहन सिंह सरकार वामपंथी दलों से समर्थन पर टिकी है. उन्हें नाराज करके न तो सरकार चल सकती है और न ही बजट पास हो सकता है.

ऐसे में, इस बात की संभावना बहुत अधिक है कि वित्तमंत्री के बजट में मौखिक रूप से आर्थिक सुधारों को बढ़ाने की बातें भले हों लेकिन व्यवहार में पिछले वर्षों की तरह ही सर्वेक्षण और बजट के बीच का फासला बना रहे.

 

उल्लेखनीय है कि पिछले चार आर्थिक सर्वेक्षणों में आर्थिक सुधारों और उदारीकरण की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने की सिफारिशों के बावजूद वित्तमंत्री ने बजट में इस दिशा में कोई बड़ा कदम उठाने से परहेज किया है. असल में, पिछले कुछ वर्षों में आर्थिक सर्वेक्षण की भूमिका आर्थिक सुधारों और उदारीकरण के पक्ष में माहौल बनाने का हो गया है. ताजा सर्वेक्षण भी इसका अपवाद नहीं है.

 

अर्थव्यवस्था को लेकर सर्वेक्षण पिछले वर्षों की तरह इस साल भी बमबम है. यूपीए सरकार ने अर्थव्यवस्था के मामले में एक बार फिर अपनी पीठ ठोंकी है. उसका दावा है कि इस बात में अब किसी को कोई शक नहीं रह जाना चाहिए कि अर्थव्यवस्था उच्च वृद्धि दर के नए दौर में पहुंच गई है. 2003-04 के बाद जीडीपी की विकास दर सालाना औसतन आठ फीसदी से ऊपर पहुंच गई है. सर्वेक्षण में यह स्वीकार किया गया है कि चालू वित्तीय वर्ष 2007-08 में अर्थव्यवस्था की विकास दर पिछले वर्ष के 9.6 प्रतिशत की तुलना में गिरकर 8.7 प्रतिशत रह जाने का अनुमान है.

लेकिन सर्वेक्षण के मुताबिक इसमें चिंता की कोई बात नहीं है. जरूरत सिर्फ इस बात की है कि अर्थव्यवस्था की रफ्तार को नौ फीसदी से ऊपर ले जाने के लिए सर्वेक्षण द्वारा सुझाए गए आर्थिक सुधारों को तेजी से लागू किया जाए.

 

इस तरह सर्वेक्षण बहुत चालाकी के साथ अर्थव्यवस्था की धीमी पड़ती रफ्तार को तेज करने के बहाने आर्थिक सुधारों के पक्ष में राय बनाने की कोशिश करता है. यह सचमुच में बहुत हैरान करने वाला तर्क है कि अर्थव्यवस्था की तेज रफ्तार का श्रेय आर्थिक सुधारों को दिया जाता है. लेकिन वृद्धि दर में गिरावट का दोष सुधारों को आगे न बढ़ाने के मत्थे मढ़ दिया जाता है.

यहां कृषि क्षेत्र का उल्लेख करना जरूरी है. कृषि क्षेत्र आर्थिक सुधारों की मार झेल रहा है. सर्वेक्षण में यह स्वीकार किया गया है कि चालू वित्तीय वर्ष में कृषि क्षेत्र की विकास दर मात्र 2.6 फीसदी रहने का अनुमान है. पिछले वित्तीय वर्ष 2006-07 में कृषि की विकास दर 3.8 फीसदी थी. यही नहीं, कृषि क्षेत्र की विकास दर में लगातार गिरावट के कारण सकल घरेलू उत्पाद
(जीडीपी) में कृषि क्षेत्र का योगदान 2001-02 के 24 फीसदी से घटकर मात्र 17.5 फीसदी रह गया है.

 

इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि कृषि क्षेत्र की स्थिति कितनी खराब है. उससे भी अधिक चिंता की बात यह है कि तमाम घोषणाओं और कार्यक्रमों के बावजूद सुधार तो दूर, स्थिति लगातार बद से बदतर होती जा रही है.

