सोमवार, जुलाई 09, 2012

इन्द्र देव की कृपा पर निर्भर कृषि

जी.डी.पी में सिर्फ १४ फीसदी का योगदान करनेवाले कृषि क्षेत्र की सरकार को कोई खास परवाह नहीं है

यह साफ़ हो चुका है कि इस साल मॉनसून की बारिश औसत से कम रहनेवाली है और जून महीने तक की बारिश सामान्य से ३१ फीसदी कम रही है. इससे सूखे की आशंका बढ़ गई है. इसके बावजूद कृषि मंत्री शरद पवार से लेकर योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलुवालिया के चेहरों पर कोई शिकन नहीं है. वे निश्चिंत हैं.
उनका कहना है कि जून में मॉनसून की बारिश कम होने के बावजूद चिंता की कोई बात नहीं है. उनका दावा है कि अभी मॉनसून के तीन महीने बचे हुए हैं जिसमें अच्छी बारिश की उम्मीद है. इससे खरीफ की फसल अच्छी रहने की उम्मीद बनी हुई है.
साफ़ है कि कृषि मंत्री या योजना आयोग के उपाध्यक्ष ‘सूखा’ शब्द के जिक्र से बचना चाहते हैं. लेकिन उनके आत्मविश्वास की वजह यह नहीं है कि वे इन्द्र देव की कृपा पर भरोसा करते हैं या भारतीय कृषि मॉनसून की विफलता से मुक्त हो चुकी है. उन्हें सच्चाई पता है लेकिन वे उसे जाहिर करने से बच रहे हैं.

‘सूखा’ शब्द को लेकर उसकी घबराहट समझी जा सकती है. वे अच्छी तरह जानते हैं कि यह स्वीकार करते ही उन्हें खरीफ की फसल को बचाने के लिए आपात और वैकल्पिक योजना तैयार करनी पड़ेगी, राजकोषीय घाटे की चिंता छोडकर किसानों की मदद करनी पड़ेगी और आवारा पूंजी को खुश करने करने के लिए सब्सिडी खासकर खाद, डीजल और बिजली सब्सिडी में कटौती की योजना को टालना पड़ेगा.  

जाहिर है कि यू.पी.ए सरकार इसके लिए तैयार नहीं है. वे ऐसी किसी भी स्थिति को टालना चाहते हैं. इसका अर्थ यह हुआ कि यू.पी.ए सरकार अगले दो-तीन सप्ताहों तक सिवाय इन्द्र देव की प्रार्थना के और कुछ नहीं करने जा रही है. अगर उसके भाग्य से अगले कुछ दिनों/सप्ताहों में मॉनसून की बारिश में कुछ सुधार हुआ तो वह एक बार फिर कुछ भी करने की जिम्मेदारी और जवाबदेही से बच निकलेगी.
लेकिन अगर मॉनसून उम्मीद के मुताबिक नहीं रहा तो भी उसके रूख से साफ़ है कि वह कुछ खास करने नहीं जा रही है. वैसे भी एक बार सूखा पड़ने और फसल बर्बाद हो जाने के बाद कुछ करने को नहीं रह जाता- ‘का बरसा जब कृषि सुखाने.’
उस स्थिति में सूखाग्रस्त क्षेत्रों को अधिक से अधिक कुछ दिखावटी मदद की घोषणा कर दी जाएगी और बाकी जिम्मेदारी राज्य सरकारों पर डाल दी जायेगी. नतीजा, मॉनसून की विफलता और सूखे को लेकर केन्द्र और राज्य सरकारों के वाक् युद्ध भी होगा. राज्य सरकारें सूखे को केन्द्र से प्राकृतिक आपदा घोषित करने की मांग करेंगी और केन्द्र सरकार उसे स्वीकार नहीं करेगी.

आश्चर्य नहीं कि इन दोनों की नूरा कुश्ती का सबसे अधिक फायदा जमाखोर, मुनाफाखोर और सट्टेबाज उठाएंगे जो सूखे का बहाना बनाकर खाद्य वस्तुओं, फलों-सब्जियों और दूध की मनमानी कीमतें वसूलेंगे और आम गरीब उपभोक्ता इसकी कीमत चुकायेंगे जबकि दूसरी ओर, किसान एक बार फिर फसल के नुकसान और उसके कारण कर्ज जाल में फंसने को मजबूर होंगे.

कहने की जरूरत नहीं है कि आज़ादी के बाद पिछले ६५ सालों में यह कहानी दर्जनों बार दोहराई जा चुकी है. मॉनसून की आँख-मिचौली नई बात नहीं है. आमतौर पर भारत पर मॉनसून की कृपा बनी रही है लेकिन हर कुछ साल बाद मॉनसून धोखा भी दे जाता है.
इस का दूसरा पहलू यह है कि इन सालों में कई बार मॉनसून की अति कृपा भी के कारण बाढ़ के रूप में फसलों और किसानों को बर्बाद करती रही है. वैसे इसमें मॉनसून का कोई दोष नहीं है. यह तो उसकी स्वाभाविक प्रकृति है. इस प्रकृति चक्र को नियंत्रित या निर्देशित करना संभव भी नहीं है.
असल में, सूखा या बाढ़ मॉनसून की विफलता या अधिकता का नहीं बल्कि नीतियों और नीति निर्माताओं की विफलताओं का नतीजा हैं. इस मायने में भारत में सूखा या बाढ़ मनुष्य निर्मित परिघटनाएं हैं. पी. साईनाथ ने ठीक ही लिखा है कि ‘इस देश में सभी (मतलब नेताओं-अफसरों-व्यापारियों) को सूखा अच्छा लगता है.’ इसी तरह सब जानते हैं कि बिहार-उत्तर प्रदेश जैसे कई राज्यों में नेता-अफसर-इंजीनियर-ठेकेदार बहुत बेसब्री से बाढ़ का इंतज़ार करते हैं.

इस देश में बाढ़ और सूखे के साथ राहत कार्यों की अर्थव्यवस्था अभिन्न रूप में जुडी हुई है और राहत के माल के महाभोज की कहानियां भी किसी से छुपी नहीं हैं. जाहिर है कि इन सभी के सूखे और बाढ़ में निहित स्वार्थ जुड़े हुए हैं और वे नहीं चाहते हैं कि आम गरीब किसानों को इससे मुक्ति मिले.

यह सचमुच इस देश के शासक वर्गों की सबसे बड़ी नीतिगत विफलताओं में से एक है कि आज़ादी के छह दशक बाद और विकास के तमाम बड़े-बड़े दावों के बावजूद भारतीय कृषि मॉनसून यानी इन्द्र देव की कृपा पर निर्भर है. तथ्य यह है कि देश में वर्ष २००९ तक कुल कृषि भूमि का सिर्फ ३५ फीसदी ही सिंचित था.
इसे ही कहते हैं कि नौ दिन, चले अढ़ाई कोस. यह उस देश का हाल है जो खुद को कृषिप्रधान देश कहता रहा है. लेकिन सिंचाई सुविधाओं के विस्तार और आखिरी खेत तक पानी पहुंचाने के मामले में यह नाकामी कृषि और देश के अन्नदाता किसानों के साथ किया गया बहुत बड़ा मजाक है. कृषि और किसान इसकी कीमत चुकाने को मजबूर हैं.
लेकिन सिंचाई सुविधाओं के विस्तार में यह विफलता किसी प्राकृतिक दुर्घटना या लापरवाही के कारण नहीं है. वास्तव में, इसके लिए ९० के दशक की वे नव उदारवादी आर्थिक नीतियां और आर्थिक सुधार जिम्मेदार हैं जिन्होंने कृषि को बिलकुल अनदेखा किया और साथ में, सरकारी खर्चों में कटौती की सबसे अधिक गाज सिंचाई योजनाओं पर गिरी.

