गुरुवार, जुलाई 07, 2011

जारी है मजीठिया वेतन आयोग के खिलाफ दुष्प्रचार अभियान

 न्यूज एजेंसियों की खराब वित्तीय स्थिति के लिए अखबार मालिक जिम्मेदार हैं



अख़बारों और न्यूज एजेंसियों के पत्रकारों और गैर पत्रकारों के लिए गठित मजीठिया वेतन आयोग की सिफारिशों के खिलाफ अखबार मालिकों की मुहिम जारी है. इस मुहिम की अगुवाई ‘टाइम्स आफ इंडिया’ समूह कर रहा है. आज भी ‘टाइम्स आफ इंडिया’ में पेज १७ पर दो कालम और सात पैराग्राफ की भारी भरकम खबर छपी है जिसमें बताया गया है कि अगर वेतन आयोग की सिफारिशें लागू हुईं तो देश की दोनों प्रमुख समाचार एजेंसियों- पी.टी.आई और यू.एन.आई बंदी के कगार पर पहुँच जाएँगी. इस रिपोर्ट के मुताबिक, यू.एन.आई पहले ही ३० करोड़ से अधिक के घाटे में और वित्तीय तौर पर खस्ताहाल है और पी.टी.आई भी इसी स्थिति की ओर बढ़ रही है.

इस रिपोर्ट का लिंक है: http://epaper.timesofindia.com/Daily/skins/TOINEW/navigator.asp?Daily=CAP&showST=true&login=default&pub=TOI&AW=1310012860916

कहने की जरूरत नहीं है कि टाइम्स में यह रिपोर्ट बहुत सुनियोजित तरीके प्लांट की गई है. उसका मकसद वेतन आयोग के खिलाफ माहौल बनाना और दुष्प्रचार करना है. इसका सबूत यह है कि रिपोर्ट बिना किसी बाइलाइन के है और पूरी खबर सूत्रों के हवाले से लिखी गई है. यही नहीं, यह ‘खबर’ कम और ‘विचार’ अधिक है. आश्चर्य की बात यह है कि जो बड़े अखबार समूह इन एजेंसियों की धीमी मौत के लिए सीधे तौर पर जिम्मेदार हैं और जिन्होंने कभी भी उनकी खोज-खबर नहीं ली, उनमें आज अचानक एजेंसियों के वित्तीय स्वास्थ्य के लिए इतना प्रेम कैसे उमड़ पड़ा है?

सच यह है कि एजेंसियों की मौजूदा स्थिति के लिए काफी हद तक बड़े और मंझोले अखबार समूह भी जिम्मेदार हैं जिन्होंने अपने खर्चों में कटौती के नाम पर एजेंसियों की सेवाएं आधिकारिक तौर पर खत्म कर दी हैं या एक एजेंसी की सेवा में कई संस्करण निकाल रहे हैं या एजेंसियों की खबरें चोरी-चोरी अपने रिपोर्टर के हवाले से छाप रहे हैं. यही नहीं, वे एजेंसियों की सेवाओं के लिए बहुत कम भुगतान कर रहे हैं. इन सब कारणों से एजेंसियों की वित्तीय स्थिति कमजोर हुई है.

तथ्य यह है कि इन एजेंसियों के मालिक भी यही बड़े अखबार समूह हैं और उनके बोर्ड आफ डाइरेक्टर्स में भी वही बैठे हैं. उनके मौजूदा हाल के लिए भी मुख्य रूप से वही जिम्मेदार हैं. लेकिन अपनी जिम्मेदारी स्वीकार करने के बजाय वे एजेंसियों के पत्रकारों और कर्मचारियों के वेतन बिल को उनकी वित्तीय दुर्दशा के लिए जिम्मेदार ठहरा रहे हैं. उनका वश चला होता तो आज यू.एन.आई बिक चुकी होती और रफ़ी मार्ग पर सुभाष चंद्र का साम्राज्य स्थापित हो चुका होता. लेकिन यू.एन.आई के पत्रकारों और कर्मचारियों के आंदोलन ने प्रबंधन को पीछे हटने को मजबूर कर दिया.

साफ है कि अख़बारों के मालिकों को एजेंसियों के स्वास्थ्य की कतई चिंता नहीं है. क्या अख़बारों या न्यूज एजेंसियों को बचाने के लिए कुर्बानी देने की जिम्मेदारी सिर्फ पत्रकारों की है? क्या मालिक अपने मोटे मुनाफे में कुछ हिस्सा उन्हें नहीं दे सकते? अगर वे सचमुच चिंतित हैं तो पहले ही एजेंसियों के लिए भी सरकार से सहायता पैकेज की मांग करते. वैसे ही जैसे उन्होंने खुद वैश्विक मंदी के समय सरकार से स्टिमुलस पैकेज लिया था. लेकिन सच यह है कि यहाँ इरादा एजेंसियों की मदद करना नहीं बल्कि उनकी आड़ में वेतन आयोग के खिलाफ दुष्प्रचार करना है. अख़बारों के मालिकान एजेंसियों के बहाने यही कर रहे हैं.

यह सचमुच अफसोस और शर्म की बात है कि अख़बारों के मालिक और उनका संगठन आई.एन.एस अपनी लाबीइंग की ताकत का इस्तेमाल करके मजीठिया वेतन आयोग की सिफारिशों को रद्द कराने या आधे-अधूरे तरीके से लागू कराने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाये हुए हैं. उनके तर्कों में कोई सच्चाई नहीं है. सबसे हैरानी की बात यह है कि इस मुहिम में शामिल अधिकांश बड़े अखबार खूब मुनाफा कमा रहे हैं लेकिन वे अपने मुनाफे में पत्रकारों और गैर पत्रकार कर्मचारियों को उनका वाजिब हिस्सा देने के लिए तैयार नहीं हैं.

