शुक्रवार, मई 17, 2013

मुद्रा कोष के हाथ में है पाकिस्तानी अर्थव्यवस्था का भविष्य

भ्रष्ट पाकिस्तानी शासक वर्ग पूरी तरह परजीवी हो चुका है और नवाज़ शरीफ उसके जाने-पहचाने प्रतिनिधि हैं  

पाकिस्तान के नए प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ की सरकार के सामने सबसे पहली और बड़ी चुनौती अर्थव्यवस्था को संभालने की है. अर्थव्यवस्था की हालत बहुत नाजुक है. वर्ष २००८ के वैश्विक आर्थिक संकट के बाद से पाकिस्तान की जी.डी.पी की औसत वृद्धि दर मात्र ३ फीसदी रह गई है.
यही नहीं, बढ़ते व्यापार और चालू खाते के घाटे के बीच सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि देश के पास सिर्फ दो महीने के आयात के लिए विदेशी मुद्रा बची है. डालर के मुकाबले पाकिस्तानी रुपया लगातार लुढ़कता जा रहा है. रेटिंग एजेंसी स्टैण्डर्ड एंड पुअर्स ने पाकिस्तान की विदेशी मुद्रा में कर्ज की रेटिंग ‘बी’ से घटाकर ‘सी.सी.सी प्लस’ कर दी है जो दिवालिया होने से कुछ ही पायदान ऊपर है.
हैरानी की बात नहीं है कि जब पाकिस्तान चुनावों के बुखार में डूबा हुआ था, वहां की कामचलाऊ सरकार अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आई.एम.एफ) से ५ से ८ अरब डालर के कर्ज के लिए बातचीत कर रही थी. इस सिलसिले में उसने आई.एम.एफ के अलावा अमेरिकी विदेश मंत्रालय के अधिकारियों से भी बातचीत की है और कर्ज के लिए समझौते का मसौदा तैयार कर लिया है.

अब इसपर दस्तखत करने का फैसला नवाज़ शरीफ की सरकार को करना है. हालाँकि उनके पास सीमित विकल्प हैं और उनकी सरकार चाहे तो अर्थव्यवस्था की बेहतरी के वैकल्पिक माडल को आजमा सकती है लेकिन शरीफ के पिछले अतीत और हालिया बयानों को देखते हुए इस बात की उम्मीद बहुत कम है कि वे वैकल्पिक रास्ता चुनेंगे.

आश्चर्य नहीं होगा कि जल्दी ही शरीफ के घोषित वित्त मंत्री इसहाक डार वाशिंगटन में आई.एम.एफ के दरवाजे पर खड़ा दिखाई दें. इससे पहले आसिफ अली ज़रदारी की सरकार ने भी २००८ में ऐसे ही हालत में फंसी अर्थव्यवस्था को संभालने के लिए आई.एम.एफ से ७.६ अरब डालर के कर्ज के समझौते पर दस्तखत किये थे.
८० के दशक से पाकिस्तान आई.एम.एफ से कई बार कर्ज ले चुका है. अब हालत यह हो चुके हैं कि
इस कर्ज की भरपाई के लिए भी कर्ज लेना पड़ रहा है. इसके बावजूद नवाज़ शरीफ की सरकार एक बार फिर आई.एम.एफ के भरोसे है और उसे उम्मीद है कि पाकिस्तान के रणनीतिक महत्व को देखते हुए अमेरिका उसे यह कर्ज जरूर दिलवाएगा.
लेकिन आई.एम.एफ के कर्ज मुफ्त में नहीं आता है. उसके साथ शर्तें भी होती है और माना जा रहा है कि इस बार उसकी शर्तें कुछ ज्यादा ही कड़ी होंगी क्योंकि उसके पिछले कर्ज की शर्तों को लागू करने में बरती गई ढिलाई से वह नाराज है. यहाँ तक कि उसने इस नाराजगी में २०११ में कर्ज की किस्त निलंबित कर दी थी.

आई.एम.एफ की मांग है कि पाकिस्तान सरकार सरकारी कंपनियों का निजीकरण करे, सब्सिडी में कटौती करे खासकर बिजली आदि की दरों में इजाफा करे और टैक्स आधार को बढ़ाकर राजस्व वसूली बढ़ाए और राजकोषीय घाटा घटाए. हालाँकि आई.एम.एफ की ये मांगें नई नहीं हैं और पाकिस्तान की अर्थनीति पिछले तीन दशकों से ज्यादा समय से कमोबेश उसी के बताये रास्ते पर चल रही है.

लेकिन पाकिस्तानी अर्थव्यवस्था को आर्थिक संकटों से निजात नहीं मिल पा रही है और कुछ सालों में वह घूम-फिरकर वैसे ही संकट के मुहाने पर खड़ी हो जाती है. इसके बावजूद नवाज़ शरीफ आई.एम.एफ की मांगों को खुशी-खुशी स्वीकार करने के लिए तैयार हैं क्योंकि वे और उनकी पार्टी नव उदारवादी आर्थिक सुधारों के घोषित समर्थक हैं.
यही नहीं, वे बहुत गर्व से दावा करते हैं कि पाकिस्तान में आर्थिक सुधारों की शुरुआत उन्होंने ही की थी. यह दावा काफी हद तक सही है. पिछली बार जब शरीफ प्रधानमंत्री बने थे, उन्होंने बैंकों से लेकर अन्य दूसरी सरकारी कंपनियों के निजीकरण को आगे बढ़ाया था.
इसके लिए हजारों कर्मचारियों की छंटनी भी की थी. लेकिन शरीफ की सत्ता से बेदखली के बावजूद आर्थिक सुधार जारी रहे. पहले जनरल परवेज़ मुशर्रफ और बाद में ज़रदारी की सरकारों ने भी उसी एजेंडे को आगे बढ़ाया.
इस मामले में भारत और पाकिस्तान में कोई खास फर्क नहीं है. इन दोनों देशों में सरकारों के बदलने के बावजूद आर्थिक नीतियों में कोई खास बदलाव नहीं होता है. दोहराने की जरूरत नहीं है कि पाकिस्तान में लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई सरकार हो या सैनिक सरकार और उसका रंग और झंडा चाहे जो हो लेकिन आर्थिक नीतियों के मामले में सबने विश्व बैंक-मुद्रा कोष निर्देशित नव उदारवादी आर्थिक नीतियों को ही आगे बढ़ाया है.

