सोमवार, अगस्त 08, 2011

युद्ध और कर्ज के बोझ से कराहती अमेरिकी अर्थव्यवस्था


अमेरिकी अर्थव्यवस्था अपने ही जाल में फंस गई है



वैश्विक अर्थव्यवस्था एक बार फिर लड़खड़ाती हुई दिख रही है. दुनिया भर के बाजारों में घबराहट और उथल-पुथल का माहौल है. अकेले बीते शुक्रवार को मुंबई शेयर बाजार सहित दुनिया भर के बाजारों में शेयरों के कत्लेआम में निवेशकों का लाखों करोड़ रूपया स्वाहा हो गया. कोई नहीं जानता कि आज जब दो दिनों की बंदी के बाद बाजार खुलेंगे तो हालात क्या होंगे?

सरकारों से लेकर निजी क्षेत्र के मैनेजरों तक सभी सदमे की स्थिति में हैं. नतीजा, वाशिंगटन से लेकर बीजिंग तक और यूरोप से लेकर भारत तक किसी को समझ में नहीं आ रहा है कि इस नए संकट से कैसे निपटा जाए?

खुद वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने स्वीकार किया है कि स्थिति गंभीर है. हालांकि इस ताजा आर्थिक संकट के आसार बहुत पहले ही दिखने शुरू हो गए थे लेकिन बहुत कम लोगों को अंदाज़ा था कि यह संकट इतनी जल्दी और इतनी तेजी से एक बार फिर दुनिया को झकझोरने लगेगा. वैसे इसमें हैरानी की कोई बात नहीं है. भूमंडलीकरण के दौर में यह बहुत स्वाभाविक है.

असल में, भूमंडलीकरण की प्रक्रिया में दुनिया भर की वित्तीय व्यवस्था और बाजारों के साथ-साथ राष्ट्रीय अर्थव्यवस्थाएं भी एक-दूसरे से इतनी गहराई से जुड़ गई हैं कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था को जुकाम होता है और भारत से लेकर ब्राजील की अर्थव्यवस्थाओं को छींक आने लगती है.

यह स्वाभाविक भी है क्योंकि अमेरिकी अर्थव्यवस्था समूची वैश्विक अर्थव्यवस्था की लगभग एक चौथाई है. ऐसे में, अगर अमेरिकी अर्थव्यवस्था में भूकंप के झटके आते हैं तो दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं को आर्थिक सुनामी के झटके झेलने पड़ते हैं. २००७-०८ में यह हो चुका है जब अमेरिकी मंदी ने दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं को अपने चपेटे में ले लिया था.

ताजा मामले में भी यही हो रहा है. क्रेडिट रेटिंग एजेंसी स्टैण्डर्ड एंड पुअर ने अमेरिका सरकार की साख में कटौती करने का एलान करते हुए उसके कर्ज पत्रों की साख की उच्च स्तरीय रेटिंग ए.ए.ए को एक श्रेणी घटाकर ए.ए प्लस कर दिया है.

हालांकि यह घोषणा शुक्रवार को बाजारों के बंद होने के बाद की गई लेकिन इसकी आशंका बहुत दिनों से जाहिर की जा रही थी. अमेरिकी बाजारों सहित दुनिया भर के बाजारों में घबराहट और बेचैनी का माहौल भी इस फैसले के अंदेशे के कारण भी था. खुद स्टैंडर्ड एंड पुअर इसकी चेतावनी बहुत दिनों से दे रहा था.

इसकी वजह यह थी कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था पिछली मंदी से पूरी तरह से बाहर नहीं निकल पा रही थी. उलटे पिछले कुछ महीनों में लड़खड़ाती अर्थव्यवस्था से आ रहे संकेतों से यह साफ़ होने लगा था कि मंदी से उबरने की रफ़्तार न सिर्फ धीमी है बल्कि उसमें फिर से गिरावट का रुझान है.

ऐसे में, स्वाभाविक तौर पर स्टैण्डर्ड एंड पुअर के फैसले से अधिकांश विश्लेषकों को बहुत हैरानी नहीं हुई है. असल में, अमेरिकी अर्थव्यवस्था जिस तरह कर्ज पर जीने की आदी होती जा रही थी, उसके कारण यह दिन एक दिन आना ही था. यह किसी से छुपा नहीं है कि आज अमेरिका न सिर्फ दुनिया का सबसे कर्जदार देश है बल्कि वह वैश्विक कर्ज का ब्लैक होल बन गया है.