यह किसी से छुपा तथ्य नहीं है कि इन दो दशकों में कृषि प्राथमिकता सूची में बहुत नीचे चली गई और कृषि में सार्वजनिक निवेश में गिरावट दर्ज की गई. नतीजा यह हुआ कि इस दौर में बजट की कमी के कारण एक तो सिंचाई परियोजनाओं पर काम की गति कछुए से भी धीमी हो गई और दूसरी ओर, नहरों और नलकूपों की देखरेख न होने के कारण उनकी भी हालत बद से बदतर होती चली गई.

एक और कड़वी सच्चाई यह है कि जिन इलाकों को आंकड़ों में सिंचित बताया जाता है, उनमें से काफी बड़े हिस्से में राज्य सरकारों की अनदेखी, लापरवाही और सबसे बढ़कर भ्रष्टाचार के कारण नहरों और नलकूपों की दुर्दशा किसी से छिपी नहीं है.
आश्चर्य नहीं कि राज्यों में सिंचाई विभाग जमाने से सबसे भ्रष्ट और लूट-खसोट में लिप्त विभाग माने जाते रहे हैं. हालाँकि जब से केन्द्र और राज्य सरकारों ने सिंचाई परियोजनाओं पर खर्चों में कटौती शुरू कर दी, लूट-खसोट के लिए गुंजाइश कम होती चली गई और दूसरे कई विभाग भ्रष्टाचार के मामले में उनसे आगे निकल गए.
असल में, ९० के दशक में आर्थिक सुधारों के चैम्पियनों ने कृषि क्षेत्र की समस्याओं और चुनौतियों को देखते हुए यह मान लिया कि कृषि में कोई सुधार संभव नहीं है और भारत की आर्थिक मुक्ति का हाईवे उद्योग और सेवा क्षेत्र के जरिये ही बन सकता है. नतीजा यह हुआ कि पिछले दो दशकों में सुनियोजित तरीके से कृषि की उपेक्षा करके और एक तरह से उसे बाईपास करते हुए आर्थिक तरक्की का नया हाईवे तैयार किया गया है.

हैरानी की बात नहीं है कि इन दो दशकों में जी.डी.पी में कृषि का हिस्सा गिरते हुए आधे से भी कम रह गया है. १९९०-९१ में जी.डी.पी में कृषि क्षेत्र का हिस्सा लगभग ३० फीसदी था जो २०११-१२ में घटकर १४ फीसदी के आसपास रह गया है जबकि कृषि पर आश्रित लोगों की तादाद में बहुत मामूली कमी आई है.

जाहिर है कि यह किसी दैवीय कारण से नहीं हुआ है बल्कि यह पिछले कई दशकों खासकर १९९० के बाद की नीतियों का नतीजा है. इसका सबसे बड़ा सबूत यह है कि आर्थिक सुधारों के पैरोकार इस तथ्य को अपनी नीतियों की सफलता के रूप में देखते हैं कि अर्थव्यवस्था में कृषि क्षेत्र का योगदान कम से कमतर होता जा रहा है. वे इसे भारत के एक विकसित अर्थव्यवस्था के रूप में आगे बढ़ने का प्रमाण मानते है.
आश्चर्य नहीं कि अर्थव्यवस्था के मैनेजरों और नव उदारवादी सुधारों के चैपियनों में इसे लेकर जश्न का माहौल है. उनकी इस खुशी का बड़ा कारण यह है कि उन्होंने अर्थव्यवस्था को काफी हद तक कृषि के दबावों से मुक्त कर दिया है यानी अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर को प्रभावित करने की उसकी क्षमता काफी कम हो गई है.
यह तथ्य है कि पिछले वर्षों में जब अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर सालाना औसतन ८ फीसदी से अधिक चल रही थी, उस समय कृषि की वृद्धि दर औसतन २ फीसदी के आसपास थी. इससे नार्थ ब्लाक में बैठे आर्थिक मैनेजरों का हौसला बढ़ा कि कृषि क्षेत्र के खराब प्रदर्शन के बावजूद अर्थव्यवस्था की सेहत पर कोई खास फर्क नहीं पड़नेवाला है.

विश्लेषकों के मुताबिक, अगर इस साल मॉनसून अच्छा नहीं रहता है तो इससे अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर में अधिक से अधिक आधी फीसदी की कमी आएगी. यही कारण है कि सूखे की आशंकाओं के बावजूद नीति नियंताओं और अर्थव्यवस्था के मैनेजरों में वह बेचैनी, घबराहट और हड़बड़ी नहीं है जो औद्योगिक उत्पादन या सेवा क्षेत्र की वृद्धि दर में आई गिरावट के कारण दिख रही है.

यह सचमुच अफसोस और चिंता की बात है कि कहाँ कृषि को मॉनसून यानी इन्द्र देव पर निर्भरता से मुक्त करने का वायदा था और कहाँ नीति नियंता अर्थव्यवस्था की कृषि पर से निर्भरता खत्म करके खुश हो रहे हैं और इसे अपनी कामयाबी मान रहे हैं? सवाल यह है कि यह ‘कामयाबी’ किस कीमत पर आई है?
लेकिन याद रहे, कृषि की उपेक्षा की कीमत सिर्फ किसानों और कृषि मजदूरों को ही नहीं, आम शहरी-मध्यमवर्गीय उपभोक्ताओं को भी चुकानी पड़ेगी. पिछले तीन वर्षों से खाद्य वस्तुओं की लगातार ऊँची मुद्रास्फीति दर कृषि की उपेक्षा और कृषि के बिना भी अर्थव्यवस्था की तेज रफ़्तार की नीति का नतीजा है जिसने अब अर्थव्यवस्था की तेज रफ़्तार पर भी ब्रेक लगाना शुरू कर दिया है.
क्या नार्थ ब्लाक और योजना भवन में बैठे अर्थव्यवस्था के मैनेजरों की आँखें मॉनसून की इस नाकामी से खुलेंगी?

('राष्ट्रीय सहारा' के परिशिष्ट 'हस्तक्षेप' में 7 जुलाई को प्रकाशित आलेख...)     

शुक्रवार, जुलाई 06, 2012

प्रिंस और माही से मनोज तक आने में क्यों घबराते हैं चैनल

मौत को रीयलिटी शो बनाते चैनल लोगों की भावनाओं का इस्तेमाल कर रहे हैं  

प्रशासन और गांववालों तमाम कोशिशों और न्यूज चैनलों की दुआओं के बावजूद ७० फुट गहरे बोरवेल में गिरकर फंसी चार साल की बच्ची माही को नहीं बचाया जा सका. गुडगाँव (हरियाणा) के पास कासना गांव की माही को बोरवेल से सुरक्षित निकालने के लिए ८६ घंटे से भी ज्यादा लंबा अभियान चला और उसे २४ घंटे के न्यूज चैनलों के जरिये पूरे देश ने देखा.
हालाँकि माही की किस्मत कुरुक्षेत्र के प्रिंस की तरह नहीं निकली और उसे बचाया नहीं जा सका लेकिन चैनल माही को बचाने के अभियान में पीछे नहीं रहे. उनके एंकरों और रिपोर्टरों ने माही के लिए दुआएं मांगीं और बचाव आपरेशन के बारे में ब्रेकिंग न्यूज देते रहे.
लेकिन शायद पिछली आलोचनाओं और खिल्लियों का असर था कि इस बार चैनलों में वह उत्साह नहीं दिखा जो उन्होंने २००६ में कुरुक्षेत्र में बोरवेल में गिरे पांच साल के प्रिंस के बचाव अभियान के दौरान दिखाया था. तब चैनलों ने लगातार ५० घंटे से अधिक की लाइव कवरेज की थी. लेकिन कुछ शर्माते- कुछ हिचकते हुए भी चैनलों ने माही बचाओ आपरेशन की अच्छी-खासी कवरेज की.