हैरानी की बात नहीं है कि एक बार फिर सत्ता संभालने से पहले ही नवाज़ शरीफ ने साफ़ कर दिया है कि वे अपने पिछले कार्यकाल के एजेंडे को ही आगे बढ़ाएंगे.

इसका अर्थ यह है कि आनेवाले महीनों में बिजली की भारी किल्लत और कटौती के बावजूद बिजली की दरों में इजाफा होगा. इसके साथ ही, दूसरी अनिवार्य सेवाओं और वस्तुओं की कीमतों में भी बढ़ोत्तरी तय है.
यही नहीं, अगले एक महीने के अंदर इस सरकार को अगले वित्तीय वर्ष का सालाना बजट भी पेश करना है जिसमें आई.एम.एफ की शर्तों के मुताबिक, राजकोषीय घाटे को कम करने के लिए किफायतशारी (आस्ट्रीटी) पर जोर दिया जाएगा. इसका सीधा अर्थ यह है कि आमलोगों खासकर गरीबों पर और अधिक बोझ डाला जाएगा.
नई सरकार से राहतों की उम्मीद कर रहे लोगों के लिए यह जले पर नमक छिड़कने जैसा होगा क्योंकि पिछले तीन-चार सालों से लगातार महंगाई की ऊँची दर ने उनका जीना मुहाल कर रखा है.
लेकिन अर्थव्यवस्था की बदतर होती हालत को सुधारने के नामपर एक बार फिर उनसे कुर्बानी देने की मांग की जाएगी. लेकिन असल सवाल यह है कि क्या लोग इस कुर्बानी के लिए तैयार होंगे?

यह सवाल इसलिए बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि सत्ता में वापसी के बावजूद शरीफ को न तो एकतरफा जनादेश है और न ही पाकिस्तान की विभाजित राजनीति और समाज में आमलोगों को नाराज करके वह बहुत दिनों तक सत्ता में टिके रह पाएंगे.

इस लिहाज से उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती सत्ता में वापसी के बाद न सिर्फ लोगों के समर्थन को
बनाए रखना बल्कि उसके दायरे को बढ़ाना और उनका भरोसा जीतना भी है.

लेकिन यह आसान नहीं है क्योंकि इसके लिए वैकल्पिक अर्थनीति और राजनीति जरूरी है. मुश्किल यह है कि शरीफ के पास न तो कोई वैकल्पिक आर्थिक और राजनीति सोच और दृष्टि है और न ही वैकल्पिक रास्ते तलाशने की राजनीतिक इच्छाशक्ति दिख रही है.
अफ़सोस की बात यह है कि नवाज़ शरीफ और उनके पीछे खड़े पाकिस्तानी शासक वर्गों की सारी उम्मीदें आई.एम.एफ-विश्व बैंक और एशियाई विकास बैंक के कर्जों और अमेरिका और दूसरे विकसित पश्चिमी देशों से मिलनेवाले अनुदानों पर टिकी हैं.
उनका सबसे बड़ा ट्रंप कार्ड यह है कि अमेरिका और बाकी पश्चिमी देश उसे आर्थिक रूप से दिवालिया नहीं होने देंगे क्योंकि उसकी राजनीतिक अस्थिरता का जोखिम वे नहीं उठा सकते हैं.
कहने की जरूरत नहीं है कि पाकिस्तानी शासक वर्ग पूरी तरह से परजीवी हो चुका है. इसका एक बड़ा सबूत यह है कि वह न सिर्फ विदेशी कर्ज और अनुदान पर जीवित है बल्कि वह पाकिस्तान के आंतरिक संसाधनों को भी घुन की तरह चाट रहा है.

क्या यह सिर्फ संयोग है कि पाकिस्तान में चाहे वह आसिफ ज़रदारी की सरकार हों या नवाज़ शरीफ की- दोनों ही भ्रष्टाचार और सार्वजनिक धन की लूट के मामले में एक-दूसरे से होड़ करते नजर आते हैं? कहने की जरूरत नहीं है कि भ्रष्टाचार और सार्वजनिक धन की खुली लूट ने पाकिस्तानी अर्थव्यवस्था को अंदर से खोखला कर दिया है.

इसके सबसे बड़े लाभार्थी के बतौर पाकिस्तानी शासक वर्ग में न तो वह नैतिक साहस बचा है और न ही तैयारी कि वह नए पाकिस्तान के लिए वैकल्पिक राह ले सके.
इसके उलट आशंका यह है कि जल्दी ही नई सरकार और उसकी जीत का उत्साह राजनीतिक-आर्थिक चुनौतियों की गर्मी में भाप की तरह उड़ जाएगा और रोजमर्रा के मुद्दों और राजनीतिक उठापटक के बीच यह सरकार भी अर्थव्यवस्था और आम पाकिस्तानी नागरिकों के लिए बोझ ही साबित हो.
क्या नवाज़ शरीफ इस आशंका को गलत साबित कर पाएंगे?
('राष्ट्रीय सहारा' के हस्तक्षेप में 18 मई को प्रकाशित टिप्पणी)                 

मंगलवार, मई 07, 2013

मीडिया का चिट फंड काल

भारतीय मीडिया के 'विकास' में चिट फंड कंपनियों के 'योगदान' को सम्मानित करने का समय आ गया है 