सच यह है कि प्रेस की आज़ादी के नाम पर मालिक मलाई काट रहे हैं लेकिन कई बड़े-मंझोले-छोटे अखबार अपने पत्रकारों को न्यूनतम वेतन भी देने को तैयार नहीं हैं. खासकर भाषाई अखबारों में स्थिति इतनी खराब है कि कल्पना नहीं की जा सकती है. उनमें पत्रकारों का वेतन सरकारी या निजी क्षेत्र में काम करनेवाले चपरासी या माली या ड्राइवर से भी कम है. दसियों साल की नौकरी के बावजूद भाषाई पत्रकारों को न नौकरी की कोई सुरक्षा है, न उचित वेतन मिल रहा है और न ही काम करने की परिस्थितियां अच्छी हैं.

तथ्य यह है कि अधिकांश अख़बारों में अभी पिछला मनीसाना वेतन आयोग भी लागू नहीं है. यहाँ तक कि अधिकांश संस्थानों में श्रमजीवी पत्रकार कानून भी लागू नहीं होता है. इसके बावजूद अखबार मालिकों को कोई शर्म नहीं है. क्या आई.एन.एस ने कभी अपने सदस्यों को कहा कि उन्हें अपने संस्थानों में श्रमजीवी पत्रकार कानून और मणिसाना वेतन आयोग की सिफारिशें ईमानदारी से लागू करें? क्या उसने कभी अपने सदस्यों के संस्थानों में पत्रकारों और गैर पत्रकार कर्मचारियों की स्थिति जानने और उसे बेहतर बनाने की कोशिश की?

अगर आई.एन.एस ने कभी यह नहीं किया तो उसे मजीठिया वेतन आयोग की सिफारिशों का विरोध करने का कोई नैतिक हक नहीं है.

बुधवार, जुलाई 06, 2011

उत्तर प्रदेश में गुंडाराज या चैनलों में 'सवर्ण राज'?


क्या चैनलों पर मायावती के खिलाफ एकतरफा अभियान चलाया जा रहा है?


न्यूज चैनलों को अचानक इलहाम हुआ है कि उत्तर प्रदेश बलात्कार प्रदेश बन गया है. दलित और महिला मुख्यमंत्री होने के बावजूद राज्य में महिलाओं खासकर दलित और कमजोर वर्गों की महिलाओं की इज्जत सुरक्षित नहीं है. हर २४ घंटे में बलात्कार की पांच घटनाएँ हो रही हैं.

चैनलों के मुताबिक, मायावती के राज में कानून व्यवस्था की स्थिति पूरी तरह से चरमरा गई है. राज्य में जंगल राज कायम हो गया है. बसपा से जुड़े गुंडे और अपराधी बेलगाम हो गए हैं. डाक्टरों की हत्याएं हो रही हैं. भ्रष्टाचार और अराजकता चरम पर है.

ये और ऐसी ही कई सुर्खियाँ इन दिनों चैनलों खासकर हिंदी न्यूज चैनलों पर छाई हुई हैं. ऐसा लगता है जैसे वहां कानून-व्यवस्था के मामले में कोई जलजला सा आ गया है. चैनलों में अचानक छा गई इन सुर्ख़ियों, रिपोर्टों और प्राईम टाइम चर्चाओं से ऐसा लगता है, जैसे उत्तर प्रदेश देश का सबसे असुरक्षित और कानून व्यवस्था की दृष्टि से बदतर राज्य बन गया है.

खुद मुख्यमंत्री मायावती का कहना है कि यह विपक्ष का कुप्रचार है. उत्तर प्रदेश में कानून-व्यवस्था की स्थिति दिल्ली, महाराष्ट्र या मध्यप्रदेश से ज्यादा खराब नहीं है.

बहन जी का सवाल है कि फिर उत्तर प्रदेश को लेकर इतना शोर क्यों मचाया जा रहा है? उनका आरोप है कि यह सवर्ण मनुवादी मीडिया की साजिश है. सवाल है कि क्या सचमुच, मायावती के प्रति पूर्वाग्रह के कारण न्यूज चैनलों में ये घटनाएँ उछाली जा रही हैं?

इस प्रश्न का उत्तर इतना आसान नहीं है. सरसरी तौर पर देखने पर मायावती की शिकायत में कोई खास दम नहीं दिखाई देता है. उनके आरोप खिसियानी बिल्ली खम्भा नोचे जैसे लगते हैं.

सच यह है कि चैनलों पर दिखाई जा रही रिपोर्टें तथ्यतः गलत नहीं हैं. इस सच्चाई को अनदेखा करना मुश्किल है कि बहन जी जिस गुंडा राज को खत्म करने के वायदे के साथ सत्ता में आईं थीं, उसमें कोई खास कमी नहीं आई है.

खासकर जिस तरह से बसपा से जुड़े विधायकों-सांसदों-मंत्रियों आदि के नाम संगीन अपराधों और भ्रष्टाचार के मामलों में आए हैं, उसे देखते हुए मीडिया और न्यूज चैनलों का शोर मचाना गलत कैसे कहा जा सकता है? आखिर सरकारों के कामकाज की पहरेदारी करना और उनकी कमियों-गलतियों-धतकरमों पर उंगली उठाना न्यूज चैनलों का काम है.