असल में, चैनलों की ऐसे मामलों को ‘तानने और उससे खेलने’ में अत्यधिक दिलचस्पी रहती है जिसमें भावनाएं हों, सस्पेंस और उसका तनाव हो, खासकर जिसमें किसी की जान अटकी हो. चैनलों को उसे ‘रीयलिटी शो’ में बदलने में देर नहीं लगती है.

लेकिन न्यूज चैनलों की इस ‘जन्मजात विकृति’ को एक पल के लिए नजरंदाज कर दिया जाए तो इसका सकारात्मक पक्ष यह है कि आपरेशन स्थल पर दर्जनों चैनलों के ओ.बी वैन और कैमरों और उनके उत्साही रिपोर्टरों की मौजूदगी ने जिला प्रशासन और राज्य सरकार पर माही बचाओ आपरेशन को तेज करने के लिए लगातार दबाव बनाए रखा.
याद रहे, ऐसे मामलों में चैनलों की अति सक्रियता के कारण ही सुप्रीम कोर्ट ने कुछ साल पहले बोरवेल की खुदाई और रखरखाव को लेकर राज्य सरकारों को कड़े निर्देश दिए ताकि माही जैसे मासूमों को बचाया जा सके. यह और बात है कि प्रशासन और बोरवेल खुला छोड़ने वाले लोगों की आपराधिक लापरवाही जारी है और अफ़सोस, किसी माही के उसमें गिरने से पहले न्यूज चैनलों की नजर भी उधर नहीं जाती. 
लेकिन न्यूज चैनलों की नजर १९ साल के मनोज और ४० साल के शंकर की मौत की ओर भी नहीं गई जो उसी दौरान किसी दूरदराज के गांव में नहीं बल्कि दिल्ली के रोहिणी इलाके में डी.डी.ए के सीवर की सफाई करने के दौरान मेनहोल की जहरीली गैस के शिकार हो गए. मनोज और शंकर मेनहोल में उतरकर सीवर की सफाई करते हुए मारे जानेवाले अकेले सफाईकर्मी नहीं हैं.

दिल्ली में सिर्फ जून महीने में चार से ज्यादा सफाईकर्मी मारे गए हैं. यही नहीं, अकेले दिल्ली में हर साल ५० से ज्यादा सीवर सफाईकर्मी ऐसी ही दुखद और अनजान मौत मरते हैं. अफसोस उनकी मौत किसी चैनल पर ब्रेकिंग न्यूज नहीं बनती, कोई लाइव रिपोर्ट नहीं होती और कोई स्टूडियो चर्चा नहीं होती.

यहाँ तक कि उनकी मौत चैनलों के टिकर में भी जगह नहीं पाती. नतीजा यह कि सीवर सफाईकर्मियों की मेनहोल में सेफ्टी गियर के साथ उतरने जैसे हाई कोर्ट के कड़े निर्देशों के बावजूद उन्हें निहायत ही अमानवीय और असुरक्षित स्थितियों में काम करना पड़ रहा है. उनमें से कई को जान से हाथ धोना पड़ रहा है और बाकी जानलेवा बीमारियों के शिकार हो रहे हैं.
क्या ‘सबसे तेज’ और ‘आपको आगे रखनेवाले’ चैनलों के कैमरे और रिपोर्टर कभी उनका भी दुःख-दर्द पूछेंगे? या उनकी दिलचस्पी सिर्फ मौत के रीयलिटी शो में है? जरा सोचिये. 
('तहलका' के 15 जुलाई के अंक में तमाशा मेरे आगे स्तम्भ में छपी टिप्पणी. इसे आप यहाँ भी पढ़ सकते हैं: http://www.tehelkahindi.com/stambh/diggajdeergha/forum/1275.html और हाँ, इस बीच लोकसभा टी.वी पर युवा पत्रकार संजय झा ने सीवरकर्मियों के दर्द और तकलीफों पर अच्छी रिपोर्ट दिखाई.. पत्रकारिता को उन जैसे नए पत्रकारों से ही उम्मीद है.)       

बुधवार, जुलाई 04, 2012

सिर्फ यूनान का नहीं, नव उदारवादी यूरो प्रोजेक्ट का संकट

याराना पूंजीवाद अपवाद नहीं नियम बन गया है नव उदारवादी आर्थिकी का

यूनान से शुरू हुआ यूरोपीय संघ का आर्थिक-वित्तीय संकट जहाँ एक ओर आयरलैंड, स्पेन, पुर्तगाल, इटली जैसे देशों से होता हुआ साइप्रस तक पहुँच गया है, वहीं यह आर्थिक संकट लगातार गहराता और एक बड़े राजनीतिक संकट में बदलता जा रहा है. इस संकट ने एकल मुद्रा- यूरो स्वीकार करनेवाले यूरोपीय देशों यानी यूरो क्षेत्र के आर्थिक-राजनीतिक भविष्य पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं.
यह आशंका जोर पकड़ती जा रही है कि देर-सवेर संकट में फंसे देशों- यूनान या स्पेन आदि को यूरो क्षेत्र से बाहर निकलना पड़ेगा या यूरो को बचाने के लिए उन्हें निकाल दिया जायेगा और उसके बाद यूरो को संभालना मुश्किल हो जाएगा.    
इस आशंका को कई कारणों से बल मिल रहा है. पहली बात यह है कि यूनान, स्पेन और पुर्तगाल आदि देशों को इस संकट से उबारने के लिए जर्मनी और फ़्रांस के नेतृत्व में यूरोपीय संघ ने जो बचाव योजना बनाई है, वह वित्तीय बाजारों को आश्वस्त करने में नाकाम रही है. उल्टे संकट फैलता और गहराता जा रहा है और जर्मनी ने हाथ खड़ा करना शुरू कर दिया है.

दूसरी ओर, इस योजना के तहत संकटग्रस्त देशों पर थोपी गई शर्तों खासकर किफायतशारी के नामपर आमलोगों पर बोझ लादने और सामाजिक सुरक्षा के बजट में कटौती के खिलाफ लोगों का गुस्सा बढ़ता जा रहा है. इससे राजनीतिक संकट बढ़ रहा है और संकट से निपटने की रणनीति को लेकर यूरोपीय देशों के बीच मतभेद और विवाद बढ़ने लगे हैं.

दूसरा कारण यह है कि यूरो क्षेत्र के इस संकट ने यूरोपीय देशों के मौद्रिक एकीकरण और एकल मुद्रा- यूरो के विचार और उसपर आधारित प्रोजेक्ट पर सवाल उठा दिए हैं. कहा जा रहा है कि बिना राजनीतिक एकीकरण के मौद्रिक एकीकरण का फैसला गलत था.
यही नहीं, यूरोपीय देशों की अर्थव्यवस्थाओं के बीच मौजूद विभिन्नताओं और असमानताओं को अनदेखा करते हुए उन्हें जिस तरह से एकल मुद्रा प्रोजेक्ट में शामिल किया गया और शर्त के रूप में उनपर वित्तीय और मौद्रिक अंकुश थोपे गए, उसने अर्थनीति तय करने के मामले में राष्ट्रीय सरकारों के हाथ बाँध दिए लेकिन वित्तीय व्यवस्था की देनदारी उनके मत्थे ही रही.
हैरानी की बात यह है कि एकल मुद्रा- यूरो के अस्तित्व में आने के बाद यूरो क्षेत्र के देशों के लिए राजकोषीय घाटे, सरकारी कर्ज, मुद्रास्फीति दर और ब्याज दर को लेकर सीमा बाँध दी गई और उसकी निगरानी का जिम्मा यूरोपीय केन्द्रीय बैंक (ई.सी.बी) को दे दिया गया लेकिन बैंकिंग व्यवस्था को एकीकृत करने यानी बैंकिंग संघ बनाने को नजरंदाज कर दिया गया.