ऐसा कर्ज ब्लैक होल जो पिछले कई दशकों से दुनिया भर के अधिकांश देशों की बचत को अपने अंदर खींचता जा रहा है. ताजा आंकड़ों के मुताबिक, आज अमेरिका पर कुल संघीय कर्ज लगभग १४.३४ खरब डालर (७१७ खरब रूपये) का है जिसमें लगभग ९.७८ खरब डालर सार्वजनिक कर्ज है. इसमें कोई ४.४५ खरब डालर का विदेशी कर्ज है.

यही नहीं, आज कुल अमेरिकी कर्ज में विदेशी कर्ज का हिस्सा लगभग ३२ फीसदी और कुल सार्वजनिक कर्ज में ४७ फीसदी तक पहुँच चुका है. विदेशी कर्ज में अकेले चीन का हिस्सा लगभग २६ फीसदी का है और इस तरह वह सबसे बड़ा कर्जदाता बन गया है. रिपोर्टों के मुताबिक, अमेरिका के कुल कर्ज में चीन का हिस्सा लगभग १.१६ खरब डालर का है जबकि जापान का ९१२.४ अरब डालर और हांगकांग का १२१ अरब डालर है.

यही नहीं, अमेरिकी कर्ज में ब्रिटेन, ब्राजील समेत भारत जैसे देशों का भी अच्छा-खासा पैसा लगा हुआ. स्वाभाविक तौर पर अमेरिकी अर्थव्यवस्था में सभी देशों के दांव लगे हुए हैं.

आश्चर्य नहीं कि चीन ने अमेरिका को चेताया है कि कर्ज लेकर घी पीने के दिन गए और वह अपनी अर्थव्यवस्था को संभाले. साफ है कि हर चीज की एक सीमा होती है. सच पूछिए तो कर्ज लेकर ऐश करने के मामले में अमेरिका ने हर सीमा तोड़ दी है. सबसे अधिक चिंता की बात यह है कि अमेरिका सत्ता प्रतिष्ठान ने कर्ज का सबसे अधिक दुरुपयोग युद्धों के लिए किया है.

अनुमानों के मुताबिक, आतंकवाद से युद्ध के नामपर पिछले दस वर्षों में अफगानिस्तान से लेकर इराक तक अमेरिका का युद्ध बजट ३.७ खरब डालर तक पहुँच गया है और आशंका है कि अंतिम आकलन में यह ४.४ खरब डालर तक जा सकता है.

कहने की जरूरत नहीं है कि आज अमेरिकी अर्थव्यवस्था युद्धों के बोझ से दबी जा रही है. इसका असर अर्थव्यवस्था पर भी दिखने लगा है. यह सच है कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था के साथ कई बुनियादी ढांचागत समस्याएं भी हैं लेकिन वास्तव में, उसकी युद्ध मशीनरी उसे अंदर से खोखला किये जा रही है.

इसके बावजूद संघीय कर्ज की सीमा को लेकर राष्ट्रपति बराक ओबामा और रिपब्लिकन पार्टी के बीच छिड़े राजनीतिक महाभारत और उसके बाद हुए समझौते में ज्यादा जोर रक्षा और युद्ध बजट में नहीं बल्कि सामाजिक सुरक्षा बजट में कटौती पर है. साफ है कि अमेरिकी नीति नियंता बजट कटौती का सारा बोझ आम अमरीकियों पर डालना चाहते हैं जबकि अमीरों और बड़ी कंपनियों को टैक्स छूट और अन्य रियायतें मिलती रहेंगी.

कर्ज संकट पर हुई डील के साथ सबसे बड़ी समस्या यह है कि यह उस समय सरकारी खर्चों खासकर जरूरी सामाजिक और आर्थिक व्यय में कटौती की पेशकश कर रहा है जब अमेरिकी अर्थव्यवस्था ठहराव और गतिरुद्धता की शिकार है. इस समय अर्थव्यवस्था को कीन्सवादी सहारे यानी आर्थिक-वित्तीय उत्प्रेरकों की जरूरत थी.

लेकिन अमेरिकी कांग्रेस के इस फैसले से अर्थव्यवस्था के एक बार फिर से मंदी में फंसने की आशंका जोर पकड़ने लगी है. नीम और उसपर करेला चढ़ा यह कि यूरोपीय अर्थव्यवस्थाएं खासकर ग्रीस, आयरलैंड, स्पेन, इटली और पुर्तगाल की हालत पहले से ही खराब है. इनमें से कई के कर्ज देनदारी में डिफाल्ट की आशंका जाहिर की जा रही है.