अगर न्यूज चैनल अपना ये काम कर रहे हैं तो मायावती को नाराज क्यों होना चाहिए? चैनल आइना भर हैं. वे यह कहकर कैसे बच सकती हैं कि कानून-व्यवस्था की इतनी ही बदतर स्थिति अन्य राज्यों में भी है?

अगर तथ्यतः यह सही भी है तो मुख्यमंत्री के नाते उत्तर प्रदेश में कानून-व्यवस्था की स्थिति बहाल करना, महिलाओं को पूरी सुरक्षा देना, अपराधियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करना और लूट-खसोट पर अंकुश लगाना उनकी जिम्मेदारी है.

फिर बलात्कार और एक के बाद एक तीन वरिष्ठ डाक्टरों की हत्याएं सामान्य अपराध की घटनाएँ नहीं हैं. सिर्फ दलित होने के कारण मायावती के ‘सात खून’ माफ नहीं किये जा सकते हैं.

कहने का मतलब यह कि न्यूज चैनलों की शिकायत करने से पहले बहन जी को अपने अंदर झांकना होगा. उन्हें भूलना नहीं चाहिए कि उन्हीं चैनलों पर आजकल उनकी सरकार की कामयाबियों का गुणगान करता सात मिनट से ज्यादा लंबा विज्ञापन धड़ल्ले से चल रहा है.

लेकिन यह सब कहने का मतलब यह नहीं है कि सारे चैनल उत्तर प्रदेश के बारे में पूर्वाग्रह से मुक्त होकर जनहित में रिपोर्टिंग कर रहे हैं. यह मान भी लिया जाए कि तथ्यों के मामले में अधिकांश रिपोर्टें सही हैं तो भी उनकी भाषा, प्रस्तुति और टोन इस तरह का है कि उसमें पूर्वाग्रह सहज ही दिख जाता है.

असल में, चैनलों ने जिस तरह और जिस अंदाज़ में उत्तर प्रदेश से जुडी खबरों को उछाला है, उसमें उनकी अतिरिक्त आक्रामकता को अनदेखा करना मुश्किल है. इस सवाल को भी नकारा नहीं जा सकता है कि चैनलों को केवल उत्तर प्रदेश की कानून-व्यवस्था, गुंडाराज और भ्रष्टाचार क्यों दिख रहे है?

क्या दिल्ली, राजस्थान, बिहार, मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र में ‘रामराज्य’ है? जब चैनल उत्तर प्रदेश के गुंडाराज को लेकर सिर आसमान पर उठाए हुए थे, उसी समय बिहार के अररिया में पुलिस की गुंडागर्दी और अमानवीयता को लेकर नितीश कुमार के ‘सुशासन’ पर चैनलों की चुप्पी हैरान करनेवाली थी.

यही नहीं, मुंबई की हाल की घटनाओं खासकर पत्रकार जे. डे की दिन दहाड़े हत्या के बाद साफ हो गया है कि वहां का कुख्यात अंडरवर्ल्ड और उसके सरगना फिर जोरशोर से सक्रिय हो गए हैं. लेकिन वहां चैनलों की वह आक्रामकता नहीं दिखाई दे रही है जो उत्तर प्रदेश के मामले में छोटी से छोटी आपराधिक घटना पर दिखाई दे रही है.

कहने की जरूरत नहीं है कि उत्तर प्रदेश के मामले में कई हिंदी न्यूज चैनलों की रिपोर्टिंग और चर्चाओं में वह संतुलन और अनुपातबोध नहीं दिख रहा है जो वस्तुनिष्ठ और पक्षपातविहीन पत्रकारिता के लिए जरूरी शर्त है.

उलटे चैनलों की एकतरफा और अतिरिक्त रूप से आक्रामक रिपोर्टिंग के कारण ऐसा आभास होने लगता है कि जैसे वे घटनाओं के तटस्थ गवाह और खबरी के बजाय पार्टी बन गए हैं. इस तरह कई बार वे सिर्फ रिपोर्टिंग करते नहीं बल्कि बसपा सरकार के खिलाफ अभियान चलाते मालूम होते हैं.

क्या इसका एक बड़ा कारण यह है कि चैनलों के अंदर काम करनेवाले पत्रकारों-संपादकों-एंकरों में दलित और पिछड़े समुदायों की भागीदारी लगभग नगण्य है?

निश्चय ही, चैनलों के न्यूज रूम और उसमें निर्णायक पदों पर बैठे संपादकों की सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि खबरों के चयन और उनकी प्रस्तुति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है. उत्तर प्रदेश पर चैनलों की हालिया हाहाकारी रिपोर्टिंग इसका एक और सबूत है. साफ है कि मायावती के साथ चैनलों को भी अपने अंदर झांकने की जरूरत है.

('तहलका' के १५ जुलाई'११ के अंक में प्रकाशित स्तम्भ 'तमाशा मेरे आगे' :
http://www.tehelkahindi.com/stambh/diggajdeergha/forum/908.html )

मंगलवार, जुलाई 05, 2011

मनमोहनी 'समावेशी विकास' की असलियत : अमीर हो रहे हैं और अमीर, गरीब और गरीब



'समावेशी विकास' की असली कीमत चुका रहा है आम आदमी


यू.पी.ए सरकार की कामयाबियों की सूची में एक और उपलब्धि जुड़ गई है. भारत में अमीरों और सुपर अमीरों की संख्या और उनकी संपत्ति देश के विकास दर की तुलना में लगभग ढाई गुना तेजी से बढ़ रही है. मेरिल लिंच और केपजेमिनी की ताजा वैश्विक सम्पदा रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में वर्ष २०१० में ऐसे अमीरों की संख्या में २०.८ प्रतिशत की बढोत्तरी हुई है जिनकी संपत्ति ४.५ करोड़ रूपये से अधिक है.

रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में ऐसे अमीरों की संख्या वर्ष २००९ के १,२६,७०० से बढ़कर २०१० में १.५३ लाख पहुँच गई है. इसके साथ ही, अमीरों की कुल संख्या के मामले में भारत दुनिया में १४ वें से १२ वें स्थान पर पहुँच गया है.

हालाँकि अमीरों की कुल संख्या के मामले में भारत अभी भी दुनिया के कई देशों से पीछे है लेकिन अमीरों की संख्या वृद्धि के मामले में भारत ने सभी रिकार्ड तोड़ दिए हैं. यहाँ अमीरों की संख्या में सबसे तेज गति से वृद्धि दर्ज की गई है. रिपोर्ट के अनुसार, जहाँ अधिकांश देशों में अमीरों की संख्या में इकहरे अंकों में बढोत्तरी दर्ज की गई है, वहीँ भारत में वृद्धि की दर दोहरे अंकों में है.

यही नहीं, पिछले वर्ष भारतीय अमीरों की तादाद में ५० फीसदी की रिकार्ड़तोड़ बढोत्तरी देखी गई थी. हालाँकि समाचार रिपोर्टों में भारतीय करोड़पतियों की कुल संपत्ति का उल्लेख नहीं है लेकिन २०१० की सम्पदा रिपोर्ट को आधार मानें तो वर्ष २००९ में भारतीय अमीरों की कुल सम्पदा लगभग ४३७ अरब डालर यानि लगभग १९६६५ अरब रूपये थी.

जाहिर है कि इस कामयाबी पर गुलाबी अखबारों सहित कारपोरेट जगत में खुशी और जश्न का माहौल है. दुनिया के बड़े लक्जरी ब्रांड्स के निर्माता खुश हैं कि उनके महंगे उत्पादों के उपभोक्ता तेजी से बढ़ रहे हैं. इसे २००८ की वैश्विक मंदी के असर से बाहर निकल आने के सबूत के तौर पर देखा जा रहा है.

साथ ही, यह माना जा रहा है कि देश के एक बार फिर से तेज आर्थिक विकास दर के दौर में पहुँच गया है. मेरिल लिंच और केपजेमिनी के मुताबिक, भारत में अमीरों की संख्या और संपत्ति में तेज गति से बढोत्तरी के पीछे ९.१ प्रतिशत की जी.डी.पी वृद्धि दर के साथ-साथ पिछले वर्ष शेयर बाजार में २४ फीसदी की उछाल की बहुत बड़ी भूमिका है.

इस कामयाबी से बमबम विश्लेषक दावे कर रहे हैं कि अगले कुछ वर्षों में भारत अमीरों की वैश्विक सूची में टॉप देशों की कतार में पहुँच जाएगा. लेकिन समावेशी विकास के नारों के बीच अमीरों की इस तेज गति से बढती संख्या और संपत्ति के क्या मायने हैं? इसे कई तरह से देखा जा सकता है.

सबसे पहले, यह देश में तेजी से बढ़ती गैर बराबरी का सबूत है. देश की कुल आबादी में करोड़पति अमीरों की संख्या सिर्फ ०.०१ फीसदी है लेकिन उनकी निवेश लायक कुल संपत्ति देश की कुल राष्ट्रीय आय के एक तिहाई के बराबर है. इसका अर्थ यह हुआ कि डेढ़ लाख अमीरों की कुल संपत्ति देश के ८० फीसदी से ज्यादा भारतीयों की कुल संपत्ति से ज्यादा है. याद रहे कि देश में ७९ फीसदी भारतीय प्रतिदिन सिर्फ २० रूपये से कम की आय में गुजर-बसर करते हैं.

साफ है कि देश में अमीर-गरीब के बीच फासला तेजी से बढ़ रहा है. इसका अनुमान इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि देश के सौ सुपर अमीरों की कुल संपत्ति लगभग १३ लाख करोड़ है जो देश की जी.डी.पी के एक चौथाई के बराबर है. यही नहीं, देश के १० सबसे अमीर धनकुबेरों की कुल संपत्ति १५५ अरब डालर है जो कि चीन के दस सबसे अमीरों की कुल संपत्ति से चार गुना अधिक है.

एक अन्य अखबारी रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में एक करोड़पति अमीर की औसत संपत्ति लगभग १६.६ करोड़ रूपये है. अगर २००७-०८ की प्रति व्यक्ति आय को आधार मान लें तो एक आम शहरी भारतीय को इस स्तर तक पहुँचने में २२३८ साल और एक ग्रामीण भारतीय को और ज्यादा लगभग ३८१४ साल लग जाएंगे.

कहने की जरूरत नहीं है कि इस बीच ये करोड़पति अरबपति और खरबपति बन चुके होंगे. दूसरी ओर, एक अन्य रिपोर्ट के मुताबिक जब देश में करोड़पति अमीरों की संख्या और उससे अधिक उनकी संपत्ति फर्राटे लगा रही थी, समावेशी विकास के दावों को झुठलाते हुए देश में गरीबों की संख्या भी बढ़ रही थी.

संयुक्त राष्ट्र के सामाजिक-आर्थिक मामलों के विभाग की रिपोर्ट के मुताबिक, वैश्विक मंदी के असर में देश में २००८ और ०९ में जी.डी.पी की वृद्धि दर में आई गिरावट के कारण ३.३६ करोड़ भारतीय गरीबी रेखा के नीचे पहुँच गए या उससे बाहर नहीं निकल पाए. इसका सीधा सा अर्थ यह है कि मंदी की सबसे अधिक और तगड़ी मार गरीबों पर पड़ी जबकि अमीरों पर इसका कोई खास असर नहीं हुआ.