इस तरह बैंकों की देनदारियों की कोई संघीय गारंटी या बीमा नहीं होने के कारण वित्तीय संकट में फंसे देशों के बैंकों से पूंजी के सुरक्षित ठिकानों के पलायन के बाद डूबते बैंकों को संभालने का जिम्मा राष्ट्रीय सरकारों पर आ पड़ा है. इससे संकट और गहरा गया है.

साफ़ है कि यूरोप के आर्थिक-वित्तीय एकीकरण का नव उदारवादी प्रोजेक्ट संकट में है. यह सिर्फ यूनान या स्पेन या पुर्तगाल जैसे देशों का संकट नहीं हैं बल्कि यह पूरे यूरोपीय संघ और वित्तीय पूंजीवाद का संकट है. वित्तीय पूंजीवाद के हितों को आगे बढ़ाने के लिए जिन नव उदारवादी आर्थिक नीतियों को थोपा गया और आवारा पूंजी के असीमित मुनाफे की भूख और मनमानियों को प्रोत्साहित किया गया, उसके कारण इस संकट को देर-सवेर आना ही था.
सच पूछिए तो २००७-०८ के अमेरिकी सब-प्राइम संकट ने सिर्फ एक ट्रिगर का काम किया और यूरो क्षेत्र के आंतरिक अंतर्विरोधों और कमजोरियों को उघाड़कर सामने रख दिया. इस अर्थ में यूरो क्षेत्र का आर्थिक-वित्तीय संकट अमेरिकी आर्थिक-वित्तीय संकट का ही विस्तार है जिसकी जड़ें नव उदारवादी आर्थिक सैद्धांतिकी में हैं.
यह किसी से छुपा नहीं है कि नव उदारवादी आर्थिक नीतियों के संरक्षण में आवारा पूंजी ने जिस तरह से सस्ती और आसान वित्तीय पूंजी के जरिये दुनिया भर में और खासकर २००२-२००८ के बीच अमेरिका और यूरोप में रीयल इस्टेट बुलबुले को पैदा किया, उसे एक न एक दिन फूटना था.

लेकिन जब यह बुलबुला फूटा तो वित्तीय व्यवस्था को ढहने से बचाने की आड़ में डूबते हुए बैंकों और वित्तीय संस्थाओं को सार्वजनिक धन से उबारा गया और इस तरह निजी बैंकों/वित्तीय संस्थाओं की मनमानी, आपराधिक धोखाधड़ी और मिलीभगत को अनदेखा करते हुए उनके नुकसान का समाजीकरण किया गया. इसके कारण इन देशों में सार्वजनिक ऋण में भारी वृद्धि हुई और जिसकी भरपाई के लिए अब आमलोगों पर बोझ लादा जा रहा है.

लेकिन मुश्किल यह है कि चाहे यूरोपीय राजनीतिक नेतृत्व हो या अमेरिकी नेतृत्व या फिर जी-२० देशों का राजनीतिक नेतृत्व, कोई इस सच्चाई को स्वीकार करने को तैयार नहीं है. उल्टे इसपर पर्दा डालने की कोशिश हो रही है.
नतीजा यह हो रहा है कि इस संकट के लिए एक ओर जहाँ खुद संकटग्रस्त देशों को उनकी आंतरिक आर्थिक कमजोरियों और गडबडियों के लिए जिम्मेदार ठहराया जा रहा है, वहीँ दूसरी ओर, समाधान के नामपर उन्हीं नीतियों की कड़वी घूँट उनके गले उतारने की कोशिश हो रही है. आश्चर्य नहीं कि इससे संकट और गहराता और फैलता जा रहा है.
असल में, यूरो क्षेत्र के नीति नियंता देशों खासकर जर्मनी और अभिजात शासक वर्ग में यूनान जैसे संकटग्रस्त देशों को सजा देने का भाव अधिक है. गोया इस संकट के लिए वे अकेले जिम्मेदार हों. यह सच है कि यूनान और बहुत हद तक स्पेन के मौजूदा आर्थिक-वित्तीय संकट के लिए मूलतः इन देशों का भ्रष्ट राजनीतिक नेतृत्व और उसका लुटेरे कारपोरेट क्षेत्र/वित्तीय संस्थाओं के साथ गठजोड़ जिम्मेदार है.

लेकिन इससे बड़ा सच यह है कि इन देशों का भ्रष्ट राजनीतिक नेतृत्व उन्हीं नव उदारवादी आर्थिक नीतियों को जोरशोर से आगे बढ़ा रहा था जिसमें सार्वजनिक हितों की कीमत पर निजी क्षेत्र को आगे बढ़ाया गया, सार्वजनिक कंपनियों-उपक्रमों का बेलगाम निजीकरण किया गया और उन्हें मनमाना मुनाफा बनाने की इजाजत दी गई.

सबसे अधिक हैरानी और अफसोस की बात यह है कि यूनान, पुर्तगाल और स्पेन आदि देशों में इन नव उदारवादी आर्थिक नीतियों को सबसे अधिक जोरशोर से सोशलिस्ट पार्टियों के नेतृत्व में बढ़ाया गया. इन देशों में पिछले तीन दशकों में सबसे अधिक समय तक सोशलिस्ट पार्टियों ने ही राज किया है लेकिन वे कहने को ही सोशलिस्ट पार्टियां थीं.
आर्थिक और कुछ हद तक सामाजिक नीतियों के मामले में उनके और अनुदारवादी-दक्षिणपंथी पार्टियों के बीच का फर्क खत्म हो गया था. यही नहीं, इन पार्टियों के शासनकाल में याराना (क्रोनी) पूंजीवाद, भ्रष्टाचार और पसंदीदा कार्पोरेट्स को छूट/रियायतें आदि अपने चरम पर था.
इस राजनीतिक नेतृत्व के दिवालिएपन का अंदाज़ा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि यूनान को यूरो क्षेत्र और एकल मुद्रा का हिस्सा बनाने की इतनी जल्दी थी कि उसके लिए जरूरी आर्थिक-वित्तीय शर्तों को पूरा करने के लिए राजकोषीय घाटे और सरकारी कर्ज आदि के फर्जी आंकड़े तैयार किये गए.

इस फर्जीवाड़े में यूनान की मदद वाल स्ट्रीट के बड़े अमेरिकी निवेश बैंकों जैसे गोल्डमैन साक्स आदि ने की और बदले में मोती कमाई की. इसके जरिये यूनान ने अपने राजकोषीय घाटे को कम करके दिखाया. लेकिन यह भी सच है कि यूरो क्षेत्र के विस्तार के लिए बेचैन यूरोपीय संघ के अधिकारियों और नेताओं ने भी जानबूझकर इसे अनदेखा किया.

