शुक्रवार, दिसंबर 18, 2009

आतंकवाद का ऑक्सीजन बनता मीडिया

आनंद प्रधान
जानेमाने पत्रकार वीर संघवी ने 26/11 के मुंबई आतंकवादी हमलों के दौरान समाचार मीडिया खासकर न्यूज चैनलों की भूमिका की आलोचना करते हुए "हिंदुस्तान टाइम्स" में लिखा है कि मीडिया ने अपनी गलतियों से सबक लिया है. उनका दावा है कि अगर भविष्य में ऐसा कोई आतंकवादी हमला फिर हुआ तो मीडिया इस बार वो गलतियां नहीं दोहराएगा. लेकिन क्या सचमुच टी.वी चैनलों ने 26/11 के कवरेज से कोई सबक लिया है और भविष्य में ऐसी गलती नहीं करेंगे?
२६/11 के बाद पिछले एक साल में और खासकर इस साल उसकी बरसी पर मीडिया और उसमें भी टी,वी चैनलों के कवरेज को देखकर ऐसी कोई उम्मीद नहीं बंधती है. इस कवरेज को देखकर नहीं लगता कि टी.वी चैनलों ने कोई सबक सीखा है. वीर संघवी से शर्त लगाने की इच्छा हो रही है कि अगर दुर्भाग्य से फिर कोई आतंकवादी हमला हुआ तो टी.वी चैनल वही गलतियां दोहराएंगे.
असल में, चैनलों ने 26/11 से सिर्फ एक सबक सीखा है. वह यह कि "अगर खून बहा है तो यही सुर्खी है" (इफ इट ब्लीड्स, इट लीड्स). यानि आतंक बिकता है. आतंक टी.आर.पी की गारंटी बन गया है. सच पूछिए तो चैनलों को खून का स्वाद लग गया है. आतंक उनके लिए यह एक लुभावना फार्मूला बन गया है. खासकर हिंदी समाचार चैनलों को लगता है कि दर्शकों को डराकर चैनल के साथ बांधे रखा जा सकता है. कहने की जरूरत नहीं है कि 26/11 की तकलीफदेह और सुन्न कर देनेवाली स्मृतियां लोगों को डराती,चौंकाती और परेशान करती हैं.
यही कारण है कि चैनल इस या उस बहाने 26/11 के जख्म को हमेशा हरा रखने की कोशिश करते हैं. पिछले एक साल में कभी 26/11 के आतंकवादियों और उनके पाकिस्तानी आकाओं के "एक्सक्लुसिव" टेप सुनाने, गिरफ्तार कसाब की कहानी बताने और लगभग दैनिक तौर पर कभी लश्कर और कभी अन्य आतंकवादी जमातों की अगले हमलों की तैय्यारियों की आधी सच्ची-आधी झूठी रिपोर्टों के बहाने आतंकवाद हिंदी चैनलों के प्राइम टाइम का एक स्थाई विषय बन चुका है. रही-सही कसर चैनलों में तथ्य को "गल्प" और गल्प को तथ्य की तरह पेश करनेवाले भाषा के जादूगर और फेफड़े के जोर से चिल्लाते एंकर पूरा कर देते हैं. चैनलों पर लगभग रोज उबकाई की हद तक पाकिस्तान की पिटाई-धुलाई के साथ अल कायदा, ओसामा और तालिबान का हौव्वा खड़ा किया जाता है.
ऐसे में, चैनल २६/11 की बरसी को भुनाने में कैसे पीछे रह सकते थे? हालांकि इस बरसी से पहले केंद्र सरकार ने सभी समाचार चैनलों को एक निर्देशनुमा सलाह भेजकर अपील की कि वे २६/11 की बरसी पर अपने कार्यक्रमों और रिपोर्टों में "संतुलन" और "जिम्मेदारी" का ध्यान रखें. सरकार ने साफ-साफ कहा कि "२६/11 के आतंकवादी हमले में मारे गए लोगों के शवों,घायलों के खून और चीत्कार, रिश्तेदारों के दर्द आदि के विजुअल्स को बार-बार दिखने से न सिर्फ उस त्रासद और दुखद घटना की यादें ताजा होंगी बल्कि इससे लोगों में डर और असुरक्षा का भाव पैदा करने का आतंकवादियों का बुनियादी मकसद भी पूरा होगा."
लेकिन किसी भी चैनल ने इस सलाह का ध्यान नहीं रखा और उन 60 घंटों को याद करने के बहाने वह सब फिर-फिर दिखाया जो नहीं दिखाने के लिए कहा गया था. इन कार्यक्रमों में तथ्य और तर्क कम और भावनाएं और अतिरेक ज्यादा था. संतुलन के बजाय "हाइपर टोन" हावी था. हमेशा की तरह इंडिया टी.वी सबसे आगे रहा जिसने उस आतंकवादी हमले को एक बार फिर फ़िल्मी अंदाज़ में "रीक्रियेट" किया. इस फिल्म में कुछ तथ्य-कुछ गल्प का ऐसा घालमेल था कि वह सी ग्रेड की मुम्बईया एक्शन फिल्म से ऊपर नहीं उठ पाया. लेकिन इंडिया टी.वी ही क्यों, बाकी हिंदी चैनल भी पीछे नहीं थे.
सबने यहां तक कि सोबर और संतुलित माने जानेवाले अंग्रेजी चैनलों ने भी पूरी नाटकीयता से उन 60 घंटों को पेश किया. शहीदों की याद में एक बार फिर पिछली बार की तरह मास हिस्टीरिया जैसा माहौल बनाने की कोशिश की गई. "टाइम्स नाउ" के अर्नब गोस्वामी तो ऐसा लगता है कि 26/11 से आगे बढे ही नहीं हैं. उनका वश चलता तो 26/11 के बाद भारत ने पाकिस्तान पर हमला बोल दिया होता. हालांकि ऐसा हुआ नहीं लेकिन अर्नब पर इसका कोई खास फर्क नहीं पड़ा है और पाकिस्तान के खिलाफ अभियान जारी है.
लेकिन जाने-अनजाने ऐसा करके चैनल आतंकवादियों की ही मदद कर रहे हैं. याद रखिये आतंकवादियों का सबसे बड़ा उद्देश्य प्रचार पाना होता है. पूर्व ब्रिटिश प्रधानमंत्री मार्गरेट थैचर के शब्दों में कहें तो "आतंकवाद के लिए प्रचार ऑक्सीजन" की तरह है. इसीलिए आतंकवाद को "प्रोपेगंडा बाई डीड" माना जाता रहा है. मुंबई पर हमला करनेवाले आतंकवादियों का मकसद भी दो समुदायों और देशों के बीच नफ़रत पैदा करने से लेकर युद्ध भड़काने के अलावा प्रचार पाना भी था. मीडिया 26/11 को इस तरह और इस हद तक याद कर उन आतंकवादियों की ही तो मदद नहीं कर रहा है?

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