 

लेकिन सर्वेक्षणों में कृषि क्षेत्र की समस्याओं को दूर करने के लिए कुछ पिटी-पिटाई बातों को दोहराने के अलावा कुछ नहीं है. इसी तरह चालू वित्तीय वर्ष में उद्योंग क्षेत्र की वृद्धि दर में गिरावट भी दर्ज की गई है. सर्वेक्षण के मुताबिक चालू वित्तीय वर्ष में विनिर्माण-मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र की वृद्धि दर पिछले वित्तीय वर्ष के 12 फीसदी की तुलना में घटकर 9.4 फीसदी रह गई है. लेकिन सर्वेक्षण में इसकी दवा भी आर्थिक सुधारों को ही बताया गया है.

 

तथ्य यह है कि उद्योग क्षेत्र, ढांचागत क्षेत्र के पर्याप्त विकास न होने, घरेलू मांग में गिरावट के साथ-साथ अमेरिकी मंदी से जूझ रहा है. अर्थव्यवस्था ही नहीं यूपीए सरकार के सामने भी सबसे बड़ी आर्थिक चुनौती यह है कि महंगाई लगातार बढ़ रही है.

 

बढ़ती महंगाई मनमोहन सिंह सरकार के लिए राजनीतिक रूप से बहुत भारी पड़ सकती है. लेकिन सर्वेक्षण इसके लिए मौसमी, ढांचागत बदलाव और अंतरराष्ट्रीय बाजार में जिंसों की कीमतों में वृद्धि को जिम्मेदार ठहराकर और उसका प्रबंधन रिजर्व बैंक के जिम्मे डालकर अपनी जवाबदेही से बच निकलता है.

 

अब देखना यह होगा कि आज बजट पेश करते हुए वित्तमंत्री पी चिदंबरम कृषि की बदतर होती स्थिति को सुधारने और उद्योग क्षेत्र की मुश्किलों को हल करने के साथ महंगाई को नियंत्रित करने के लिए क्या उपाय करते हैं  ? यही नहीं, उनके सामने चुनौती यह भी है कि वे अपने आर्थिक सलाहकारों द्वारा तैयार आर्थिक सर्वेक्षण में सुझाए गए रास्ते पर चलने की हिम्मत कहां तक कर पाते हैं  ? अगर वह इस चुनौती पर खरे नहीं उतरते हैं तो यह सवाल जरूर पूछा जाएगा कि कथनी और करनी में इतना अंतर क्यों है ? उनके बजट से यह भी साफ हो जाएगा कि क्या सचमुच, यूपीए सरकार वामपंथी दलों से पीछा छुड़ाने का मन बना चुकी है....?

चुनावी वैतरणी पार करने की कोशिश...

लालू प्रसाद मास्टर पोलिटिशियन माने जाते हैं और उन्होंने आज 2008-09 का रेल बजट पेश करते हुए यह साबित कर दिया कि उन्हें ऐसा क्यों कहा जाता है. यह रेल बजट चुनावी वर्ष का एक लोकलुभावन बजट है जिसका मकसद यूपीए गठबंधन के लिए अगले आम चुनावों में अधिक से अधिक वोट जुटाना है.

 

हालांकि इसके लिए लालू प्रसाद की खूब आलोचना होगी लेकिन यह याद रखना चाहिए कि एक राजनेता आखिर राजनेता होता है. लालू प्रसाद भी इसके अपवाद नहीं हैं. रेल बजट ने यह साबित कर दिया है कि वे राजनेता पहले हैं और रेलमंत्री बाद में.

 

इसमें कोई दो राय नहीं है कि लालू प्रसाद ने पिछले पांच बजटों में यात्री किराये में सीधे कोई बढ़ोत्तरी न करके एक रिकार्ड कायम किया है. इसका श्रेय उन्हें मिलना चाहिए. यही नहीं, उन्होंने लगातार उच्च श्रेणी के किरायों में कटौती करके मध्यवर्ग का दिल जीतने की भी कोशिश की है. उनके बजट में ऐसे कई प्रस्ताव हैं जिनका स्वागत किया जाना चाहिए. हालांकि उनमें से कई प्रस्ताव पहले भी लागू हो सकते थे लेकिन देर आयद, दुरुस्त आयद.

 

हर बार की तरह इस बार भी लालू प्रसाद ने रेलवे को भारी मुनाफा होने का दावा किया है. इसमें कुछ सच्चाई है, कुछ ट्रिक है और कुछ अर्थव्यवस्था के शानदार प्रदर्शन का नतीजा. तथ्य यह है कि रेलवे को पिछले कुछ वर्षों में मुनाफा इसलिए हुआ है क्योंकि अर्थव्यवस्था की तेज रफ्तार और गतिशीलता के साथ-साथ पिछले बजटों में माल भाड़े के तार्किकीकरण के कारण रेलवे को अधिक माल ढुलाई का फायदा मिला है.