जाहिर है कि इससे यूनान के अधिकारियों और राजनीतिक नेतृत्व का हौसला बढ़ा और एक के बाद दूसरी सरकारों ने राजकोषीय घाटे और सार्वजनिक कर्ज को कम दिखाने के लिए आंकड़ों में हेरफेर किया. लेकिन जब तक यूरो क्षेत्र और यूनान में आर्थिक बूम का माहौल था, इसे अनदेखा किया गया लेकिन जब २००७-०८ में अमेरिकी बुलबुला फूटा और उसके साथ आए आर्थिक संकट के संक्रमण ने यूरोप को चपेट में लेना शुरू किया तो यूनानी अर्थव्यवस्था की कमजोरियां उजागर होने लगीं.
पता चला कि २००९ की शुरुआत में राजकोषीय घाटे का अनुमान जी.डी.पी का ३.७ फीसदी था जो सितम्बर महीने में संशोधित करके पहले जी.डी.पी का ६ फीसदी और बाद में सीधे १२.७ फीसदी तक पहुँच गया.
कहानी यहीं खत्म नहीं हुई. मई’२०१० में राजकोषीय घाटा जी.डी.पी का १३.७ फीसदी और यूनान का कुल सार्वजनिक कर्ज जी.डी.पी का १२० फीसदी रहने का संशोधित अनुमान पेश किया गया. लेकिन नवंबर में यूरो क्षेत्र के आधिकारिक आडिट के बाद यूरोस्टैट ने इसे और संशोधित कर दिया जिसके मुताबिक वर्ष २००९ में यूनान का राजकोषीय घाटा बढ़कर जी.डी.पी का १५.४ फीसदी और सार्वजनिक कर्ज जी.डी.पी का १२६.८ फीसदी पहुँच गया.

इस फर्जीवाड़े के उजागर होने के बाद से यूरो क्षेत्र के प्रभावशाली देशों और मुद्रा कोष-वाल स्ट्रीट के प्रतिनिधियों की ओर से यूनानी राजनेताओं और अधिकारियों की लानत-मलामत शुरू हो गई, गोया इस सबके लिए वे अकेले जिम्मेदार हों. यही नहीं, अत्यधिक राजकोषीय घाटे और सरकारी कर्ज का सारा ठीकरा यूनानी जनता पर फोड़ा जाने लगा कि वे काम नहीं करते लेकिन उनकी तनख्वाहें बहुत ज्यादा हैं, उनके सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रमों पर व्यय बहुत अधिक है आदि-आदि.

जाहिर है कि यह सब यूनान को दिए बचाव पैकेज के बदले में उसपर थोपे गए किफायतशारी उपायों को जायज ठहराने के लिए गढ़ी गई कहानियां थीं. सच यह है कि यूनान में यह फर्जीवाडा एक दिन या साल में नहीं हुआ था और न ही यूरो क्षेत्र के नेताओं/अधिकारियों और बड़ी पूंजी की जानकारी के बिना हुआ था.
यह सही है कि यूनानी राजनीतिक नेतृत्व और नौकरशाही निहायत ही भ्रष्ट और याराना पूंजीवाद को आगे बढ़ानेवाली रही है लेकिन यूनान में सालों से मची इस लूट में सभी शामिल थे. यूरो क्षेत्र का राजनीतिक नेतृत्व यूनान के आर्थिक-वित्तीय संकट की जिम्मेदारी से बच नहीं सकता है और इसके लिए यूनानी जनता कहीं से जिम्मेदार नहीं है. अलबत्ता वह इस संकट की भुक्तभोगी और पीड़ित है.
दूसरी बात यह है कि अगर मौजूदा संकट के लिए सिर्फ यूनान जिम्मेदार होता तो यह आर्थिक संकट सिर्फ यूनान तक सीमित रहता. लेकिन तथ्य यह है कि इसकी चपेट में यूनान के साथ-साथ पुर्तगाल, स्पेन, साइप्रस, आयरलैंड आ चुके हैं और इटली, इंग्लैण्ड और फ़्रांस का नंबर आनेवाला है. अमेरिकी अर्थव्यवस्था पहले से ही मुश्किलों में है.

यही नहीं, यूरो क्षेत्र के इस आर्थिक संकट के संक्रमण का वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी असर दिखने लगा है. साफ़ है कि यह आर्थिक संकट कहीं ज्यादा व्यापक, गहरा और व्यवस्थागत है. वास्तव में, यह संकट नव उदारवादी पूंजीवाद का है जो मुनाफे के अपने असीमित लोभ-लालच और मनमानियों की अंधी सुरंग के आखिरी छोर पर पहुँच गया है. 

दोहराने की जरूरत नहीं है कि यूनान और यूरो क्षेत्र के संकट ने नव उदारवादी पूंजीवाद के यूरो प्रोजेक्ट के भविष्य पर सवाल खड़े कर दिए हैं. सवाल यह है कि घाटे का समाजीकरण और मुनाफे का निजीकरण की व्यवस्था और कितने दिन चलेगी?
यह भी कि लोगों की कीमत पर मुनाफे की अर्थनीति को लोग कब तक बर्दाश्त करेंगे? मतलब यह कि आनेवाले दिनों में एक फीसदी बनाम ९९ फीसदी की बहस न सिर्फ प्रासंगिक बनी रहेगी बल्कि तेज होगी और उसी से यूरो और वैश्विक अर्थव्यवस्था का भविष्य तय होगा.
पश्च नोट: भारत के लिए भी यह बहस बहुत प्रासंगिक है जहाँ आर्थिक--सामाजिक असमानता बहुत तेजी से बढती जा रही है. यही नहीं, भारतीय अर्थव्यवस्था भी याराना पूंजीवाद के चंगुल में फंस गई है और लोगों की कीमत पर सार्वजानिक संसाधनों की लूट अपने चरम पर है. 
('जनसत्ता' के सम्पादकीय पृष्ठ पर 4 जुलाई को प्रकाशित आलेख)                                   

मंगलवार, जुलाई 03, 2012

मोदी बनाम नीतिश : ‘विकास पुरुष’ की फर्जी लड़ाई

तेज विकास दर के बावजूद बिहार और गुजरात भुखमरी के पैमाने पर साथ खड़े हैं 
राष्ट्रीय राजनीति में गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी और बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार की बढ़ती दावेदारी और आपसी प्रतिस्पर्द्धा के पीछे सबसे बड़ी वजह यह मानी जाती रही है कि दोनों ने अपने-अपने राज्यों में ‘सुशासन’ के जरिये न सिर्फ चमत्कारिक और तेज आर्थिक विकास सुनिश्चित किया है बल्कि अपने-अपने राज्यों को विकास दर के मामले में देश के टाप राज्यों में पहुंचा दिया है. इस कारण दोनों अपने को ‘विकासपुरुष’ के रूप में पेश करते रहे हैं.
यही नहीं, दोनों में एक समानता और है. दोनों खुद को अपने-अपने राज्यों की क्षेत्रीय, गुजराती और बिहारी अस्मिता के प्रतीक के बतौर पेश करते हैं. लेकिन दोनों के बीच विकास के नीतिश बनाम नरेन्द्र मोदी माडल को ज्यादा बेहतर बताने की होड़ भी है.
लेकिन उनके दावों की सच्चाई क्या है? असल में, उनके दावे ‘आधी हकीकत और आधा फ़साना’ के ऐसे उदाहरण हैं जिनके आधार पर उनकी ‘विकास पुरुष’ की छवियाँ गढ़ी गई हैं. इन दावों को बारीकी और करीब से देखने पर ही यह स्पष्ट हो पाता है कि उनमें कितना यथार्थ है और कितना मिथ?

लेकिन इससे पहले कि दोनों राज्यों के आर्थिक और मानवीय विकास और उनके सुशासन के दावों को करीब से देखा जाए, यह जानना बहुत जरूरी है कि इन दोनों मुख्यमंत्रियों का कार्यकाल २१ वीं सदी का पहला दशक है जिसमें न सिर्फ ये दोनों राज्य बल्कि देश के अधिकांश राज्यों में आर्थिक वृद्धि की रफ़्तार में तेजी देखी गई है और खुद भारत की जी.डी.पी वृद्धि दर पूर्व के सभी दशकों से तेज रही है.