चैनलों और अखबारों में इन दिनों पश्चिम बंगाल की चिट फंड जैसी कंपनी- शारदा की हजारों करोड़ रूपये की धोखाधड़ी और घोटाले की खबर सुर्ख़ियों में हैं. रिपोर्टों के मुताबिक, शारदा समूह की कंपनियों ने बंगाल और उसके आसपास के राज्यों के लाखों गरीब और निम्न मध्यवर्गीय परिवारों से विभिन्न जमा स्कीमों में लुभावने रिटर्न के वायदे के साथ हजारों करोड़ रूपये लूट लिए.
हालाँकि पश्चिम बंगाल या अन्य दूसरे राज्यों में कथित चिट फंड या ऐसी ही दूसरी निवेश कंपनियों द्वारा लोगों को झांसा देकर उनकी गाढ़ी कमाई लूटने की यह पहली घटना नहीं है.
लेकिन हर बार की तरह इस मामले में भी जब शारदा समूह की कम्पनियाँ लोगों को बेवकूफ बनाने और उनका पैसा हडपने में लगी हुई थीं तो न सिर्फ राज्य और केन्द्र सरकार, रिजर्व बैंक और सेबी, पुलिस और प्रशासन आँखें बंद किये रहे बल्कि अखबार और चैनल भी सोते रहे. यह अकारण नहीं था.

रिपोर्टों के अनुसार, इस मामले में सत्ताधारी तृणमूल और कांग्रेस से जुड़े नेताओं, सांसदों, मंत्रियों और अधिकारियों के अलावा पत्रकारों-मीडिया मालिकों के नाम उछल रहे हैं जिन्होंने इस लूट में खूब माल उड़ाया और ऐश की. मजे की बात यह है कि अब यही चैनल और अखबार ऐसे हंगामा काट रहे हैं, जैसे उन्हें इस घोटाले के बारे में पहले कुछ पता ही नहीं था.       

यह सिर्फ संयोग नहीं है कि शारदा समूह का सी.एम.डी और चेयरमैन सुदीप्तो सेन न सिर्फ खुद कई चैनलों, अख़बारों और पत्रिकाओं का मालिक था बल्कि उसने बंगाल और असम में कई और मीडिया समूहों में भी निवेश कर रखा था.
यही नहीं, वह इस क्षेत्र के अखबारों और चैनलों का एक बड़ा विज्ञापनदाता भी था. सच यह है कि
वह बंगाल का उभरता हुआ मीडिया मुग़ल था जिसके चैनलों और अख़बारों ने तृणमूल के पक्ष में हवा बनाने में खासी भूमिका निभाई.
लेकिन शारदा और सुदीप्तो का असली धंधा मीडिया नहीं था बल्कि उसने चैनल और अखबार अपनी साख बनाने, अपनी फर्जी निवेश/रीयल इस्टेट/ट्रेवल कंपनियों के लिए राजनीतिक और प्रशासनिक संरक्षण हासिल करने और पत्रकारों/मीडिया का मुंह बंद करने के लिए शुरू किये थे.
लेकिन शारदा समूह और सुदीप्तो अपवाद नहीं हैं. इससे पहले भी कुबेर से लेकर जे.वी.जी जैसी कई चिट फंड कम्पनियों में लोगों का सैकड़ों करोड़ रुपया डूब चुका है जो मीडिया बिजनेस में भी खूब धूम-धड़ाके के साथ उतरे थे. इनाडु से लेकर सहारा जैसी कई कंपनियों इसी रास्ते आगे बढ़ीं.

यही नहीं, आज भी बंगाल और पूर्वोत्तर भारत से लेकर पूरे देश में ऐसी दर्जनों छोटी-बड़ी कम्पनियाँ हैं जो लाखों-करोड़ों लोगों को लुभावने और ऊँचे रिटर्न का झांसा देकर इस या उस स्कीम में पैसे बटोर रही हैं, उसका कुछ हिस्सा अख़बारों और चैनलों में और कुछ हिस्सा राजनेताओं, अफसरों और पत्रकारों में निवेश कर रही हैं.   

नतीजा यह कि इन चिट फंड/निवेश कंपनियों की मदद से आए दिन नए चैनल और अखबार खुल रहे हैं, पत्रकारों और संपादकों को नौकरियां मिल रही हैं और चौथा खम्भा ‘मजबूत’ हो रहा है. सच पूछिए तो पिछले एक-डेढ़ दशकों में मीडिया कारोबार के ‘विकास और विस्तार’ में इन चिट फंड और निवेश कंपनियों का ‘भारी योगदान’ रहा है.
भारतीय पत्रकारिता के ‘चिट फंड काल’ के ‘विकास’ में उनके इस ‘योगदान’ को देखते हुए किसी मीडिया समूह को सुदीप्तो सेन, शारदा, कुबेर, जे.वी.जी आदि के नामों से पत्रकारिता पुरस्कार शुरू करने चाहिए. उन्हें स्पांसरशिप की चिंता करने की जरूरत नहीं है. कोई न कोई 'सहारा' मिल ही जाएगा.
('तहलका' के 15 मई के अंक में प्रकाशित)    

सोमवार, अप्रैल 29, 2013

भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की विरासत

आंदोलन ने देश भर में पहले से चल रहे जनतांत्रिक और बुनियादी बदलाव के आन्दोलनों को भी पुनरुज्जीवन दिया है

हालाँकि भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन का उत्ताप और बेचैनी अब कमजोर पड़ चुकी है लेकिन उस आंदोलन से पैदा हुई नई नागरिक चेतना, सक्रियता और बदलाव की आकांक्षा की तीव्रता कतई कमजोर नहीं पड़ी है. दिल्ली में १६ दिसंबर की बर्बर सामूहिक बलात्कार की घटना के खिलाफ भड़के आंदोलन में उसी नई नागरिक सक्रियता और बदलाव की आकांक्षा की अभिव्यक्ति देखी जा सकती है.
इस अर्थ में भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन ने न सिर्फ लोगों खासकर मध्यवर्ग में नागरिकता बोध को जगाया, उन्हें बंद कमरों से बाहर आकर सामूहिक कार्रवाई में शामिल होने के लिए प्रेरित किया बल्कि उसने सत्ता और उसके दमनतंत्र को चुनौती देकर लोकतंत्र में लोगों को अपनी ताकत का अहसास करवाया.
उसी नागरिकता बोध और सामूहिक कार्रवाई के साथ अपनी ताकत के अहसास ने लोगों खासकर युवाओं-महिलाओं को स्त्रियों के लिए बेख़ौफ़ आज़ादी के आंदोलन में उतरने की प्रेरणा और हिम्मत दी.