 

खुद रेलमंत्री ने स्वीकार किया है कि माल भाड़े में लीन सीजन डिस्काउंट देकर और पीक सीजन सरचार्ज लगाकर रेलवे ने दो हजार करोड़ रुपए की अतिरिक्त कमाई की है. इसी तरह रेलों में अतिरिक्त यात्री डिब्बे जोड़कर रेलवे ने और दो हजार करोड़ रुपए की अतिरिक्त कमाई की है.

 

इसी तरह मालगाड़ियों पर पे लोड बढ़ाकर रेलवे ने चौदह हजार करोड़ रुपए का अतिरिक्त राजस्व अर्जित किया है. जाहिर है कि रेलमंत्री ने बहुत चालाकी के साथ लोगों की जेब से पैसे निकाल लिया लेकिन लोग इस धोखे में रह गए कि लालू प्रसाद ने किराया नहीं बढ़ाया है.

 

इसके साथ ही लालू प्रसाद ने रेलवे के निजीकरण के बारे में पूर्व रेलमंत्री नीतीश कुमार के समय तैयार राकेश मोहन समिति की सिफारिशों को किस्तों में लागू किया है. दरअसल, लालू प्रसाद की खासियत यह है कि निजीकरण की कड़वी गोली भी लोकलुभावन घोषणाओं की चाशनी में लपेटकर पेश करते हैं.

 

उनका रेल बजट इस बात का उदाहरण है कि अगर कोई राजनेता किसी रेल जैसी कॉरपोरेट कंपनी का बजट पेश करे तो वह कैसा होगा. इस बजट में भी रेलमंत्री का सबसे अधिक जौर रेलवे के मुनाफे को अधिक से अधिक बढ़ाने पर है.

 

सवाल यह है कि अगर रेल एक व्यावसायिक सेवा से अधिक सामाजिक सेवा है तो उसे एक निजी कंपनी की तरह भारी मुनाफे की चिंता क्यों करनी चाहिए ? इसके साथ ही रेलमंत्री को मुनाफे से अधिक रेलयात्रियों की सुविधाओं और सुरक्षा की चिंता करनी चाहिए.

 

अफसोस की बात यह है कि पिछले सभी बजटों में लालू प्रसाद ने यात्री सुविधाओं और सुरक्षा को प्राथमिकता देने की बात जरूर की लेकिन व्यवहार में सुविधाएं राजधानी और शताब्दी एक्सप्रेस तक सीमित रह गई हैं जबकि सुरक्षा तो हमेशा की तरह भगवान भरोसे है.

 

यह एक ऐसा पहलू है जिसकी उपेक्षा यात्रियों के कीमती जीवन की कीमत पर की जा रही है. इसके साथ ही यात्री सुविधाएं सबसे पहले पैसेंजर ट्रेनों और सामान्य यात्री डिब्बों के साथ-साथ छोटे स्टेशनों तक पहुंचनी चाहिए. रेल सिर्फ दिल्ली, मुंबई और कुछ बड़े महानगरों और उच्च श्रेणी के यात्रियों के लिए नहीं है.

 

बहरहाल, लालू प्रसाद ने एक लोकलुभावन बजट पेश कर अपने कैबिनेट साथी वित्तमंत्री पी चिदंबरम के लिए एक बड़ी चुनौती पेश कर दी है. निश्यच ही, चिदंबरम से भी एक और ड्रीम बजट की अपेक्षा की जाएगी. अगर यह रेल बजट कोई संकेत है तो 29 फरवरी को पेश किया जाने वाला आम बजट भी इसी तरह लोकलुभावन और चुनावी बजट होना चाहिए.

मंगलवार, फ़रवरी 26, 2008

बजट बे-धड़क…

आखिर गरीबों को दी जाने वाली सब्सिडी पर इतना शोर क्यों मचाया जाता है जबकि टैक्स दरों में कटौती और छूट भी एक तरह की सब्सिडी है.

 

एक बार फिर हर ओर बजट को लेकर चर्चाओं, अनुमानों, आकलनों और उत्सुकताओं का बाजार गर्म है. इससे बजट की महिमा का अंदाजा लगाया जा सकता है.