इस तथ्य पर गौर कीजिए:
·         १९९४-९५ से १९९९-०० के बीच देश की जी.डी.पी वृद्धि दर औसतन ६.०९ फीसदी थी जो २०००-०१ से २००९-१० के बीच बढ़कर औसतन ७ फीसदी हो गई. इस दौरान गुजरात की राज्य जी.डी.पी वृद्धि दर ९४-९५ से ९९-०० के बीच औसतन ८ फीसदी थी जो ००-०१ से ०९-१० के बीच बढ़कर ८.६८ फीसदी हो गई है.

   साफ़ है कि गुजरात में नरेन्द्र मोदी के कार्यकाल में औसतन सिर्फ ०.६८ फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई है. अलबत्ता, इस बीच बिहार में जी.डी.पी वृद्धि दर ने जरूर तेज छलांग लगाईं है. बिहार में ९४-९५ से ९९-०० के बीच जी.डी.पी की औसत वृद्धि दर ४.७० फीसदी थी जो ००-०१ से ०९-१० के बीच उछलकर औसतन ८.०२ फीसदी तक पहुँच गई है. लेकिन इन दस वर्षों में पांच वर्ष लालू प्रसाद और पांच वर्ष नीतिश कुमार की सरकार रही है.

दूसरे, इसी दौरान देश के कई और राज्यों की औसत वृद्धि दर में ऐसी ही उछाल देखी गई है. इन राज्यों में छत्तीसगढ़ (२.८८ फीसदी से ७.९८ फीसदी), हरियाणा (५.९६ फीसदी से ८.९५ फीसदी), उत्तराखंड (३.२२ फीसदी से ११.८४ फीसदी), ओडिशा (४.४२ फीसदी से ७.९५ फीसदी) और महाराष्ट्र (६.३० फीसदी से ८.१३ फीसदी) जैसे राज्य शामिल हैं जिनका आर्थिक प्रदर्शन किसी भी मायने में गुजरात या बिहार से कमतर नहीं है.           

साफ है कि तेज आर्थिक विकास के मामले में गुजरात या बिहार कोई अपवाद नहीं हैं और न ही यह सिर्फ इन दोनों राज्यों तक सीमित परिघटना है. सच यह है कि इन दोनों राज्यों को देश और अन्य राज्यों की तेज आर्थिक विकास का फायदा मिला है क्योंकि यह संभव नहीं है कि देश और बाकी राज्यों में आर्थिक विकास ठप्प हो और सिर्फ गुजरात और बिहार तेज रफ़्तार से भाग रहे हों.  

और अब आइये इन दोनों राज्यों के आर्थिक विकास के तथ्यों के आलोक में विकास पुरुषों के विकास के फ़साने को समझा जाए:           

-    यह एक तथ्य है कि गुजरात आर्थिक विकास और प्रति व्यक्ति राज्य घरेलू उत्पाद (एस.डी.पी) के मामले में लंबे अरसे से देश के शीर्ष राज्यों में रहा है. ऐसा नहीं है कि यह ‘चमत्कार’ भाजपा और खासकर मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के कार्यकाल में हुआ है. तथ्यों के मुताबिक, गुजरात प्रति व्यक्ति राज्य घरेलू उत्पाद के मामले में गुजरात पिछले चार दशकों से अधिक समय से देश के शीर्ष के दस बड़े राज्यों में पांचवें या छठे स्थान पर रहा है. एकाध बार चौथे स्थान पर भी रहा है.
  
  लेकिन प्रति व्यक्ति राज्य घरेलू उत्पाद के मामले में हरियाणा, पंजाब, महाराष्ट्र और तमिलनाडु जैसे राज्य उससे आगे हैं. साफ़ है कि मोदी ने आर्थिक विकास के मामले में कोई ऐसा चमत्कार नहीं कर दिया है जो और कोई मुख्यमंत्री नहीं कर पाया है.   

-    दूसरी ओर, बिहार में नीतिश कुमार के कार्यकाल में बिहार की जी.डी.पी वृद्धि दर (०५-०६ में ०.९२ फीसदी, ०६-०७ में १७.७५ फीसदी, ०७-०८ में ७.६४ फीसदी, ०८-०९ में १४.५८ फीसदी, ०९-१० में १०.४२ फीसदी, १०-११ में १४.७७ फीसदी और ११-१२ में १३.१३ फीसदी) जरूर चमत्कारिक और हैरान करनेवाली दिखती है लेकिन वह न सिर्फ एकांगी और विसंगत वृद्धि का नमूना है बल्कि आंकड़ों का चमत्कार है.
  
   असल में, यह बिहार की अर्थव्यवस्था के अत्यधिक छोटे आकार में हो रही वृद्धि का नतीजा है जिसे अर्थशास्त्र में बेस प्रभाव कहते हैं. चूँकि बिहार की जी.डी.पी का आकार छोटा है और उसकी वृद्धि दर भी कम थी, इसलिए जैसे ही उसमें थोड़ी तेज वृद्धि हुई, वह प्रतिशत में चमत्कारिक दिखने लगी.

दूसरे, बिहार की मौजूदा आर्थिक वृद्धि दर न सिर्फ एकांगी और विसंगत है बल्कि वह अर्थव्यवस्था के सिर्फ कुछ क्षेत्रों में असामान्य उछाल के कारण आई है. उदाहरण के लिए, बिहार की आर्थिक वृद्धि में मुख्यतः निर्माण क्षेत्र यानी सड़कों-पुलों-रीयल इस्टेट में बूम की बड़ी भूमिका है.

यही नहीं, इस तेज वृद्धि दर के बावजूद बिहार की प्रति व्यक्ति आय २००५-०६ में ८३४१ रूपये थी जो नीतिश कुमार के कार्यकाल के दौरान बढ़कर २०१०-११ तक २००६९ रूपये तक पहुंची है.

अब अगर इसकी तुलना देश के कुछ अगुवा राज्यों की प्रति व्यक्ति आय से करें तो पता चलता है कि हरियाणा के ९२३८७ रूपये, पंजाब के ६७४७३ रूपये, महाराष्ट्र के ८३४७१ रूपये और तमिलनाडु के ७२९९३ रूपये से काफी पीछे है. इसका अर्थ यह हुआ कि अगर बिहार में जी.डी.पी की यह तेज वृद्धि दर इसी तरह बनी रहे और अगुवा राज्य भी अपनी गति से बढते रहे तो देश के अगुवा राज्यों तक पहुँचने में बिहार को अभी कम से कम दो दशक और लगेंगे.

लेकिन उससे भी जरूरी बात यह है कि बिहार में मौजूदा विकास/वृद्धि के साथ सबसे बड़ी समस्या यह है कि वहाँ औद्योगिक विकास खासकर मैन्युफैक्चरिंग के क्षेत्र में कोई विकास नहीं है और बुनियादी ढांचे खासकर बिजली के मामले में स्थिति बद से बदतर हुई है. इसी तरह, कृषि में भी अपेक्षित वृद्धि नहीं दिखाई दे रही है.  

ऐसे और भी कई तथ्य हैं जो इन दोनों राज्यों में तेज आर्थिक विकास की विसंगतियों की सच्चाई सामने लाते हैं. लेकिन अगर एक मिनट के लिए उनके दावों को स्वीकार भी कर लिया जाए तो असल सवाल यह है कि तेज वृद्धि दर के बावजूद इन राज्यों में मानव विकास का क्या हाल है?
क्या इस तेज विकास का फायदा भोजन, गरीबी उन्मूलन, शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास, रोजगार आदि क्षेत्रों और राज्य के सभी इलाकों और समुदायों को भी मिला है?
इस मामले में तथ्य बहुत निराश करते हैं:
·         बिहार में गरीबी, भुखमरी, स्वास्थ्य-शिक्षा और रोजगार के हाल के बारे में जितनी कम बात की जाए, उतना ही अच्छा है. नीतिश कुमार के कार्यकाल में तेज वृद्धि दर के बावजूद मानव विकास के सभी मानकों पर बिहार अभी भी देश के बड़े राज्यों में सबसे निचले पायदान के तीन राज्यों में बना हुआ है.