निश्चय ही, वैश्विक अर्थव्यवस्था पर गहराते संकट के इन बादलों से भारत का भी बचना मुश्किल है. लेकिन संकट का इंतज़ार करने और अनावश्यक आत्मविश्वास दिखाने के बजाय यू.पी.ए सरकार को तुरंत एहतियाती कदम उठाने चाहिए. इसके लिए बाहर और बड़ी विदेशी पूंजी का मुंह जोहने के बजाय घरेलू अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के उपाय सोचने चाहिए. क्या सरकार अपनी नीतिगत लकवे की स्थिति से बाहर निकलेगी?

('राष्ट्रीय सहारा' के सम्पादकीय पृष्ठ पर ८ अगस्त को प्रकाशित लेख) 

शनिवार, अगस्त 06, 2011

‘स्वर्गवासी’ खबरें


आइये, 'खबरों' की वापसी की खबर का स्वागत करें, बशर्ते यह सच हो... 



एक अच्छी खबर है. सुना है कि हिंदी न्यूज चैनलों पर ‘खबर’ की वापसी हो रही है. हालांकि ऐसी अफवाहें, माफ कीजिएगा, ‘ख़बरें’ काफी समय से चल रही हैं लेकिन कुछ अपवादों को छोड़ दें तो अधिकांश चैनलों पर अब भी ‘खबर’ के नाम पर सिनेमा, क्रिकेट, मनोरंजन, रियलिटी शो से लेकर ज्योतिष, बाबाओं, तांत्रिकों और असामान्य, परालौकिक और बेसिर-पैर की ‘परा-खबरों’ का बोलबाला है. सच यह है कि तमाम चर्चाओं-आलोचनाओं और आत्ममंथनों के बावजूद पिछले कुछ वर्षों में चैनलों पर हार्ड न्यूज की विदाई और ‘परा-ख़बरों’ का दबदबा बढ़ता ही गया है.

इसलिए इस ‘खबर’ पर भरोसा नहीं हो रहा है कि चैनलों पर ‘खबरों’ के दिन लौटने वाले हैं. ऐसे दावे कई बार किये गए लेकिन नतीजा, वही चैनल के तीन पात- मनोरंजन, क्रिकेट और परालौकिक. याद कीजिये, कोई तीन साल पहले बहुत जोरशोर से ‘न्यूज इज बैक’ (खबर लौट आई है) नारे के साथ न्यूज २४ चैनल शुरू हुआ था लेकिन वहां खबरों को गायब होने में ज्यादा समय नहीं लगा. हालांकि कई खबर-जलों का तो यह भी कहना है कि वहां कभी ‘खबर’ थी ही नहीं, इसलिए उसके लौटने या गायब होने की चर्चा बेकार है.

इसी आधार पर कुछ खबर-जलों ने चैनलों पर ‘इतिहास के अंत’ की तरह ‘खबर के अंत’ का एलान कर दिया. दूसरी ओर, चैनलों के कुछ तेजतर्रार संपादकों ने यहाँ तक कहना शुरू कर दिया कि बदलते समय और समाज के साथ ‘समाचार’ की परिभाषा भी बदल रही है और चैनल जो दिखा रहे हैं और दर्शक जो देख रहे हैं, वही ‘खबर’ है. यह भी कि ‘खबर’ का दायरा बढ़ रहा है. इससे भला किसी को क्या आपत्ति हो सकती थी?

लेकिन ‘खबरों’ के इस बढ़ते दायरे में पर्यावरण, विज्ञान-तकनीक, स्वास्थ्य या विकास-विस्थापन सम्बन्धी ख़बरें या उत्तर पूर्व, उड़ीसा जैसे पिछड़े इलाके की खबरें फिर भी गायब रहीं और चैनलों की ‘खबरों’ का दायरा बढ़ते हुए सीधे परा-लौकिक ‘खबरों’ तक जा पहुंचा.

नतीजा, हिंदी न्यूज चैनलों के सौजन्य से दर्शकों को दूसरे लोक (जैसे स्वर्ग की सीढ़ी) के साथ-साथ अपना परलोक सुधारने की और मौसम के हाल के बजाय सीधे प्रलय (धरती के खत्म होने) की संभावित तिथियों की ‘खबरें’ मिलनी लगीं. इस मायने में खबरें सचमुच ‘स्वर्गवासी’ हो गईं.

इसके बावजूद मजा देखिए कि हर कुछ महीनों में ‘खबर’ के फिर से जिन्दा होने की खबरें भी उड़ने लगती हैं. इधर पिछले कुछ महीनों से जी न्यूज ‘फार द सेक आफ न्यूज’ यानी ‘खबरों की खातिर’ की पंचलाइन के साथ बाकायदा एक मीडिया अभियान चला रहा है जिसमें न्यूज चैनलों पर टी.आर.पी के लिए खबरों की पवित्रता से खिलवाड़ करने की शिकायत करते हुए ‘खबर’ को फिर से उसकी जगह पर बहाल करने की अपील की गई है. जी न्यूज का दावा है कि प्राइम टाइम पर वह केवल ‘खबरें’ दिखाता है.