असल में, वर्ष २०११ में शुरू हुए भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन ने देश में लंबे अरसे बाद उस शहरी मध्यवर्ग को सड़कों पर उतार दिया जो नव उदारवादी आर्थिक सुधारों का महत्वपूर्ण लाभार्थी होने के कारण उसका सबसे मुखर पैरोकार बन गया था.

यह उसकी सबसे बड़ी ताकत थी. लेकिन इसके साथ ही यह भी सही है कि भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन अपने उद्देश्य, स्वरुप और चरित्र में बुनियादी बदलाव का वर्गीय आंदोलन नहीं था और न ही उसका कोई व्यापक एजेंडा और कार्यक्रम था.

यह भी सही है कि उसमें कई अंतर्विरोधों, विसंगतियों के साथ-साथ सांप्रदायिक-जातिवादी-प्रतिक्रियावादी राजनीतिक रुझान भी दिखाई दिए. उसकी संकीर्णताएँ खासकर राजनीति विरोधी अभियान भी किसी से छुपी नहीं हैं. इन कमियों, सीमाओं और तात्कालिक विफलता के बावजूद भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन ने भारतीय लोकतंत्र को बहुत कुछ दिया है.
इस आंदोलन की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि यह रही कि इसने मध्यवर्गीय नागरिक समाज के एक
बड़े हिस्से में बढ़ रहे अलगाव-निराशा और हताशा को तोडा, उनमें नागरिकता बोध पैदा किया और सामूहिक कार्रवाई में उतरने के लिए प्रेरित किया. इस प्रक्रिया में इस आंदोलन ने न सिर्फ लोगों में राजनीतिकरण की ठहर गई प्रक्रिया को तेज किया बल्कि उनके अंदर सत्ता के खिलाफ खड़ा होने की हिम्मत दी.
इस अर्थ में इस आंदोलन ने देश भर में पहले से चल रहे अनेकों जनतांत्रिक और बुनियादी बदलाव के आन्दोलनों को भी एक नया पुनरुज्जीवन दिया है.

हैरानी की बात नहीं है कि इस आंदोलन के दौरान और उसके बाद चाहे वह नर्मदा बचाओ आंदोलन के विस्थापितों की लड़ाई हो या कुडनकुलम/जैतापुर परमाणु बिजलीघर के खिलाफ अभियान हो या पास्को/वेदांता जैसे बड़े प्रोजेक्ट्स के खिलाफ चल रहे जनांदोलनों की गतिशीलता- सबमें एक तेजी और नई उर्जा दिखाई दी है.

ऐसा इसलिए हो पाया क्योंकि भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन ने आर्थिक सुधारों के मुखर समर्थक मध्यवर्ग में जनांदोलनों के प्रति एक नई संवेदनशीलता पैदा की, शासक वर्गों की साख को जबरदस्त धक्का दिया और सबसे बढ़कर इसने जनतंत्र में जनांदोलनों की भूमिका को पुनरुस्थापित किया.    

यही नहीं, इस आंदोलन की कमियों, सीमाओं और अंतर्विरोधों को स्वीकार करते हुए भी यह नहीं भूलना चाहिए कि उत्तर उदारीकरण-भूमंडलीकरण के दौर में दुनिया भर में और भारत में भी न सिर्फ कई नए प्रकार के सामाजिक-राजनीतिक जनांदोलनों/आन्दोलनों ने दस्तक दी है बल्कि कई पारंपरिक जनांदोलनों के स्वरुप, चरित्र और मिजाज में भी उल्लेखनीय बदलाव आया है.
पिछले दो दशकों में भारत में पर्यावरण संरक्षण, विस्थापन विरोधी, बड़े बांधों के खिलाफ, परमाणु बिजली विरोधी, ‘जल-जंगल-जमीन-खनिजों’ को कारपोरेट लूट से बचाने के लिए आदिवासियों और किसानों के आन्दोलनों, अस्मिताओं के आंदोलनों के अलावा भूमंडलीकरण विरोधी आंदोलन भी उभरे हैं.
भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन भी इन्हीं नए सामाजिक-राजनीतिक आन्दोलनों में से एक है. हालाँकि भारत में भ्रष्टाचार के खिलाफ संगठित राजनीतिक आंदोलन का इतिहास इतना नया भी नहीं है. सबसे पहले १९७४ में जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में भ्रष्टाचार विरोधी बड़ा संगठित आंदोलन चला जो जल्दी ही लोकतंत्र की रक्षा के आंदोलन में बदल गया.

१९८८-८९ में वी.पी सिंह ने भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाकर अभियान चलाया और कांग्रेस को सत्ता से बेदखल करने में कामयाब रहे. लेकिन इन दोनों भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलनों और अभियानों से २०११ का भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन इस मायने में अलग था कि इसके नेतृत्व में स्थापित राजनीतिक दलों से इतर नागरिक समाज के संगठन और नेता थे, इसका एजेंडा सुधारवादी होते हुए भी राजनीतिक सत्तातंत्र के मर्म पर चोट करनेवाला था और भागीदारी के स्तर पर भी इसमें छात्राओं-युवाओं के साथ मध्यवर्ग में उभरा नया तबका- प्रोफेशनल्स शामिल थे.