·         लेकिन तीव्र आर्थिक वृद्धि के बावजूद मानव विकास के कई मानकों पर गुजरात का रिकार्ड शर्मनाक है. उदाहरण के लिए, भुखमरी के मामले में गुजरात, देश के सबसे बदतर राज्यों की सूची में बिहार और ओडिशा जैसे राज्यों के साथ बराबरी में खड़ा है. यहाँ तक कि उत्तर प्रदेश भी भुखमरी के इंडेक्स में गुजरात से ऊपर है.

   यह इस बात का सबूत है कि गुजरात में गैरबराबरी बहुत अधिक है और तीव्र विकास का लाभ गरीबों तक नहीं पहुँच रहा है. यही नहीं, बाल कुपोषण दर के मामले में भी गुजरात का रिकार्ड देश के कई विकसित राज्यों की तुलना में बहुत खराब और बदतर राज्यों के करीब है.

इसके अलावा, गुजरात में तेज आर्थिक विकास का लाभ आदिवासियों और मुस्लिमों को नहीं मिला है. खासकर मुस्लिमों के साथ भेदभाव यहाँ तक कि उनके अघोषित आर्थिक बायकाट की नीति के कारण उनकी स्थिति बद से बदतर हुई है.

इन तथ्यों से साफ़ है कि मोदी और नीतिश खुद को ‘विकास पुरुष’ के रूप में चाहे जितना पेश करें लेकिन उन्होंने विकास का कोई नया, ज्यादा समावेशी और टिकाऊ माडल नहीं पेश किया है. उनकी अर्थनीति किसी भी रूप में केन्द्र की यू.पी.ए सरकार या किसी कांग्रेसी मुख्यमंत्री से अलग नहीं है.
दोनों (खासकर मोदी) उन्हीं नव उदारवादी आर्थिक नीतियों को आगे बढ़ा रहे हैं जो गरीबों को बाईपास करके निकल जाने के लिए जानी जाती है. सच यह है कि उन्होंने बहुत चतुराई से देश भर में हो रही मौजूदा आर्थिक वृद्धि को अपनी छवि गढ़ने के लिए इस्तेमाल कर लिया है लेकिन उसके नकारात्मक नतीजों का ठीकरा केन्द्र सरकार पर फोड दिया है.
इस मामले में दोनों का कोई जवाब नहीं है. दोनों एक ही खेल के माहिर हैं और इस कारण स्वाभाविक तौर पर उनमें होड़ भी दिखाई पड़ती है. देखिये, छवियों की इस लड़ाई में कौन बीस बैठता है?
(साप्ताहिक 'शुक्रवार' के 29 जून से 5 जुलाई के अंक में प्रकाशित आलेख..अगले कुछ दिनों में मोदी और नीतिश कुमार के विकास और राजनीति की पोल खोलती रिपोर्टों की श्रृंखला   लिखने का इरादा है...आपकी टिप्पणियों का इंतजार रहेगा.)           

सोमवार, जुलाई 02, 2012

नए वित्त (प्रधान) मंत्री के लिए रास्ता आसान नहीं है

क्योंकि 2012, 1991 नहीं है और नव उदारवादी आर्थिक सुधारों की पोल खुल चुकी है  


भारतीय अर्थव्यवस्था पर मंडराते संकट के बादलों के बीच राष्ट्रपति चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे प्रणब मुखर्जी के वित्त मंत्री पद से इस्तीफे के बाद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने ‘मैं हूँ ना’ की तर्ज पर खुद वित्त मंत्रालय सँभालने का फैसला करके घबराए बाजार, नाराज कारपोरेट जगत और बेचैन देशी-विदेशी निवेशकों को आश्वस्त करने की कोशिश की है.
नव उदारवादी आर्थिक सुधारों के जनक और १९९१ में देश को गंभीर आर्थिक संकट से निकालने वाले वित्त मंत्री के रूप में मनमोहन सिंह बाजार, कारपोरेट जगत और देशी-विदेशी निवेशकों के लाडले रहे हैं. 
इस कारण बाजार, कारपोरेट जगत और देशी-विदेशी निवेशकों को उनसे बहुत उम्मीदें हैं कि वे पटरी से उतरती अर्थव्यवस्था को संभालने के लिए साहसिक फैसले करेंगे और खासकर ठहर गए आर्थिक सुधारों को तेजी से आगे बढ़ाएंगे.
लेकिन उनके लिए यह चुनौती आसान नहीं है. एक ओर जहाँ उनपर उम्मीदों और अपेक्षाओं का भारी बोझ है, वहीं चुनौतियाँ सिर्फ आर्थिक नहीं बल्कि राजनीतिक-सामाजिक और वैचारिक ज्यादा हैं. सबसे पहली बात यह है कि १९९१ और २०१२ के बीच गंगा-यमुना में बहुत पानी बह चुका है. मौजूदा आर्थिक-वित्तीय संकट १९९१ की तरह सिर्फ भारत तक सीमित नहीं है बल्कि यह एक वैश्विक आर्थिक संकट है जो मूलतः नव उदारवादी पूंजीवाद का संकट है.

नव उदारवादी आर्थिक सैद्धांतिकी के पास फिलहाल इसका कोई समाधान नहीं दिख रहा है. इस संकट के इलाज के नामपर और ज्यादा नव उदारवादी दवा देने की कोशिशें न सिर्फ नाकाम हो गईं हैं बल्कि उनके कारण राजनीतिक संकट बढ़ने लगा है.

दूसरी ओर, वित्त मंत्री के बतौर मनमोहन सिंह के सामने आज राजनीतिक चुनौतियाँ ज्यादा हैं. उसकी वजह यह है कि मनमोहनी नव उदारवादी आर्थिक सुधारों को लेकर देश में भी सवाल उठने लगे हैं. यहाँ तक कि इन आर्थिक सुधारों को लेकर खुद यू.पी.ए और कांग्रेस के अंदर मतभेद साफ़ तौर पर दिख रहे हैं और नव उदारवादी आर्थिक नीतियों को लेकर बनी राजनीतिक सर्वसम्मति में दरार उभर कर सामने आ गई है.
इसकी एक बड़ी वजह यह है कि नव उदारवादी आर्थिक नीतियों की साख और चमक एक ओर भ्रष्टाचार और सार्वजनिक संसाधनों की कारपोरेट लूट के बड़े-बड़े मामलों के उजागर होने के कारण फीकी पड़ने लगी है और दूसरी ओर, इन नीतियों के कारण ‘जल-जंगल-जमीन’ गवांने और बदले में कुछ न पानेवाले किसानों, श्रमिकों और आदिवासियों ने विद्रोह का झंडा बुलंद कर दिया है.
यही कारण है कि यू.पी.ए-दो सरकार के लिए आर्थिक सुधारों खासकर विवादास्पद खुदरा व्यापार में विदेशी पूंजी को अनुमति, पेंशन, बीमा और उड्डयन क्षेत्र में मौजूदा विदेशी पूंजी निवेश की सीमा में बढ़ोत्तरी और श्रम सुधारों को आगे बढ़ाने में कठिनाई हो रही है और दूसरी ओर, नई औद्योगिक इकाइयों या ढांचागत परियोजनाओं के लिए किसानों से जमीन अधिग्रहण या आदिवासी इलाकों में खनिजों के दोहन में कड़े प्रतिरोध का सामना करना पड़ रहा है.