मीडिया वेबसाइट्स के मुताबिक, अब ‘आज तक’ ने भी फैसला किया है कि वह टी.आर.पी की परवाह किये बगैर ‘खबरें’ दिखायेगा. कुछ खबर-जलों का कहना है कि यह फिसल पड़े तो हर गंगे वाली बात हो गई. मतलब यह कि जब उलजुलूल खबरें दिखाकर भी टी.आर.पी की दौड़ में इंडिया टी.वी से जीत नहीं पा रहे तो ‘खबर’ की याद आने लगी. कारण चाहे जो हो लेकिन अगर यह खबर सही है तो इसका स्वागत होना चाहिए. आखिर पिछले कुछ सालों में कंटेंट और खबरों के स्तर पर ‘आज तक’ में जितनी गिरावट आई है, उसने मेरे जैसे बहुतेरे लोगों को बहुत निराश किया है.

असल में, न्यूज चैनलों खासकर हिंदी चैनलों के भटकाव को लेकर काफी दिनों से खतरे की घंटी बज रही है. कई चैनलों में खबरों के नाम पर ‘खबर’ के साथ जो मजाक चल रहा है, वह एब्सर्डिटी की हद तक पहुँच चुका है. खबर और कल्पना, खबर की प्रस्तुति और ड्रामा और न्यूज चैनल और मनोरंजन चैनल के बीच का फर्क मिट चुका है. नतीजा यह कि लोग न्यूज चैनलों का मजाक उड़ाने लगे हैं. उन्हें हल्के में लेने लगे हैं. उनके आलोचकों की संख्या दिन पर दिन बढ़ रही है. उनका सामाजिक-राजनीतिक प्रभाव घटने लगा है.

यही नहीं, न्यूज चैनलों खासकर हिंदी चैनलों के दर्शक भी उबने और घटने लगे हैं. टैम मीडिया रिसर्च के मुताबिक, वर्ष २००८ की तुलना में २०१० में कुल टी.वी दर्शकों में हिंदी न्यूज चैनलों के दर्शकों की संख्या ४.८ फीसदी से घटकर ३.४ फीसदी रह गई है. यही नहीं, उनकी जी.आर.पी (दर्शकों तक पहुँच और चैनलों पर खर्च समय) में भी काफी गिरावट आई है. असल में, चैनलों को लगता है कि उनसे चतुर-सुजान और दर्शकों से बेवकूफ कोई नहीं है लेकिन लोगों को बेवकूफ बनाने के चक्कर में वे खुद बेवकूफ साबित होने लगे हैं.

कहते हैं कि आप कुछ लोगों को कुछ बार बेवकूफ बना सकते हैं लेकिन सभी लोगों को सभी बार बेवकूफ नहीं बना सकते हैं. कहने की जरूरत नहीं है कि सभी लोगों को सभी बार बेवकूफ बनाने की कोशिश में अब चैनलों के बेवकूफ बनने की बारी है. लोग हिंदी न्यूज चैनलों के नाटक (खींचो, तानो, खेलो) से तंग आ गए हैं. वे चैनलों की ट्रिक्स समझने लगे हैं. उन्हें पता चल गया है कि स्वर्ग का रास्ता किधर से है, पाताललोक कहाँ है, धरती कितने तरह से और किन तारीखों को खत्म हो सकती है और शनिवार को क्या खाना-पहनना और दान देना है.

हालांकि मनुष्य की कल्पनाशक्ति का कोई अंत नहीं है और चैनलों की कल्पनाशक्ति की कल्पना करना मेरे वश से बाहर है लेकिन ऐसा लगता है कि चैनल अब सुरंग के आखिर में पहुँच चुके हैं. वहां से आगे का रास्ता बंद है. उनके पास वापस लौटने के अलावा और कोई चारा नहीं है. जो लौटेंगे, वे न्यूज चैनल के रूप में बचेंगे और जो सुरंग में फंसेंगे, वे अंधेरों में खो जाएंगे.

चैनल माने या न मानें, उनके लिए उलटी गिनती शुरू हो चुकी है.