उलटे ऐसा लगता है कि भारतीय अमीरों ने मंदी को अपनी स्थिति और मजबूत और बेहतर बनाने के लिए इस्तेमाल किया. साफ है कि मंदी से निपटने के नाम पर यू.पी.ए सरकार ने जो दो लाख करोड़ रूपये से अधिक के पैकेज और अन्य रियायतों का एलान किया, उसका सारा लाभ अमीर और धनकुबेर उठा ले गए.

इसका एक और प्रमाण यह है कि देश में रोजगार की स्थिति पर एन.एस.एस.ओ के एक ताजा सर्वेक्षण रिपोर्ट के मुताबिक, देश की श्रम शक्ति में रोजगार प्राप्त श्रमिकों की कुल संख्या २००४-०५ में जहां ४२ फीसदी थी, वह २००९-१० में घटकर ३९.२ फीसदी रह गई है. यही नहीं, इसी अवधि में देश में अस्थाई श्रमिकों की संख्या में २.१९ करोड़ की वृद्धि दर्ज की गई जबकि स्थाई श्रमिकों की संख्या घटकर आधी यानि लगभग ५८ लाख रह गई है.

यह है समावेशी विकास का असली रूप जिसमें रोजगार के अस्थाईकरण पर सबसे अधिक जोर है. आश्चर्य नहीं कि आज निजी क्षेत्र में ८० फीसदी से अधिक नौकरियां अस्थाई और ठेके पर हैं. पिछले दस-पन्द्रह वर्षों में अधिक से अधिक श्रमिकों और कर्मचारियों को अस्थाई और ठेका श्रमिक के रूप काम करने के लिए बाध्य किया गया है जिन्हें बद से बदतर स्थितियों में काम करना पड़ रहा है.

उनकी जाब की कोई सुरक्षा नहीं है और उन्हें किसी तरह की कोई सामाजिक सुरक्षा हासिल नहीं है. हैरानी की बात नहीं है कि पिछले दो-तीन वर्षों में देश के अलग-अलग हिस्सों में इन श्रमिकों का गुस्सा हिंसक रूपों में फूट रहा है. मारुति सुजूकी की हालिया हड़ताल के पीछे भी यही वजह थी.

यही नहीं, जन अमीरों की संख्या और संपत्ति में तेजी से इजाफा हो रहा था, उसी दौर में आम आदमी खासकर गरीब आसमान छूती महंगाई की मार झेल रहे थे. नतीजा, पिछले तीन सालों से बेकाबू महंगाई ने देश के आम परिवारों की आय से ५.८ लाख करोड़ रूपये झटक लिए.

क्रेडिट रेटिंग संस्था क्रिसिल की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ष २००८-०९ से २०१०-११ के बीच आम भारतीयों को आसमान छूती महंगाई के कारण आम उपभोक्ता वस्तुओं और सामानों की खरीद पर ५.८ लाख करोड़ रूपये अधिक खर्चने पड़े. यह एक तरह से आम आदमी की जेब पर डाके की तरह है. साफ है कि बेलगाम महंगाई आम आदमी की जेब से पैसा निकालकर अमीरों की तिजोरी भरने का माध्यम बन चुकी है.

उल्लेखनीय है कि विश्व बैंक और विश्व खाद्य संगठन ने अपनी एक हालिया रिपोर्ट में यह चेतावनी दी थी कि अगर खाद्य वस्तुओं की कीमतें इसी तरह बढ़ती रहीं तो दुनिया की एक बड़ी आबादी फिर से गरीबी में धकेल दी जायेगी. बैंक के अनुसार, पिछले साल खाद्य वस्तुओं की कीमतों में ३० से लेकर ४० फीसदी की बढोत्तरी दर्ज की गई जिसके कारण करीब ४.४ करोड़ लोग गरीबी रेखा के नीचे धकेल दिए गए.

जाहिर है कि भारत में स्थिति और भी खराब है जहाँ पिछले तीन सालों से खाद्य वस्तुओं की कीमतों में आग लगी हुई है. लेकिन विडम्बना देखिए कि आम आदमी की सरकार होने का दावा करने वाली यू.पी.ए सरकार के राज में एक ओर पिछले तीन सालों से खाद्य सुरक्षा क़ानून पर बहस चल रही है और दूसरी ओर, सरकारी गोदामों में रिकार्ड़तोड़ अनाज का भण्डार सड़ रहा है या चूहे खा रहे हैं.

हालत यह है कि इस समय सरकारी भण्डार में रिकार्ड ६.५ करोड़ टन अनाज है जबकि गोदामों में सिर्फ ६.२ करोड़ टन अनाज रखने की जगह है. यही नहीं, इसमें से करीब ८० लाख टन अनाज खुले में पड़ा है और उसका क्या हश्र होगा, इसका अनुमान लगाना मुश्किल नहीं है. लेकिन लगता नहीं है कि समावेशी विकास की रट लगानेवाली सरकार की सेहत पर कोई असर पड़ रहा है.

हालाँकि सुप्रीम कोर्ट ने सरकार के रवैये से खीजकर कहा कि यह अनाज गरीबों में मुफ्त बाँट दिया जाए लेकिन सरकार ने ऐसा करने से साफ़ मना कर दिया. अब यह सरकार कह रही है कि वह निजी क्षेत्र की मदद से और गोदाम बनाएगी ताकि अनाज को सड़ने से बचाया जा सके. दूसरे, इस बीच तात्कालिक तौर पर अनाज के निर्यात की भी तैयारी चल रही है.