इस भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन का उल्लेखनीय पहलू यह भी था कि इसमें लोगों को आंदोलित करने, उन्हें संगठित करने और सड़कों पर उतारने के लिए पारंपरिक माध्यमों के बजाय पहली बार नए माध्यमों खासकर सोशल मीडिया का इस्तेमाल किया गया.
यही नहीं, भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन खासकर अन्ना हजारे के नेतृत्ववाले आंदोलन को कारपोरेट मीडिया का भी खुला समर्थन मिला. याद रहे कि यह भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन एक ऐसे दौर में उभरा, जब दुनिया भर में आन्दोलनों की एक नई लहर दिखाई पड़ रही थी.
ट्यूनीशिया और मिस्र से तानाशाह सत्ताओं के खिलाफ लोकतंत्र बहाली के लिए शुरू हुआ अरब वसंत हो या अमेरिका और पश्चिम के कई देशों में बड़ी वित्तीय पूंजी की लूट के खिलाफ आक्युपाई वाल स्ट्रीट आंदोलन- इन सबका असर दुनिया के तमाम देशों पर पड़ा.
इससे पहले दुनिया भर में वित्तीय पूंजी के नेतृत्व में कारपोरेट भूमंडलीकरण और उसकी लूट के खिलाफ शुरू हुए आंदोलन- विश्व सामाजिक मंच (वर्ल्ड सोशल फोरम) के जरिये एकजुट होने लगे थे. इससे वैश्विक स्तर पर जनांदोलन के लिए एक नया समर्थन पैदा हुआ है.

इसकी वजह यह भी थी कि बड़ी वित्तीय पूंजी के लोभ से पैदा हुए सब-प्राइम बुलबुले के २००७-०८ में
फूटने से अमेरिकी अर्थव्यवस्था लड़खड़ा चुकी थी और उसके साथ यूरोप और वैश्विक अर्थव्यवस्था भी गहरे संकट में फंस चुकी थी.

इससे निपटने के नामपर जिस तरह से बड़ी वित्तीय पूंजी ने आमलोगों के सामाजिक सुरक्षा के बजट में कटौती करने से लेकर उनपर बोझ डालना शुरू किया, उसके खिलाफ यूरोप के तमाम देशों में लोगों के गुस्से और आन्दोलनों की लहर सी फूट पड़ी.

कहने की जरूरत नहीं कि भारत पर भी इसका असर पड़ा. इसी दौरान लोगों ने यह देखा कि भारत में भी नव उदारवादी आर्थिक नीतियों के तहत देशी-विदेशी बड़ी पूंजी-कारपोरेट क्षेत्र को सार्वजनिक संसाधनों-जल-जंगल-जमीन-खनिजों से लेकर २-जी तक की लूट की खुली छूट दे दी गई है.
इसे सुधारों के मुखर पैरोकार रहे मध्यवर्ग ने अपनी आकांक्षाओं, अपेक्षाओं और भरोसे पर खुले हमले की तरह देखा. लेकिन यह सिर्फ उच्च मध्यवर्ग का ही गुस्सा नहीं था बल्कि इसमें वह निम्न मध्यवर्ग और गरीब का भी बड़ा हिस्सा शामिल था जो भ्रष्टाचार की असली कीमत चुका रहा है.
वह निम्न मध्यवर्ग और गरीब समुदाय ही हैं जिन्हें अपने वाजिब अधिकारों- सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के लाभों, रोजगार, शिक्षा-स्वास्थ्य जैसे बुनियादी हकों और न्याय के लिए सरकारी अधिकारियों, कर्मचारियों, दलालों और नेताओं को घूस देनी पड़ती है.
यह ठीक है कि इस आंदोलन में गरीबों और निम्न मध्यवर्ग के अलावा समाज में हाशिए पर पड़े वंचित समुदायों की सीधी भागीदारी नहीं थी. इसमें महिलाएं और खासकर अल्पसंख्यक भी नहीं जुड़ पाए.

यह इस आंदोलन की बड़ी कमजोरी थी कि वह एक समावेशी आंदोलन नहीं बन पाया और न ही भ्रष्टाचार के मुद्दे को व्यापक बदलाव के आन्दोलनों के साथ जोड़ पाया. यह भविष्य के जनांदोलनों के लिए एक सबक भी है.

लेकिन इन कमियों और नाकामियों के बावजूद इस आंदोलन ने राजनीतिक और शासन व्यवस्था की सड़न को उघाड़कर लोगों को भारतीय जनतंत्र की सीमाओं और खामियों से अवगत कराया है, उसने नागरिक समाज को अपने अधिकारों और जिम्मेदारियों के प्रति सक्रिय और सचेत बनाया है और व्यवस्था पर जनतांत्रिक सुधारों/बदलाव का दबाव बढ़ा दिया है.

लेकिन क्या अब यह मान लिया जाए कि यह आंदोलन इतिहास का विषय बन चुका है? ऐसा सोचनेवाले जल्दबाजी में हैं. सच यह है कि लोग सत्ता और उसपर बैठे राजनीतिक तंत्र की प्रतिक्रिया को गौर से देख रहे हैं. लेकिन इतना तय है कि लोग लंबे समय तक इंतज़ार नहीं करेंगे.
('राष्ट्रीय सहारा' के 27 जुलाई)    

बुधवार, अप्रैल 17, 2013

आरामतलब या पार्टनरशिप पत्रकारिता?

मीडिया में आँख मूंदकर मोदी गान हो रहा है   

भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री पद के घोषित-अघोषित उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी के अश्वमेध का घोड़ा देशव्यापी अभियान पर निकल चुका है. दूसरी ओर, कांग्रेस के युवराज भी शर्माते-सकुचाते मैदान में उतर गए हैं. दोनों के बीच जुबानी जंग शुरू हो चुकी है.
पहले दौर के वाकयुद्ध में छींटाकशी, सवाल-जवाब और आरोप-प्रत्यारोप के साथ अपनी कामयाबियों का बखान भी हो रहा है. इस दौर में दोनों नेता खासकर मोदी पार्टी फोरम से लेकर कारपोरेट मंचों पर देश की समस्याओं को हल करने के दावे और विजन पेश करते नजर आ रहे हैं.
लेकिन असली लड़ाई न्यूज चैनलों के पर्दों/स्टूडियो और सोशल मीडिया के स्क्रीन पर लड़ी जा रही है जहाँ दोनों ओर से स्पिन डाक्टर्स और सोशल मीडिया के पेड कारकून छवि बनाने और बिगाड़ने और धारणाओं (परसेप्शन) की लड़ाई में हर हथियार आजमा रहे हैं.