(तहलका के १५ अगस्त के अंक में प्रकाशित स्तम्भ)



शुक्रवार, अगस्त 05, 2011

दोनों सिरों से जल रही है न्यूज चैनलों के पत्रकारों के जीवन की मोमबत्ती


बदतर सेवाशर्तों और कामकाज की परिस्थितियों के कारण बीमार हो रहे हैं न्यूज चैनलों के पत्रकार  

तीसरी और आखिरी किस्त

यही नहीं, चैनलों में इन दबावों और तनावों के कारण पत्रकारों के स्वास्थ्य पर भी बहुत बुरा असर पड़ रहा है. अनिल चमडिया के नेतृत्व में मीडिया स्टडीज ग्रुप ने कोई दो साल पहले मीडिया में काम करनेवाले पत्रकारों के कामकाज की परिस्थितियों और उनके स्वास्थ्य का हाल जानने के लिए सर्वेक्षण किया था जिसके नतीजे बहुत चौंकानेवाले थे. इस सर्वेक्षण के मुताबिक, करीब १२ फीसदी पत्रकार अपनी अनियमित दिनचर्या और काम के तनाव आदि के कारण डायबिटीज के शिकार हैं.

कंप्यूटर पर लगातार काम करने के कारण लगभग १४ फीसदी पत्रकार आर्थोपीडिक यानि पीठ दर्द और आर्थराइटिस आदि से पीड़ित हैं. करीब १२ फीसदी को आँखों की बिमारी है. करीब ६२ फीसदी पत्रकारों को खाने का समय या समय पर खाने का मौका नहीं मिलता है, इसके कारण १३ फीसदी को पाचन सम्बन्धी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है.


इस सर्वेक्षण के मुताबिक, लगभग ६२ फीसदी पत्रकारों को हर दिन आठ घंटे या उससे अधिक काम करना पड़ता है जिसका असर यह हुआ है कि उनमें से कोई ११ फीसदी मानसिक बिमारियों जैसे डिप्रेशन आदि का शिकार हो गए हैं. करीब १४ फीसदी को ह्रदय सम्बन्धी और बी.पी की समस्या से जूझना पड़ रहा है.

लेकिन सबसे अधिक तकलीफ की बात यह है कि उनमें से ४८ फीसदी पत्रकारों को इन बिमारियों के इलाज के लिए पर्याप्त समय नहीं मिल पता है. इसकी वजह छुट्टी न मिल पाना है. इस सर्वेक्षण के अनुसार, ११ फीसदी पत्रकारों को कोई साप्ताहिक अवकाश भी नहीं मिलता. केवल १७ फीसदी पत्रकारों को सप्ताह में दो दिन की छुट्टी का सौभाग्य मिलता है.

हालांकि यह सर्वेक्षण प्रिंट और टी.वी सहित सभी तरह के माध्यमों में काम करनेवाले पत्रकारों पर किया गया था. लेकिन टी.वी. न्यूज चैनलों के पत्रकारों से खुद की बातचीत के आधार पर कह सकता हूँ कि चैनलों में हालात और खराब हैं. मैं ऐसे कई टी.वी कर्मियों को जानता हूँ जो बहुत कम उम्र में बी.पी और डायबिटीज सहित स्पोंडीलाइटीस जैसी बिमारियों/समस्यायों के शिकार हो गए हैं.

इनमें से कई मेरे छात्र रहे हैं. कुछ को मजबूरी में नौकरियां तक छोड़नी पड़ी हैं. निश्चय ही, इसके लिए काफी हद तक चैनलों के अंदर की स्थितियां और कामकाज का माहौल जिम्मेदार है. कई बार ऐसा लगता है कि न्यूज चैनलों में काम करनेवाले पत्रकारों के जीवन की मोमबत्ती दोनों सिरों से जल रही है.

इसके बावजूद इसपर चर्चा करने के बजाय चैनलों के प्रबंधक और कई संपादक यह कहकर इसे ग्लैमराइज करने की कोशिश करते हैं कि न्यूज चैनलों में काम करने का दबाव और तनाव ही टी.वी पत्रकारिता का असली एक्साइटमेंट है. लेकिन यह एक्साइटमेंट अब जानलेवा होने लगा है.

जाहिर है कि यह न टी.वी कर्मियों के लिए अच्छा है और न चैनलों के लिए. अगर यह स्थिति सुधरी नहीं तो चैनलों के लिए योग्य और प्रतिभाशाली पत्रकारों को आकर्षित करना मुश्किल होने लगेगा. यही नहीं, इसका असर चैनलों के कंटेंट पर भी पड़ेगा. हम आम दर्शकों के लिए यह इसलिए भी गहरी चिंता का कारण होना चाहिए.

समय आ गया है जब इस मसले पर टी.वी पत्रकारों और न्यूज चैनलों के प्रबंधकों के बीच खुलकर बातचीत हो जिसमें सरकार और पत्रकार यूनियनों के लोग भी हिस्सा लें. सरकार अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकती है. पहली बात तो यह है कि टी.वी पत्रकारों को भी श्रमजीवी पत्रकार कानून के दायरे में लाया जाए और उनकी तनख्वाहें भी अख़बारों के पत्रकारों और गैर पत्रकारों के वेतन आयोग के द्वारा तय की जाएँ.