इन दोनों फैसलों का मतलब यह है कि यू.पी.ए सरकार महंगाई की मार से त्रस्त गरीबों और आम आदमी तक यह अनाज पहुँचाने के बजाय उसे सुरक्षित गोदामों में रखने या निर्यात करने को ज्यादा प्राथमिकता दे रही है. सवाल यह है कि सरकार को अपने गोदामों में रिकार्ड़तोड़ अनाज क्यों रखना चाहिए?

इससे तो यह सरकार खुद सबसे बड़े जमाखोर के रूप में अनाजों की किल्लत पैदा करके महंगाई की आग को हवा दे रही है. कहने की जरूरत नहीं है कि सरकार अपने गोदामों से अनाज निकालने या खाद्य सुरक्षा कानून के दायरे को बढ़ाने में आनाकानी इसलिए कर रही है कि उसे गरीबों और महंगाई से ज्यादा वित्तीय घाटे की चिंता है.

यह और बात है कि अमीरों के लिए बजट में साढ़े पांच लाख करोड़ से ज्यादा की टैक्स छूट और रियायतें देते हर उसे वित्तीय घाटे की कभी चिंता नहीं होती है.

मजे की बात यह है कि यह सरकार अब महंगाई से निपटने के नाम पर खुदरा व्यापार के क्षेत्र को विदेशी पूंजी के लिए खोलने का एलान करने जा रही है. उसका तर्क है कि बिचौलियों की मुनाफाखोरी के कारण महंगाई बढ़ रही है और बिचौलियों को खत्म करने के लिए संगठित और बड़ी विदेशी खुदरा व्यापार कंपनियों को लाना जरूरी हो गया है. इससे प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी और नतीजे में, महंगाई पर लगाम लगेगी.

यह तर्क कुछ ऐसा ही है कि चूहे से लड़ने के लिए बिल्ली और बिल्ली से बचने के लिए कुत्ता और कुत्ते से परेशानी होने पर बाघ को बुलाया जाए. जाहिर है कि ‘समावेशी विकास’ की दिशा में यह एक और कदम है जिससे देश के सबसे बड़े अमीरों की संपत्ति और तेजी से बढ़ेगी लेकिन उसका खामियाजा छोटे दुकानदारों, फेरीवालों और फुटपाथ वेंडरों के साथ-साथ आम आदमी को उठाना होगा.


('जनसत्ता' में सम्पादकीय पृष्ठ पर ४ जुलाई'११ को प्रकाशित) 

सोमवार, जुलाई 04, 2011

क्या करें देश के सबसे अमीर भगवान की संपत्ति का ?

क्यों न इससे नए विश्वविद्यालय और अस्पताल खोले जाएँ?  


देश के सबसे अमीर भगवान का पता चल चुका है. वे हैं केरल के श्री पद्मनाभ स्वामी. राजधानी तिरूअनंतपुरम के पूर्वी किले में स्थित पद्मनाभ स्वामी मंदिर के गुप्त खजाने में अब तक कोई एक लाख करोड़ रूपये की संपत्ति मिल चुकी है. वैसे सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर खजाने की गिनती अभी जारी है. अखबारी रिपोर्टों के मुताबिक, अभी एक और संदूक को खोलना बाकी है.



माना जा रहा है कि पद्मनाभ स्वामी संपत्ति के मामले में देश के अन्य सभी मंदिरों को पीछे छोड़ देंगे. ऐसा मानने की एक वजह यह भी है कि मंदिर के गुप्त खजाने से जो अकूत संपत्ति मिली है, उसमें ईस्ट इंडिया कंपनी और नेपोलियन के ज़माने के सोने के सिक्कों के अलावा प्राचीन मूर्तियां, हीरे-जवाहरात और गहने शामिल हैं जिनकी सही-सही कीमत का अंदाज़ा लगाना मुश्किल है.

हालाँकि तात्कालिक रूप से पद्मनाभ स्वामी ने संपत्ति के मामले में अन्य भगवानों और मंदिरों को पीछे छोड़ दिया है लेकिन इससे इनकार नहीं किया जा सकता है कि ऐसे गुप्त और खुले खजाने देश के सैकड़ों मंदिरों और मठों में मौजूद हैं. पुराने मंदिरों की तो छोडिये, नए बाबाओं और स्वामियों के मंदिरों और आश्रमों तक में हजारों करोड़ की संपत्ति छिपी हुई है.

दूर क्यों जाएँ, हाल में ही सिधारे सत्य साईं बाबा को ही लीजिए. ऐसा लगता है कि उनके पास नोट छापने की मशीन लगी हुई थी. उनके खुद के कमरे में मिली संपत्ति को देखकर लोगों की आँखें फटी की फटी रह गईं: ११.५६ करोड़ रूपये नगद, ९८ किलो सोना और ३०७ किलो चांदी. इसके अलावा ऐसा अनुमान है कि बाबा के पुट्टपर्थी आश्रम की कुल संपत्ति लगभग ५० हजार करोड़ रूपये से अधिक की है.

इस समय उस संपत्ति के लिए उनके चेले और रिश्तेदारों में मारामारी मची हुई है. हालत यह है कि पुलिस ने उस इलाके में एक गाडी में ३५ लाख रूपये बरामद किये हैं जो बिना किसी हिसाब-किताब के ले जाए जा रहे थे. कहने की जरूरत नहीं है कि देश में साईं जैसे और कई ‘भगवान’ हैं जिन्होंने भक्तों की श्रद्धा और अमीरों की ‘टैक्स सेवा’ से अरबों रूपये की संपत्ति खड़ी कर ली है.