 

लेकिन सच्चाई यह है कि उदारीकरण के पिछले डेढ़ दशकों में केंद्रीय बजट का महत्व उसी तरह घटता गया है जैसे अर्थव्यवस्था में भारतीय राज्य की भूमिका सिकुड़ती गई है.

 

अब बजट सरकारी आय-व्यय के हिसाब और सार्वजनिक क्षेत्र की योजनाओं की फंडिंग तक सीमित हो गया है. वह नियोजन आधारित अर्थव्यवस्था के नेतृत्वकारी बजट से सिमटकर नवउदारवादी अर्थव्यवस्था का पिछलग्गू बजट बन गया है.

 

वह भारतीय अर्थव्यवस्था का नेतृत्व करने के बजाय निजी क्षेत्र के एक मददगार के बतौर खड़ा हो गया है.

 

इसके बावजूद बजट को लेकर मीडिया, उद्योग और वाणिज्य जगत में इतनी हचचल और चर्चाओं की वजह यह है कि बजट से जैसे-जैसे उसका वास्तविक सत्व कम होता चला गया है, वैसे-वैसे उसके साथ ड्रामा और धूम-धड़ाके का जोर बढ़ता चला गया है.

 

दरअसल, बजट सिर्फ आय-व्यय का ब्यौरा नहीं बल्कि वह सरकार की अर्थनीति की दिशा और उसकी राजनीतिक-सामाजिक प्रतिबद्धताओं का ऐलान है.

 

उसकी भूमिका पूरी अर्थव्यवस्था को दिशा देने की है लेकिन सच यह है कि बजट न सिर्फ अपनी यह भूमिका खो चुका है बल्कि पूरी तरह से प्रभावशाली औद्योगिक, वाणिज्यिक लॉबी, संगठनों और विश्व बैंक-मुद्रा कोष जैसे अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के कब्जे में चला गया है.

 

बजट का राजनीतिक और आर्थिक महत्व घटने की सबसे बड़ी वजह यह है कि उदारीकरण के पिछले डेढ़ दशकों में अर्थनीति लगभग पूरी तरह से राजनीति से अलग और स्वतंत्र हो चुकी है.

 

जाहिर है यह अपने आप नहीं हुआ है. वह उदारवाद का आर्थिक दर्शन इसी विचार पर टिका हुआ है कि अर्थनीति को राजनीति से अलग कर देना चाहिए.

 

सतही तौर पर विचार बहुत लुभावना लगता है लेकिन अर्थनीति यानी बजट को राजनीति से अलग या स्वतंत्र करने की मांग वास्तव में अर्थनीति को आम लोगों खासकर कमजोर वर्गों की जरूरतों, आकांक्षाओं और इच्छाओं को स्वतंत्र करने की मांग है.

 

आखिर राजनीति क्या है ?  राजनीति वास्तव में जनसमुदाय के विभिन्न वर्गों की अपनी मांगों, आकांक्षाओं और उम्मीदों को अभिवयक्त करने और उसे आगे बढ़ाने की कला है.

 

सवाल यह है कि अर्थनीति राजनीति से स्वतंत्र क्यों होनी चाहिए. कारण बिल्कुल साफ है. अर्थनीति आम लोगों खासकर गरीबों और कमजोर वर्ग की इच्छाओं और आकांक्षाओं का बोझ उठाने को तैयार नहीं है.

 

लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि अर्थनीति का राजनीति से कोई संबंध नहीं रह गया है. राजनीति अब भी है लेकिन वह अमीर और प्रभावशाली वर्गों की राजनीति है जिसने अर्थनीति और बजट को अपने कब्जे में ले लिया है.

 

अगर ऐसा नहीं है तो हर बजट से पहले वित्तमंत्री पर टैक्स में कटौती का दबाव क्यों बढ़ जाता है ? क्यों पी चिदंबरम के उसी बजट को ड्रीम बजट माना जाता है जिसमें उन्होंने अमीरों और मध्यम वर्ग को खुश करने के लिए भारी कटौती की थी.

 

आखिर गरीबों को दी जाने वाली सब्सिडी पर इतना शोर क्यों मचाया जाता है जबकि टैक्स दरों में कटौती और छूट भी एक तरह की सब्सिडी है.

 

दरअसल, अर्थनीति और बजट को राजनीति से अलग करने के नाम पर उसे देश के बहुसंख्यक समुदाय की जरूरतों और इच्छाओं से अलग कर दिया गया है.