इसके अलावा चैनलों में पत्रकारों को अपनी यूनियन बनाने का अधिकार भी मिलना चाहिए. यह ठीक है कि आज अधिकांश पत्रकार संगठन और यूनियनें अप्रभावी हो चुकी हैं या प्रबंधन के हाथ की कठपुतली बन चुकी हैं लेकिन इसके बावजूद अधिकांश अख़बारी प्रतिष्ठानों में यूनियनें हैं.

लेकिन क्या यह आश्चर्य की बात नहीं है कि किसी भी चैनल में पत्रकारों की कोई यूनियन नहीं है? सवाल है कि क्या चैनल श्रम कानूनों से ऊपर हैं? अगर नहीं तो उनमें सभी श्रम कानूनों और श्रमजीवी पत्रकार कानून की खिल्ली क्यों उडाई जा रही है? यहाँ यह कहना जरूरी है कि ये बहुत महत्वपूर्ण सवाल हैं. इन्हें अनदेखा नहीं किया जा सकता है.

मीडिया अगर लोकतंत्र का चौथा खम्भा है तो उसके अंदर क्या चल रहा है और उसके कर्मियों का क्या हाल है, यह हम सबकी चिंता का विषय होना चाहिए. यह चुप्पी अब टूटनी चाहिए क्योंकि अगर हमने खबर देनेवालों की खबर नहीं रखी तो उनकी खबर और कौन लेगा?

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चलते-चलते

ये डी.डी न्यूज में क्या हो रहा है?

 खबरें आ रही हैं कि सरकारी न्यूज चैनल डी.डी न्यूज के अस्थाई और संविदा पर नियुक्त पत्रकार कम वेतन और बदतर सेवाशर्तों के विरोध में पिछले तीन दिनों से काली पट्टी बांधकर अपना क्षोभ जता रहे हैं. आन्दोलनकारी पत्रकारों के मुताबिक, उनका वेतन बहुत कम है, यहाँ तक कि कुछ लोगों का वेतन छह हजार रूपये है. ऊपर से पिछले ढाई वर्षों से उनके वेतन में कोई वृद्धि नहीं हुई है. यही नहीं, पी.एफ-बीमा-चिकित्सा व्यय आदि की सुविधा नहीं है, छुट्टियों का कोई सिस्टम नहीं है और उनकी शिकायतों की कहीं कोई सुनवाई नहीं है. बताया जाता है कि ऐसे पत्रकारों की संख्या ४०० के आसपास है.  

निश्चय ही, यह बहुत चिंता और अफसोस की बात है. अगर सार्वजनिक प्रसारक ही पत्रकारों का शोषण करेगा तो निजी चैनलों में सुधार और बेहतरी की उम्मीद कैसे की जा सकती है? सुप्रीम कोर्ट ने अपने कई फैसलों में कहा है कि सरकार को एक अच्छे और आदर्श नियोक्ता के रूप में पेश आना चाहिए ताकि वह एक उदाहरण पेश कर सके. लेकिन डी.डी न्यूज के मामले में सरकार के रवैये से निराशा होती है कि वह आदर्श नहीं बल्कि बदतर नियोक्ता के रूप में निजी क्षेत्र को भी ऐसे ही व्यवहार के लिए प्रोत्साहित कर रही है.

क्या यह उम्मीद करें कि सरकार खासकर प्रसार भारती जल्दी से जल्दी अपने पत्रकारों के दुःख-दर्द को सुनेगी और स्थितियों को बेहतर बनाने के लिए उपाय करेगी?   

('कथादेश' के अगस्त अंक में प्रकाशित स्तम्भ की तीसरी और आखिरी किस्त)



गुरुवार, अगस्त 04, 2011

चैनलों में हावी होता 'कम लोग, कम वेतन और अधिक काम' का माडल

क्या चैनलों में पत्रकारों के लिए कोई भविष्य है ? 


दूसरी किस्त : चैनलों के अन्दर की दुनिया  

आज अधिकांश न्यूज चैनलों यहाँ तक कि कुछ बड़े न्यूज चैनलों ने भी “कम लोगों और कम वेतन” के माडल को अपना लिया है. इसमें चैनल कम से कम पत्रकारों को रख रहे हैं, उन पर काम का बोझ बढ़ाया जा रहा है, उन्हें कम वेतन दिया जा रहा है और सेवाशर्तें दिन पर दिन बिगड़ती जा रही हैं.