हालाँकि मैदान में प्रधानमंत्री पद के कई और दावेदार भी हैं लेकिन मीडिया में उन्हें कोई खास भाव नहीं मिल रहा है. मतलब लेवल-प्लेइंग फील्ड नहीं है. मीडिया ने असली मुकाबले से पहले इसे ‘राहुल बनाम मोदी’ की लड़ाई बना दिया है. चैनलों और सोशल मीडिया में यही दोनों छाए हैं.

लेकिन छवि निर्माण की इस लड़ाई में मोदी का कोई जवाब नहीं है. मोदी ने प्रोफेशनल पी.आर कंपनियों से लेकर सोशल मीडिया के पेड कार्यकर्ताओं की मदद से एक सुनियोजित अभियान छेड दिया है. इस अभियान के तहत एक ओर मोदी खुद गुजरात में अपनी उपलब्धियों का गुणगान कर रहे हैं और दूसरी ओर, सुशासन और विकास के ऐसे फार्मूले बता रहे हैं जिनसे देश की सभी समस्याओं का चुटकियाँ बजाते ही समाधान हो जाएगा.                                    

यहाँ तक तो ठीक है. लोकतंत्र में सत्ता के सभी दावेदारों को अपनी उपलब्धियों का प्रचार करने से लेकर सोच-नीतियां-कार्यक्रम बताने का पूरा अधिकार है.
लेकिन लोकतंत्र में ऐसे मौके पर न्यूज मीडिया की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि उससे एक बहु-सूचित विमर्श की अपेक्षा होती है. खासकर जिस तरह से भारतीय राजनीति का मीडियाकरण (मीडिया-टाईजेशन)  हो रहा है, उसमें सूचनाओं के लिए मीडिया पर नागरिकों की निर्भरता बढ़ती जा रही है.

लेकिन मुश्किल यह है कि पिछले कुछ सप्ताहों में गुजरात से लेकर बंगाल तक मोदी जहाँ भी जा रहे हैं, मीडिया खासकर चैनल उनके साथ-साथ हैं. वे जिन मंचों पर बोल रहे हैं, चैनल उन्हें लाइव दिखा रहे हैं.

यही नहीं, लाइव के अलावा सुबह से रात तक उनके भाषणों के चुनिंदा क्लिप अहर्निश चल रहे हैं और प्राइम टाइम चर्चाओं में भी वे छाए हुए हैं. मोदी के लिए मीडिया ‘जादुई गुणक’ (मैजिक मल्टीप्लायर) बन गया है जो उनके आधे सच्चे-आधे झूठे दावों-फार्मूलों को बिना किसी स्वतंत्र जांच पड़ताल और सवाल-जवाब के एक वैधता सा दे रहा है.
इस तरह मीडिया खासकर चैनल मोदी के इस प्रचार अभियान में जाने-अनजाने पार्टनर से बनते जा रहे हैं. यह एक गंभीर समस्या है. सवाल यह है कि मीडिया खासकर चैनलों का काम क्या सिर्फ पोस्ट-आफिस का है? या, उनके आडिएंस की अपेक्षा यह है कि वे नेताओं के दावों/बयानों की पत्रकारीय जांच-पड़ताल और छानबीन भी करें और उन्हें उनके पूरे सन्दर्भ के साथ पेश करें?
उदाहरण के लिए, मोदी ने फिक्की की महिला सभा में गुजरात की राज्यपाल पर आरोप लगाया कि वे महिला होकर भी स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए ५० फीसदी सीटें आरक्षित करनेवाले विधेयक को मंजूरी नहीं दे रही हैं. कहने की जरूरत नहीं है कि मोदी का यह आरोप तुरंत सुर्खी बन गया और घंटों चैनलों पर चलता रहा.

लेकिन किसी चैनल ने इस आरोप की और छानबीन करने की जरूरत नहीं समझी. भला हो, एन.डी.टी.वी-इंडिया का जिसपर उस रात ‘तहलका’ की राणा अयूब ने खुलासा किया कि यह विधेयक अनिवार्य वोटिंग के प्रावधान के कारण रोका गया है.       

यह अकेला मामला नहीं है. ऐसे अनेकों दावे हैं जिनकी छानबीन और पूरे संदर्भ के साथ पेश करना जरूरी है. लेकिन ऐसा हो नहीं रहा है.
कहना मुश्किल है कि यह आरामतलब पत्रकारिता का नतीजा है या पार्टनरशिप पत्रकारिता का? वजह चाहे जो हो लेकिन मोदी और उनकी प्रचार टीम इसका पूरा फायदा उठा रही है और नुकसान दर्शकों-पाठकों और व्यापक अर्थों में लोकतंत्र का हो रहा है.
('तहलका' के 30 अप्रैल के अंक में प्रकाशित। आप इसे तहलका हिंदी की वेबसाईट पर भी पढ़ सकते हैं।)       

मंगलवार, अप्रैल 16, 2013

राहुल मॉडल की सीमाएं उजागर और चमक फीकी पड़ चुकी है

आखिर राहुल गाँधी और नरेन्द्र मोदी के माडलों में बुनियादी अंतर क्या है? 

अगले आम चुनावों के मद्देनजर इन दिनों देश में मौजूदा राजनीतिक-आर्थिक-सामाजिक और प्रशासनिक चुनौतियों से निपटने और विकास की गति को तेज करने को लेकर राहुल गाँधी मॉडल और नरेन्द्र मोदी मॉडल की चर्चाएं सुर्ख़ियों में हैं.

दोनों मॉडलों में ज्यादा बुनियादी समानताओं और मामूली भाषा और शैलीगत भिन्नताओं के बावजूद राजनीतिक पंडित और स्पिन डाक्टर दोनों के बीच के बारीक फर्कों, उनकी खूबियों और कमियों को स्पष्ट करने में खूब पसीना बहा रहे हैं. खुद दोनों नेताओं ने इस फर्क को उछालने और उसपर जोर देने में कोई कोर-कसर नहीं उठा रखा है.
लेकिन इस तथ्य को अनदेखा करना मुश्किल है कि राहुल गाँधी और नरेन्द्र मोदी शासक वर्ग की जिन दोनों प्रमुख और प्रतिनिधि पार्टियों की अगुवाई कर रहे हैं, उनकी वैचारिकी और अर्थनीति के केन्द्र में वही नव उदारवादी आर्थिक सैद्धांतिकी है जो उदारीकरण-निजीकरण-भूमंडलीकरण और उसके जरिये हासिल की गई तेज आर्थिक वृद्धि दर को देश-समाज की सभी समस्याओं और चुनौतियों का हल मानती है.