 

इसका एक और प्रमाण है एनडीए सरकार द्वारा पारित वित्तीय जवाबदेही और बजट प्रबंधन कानून (एफआरबीएम) जिसे यूपीए सरकार ने अपने पहले बजट से ठीक एक सप्ताह पहले लागू कर दिया था.

 

यह कानून वित्तमंत्री के साथ-साथ पूरी संसद का हाथ बांध देता है कि वह जीडीपी की एक पूर्व निर्धारित सीमा से अधिक वित्तीय और राजस्व घाटा बजट में नहीं आने दे सकते हैं.

 

यह कानून इसलिए पारित किया गया था कि वित्तमंत्री इसकी दुहाई देकर बजट में जनकल्याण के कार्यक्रमों पर खर्च करने की मांग से बच सकेंगे.

 

आश्चर्य नहीं है कि चिदंबरम अपने हर बजट में इस कानून का हवाला जरूर देते हैं और वित्तीय घाटा कम करने के लिए अपनी पीठ ठोंकते हैं.

 

लेकिन इस कारण बजट न सिर्फ अपना महत्व खोता जा रहा है बल्कि वह आम लोगों के जीवन और उनके सुख-दुख से भी दूर होता जा रहा है.

 

आज निजीकरण और अर्थव्यवस्था से भारतीय राज्यों के पीछे हटने के कारण अर्थनीति की दिशा बड़ी देशी-विदेशी पूंजी तय कर रही है.

 

जाहिर है कि इस पूंजी की जान शेयर बाजार में बसती है. आश्चर्य नहीं है कि हर वित्तमंत्री बजट पेश करते हुए शेयर बाजार के सूचकांक पर निगाह लगाए रहता है.

 

लेकिन बजट जब शेयर बाजार को खुश करने के लिए बनने लगे तो उस बजट की राजनीति को समझना मुश्किल नहीं है.

रविवार, फ़रवरी 03, 2008

उदारीकरण के डेढ़ दशक...

इस आर्थिक समुद्र मंथन का अमृत अमीरों और विष गरीबों के हिस्से

भारत में आर्थिक उदारीकरण की प्रक्रिया को शुरू हुए डेढ़ दशक से अधिक हो गए. इन पंद्रह वर्षों में, गंगा से गोदावरी तक बहुत पानी बह गया. इसमें कोई दो राय नहीं है कि इन डेढ़ दशकों में "इंडिया" की सूरत बहुत बदल गई है. इस समय दुनिया भर में "इंडिया" अपने अरबपतियों की लगातार बढ़ती संख्या के लिए सुर्खियों में है.
 
अर्थव्यवस्था की विकास दर 9 फीसदी से ऊपर पहुंच चुकी है. हिंदू विकास दर अतीत की बात हो चुकी है. "इंडिया" चमक रहा है और माना जा रहा है कि देश अगले दशक के मध्य तक विकसित देशों की कतार में पहुंच जाएगा.
 
लेकिन अफसोस के साथ कहना पड़ता है कि देश में अरबपतियों और खरबपतियों की तेजी से बढ़ती संख्या के साथ गरीबों की तादाद में उस तेजी से कमी नहीं आ रही है जिसकी आर्थिक उदारीकरण से अपेक्षा की गई थी. इस मायने में यह एक उदास करनेवाली परिघटना है.
 
यह एक कड़वी सच्चाई है कि आर्थिक उदारीकरण और भूमंडलीकरण के समुद्र मंथन से पिछले 15 सालों में निकले तीव्र आर्थिक विकास का अमृत अमीर पी रहे हैं जबकि गरीबों के हिस्से में एक बार फिर विष आया है.
 
विश्व बैंक के ताजा आंकड़ों के मुताबिक भारत में प्रतिदिन एक डॉलर से कम की आय में गुजर-बसर करनेवाले लोगों की तादाद 1994 में कुल आबादी की 45 फीसदी थी जो पिछले दस सालों में घटने के बावजूद अब भी 34.3 फीसदी पर बनी हुई है.
 
स्वयं योजना आयोग ने स्वीकार किया है कि 1993 से 2004 के बीच गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले भारतीयों की तादाद में प्रति वर्ष सिर्फ 0.74 प्रतिशत की कमी आई है, जबकि इससे पहले 1983 से 1993-94 के बीच गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करने वाले लागों की तादाद में प्रति वर्ष 0.85 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई थी.
 