अधिकांश चैनलों में इस माडल के तहत टॉप पर कुछ चुनिन्दा पत्रकारों को ऊँची तनख्वाहें दी जा रही है जबकि निचले और मंझोले स्तर पर कम से कम वेतन दिया जा रहा है. खासकर निचले स्तर पर वेतन बहुत कम है जबकि सबसे अधिक काम उनसे ही लिया जाता है. यही नहीं, रिपोर्टिंग के लिए फील्ड वीजिट आदि पर भी खर्चों में काफी कटौती की गई है.


हालत कितनी खराब है, इसका अंदाज़ा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि कई चैनलों खासकर ई.टी.वी माडल के चैनलों और ए.एन.आई मार्का न्यूज एजेंसियों में पत्रकारों का वेतन एंट्री लेवल पर पांच हजार से लेकर ८ हजार तक है. यही नहीं, उनसे तीन साल का बांड भरवाया जाता है. उन्हें नियुक्तिपत्र नहीं दिया जाता. छुट्टियाँ नहीं मिलती हैं. छुट्टियाँ खासकर बीमारी आदि कारण लंबी छुट्टी का मतलब नौकरी से छुट्टी है.

आमतौर पर न्यूनतम १० घंटे और अधिकतम १४-१५ घंटे तक काम करवाया जाता है. समय पर वेतन मिलता नहीं है. पी.एफ आदि नहीं कटता है. मेडिकल आदि की सुविधा नहीं है. कैंटीन में ढंग का खाना नहीं मिलता. नतीजा, अधिकांश पत्रकारों को गंभीर बीमारियाँ जकड़ लेती हैं.

असल में, चैनलों में लगभग सौ फीसदी नियुक्तियां कांट्रेक्ट यानि ठेके पर होती हैं. इस तरह उनकी नौकरी की कोई सुरक्षा नहीं है. चैनलों के कर्मियों के लिए अख़बारों की तरह कोई वेतन आयोग नहीं है और न ही वहां नियुक्तियां श्रमजीवी पत्रकार कानून के तहत होती हैं. इस मामले में टी.वी पत्रकारों को वे सीमित कानूनी अधिकार भी हासिल नहीं हैं जो अख़बारों और न्यूज एजेंसियों के पत्रकारों को प्राप्त हैं.

हालांकि अब धीरे-धीरे अख़बारों में भी अधिकांश नियुक्तियां ठेके पर होने लगी हैं लेकिन अभी भी कई संस्थानों में श्रमजीवी पत्रकार कानून और वेतन आयोग लागू है और वहां पत्रकारों को कुछ हद तक जाब सेक्युरिटी है. लेकिन चैनलों में कोई जाब सेक्युरिटी नहीं है. आश्चर्य नहीं कि ढाई साल पहले कई छोटे-बड़े चैनलों ने एक झटके में सैकड़ों लोगों की छंटनी कर दी थी.

जाहिर है कि इस सबका असर न्यूज चैनलों के कंटेंट पर भी दिख रहा है. खासकर हिंदी चैनलों में जहाँ न सिर्फ रिपोर्टिंग का दायरा घटता जा रहा है बल्कि उसका स्केल भी कम होता जा रहा है, प्रोग्रामिंग खासकर डेस्क पर तैयार कार्यक्रमों पर जोर बढ़ता जा रहा है. नतीजा, सबके सामने है. कार्यक्रमों के नाम पर सिनेमा, क्रिकेट और भूत-पिशाच, अजब-गजब और नाग-नागिन का बोलबाला है.

इसी तरह, रिपोर्टिंग क्राईम और प्रेस कांफ्रेंस आदि तक सीमित हो गई है. अधिकांश राज्यों में न्यूज चैनलों ने अपने ब्यूरो आदि बंद कर दिए हैं. चैनल अप्रशिक्षित स्ट्रिंगरों के भरोसे चल रहे हैं जो खुद भी मामूली भुगतान के कारण भांति-भांति के धंधे करने को मजबूर हैं.

यही नहीं, सेवाशर्तों और कामकाज के माहौल के मामले में बड़े और छोटे चैनलों में कोई खास फर्क नहीं है. सच यह है कि चैनलों के अंदर जूनियर सहकर्मियों से गाली-गलौज की भाषा में बात करने और बात-बात पर उनका अपमान करने की सामंती संस्कृति बड़े हिंदी चैनलों से ही शुरू हुई और देखते-देखते हर जगह छा गई.

