मंगलवार, मार्च 20, 2012

चैनलों पर कयासों के विशेषज्ञ

चैनलों पर विशेषज्ञों की अद्द्भुत प्रजाति और उनकी चुनावी सिद्धूवाणी

विधानसभा चुनाव खत्म हुए और इसके साथ चैनलों पर अहर्निश जारी चुनावी तमाशा भी खत्म हुआ. एक बार फिर वोटर चैनलों के एंकरों, राजनीतिक संपादकों, रिपोर्टरों और मेरे जैसे अनाड़ी राजनीतिक विशेषज्ञों से ज्यादा तेज निकले. उत्तराखंड को छोडकर बाकी सभी राज्यों में स्पष्ट जनादेश देकर वोटरों ने सभी तरह के राजनीतिक सस्पेंस और उठापटक और उसमें फलने-फूलने वाले चैनलों के लिए कयास लगाने की गुंजाइश को खत्म करा दिया.

एक बार फिर कई एक्जिट और ओपिनियन पोल वोटरों के मन को पकड़ने में नाकाम रहे तो कई वास्तविक नतीजों से काफी आगे-पीछे रहने के बावजूद रुझानों का सही अनुमान लगाने में कामयाब रहे. एक बार फिर साबित हुआ कि एक्जिट पोल और ओपिनियन पोल बड़े जोखिम हैं खासकर वोटों के प्रतिशत और सीटों के अनुमान के मामले में गणित अक्सर गड़बड़ा जा रहा है.

आश्चर्य नहीं कि सी.एन.एन-आई.बी.एन पर राजनीतिक विज्ञानी और सेफोलाजिस्ट योगेन्द्र यादव ने एक्जिट पोल में उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और पंजाब के बारे रुझानों के बारे में काफी हद तक सही पूर्वानुमानों के बावजूद इस धंधे को अलविदा कहने का एलान कर दिया है. अफसोस इस धंधे में गंभीर और ईमानदार खिलाड़ी होने के बावजूद उन्होंने रिटायर होने का एलान कर दिया.

लेकिन योगेन्द्र यादव रहें या न रहें, न्यूज चैनल एक्जिट और ओपिनियन पोल या कहें चुनावों के संभावित नतीजों को लेकर कयास लगाये बिना नहीं रह सकते हैं. इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि उसमें एक सस्पेंस, सनसनी और ड्रामा है.

असल में, चैनलों समेत समूचे न्यूज मीडिया में चुनाव का मतलब ही कयास और पूर्वानुमान हो गया है. इसी का नतीजा है कि चैनलों और अख़बारों में चुनावों को लेकर होनेवाली स्वतंत्र और बारीक फील्ड रिपोर्टिंग लगातार कम होती जा रही है जबकि चैनलों पर स्टूडियो में होनेवाली बहसों और चर्चाओं, नेताओं की रैलियों, प्रेस कांफ्रेंसों, आरोप-प्रत्यारोपों और उम्मीदवारों के बीच बहस के नाम पर होनेवाले दंगल का शोर-शराबा बढ़ता जा रहा है.

ऐसा नहीं है कि इसके अपवाद नहीं हैं. इस मामले में अखबारों खासकर अंग्रेजी अखबारों ने फील्ड से कई अच्छी रिपोर्टें और चुनाव यात्रा विवरण छापे. इनमें भी खासकर ‘इंडियन एक्सप्रेस’ और ‘द हिंदू’ ने कई बेहतरीन रिपोर्टें और गंभीर विश्लेषण छापे.

इनके संवाददाताओं में स्मिता गुप्ता, विद्या सुब्रहमनियम, सीमा चिश्ती, वन्दिता मिश्र और खुद ‘एक्सप्रेस’ के संपादक शेखर गुप्ता की रिपोर्टें/विश्लेषण राजनीतिक शोर-शराबे से दूर जमीन पर बदल रही राजनीतिक-सामाजिक-आर्थिक सच्चाइयों की वास्तविक तस्वीर पेश कर रहे थे. उनमें गहरी अंतर्दृष्टि, राजनीति और समाज के रिश्ते और उनमें आ रहे बदलावों को समझने की कोशिश थी.


लेकिन इसके उलट ज्यादातर हिंदी अख़बारों और चैनलों ने चुनाव कवरेज का मतलब शोर-शराबा और तमाशा समझ लिया है. मजे की बात यह है कि चुनाव आयोग के निर्देशों के कारण नीचे जमीन पर चुनाव प्रचार में स्टार प्रचारकों के हेलीकाप्टरों और रैलियों के शोर-शराबे के अलावा आमतौर पर बहुत ख़ामोशी थी.

शहरों तक में न बैनर थे, न पोस्टर, न वाल राईटिंग, न होर्डिंग और न नुक्कड़ सभाएं- लगता ही नहीं था कि चुनाव हो रहे हैं. यह मानने के लिए कि चुनाव हो रहे हैं, आपको चैनल और अखबार देखने होंगे क्योंकि चुनावों के साथ जुड़ा सारा हंगामा और राजनीतिक तमाशा वहीँ पहुँच गया है.