सवाल है कि इस संपत्ति का क्या किया जाए? केरल के मुख्यमंत्री ओमन चांडी का कहना है कि यह पद्मनाभ स्वामी की संपत्ति है और उन्हीं के पास रहेगी. उन्होंने उसकी सुरक्षा के लिए समुचित व्यवस्था करने का वायदा भी किया है. लेकिन पिछले पचासों साल में देश भर के मंदिरों, आश्रमों और मठों में उनकी संपत्ति की जिस तरह से संगठित लूट हुई है, उसे देखते हुए चांडी के आश्वासन पर भरोसा करना मुश्किल है.

ऐसे में, सबसे बेहतर रास्ता यह है कि पद्मनाभ स्वामी की संपत्ति को देश-समाज के विकास में खर्च किया जाए. आखिर एक लाख करोड़ रूपये की संपत्ति यूँ ही खजाने में सडती-लुटती रहे, उससे अच्छा यह होगा कि उसे उत्पादक कार्यों में खर्च किया जाए.

क्यों न इस संपत्ति से देश में लगभग एक-एक हजार करोड़ रूपये खर्च करके ५० बेहतरीन विश्वविद्यालय और ५० मेडिकल कालेज और अस्पताल बनवाए जाएँ. देश के सभी राज्यों को दो-दो विश्वविद्यालय और मेडिकल कालेज अस्पताल मिल जाएंगे.

निश्चय ही, इससे सबसे ज्यादा खुशी श्री पद्मनाभ स्वामी को होगी. आखिर उनके भक्तों को उनकी संपत्ति से गुणवत्तापूर्ण उच्च शिक्षा और चिकित्सा सुविधा मिल सकेगी. यही नहीं, आंध्र प्रदेश सरकार को भी तुरंत सत्य साईं ट्रस्ट को अधिग्रहित कर लेना चाहिए और वहां मिली संपत्ति का इस्तेमाल स्कूल-कालेज और अस्पताल खोलने में करना चाहिए.

मेरा एक और प्रस्ताव है. केन्द्र सरकार को तुरंत एक मंदिर अधिग्रहण कानून बनाना चाहिए और देश भर के प्रमुख मंदिरों, आश्रमों और मठों को ‘राष्ट्रीय हित’ में अधिग्रहीत कर लेना चाहिए. यही नहीं, नए ज़माने के बाबाओं-स्वामियों और मठाधीशों के ट्रस्टों को दी गई टैक्स रिआयतें तुरंत वापस लेनी चाहिए.

भगवान का धन अगर दरिद्र नारायण की सेवा में खर्च हो तो भला किस भगवान को आपत्ति होगी?

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रविवार, जुलाई 03, 2011

प्रेस की आज़ादी पत्रकारों की नहीं, अखबार मालिकों की आज़ादी बन गई है

कौन है पत्रकारों के मजीठिया वेतन आयोग की सिफारिशों के खिलाफ?



अख़बारों और न्यूज एजेंसियों में काम करनेवाले पत्रकारों और गैर पत्रकार कर्मचारियों का वेतन आदि तय करने के लिए गठित जस्टिस जी.आर मजीठिया वेतन आयोग की सिफारिशों के खिलाफ अखबार मालिकों ने चौतरफा युद्ध सा छेड दिया है. वे किसी भी कीमत पर इन सिफारिशों को लागू करने के लिए तैयार नहीं हैं.

उनके जबरदस्त दबाव का नतीजा है कि यू.पी.ए सरकार पिछले छह महीने से इस रिपोर्ट को दबाए बैठी है. हालाँकि प्रधानमंत्री ने अब पत्रकारों और गैर पत्रकारों के एक साझा प्रतिनिधिमंडल से वायदा किया है कि वे “अपनी ड्यूटी निभाएंगे.”

लेकिन सच्चाई यही है कि अभी तक उनकी सरकार ने इस मामले में अपनी जिम्मेदारी और जवाबदेही का पालन नहीं किया है. अगर उन्होंने अपनी ड्यूटी निभाई होती तो अब तक मजीठिया वेतन आयोग की सिफारिशें नोटिफाई कर दी गई होतीं.

इसके उलट सरकार अखबार मालिकों के दबाव में है और उनके साथ मिलकर मजीठिया आयोग की सिफारिशों की हत्या करने में जुटी हैं. यही कारण है कि सरकार अखबार मालिकों को इस बात का पूरा मौका दे रही है कि वे इन सिफारिशों के खिलाफ न सिर्फ झूठा, एकतरफा और मनमाना अभियान चलाएं बल्कि कोर्ट से लेकर अन्य मंचों पर उसे ख़ारिज करने के लिए जमकर लाबींग करें.

नतीजा यह कि मजीठिया आयोग की सिफारिशों के खिलाफ अखबार मालिकों का अभियान जारी है. वे अपने अख़बारों और पत्रिकाओं में इन सिफारिशों के खिलाफ खबरें, विज्ञापन और संपादकीय पृष्ठ पर लेख लिख और छाप रहे हैं. उनमें कई खासकर विज्ञापन तो बहुत अपमानजनक हैं. मजे की बात यह है कि इन अखबारों में पत्रकारों और गैर पत्रकारों के पक्ष में न तो खबरें छप रही हैं और न ही लेख और संपादकीय.

आखिर अखबार की आज़ादी, पत्रकारों की नहीं बल्कि अखबार मालिकों की आज़ादी है. वे जो चाहते हैं, उनके अख़बारों में वही छपता है. जिनको अभी भी मुगालता हो कि प्रेस की आज़ादी का मतलब पत्रकारों की आज़ादी हैं, उनकी आँखें इस प्रकरण से खुल जानी चाहिए.