आश्चर्य नहीं कि अपने बुनियादी चरित्र और अंतर्वस्तु में राहुल गाँधी मॉडल और नरेन्द्र मोदी मॉडल में भी कोई खास अंतर नहीं है. यही कारण है कि दोनों मॉडलों को लेकर हो रही बहसों और चर्चाओं में विचारों, नीतियों, मुद्दों और कार्यक्रमों से ज्यादा उनके व्यक्तित्वों, भाषण शैलियों और अदाओं पर चर्चा हो रही है.
उदाहरण के लिए, राहुल गाँधी मॉडल को ही लीजिए जिसे नरेन्द्र मोदी मॉडल के बरक्स खड़ा करने की कोशिश की जा रही है. सवाल यह है कि राहुल मॉडल में ऐसा नया या अनूठा क्या है जो उसे कांग्रेस या यू.पी.ए सरकार से अलग और विशिष्ट बनाता है?

हाल के महीनों में राहुल गाँधी के सार्वजनिक भाषणों में ऐसी कोई नई बात, सोच या आइडिया नहीं दिखाई पड़ा है जो कांग्रेस की वैचारिकी या नीतियों में कोई बड़े या उल्लेखनीय बदलावों की ओर इशारा करता हो.                                                                   

उनके भाषणों में वही समावेशी विकास और आर्थिक वृद्धि का लाभ गरीबों, आदिवासियों, अल्पसंख्यकों और हाशिए पर पड़े लोगों तक पहुँचाने की बातें हैं, विकेन्द्रीकरण और पंचायतों को सशक्त बनाने पर जोर है और युवाओं के लिए नए अवसर और उम्मीदें पैदा करने जैसे आह्वान और सपने हैं.
दोहराने की जरूरत नहीं है कि कांग्रेस और उसके नेतृत्ववाली यू.पी.ए सरकार पिछले नौ सालों से यही बातें कर रही हैं. लेकिन व्यवहार में इसके ठीक उलट हो रहा है. तथ्य यह है कि पिछले छह-सात महीनों में कांग्रेस नेतृत्व ने नव उदारवादी आर्थिक नीतियों को न सिर्फ निर्णायक रूप से अंगीकार किया है बल्कि खुलकर उसके समर्थन में आ गया है और उसकी हरी झंडी के बाद यू.पी.ए सरकार उन्हें जोरशोर से लागू करने और आगे बढ़ाने में भी जुटी है.

याद रहे, एक ओर कांग्रेस पार्टी में राहुल गाँधी के नेतृत्व को औपचारिक रूप आगे बढ़ाया जा रहा था और दूसरी ओर, उसी समय पार्टी कार्यसमिति की मुहर के साथ यू.पी.ए सरकार खासकर वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने एक झटके में खुदरा व्यापार से लेकर पेंशन क्षेत्र में एफ.डी.आई को इजाजत देने से लेकर विदेशी पूंजी को तमाम रियायतें देने के कई बड़े और विवादस्पद फैसले किये हैं.
यही नहीं, आर्थिक सुधारों से थोड़ी दूरी बनाकर चलनेवाले और सुधारों को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के हिस्से डालनेवाले कांग्रेस नेतृत्व ने पहली बार दिल्ली में खुदरा व्यापार में एफ.डी.आई के समर्थन में रैली आयोजित की जिसके स्टार वक्ता खुद राहुल गाँधी थे.

साफ़ है कि कांग्रेस नेतृत्व में आर्थिक उदारीकरण को लेकर अब कोई भ्रम नहीं है और उसने बड़ी पूंजी-कारपोरेट क्षेत्र को खुश करने का और इसके लिए आर्थिक सुधारों पर दांव लगाने फैसला कर लिया है और पिछले छह महीनों में यहाँ तक कि पार्टी के उपाध्यक्ष बनने के बाद भी ऐसे संकेत नहीं हैं कि राहुल गाँधी कांग्रेस नेतृत्व से अलग सोच रहे हैं.
असल में, राहुल मॉडल और कुछ नहीं बल्कि नव उदारवादी आर्थिक वैचारिकी पर आधारित बड़ी पूंजी-कारपोरेट निर्देशित ‘विकास’ और उसके भीतर गरीबों के लिए थोड़ी-मोड़ी राहतों की व्यवस्था करके उसे आमलोगों के बीच सहनीय बनाने तक सीमित है.

सच पूछिए तो यह रणनीति नव उदारवादी आर्थिक सुधारों के राजनीतिक प्रबंधन की रणनीति है जिसका मकसद आर्थिक सुधारों के लिए आमलोगों खासकर गरीबों-हाशिए पर पड़े लोगों का समर्थन जीतना और उसे उनके बीच स्वीकार्य बनाना है.
यहाँ तक कि अब तो विश्व बैंक ने भी इसी भाषा में बोलना शुरू कर दिया है. विश्व बैंक ने भी नव उदारवादी आर्थिक सुधारों को समावेशी बनाने के नामपर गरीबों को कुछ राहत देने और इसके लिए एन.जी.ओ आदि की मदद लेने की बात दशक भर पहले से ही शुरू कर दी थी.