स्पष्ट है कि आर्थिक उदारीकरण के पिछले 15 वर्षों में सकल घरेलू उत्पाद की दर में वृद्धि के बावजूद उसका फायदा गरीबों को नहीं मिला है. हालांकि आर्थिक उदारीकरण और भूमंडलीकरण के समर्थकों का यह दावा रहा है कि तीव्र आर्थिक विकास दर के साथ आने वाली समृद्धि की बाढ़ में गरीबों की नौकाएं भी उपर आ जाती हैं.
 
लेकिन हकीकत इसके ठीक उलट है. सच यह है कि जिस तेजी से कॉरपोरेट क्षेत्र के मुनाफे में वृद्धि हो रही है, उसकी तुलना में लोगों के वेतन में वृद्धि  नहीं हो रही है बल्कि उसमें गिरावट दर्ज की जा रही है.
 
पिछले पांच वर्षों में जीडीपी के अनुपात में कॉरपोरेट क्षेत्र का मुनाफा वर्ष 2002 के 3.7 प्रतिशत से उछल कर 2007 में 9.1 प्रतिशत तक पहुंच गया है जबकि वेतन जीडीपी की तुलना में 2002 के 31 फीसदी से घटकर 28.7 फीसदी रह गया है.

दोहराने की जरूरत नहीं है कि तीव्र आर्थिक विकास दर से देश में गरीबी घटने की बजाए आर्थिक विषमता और गैर-बराबरी बहुत तेजी से बढ़ी है. अमीर और गरीब, अर्धशहरी और ग्रामीण तथा समृद्ध और पिछड़े राज्यों के बीच की खाई लगातार बढ़ती जा रही है.
 
विश्व बैंक ने भी स्वीकार किया है कि भारत में आय/ उपभोग पर आधारित असमानता तेजी से बढ़ रही है. इसकी वजह यह है कि हाल के वर्षों में आई समृद्धि मुख्यत: तीन क्षेत्रों- शेयर बाजार, रियल इस्टेट और प्रॉपर्टी तथा सोने तक सीमित रही है.

दुनिया की जानी-मानी कंसल्टेंसी कंपनी मार्गन स्टेनली के भारतीय कार्यकारी निदेशक चेतन आहया के मुताबिक पिछले चार वर्षों में भारत की संपदा में लगभग एक खरब डॉलर से अधिक की वृद्धि हुई है. लेकिन इस संपदा वृद्धि का लाभ बहुत सीमित तबके को मिला है.
 
आहया के अनुसार भारतीय शेयर बाजार का पूंजीकरण मार्च 2003 के 120 अरब डॉलर से बढ़कर मई 2007 में एक खरब डॉलर तक पहुंच गया है. अगर इसमें विदेशी और सरकारी कंपनियों के स्वामित्व वाले हिस्से को निकाल दिया जाए तो घरेलू शेयरधारकों की परिसंपत्तियों में लगभग 570 अरब डॉलर की वृद्धि दर्ज की गई है.
 
लेकिन इसका लाभ कितने लोगों को मिला है?
 
सेबी के अनुसार देश में कुल आबादी के सिर्फ 4 से 7 फीसदी लोगों के पास शेयर हैं. इसमें भी कंपनियों के मालिकों का हिस्सा बहुत बड़ा है. आहया के मुताबिक 570 अरब डॉलर में 350 अरब डॉलर कंपनियों के मालिकों के हिस्से में गया है.
 
दरअसल, अनिल और मुकेश अंबानी के खरबपति होने का राज भी इसी में छिपा हुआ है. दोनों के खरबपति होने की वजह यह है कि उनकी कंपनियों के शेयरों की कीमतों में हाल के महीनों में भारी वृद्धि दर्ज की गई है. इस कारण उनका बाजर पूंजीकरण खरबों में पहुंच गया है और उन कंपनियों में उनका हिस्सा 55 फीसदी से अधिक होने के कारण ही वे भी खरबपति हो गए हैं.
 
लेकिन अनिल और मुकेश अंबानी के खरबपति होने से जुड़ी एक विडंबना यह भी है कि एक आम भारतीय और इन खरबपति भाईयों के बीच आय का अनुपात जो कुछ वर्षों पहले तक 1,90,000 का था, वह बढ़कर 11,00,000 से ऊपर पहुंच गया है.
 