खासकर चैनलों के लिए तो इस बार के चुनाव क्रिकेट के तमाशे की भरपाई करते दिखे क्योंकि एक तो कोई बड़ा टूर्नामेंट नहीं हो रहा था और दूसरे, आस्ट्रेलियाई दौरे पर भारतीय टीम बुरी तरह हार रही थी. इसके कारण उसमें न तो वह ड्रामा और न सस्पेंस रह गया था कि चैनल उसके पीछे भागते.
नतीजा, चैनलों ने चुनावों खासकर उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों को २०-२० क्रिकेट मैच और कुछ हद तक डब्ल्यू.डब्ल्यू.एफ कुश्ती में बदल दिया. उसी तरह की लाइव कमेंट्री और उसपर मेरे जैसे कथित वरिष्ठ पत्रकारों और विशेषज्ञों की कभी चुटकुलानुमा और कभी कुछ तथ्य और ज्यादातर अनुमान पर आधारित २० सेकेण्ड की टिप्पणियों का ड्रामा अंत तक चलता रहा.

चूँकि न्यूज चैनल बहुत हो गए हैं और सबको विशेषज्ञ चाहिए, इसलिए इस बार अपन को भी कुछ चैनलों (न्यूज २४, ई.टी.वी और सहारा समय) पर चुनाव विशेषज्ञ बनकर जाने का मौका मिल गया. इस अनुभव के बारे में जितना कहूँ, उतना कम होगा.

अंदर की बात ये है कि ये चुनाव विशेषज्ञ भी अद्दभुत प्रजाति हैं. इनमें से ज्यादातर अख़बारों के पत्रकार और संपादक हैं. वे राजनीति के पंडित और चुनाव शास्त्र के विशेषज्ञ बताये जाते हैं. कुछ मशहूर विशेषज्ञों की तो इतनी मांग थी कि वे इस चैनल से उस चैनल शिफ्ट में भी काम करते दिखे.

कई चैनलों ने अपना जलवा दिखाने के लिए एक-दो या तीन नहीं बल्कि एक दर्जन से ज्यादा विशेषज्ञ अपने न्यूज रूम में जुटा लिए. इस चक्कर में चैनलों में विशेषज्ञ जुटाने की होड़ सी शुरू हो गई. जिसके पास जितने विशेषज्ञ, वह उतना बड़ा चैनल.

इस होड़ में हालात यह हुई कि आखिर में ‘टाइम्स नाउ’ पर अपने अर्नब गोस्वामी ने इतने विशेषज्ञ बुला लिए कि खुद बैठने को जगह नहीं मिली और खड़े-खड़े १०० घंटे तक अहर्निश चर्चा करनी पड़ी. वैसे यह मालूम नहीं कि उन विशेषज्ञों में से कोई इन चुनावों में नीचे जमीन पर झांकने भी गया या नहीं लेकिन वे बात ऐसे करते दिखे जैसे उनका हाथ सीधे जनता की नब्ज पर हो.
यह और बात है कि मुझ समेत उनमें से ज्यादातर की विशेषज्ञता कयास से आगे नहीं बढ़ पाई. अक्सर उनकी विशेषज्ञता ‘यह भी हो सकता है और उसका उल्टा भी हो सकता है’ में उलझ कर रह जा रही थी. रही-सही कसर चैनलों के वाक् चपल एंकरों ने पूरी कर दी जो किसी भी विशेषज्ञ को १५ सेकेण्ड से ज्यादा एयर टाइम देने को तैयार नहीं थे.

इसमें भी उनकी कृपा उन विशेषज्ञों पर ज्यादा बरसी जो १५ सेकेण्ड में चुटीली टिप्पणियों यानी चुनावी सिद्धू-वाणी के उस्ताद हो गए. यह मत पूछिए कि इससे बेचारे टी.वी दर्शक का राजनीतिक ज्ञान और समझदारी कितनी बढ़ी लेकिन इस तमाशे में मनोरंजन की कोई कमी नहीं थी. चैनलों को भला और क्या चाहिए?

('तहलका' के ३० मार्च के अंक में प्रकाशित स्तम्भ का विस्तृत रूप...आप यह टिपण्णी तहलका के वेबसाईट पर भी पढ़ और अपनी राय दे सकते हैं..इसके लिए यहाँ चटका लगायें: http://www.tehelkahindi.com/stambh/diggajdeergha/forum/1144.html )

2 टिप्‍पणियां:

Himank Kothiyal ने कहा…

आनंद भाई, पुरानी कहावत है कि विशेशाग्ग्य उसे कहते हैं जो कम से कम विषयों पर अधिक से अधिक जानकारी रखता हो !!!!! और किसी टिपण्णी की आवश्यकता है क्या???

DHEERAJ ने कहा…

आपकी बातें सही तो हैं पर फिर भी मेरे अनुभव से यह पहला मौका था जब दर्शको को प्रिंट व इलेक्ट्रोनिक मीडिया ने भरपूर या ये कहें की अतिरेक में सूचित करने का काम किया जो लोकतंत्र में राजनीतिक जागरुकता के लिए आवश्यक है