आश्चर्य नहीं कि अख़बारों में मजीठिया वेतन आयोग के खिलाफ लगातार छप रहा है जबकि वेतन आयोग की सिफारिशों को लागू करने की मांग कर रहे पत्रकारों और गैर पत्रकारों के संघर्षों की वास्तविक खबरें और रिपोर्टें कुछ अपवादों को छोडकर कहीं नहीं छप रही हैं.

अखबार मालिकों की पत्रकारों के वेतन आयोग से कई तरह की नाराजगी है. उनका कहना है कि जब किसी अन्य उद्योग या क्षेत्र यहाँ तक कि इलेक्ट्रानिक मीडिया के पत्रकारों के लिए वेतन आयोग नहीं है तो पत्रकारों के लिए अलग से वेतन आयोग क्यों होना चाहिए? उनका आरोप है कि वेतन आयोग की आड़ में सरकार पत्रकारों की वफ़ादारी खरीदना चाहती है.

अखबार मालिकों का यह भी कहना है कि अगर मजीठिया आयोग की सिफारिशों को लागू कर दिया गया तो ज्यादातर अखबार बढे हुए वेतनों का बोझ नहीं उठा पाएंगे और बंद हो जाएंगे. उनके मुताबिक, मजीठिया आयोग ने पत्रकारों और गैर पत्रकारों के वेतन में अस्सी से सौ फीसदी तक बढोत्तरी की सिफारिश की है.

यही नहीं, अखबार मालिकों की संस्था- आई.एन.एस के एक विज्ञापन में बड़े अपमानजनक तरीके से कहा गया है कि इन सिफारिशों के मुताबिक अखबार के चपरासी और ड्राइवर को भी ५०००० हजार रूपये तक की तनख्वाह देनी पड़ेगी.

उनका कहना है कि इतना तो सरकार भी अपने ड्राइवरों और चपरासियों को नहीं देती है. यह और बात है कि विज्ञापन के नीचे २ पॉइंट में बताया गया है कि यह सिफारिश उन अख़बारों के लिए है जिनका सालाना टर्नओवर १००० करोड़ रूपये से अधिक का है.

अखबार मालिकों का आरोप है कि सरकार वेतन आयोग के बहाने आज़ाद प्रेस को खत्म करना चाहती है और यह लोगों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला है. इसलिए उनकी मांग है कि सरकार तुरंत मजीठिया आयोग की सिफारिशों को नामंजूर करे और प्रेस की आज़ादी को बनाये रखने के लिए पत्रकारों के वेतन और अन्य सेवाशर्तों को तय करने का अधिकार मालिकों के हाथ में रहने दे.

साफ है कि अखबार मालिकों और उनकी संस्था-आई.एन.एस की नाराजगी की जड़ में असली मकसद यही है. वे अपनी मनमर्जी से पत्रकारों का वेतन और अन्य सेवाशर्तें तय करने का अधिकार कतई नहीं छोड़ना चाहते हैं. वैसे इससे बड़ा भ्रम और कुछ नहीं है कि सरकार मजीठिया आयोग की सिफारिशें नोटिफाई कर देती है तो अखबार मालिक उसे लागू कर देंगे.

सच यह है कि अगर मजीठिया वेतन आयोग लागू भी हो गया तो भी उसका वही हश्र होगा जो इससे पहले मणिसाना या बच्छावत वेतन आयोगों का हुआ था. तथ्य यह है कि कोई भी अखबार वेतन आयोगों की सिफारिशों को ईमानदारी और सच्ची भावना से लागू नहीं करता है.

यही नहीं, पिछले डेढ़-दो दशकों में लगभग ८० से ९० प्रतिशत अख़बारों में पत्रकारों की अस्थाई और संविदा पर नियुक्ति के कारण वेतन आयोग पूरी तरह से बेमानी हो चुका है.

हकीकत यह है कि अधिकांश बड़े और मंझोले अख़बारों में ज्यादातर पत्रकारों की तनख्वाहें और सेवाशर्तें लगातार बद से बदतर होती चली गई हैं. यहाँ तक कि बड़े अख़बारों में भी संपादक सहित मुट्ठी भर पत्रकारों को छोड़ दिया जाए जिन्हें संविदा सिस्टम का लाभ मिला है तो बाकी ८० फीसदी पत्रकारों की तनख्वाहें बहुत कम हैं. खासकर निचले स्तर पर उप संपादकों और रिपोर्टरों की तनख्वाह सरकारी और निजी क्षेत्र के महकमों के सबसे निचले कर्मचारी से भी कम हैं.

यही नहीं, सबसे गंभीर चिंता की बात यह है कि कुछ अपवादों को छोड़ दिया जाए तो लगभग सभी अख़बारों और चैनलों में पत्रकारों और गैर पत्रकारों की यूनियनें नहीं रह गई हैं. अधिकांश यूनियनों को धीरे-धीरे खत्म कर दिया गया है और जो बच गई हैं कि उनके नेतृत्व को खरीद लिया गया है.

नतीजा यह कि पत्रकारों और गैर पत्रकारों के पास वेतन और अन्य सेवाशर्तों के मामले में प्रबंधन के साथ सामूहिक मोलतोल की क्षमता नहीं रह गई है. वे पूरी तरह से मालिकों की दया और मर्जी पर निर्भर हैं. इस तरह मालिकों ने प्रेस की आज़ादी को अपनी चेरी बना लिया है. सच पूछिए तो प्रेस की आज़ादी को असली खतरा अखबार मालिकों की इसी तानाशाही से है.