यानि सुपर अमीरों और आम आदमी के बीच की खाई और गहरी और चौड़ी होती जा रही है. साफ है कि उदारीकरण की लक्ष्मी गरीबों और आम आदमियों के घर का रुख करने की बजाय आबादी के एक छोटे हिस्से सुपर अमीरों के घर में कैद होकर रह गई है.
 
जाहिर है कि यह खुश होने का नहीं बल्कि उदास होने का वक्त है.
 
इसे देखकर ऐसा लगता है कि लक्ष्मी अमीरों के घर कैद हो गई है. इस लक्ष्मी का रंग काला है.
 
तथ्य यह है कि देश में काले धन में लगातार वृद्धि हो रही है. हालांकि आर्थिक उदारीकरण और कर सुधारों के समर्थकों का दावा था कि जैसे-जैसे आर्थिक सुधारों की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी, देश में काला धन कम होता जाएगा. लेकिन सच यह है कि 1983 में देश में कुल काले धन का अनुमान लगभग 36,786 करोड़ रुपए का था जो आज बढ़कर लगभग नौ लाख करोड़ रुपए तक पहुंच गया है.
 
एक मोटे अनुमान के अनुसार देश में हर साल जीडीपी के 40 फीसदी के आसपास काला धन पैदा होता है. यही वह काला धन है जो शॉपिंग मॉल्स में चमकता और बिखरता हुआ दिखाई पड़ता हैं.
 
यह यूंही नहीं है कि देश में अचानक दुनिया भर के सभी लग्जरी ब्रांडों के निर्माता भागे चले आ रहे हैं. लुई विंता से लेकर पोर्शे कार तक दुनिया का कोई भी ऐसा लग्जरी ब्रांड नहीं है जो आज भारत में उपलब्ध नहीं है.
 
करोड़ों रुपए की लग्जरी फ्लैट से लेकर कारों तक के खरीददारों की संख्या दिन पर दिन बढ़ती जा रही है. एक अनुमान के अनुसार पिछले साल अमीर भारतीयों ने लगभग पचास हजार करोड़ का सोना और छह हजार करोड़ रुपए के हीरे खरीदे.
 
कहने की जरूरत नहीं है कि सोना, हीरा और दूसरे सभी लग्जरी ब्रांड्स काले धन को छुपाने और खर्चने के सबसे आसान रास्ते हैं.
 
सच पूछिए तो लक्ष्मी की वास्तविक कृपा इस देश के अरबपतियों और करोड़पतियों पर हुई है. गुलाबी अखबारों में आए दिन भारत के अरबपतियों और करोड़पतियों की बढ़ती तादाद पर खबरें छपती रहती हैं. अरबपतियों और करोड़पतियों की बढ़ती संख्या और उनकी वृद्धि दर के मामले में भारत एशिया के तमाम देशों को पीछे छोड़ चुका है. उनकी संख्या हर साल अर्थव्यवस्था की विकास दर से भी दोगुनी रफ्तार से बढ़ रही है.
 
लेकिन यूएनडीपी का कहना है कि अरबपतियों और करोड़पतियों के साथ देश में गरीबों की संख्या भी लगातार बढ़ रही है. देश की लगभग 80 फीसदी आबादी आज भी प्रतिदिन 2 डॉलर से कम की आय पर अपना जीवन निर्वाह कर रही है.
 
असल में, अरबपतियों और करोड़पतियों के घरों में लक्ष्मी बरस रही है. यह आर्थिक उदारीकरण और भूमंडलीकरण के कारण संभव हुआ है.
 
विश्व बैंक की एक रिपोर्ट के मुताबिक 1987-88 से 1999-2000 के बीच देश के सबसे अमीर 0.1 फीसदी हिस्से की आय में 285 फीसदी की वृद्धि हुई है और वह सालाना लगभग 1,60,000 डॉलर प्रतिव्यक्ति तक पहुंच गई है.
 
पिछले पांच वर्षों में यह प्रक्रिया और सघन हुई है. शेयर बाजार से लेकर कमोडिटी बाजार तक जो बूम दिखाई पड़ रहा है, उसका लाभ कुल आबादी के मुश्किल से चार से पांच फीसदी लोगों को मिला है. उनके लिए यह उदारीकरण दिवाली है लेकिन बाकी लोगों के लिए यह दिवाला है.