इस सोच को २००४ में इंडिया शाइनिंग के नारे के पिटने और एन.डी.ए की हार के बाद एक तरह की स्वीकार्यता मिली. अर्थव्यवस्था के मैनेजरों और नीति नियंताओं ने आर्थिक सुधारों को लोगों के गले उतारने के लिए समावेशी विकास और नरेगा जैसी योजनाएं शुरू कीं. नीति निर्णय में एन.जी.ओ को शामिल करने के लिए राष्ट्रीय सलाहकार परिषद (एन.ए.सी) जैसे प्रबंध किये गए.
कहने की जरूरत नहीं है कि इससे एक राजनीतिक स्थिरता आई और आर्थिक सुधारों को आगे बढ़ाने में मदद मिली. याद रहे कि समावेशी विकास के नारों के बीच इसी दौर में जमीन की लूट का रास्ता साफ़ करने के लिए सेज आया, विदेशी पूंजी के लिए अर्थव्यवस्था के दरवाजे और ज्यादा खोले गए और सार्वजनिक संसाधनों की लूट (जैसे २-जी और के.जी बेसिन आदि) तेज हुई.  

इसलिए जब राहुल गाँधी समावेशी विकास के लिए अधिकार आधारित एप्रोच की बात करते हैं तो आज वह एक मजाक से अधिक नहीं लगता है. एक नारे के बतौर समावेशी विकास अपनी चमक खो चुका है. उसकी सीमाएं किसी से छुपी नहीं हैं.                                            

सच यह है कि चाहे नरेगा हो या शिक्षा का अधिकार या खाद्य सुरक्षा का अधिकार- ये सभी अपने मूल अंतर्वस्तु में शिक्षा, रोजगार और भोजन के मौलिक अधिकार के आइडिया का मजाक उड़ानेवाले हैं. तथ्य यह है कि कांग्रेस और यू.पी.ए के समावेशी विकास की सीमा नरेगा और खाद्य सुरक्षा जैसी सीमित और आधी-अधूरी योजनाएं हैं.

अन्यथा यह तो खुद राहुल गाँधी भी जानते हैं कि कारपोरेट निर्देशित विकास में आमलोगों को कुछ खास नहीं मिल रहा है. उल्टे उन्हें उसकी भारी कीमत चुकानी पड़ रही है. सी.आई.आई के सम्मेलन में खुद राहुल गाँधी ने स्वीकार किया कि ‘विकास के ज्वारभाटे में हर नाव ऊँचा उठ जाती है लेकिन यहाँ तो बहुसंख्यकों के पास नाव ही नहीं है.’
यह भी किसी से छुपा नहीं है कि पिछले दो दशकों के नव उदारवादी आर्थिक सुधारों के तहत कारपोरेट विकास के मॉडल में आर्थिक वृद्धि की रफ़्तार तो जरूर तेज हुई है लेकिन उससे आई समृद्धि एक बहुत ही छोटे वर्ग तक सीमित हो गई है.

इसकी वजह यह है कि यह मूलतः ‘रोजगारविहीन, शहर केंद्रित और कुछ क्षेत्रों तक सीमित और सार्वजनिक संसाधनों की लूट’ पर आधारित ‘कारपोरेट विकास’ रहा है. इसके कारण न सिर्फ आर्थिक गैर बराबरी और विषमताएं बढ़ी हैं, गरीबों-आदिवासियों को उनके अपने जल-जंगल-जमीन-खनिजों से बेदखल किया गया है बल्कि लाखों किसानों को आत्महत्याएं करनी पड़ी हैं, श्रमिकों का शोषण-उत्पीडन बढ़ा है और श्रम की कोई गरिमा कम हुई है.
पर्यावरण विनाश को अनदेखा किया जा रहा है. लेकिन इसके साथ ही यह भी सच है कि देश भर में इन नीतियों और कारपोरेट लूट के खिलाफ किसान, श्रमिक, आदिवासी और गरीब लड़ाई में उतर आए हैं.

यह तथ्य है कि आज किसानों-गरीबों-आदिवासियों के इन विरोध प्रदर्शनों के कारण देश भर में दर्जनों पावर, स्टील, हाईवे, रीयल इस्टेट प्रोजेक्ट्स ठप्प पड़े हैं. दूसरी ओर, २-जी से लेकर कोयला आवंटन जैसे मामलों के खुलासों के बाद सार्वजनिक संसाधनों की कारपोरेट लूट और याराना पूंजीवाद पर सवाल उठने लगे हैं.
जाहिर है कि इससे कारपोरेट जगत बहुत बेचैन है और यू.पी.ए सरकार पर ‘नीतिगत लकवे’ का आरोप लगा रहा है. हालाँकि यू.पी.ए सरकार ने पिछले छह महीनों में देशी-विदेशी बड़ी पूंजी-कारपोरेट दबाव में आर्थिक सुधारों के बाबत बड़े फैसलों के साथ ठहरे पड़े प्रोजेक्ट्स को हरी झंडी देने के लिए प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में कैबिनेट की निवेश सम्बन्धी समिति गठित की है जिसने पिछले कुछ सप्ताहों में पर्यावरण और आदिवासी जमीन से सम्बन्धी बाधाओं को दरकिनार करते हुए हजारों करोड़ के प्रोजेक्ट्स को एक्सप्रेस अनुमति दी है.

राहुल माडल की सीमाओं का अंदाज़ा इस तथ्य से भी लगाया जा सकता है कि एक ओर राहुल गाँधी सी.आई.आई के जिस सम्मेलन में विकेन्द्रीकरण और पंचायतों को और अधिकार देने की बात कर रहे हैं, गरीबों को सुनने और उन्हें विकास प्रक्रिया में शामिल करने की बात कर रहे थे, उसी सम्मेलन में प्रधानमंत्री ने बड़े प्रोजेक्ट्स के लिए जमीन अधिग्रहण में पंचायतों की अनुमति की बाध्यता में छूट देने का एलान किया. क्या अब भी राहुल मॉडल की सीमाएं बताने की जरूरत है?
हैरानी की बात नहीं है कि इसकी चमक फीकी पड़ती जा रही है और उनके स्पिन डाक्टरों की उसे चमकाने की तमाम कोशिशों के बावजूद उसके खरीददार उससे मुंह मोड़ते दिख रहे हैं.

('राष्ट्रीय सहारा'के हस्तक्षेप में १ अप्रैल को प्रकाशित टिप्पणी)