यही नहीं, यू.पी.ए सरकार के लिए कई महत्वपूर्ण नीतिगत फैसलों को लेने में सबसे ज्यादा मुश्किल इसलिए हो रही है क्योंकि टेलीकाम से लेकर उड्डयन क्षेत्र तक और कोयला से लेकर गैस आवंटन में कारपोरेट समूहों के बीच जबरदस्त खींचतान मची हुई है.

इस कारपोरेट युद्ध में फंसी यू.पी.ए सरकार सरकार नीतिगत रूप से पंगु हो गई है. इसके लिए यह सरकार खुद जिम्मेदार है क्योंकि उसने आर्थिक वृद्धि के नामपर जिस तरह से क्रोनी पूंजीवाद को फलने-फूलने का मौका दिया, जिसके कारण भ्रष्टाचार और कारपोरेट लूट के बड़े-बड़े मामलों के खुलासों के बीच सरकार और खुद प्रधानमंत्री ने राजनीतिक साख या पूंजी गँवा दी है.
कमजोर राजनीतिक साख के साथ कड़े फैसले ले पाना आसान नहीं होता. ऐसे में, प्रधानमंत्री के लिए सबसे बड़ी चुनौती न सिर्फ सरकार के इकबाल को बहाल करना और राजनीतिक पूंजी जुटाना है बल्कि आर्थिक नीतियों और फैसलों को कारपोरेट दबाव और लाबीइंग से मुक्त कराना है.
जाहिर है कि यह आसान चुनौती नहीं है. यह किसी से छुपा नहीं है कि आर्थिक सुधारों के कथित तौर पर रूक जाने से देशी-विदेशी कारपोरेट समूह सरकार से सख्त नाराज हैं. अजीम प्रेमजी से लेकर एन.आर नारायणमूर्ति तक कई बड़े कार्पोरेट्स ने खुलेआम सरकार पर नीतिगत अनिर्णय का शिकार होने का आरोप लगाते हुए उसकी तीखी आलोचना की है.

वे चाहते हैं कि अब जब वित्त मंत्रालय भी प्रधानमंत्री के पास है तो सरकार बिना और विलम्ब के आर्थिक सुधारों को तेजी से आगे बढ़ाए. उनकी मांग है कि सरकार एक ओर राजकोषीय घाटे को कम करने के लिए अपने खर्चों में कटौती करे, डीजल-खाद पर सब्सिडी में कमी करे और दूसरी ओर, खुदरा व्यापार में एफ.डी.आई को मंजूरी जैसे रूके हुए फैसलों को हरी झंडी दे.

यही नहीं, वे यह भी चाहते हैं कि बतौर वित्त मंत्री मनमोहन सिंह विदेशी पूंजी और बड़े कार्पोरेट्स को आश्वस्त करें कि वह वोडाफोन मामले में पीछे से टैक्स वसूलने, टैक्स देने से बचने पर अंकुश लगानेवाले गार नियमों और २ जी मामले में १२४ लाइसेंसों को रद्द करने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले में उनके हितों का ध्यान रखेगी.
साफ़ है कि कारपोरेट जगत खासकर बड़ी विदेशी पूंजी मौजूदा आर्थिक संकट को एक मौके की तरह इस्तेमाल कर रही है. वह सरकार से ज्यादा से ज्यादा रियायतें लेने की कोशिश कर रही है. सरकार दबाव में है और वह न सिर्फ आर्थिक बल्कि राजनीतिक कारणों से भी देशी-विदेशी कार्पोरेट्स को खुश करने के लिए विवादास्पद आर्थिक सुधारों को आगे बढ़ाने की जल्दी में दिख रही है.
लेकिन इन फैसलों से संकट में फंसी अर्थव्यवस्था को तात्कालिक तौर पर कोई मदद नहीं मिलने जा रही है क्योंकि भारतीय अर्थव्यवस्था के संकट की जड़ में आर्थिक सुधारों में रुकावट नहीं बल्कि वही नव उदारवादी आर्थिक सुधार हैं जो वैश्विक आर्थिक संकट के साथ-साथ घरेलू संकट के लिए भी जिम्मेदार हैं.

यही कारण है कि सरकार संकट से निपटने के लिए जो भी फैसले कर रही है, उसका बाजार पर कोई खास असर नहीं हो रहा है. उदाहरण के लिए, रिजर्व बैंक ने अप्रैल में मुद्रास्फीति की ऊँची दरों के बावजूद ब्याज दरों में एकबारगी आधा फीसदी की कटौती की लेकिन इससे निवेश में कोई खास बढ़ोत्तरी नहीं हुई. अलबत्ता, कार्पोरेट्स और कटौती की मांग कर रहे हैं.

इसी तरह, रिजर्व बैंक ने इस सप्ताह कार्पोरेट्स और विदेशी पूंजी के लिए निवेश और कर्जों में कई ढील देने की घोषणा की है. इस फैसला आवारा विदेशी पूंजी को प्रोत्साहित करनेवाला है. इससे अर्थव्यवस्था की विदेशी पूंजी पर निर्भरता और बढ़ जाएगी. इसके बावजूद बाजार में निराशा का माहौल बना हुआ है.
बाजार सरकार और अब नए वित्त मंत्री के बतौर प्रधानमंत्री से और बड़े फैसलों की उम्मीद कर रहा है. ऐसे में, सवाल यह है कि खुदरा व्यापार में विदेशी पूंजी को मंजूरी या वोडाफोन मामले में पीछे से टैक्स लगाने के फैसले को वापस लेने से क्या मौजूदा आर्थिक संकट टल जाएगा?
वैश्विक आर्थिक संकट खासकर यूरोप के मौजूदा हाल को देखते हुए इस बात की उम्मीद बहुत कम दिखाई देती है. सच यह है कि इस संकट से निपटने के लिए विदेशी पूंजी या देशी-विदेशी कार्पोरेट्स पर भरोसा करने से स्थिति नहीं संभलनेवाली है.

यह भी कि देशी-विदेशी बड़ी पूंजी और कार्पोरेट्स को मुंहमांगी रियायतें देने से हो सकता है कि संकट थोड़े समय के लिए टल जाए लेकिन वह खत्म नहीं होगा और कुछ समय बाद फिर उभर आएगा. इसलिए अब समय आ गया है जब इस संकट से निपटने के लिए बाहर के बजाय देश के अंदर और बड़ी देशी-विदेशी पूंजी के बजाय सार्वजनिक संसाधनों पर भरोसा करके अर्थव्यवस्था में निवेश बढ़ाने के उपाय किये जाएँ. 

यह सही है कि इस संकट से निकलने का रास्ता इतना आसान नहीं है. एक ओर ऊँची मुद्रास्फीति और दूसरी ओर, गिरती वृद्धि दर के बीच फैसला करना आसान नहीं है. लेकिन इतना तय है कि अर्थव्यवस्था निवेश मांग रही है खासकर भौतिक और सामाजिक ढांचागत और कृषि क्षेत्र में. इस निवेश में ही दोनों समस्याओं का हल है.

लेकिन इसके लिए सरकार को फिलहाल, राजकोषीय घाटे की चिंता छोड़नी पड़ेगी और अर्थव्यवस्था में सार्वजनिक निवेश में बढ़ोत्तरी करनी होगी. इसके अलावा और कोई विकल्प नहीं है क्योंकि देशी-विदेशी बड़ी पूंजी को खुश करते-करते देश वहां पहुँच गया है जहाँ से आगे की राह और फिसलन भरी है.

('दैनिक भास्कर', नई दिल्ली के 29 जून के अंक में आप-एड पृष्ठ पर प्रकाशित मुख्य लेख का असंपादित रूप)