आज इस मामले में कुछ अपवादों को छोड़ दिया जाए तो अधिकांश चैनलों में न्यूजरूम में गैर जरूरी शोर-शराबा, हंगामा और चीख-चिल्लाहट आम बात हो गई है. कई संपादक आतंक के प्रतीक बन चुके हैं. उनकी ‘प्रोफेशनल ख्याति’ पीछे छूट चुकी है और न्यूजरूम में डराने-धमकाने और बदतमीजी में उनकी शोहरत हर ओर फ़ैल चुकी है.

जैसे इतना ही काफी न हो, चैनलों के भीतर अंदरूनी गुटबाजी, खींचतान और उठापटक भी खूब है. संपादकों यानि बॉस की लल्लो-चप्पो के आगे कई बार काम और काबिलियत बेमानी हो जाते हैं. खासकर हिंदी न्यूज चैनलों में स्थिति बहुत खराब है. संपादकों के ‘अपने गैंग बन चुके हैं.’ वे एक साथ एक चैनल से दूसरे चैनल में जाते हैं. इस कारण किसी टी.वी पत्रकार के लिए बॉस की स्वामीभक्ति उसका सबसे बड़ा गुण बन चुका है.

आश्चर्य नहीं कि न्यूजरूम की इस हिंसक और लिजलिजेपन की संस्कृति में कई संवेदनशील पत्रकार खुद को अनफिट महसूस करने लगे हैं. मैं खुद ऐसे कई टी.वी पत्रकारों को जानता हूँ जिन्होंने न्यूज चैनलों की स्थितियों से परेशान और हताश होकर टी.वी पत्रकारिता छोड़ दी और कुछ ने पत्रकारिता ही छोड़ दी.

महिला पत्रकारों की स्थिति और खराब है. उनसे भी पुरुषों की ही तरह बल्कि खुद को साबित करने के लिए उनसे अधिक काम करने की अपेक्षा की जाती है. उन्हें अलग से कोई सुविधा नहीं दी जाती है. यहाँ तक कि उनके लिए कानूनन जरूरी प्रावधानों का भी ध्यान नहीं रखा जाता है.

यौन उत्पीड़न की शिकायतों के बावजूद अधिकांश चैनलों में इसके लिए अलग से कोई सेल नहीं बनाया गया है. उन्हें रात्रि या भोर की पाली में कई बार पिक अप की सुविधा नहीं मिलती है. इस कारण, एक बड़े अंग्रेजी चैनल की महिला पत्रकार सौम्या विश्वनाथन की रात में अकेले घर लौटते हुए हत्या तक हो गई.

('कथादेश' के अगस्त में प्रकाशित स्तम्भ की दूसरी किस्त)

बुधवार, अगस्त 03, 2011

चैनलों के अंदर की दुनिया


वेतन और सेवाशर्तों से लेकर न्यूजरूम के अंदर के हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं

पहली किस्त

चैनल में काम करना ईंट भट्ठे पर काम करने जैसा लगता है..या कोयले के इंजन का ड्राइवर जैसे गर्मी में आग के सामने कोयला डालता था, बिना रूके..इस डर से की इंजन बंद हो जाएगा...वैसा ही अनुभव कराता है तथाकथित न्यूज रूम...पत्रकारिता त्याग मांगती है लेकिन ऐसा त्याग क्या कि एक सैनिक बार्डर पर नहीं...बल्कि अपने ही बैरक में गोली का शिकार हो जाए.”

“न्यूजरूम का माहौल: भेड़ बकरी चराने वाले जैसे चीखते हैं ....जानवरों को हांकने में वैसा ही कुछ बॉस चीखते हैं...जैसे चीख कर ही जूनिएर की कान में आवाज पहुंचाई जा सकती हो..क्या चीख चिल्ला कर ही काम किया जा सकता है?...क्या ऐसे अम्बिएंस में काम कर सकना लम्बे समय तक संभव है ?...न्यूज़ रूम और बॉस की नज़र में अपनी ब्रांडिंग करने का सबसे आसान तरीका चीखना चिल्लाना...अधिकांश लोग अपनी जानकारी और लिखने की कला को छोटा समझने लगे है और चीखने चिल्लाने को बड़ा...काश, मैं भी चीख सकता...की भावना आ रही है लोगो में..लगातार न्यूज़ परोसने के दबाव में नाम पर न्यूज़ रूम को टोर्चेर रूम बनाया जा रहा है..”

-एक न्यूज चैनल में कार्यरत युवा रिपोर्टर

“मैं अपने आपको रोज जलील होते देखता हूँ तो लगता है कि शायद सभी को ये सब सहना होता होगा, पर फिर लगता है कि शायद हमने ही पढाई नहीं की होगी..ऐसे ही हमें भर्ती कर लिया गाली सुनने के लिए...मैं अपना विश्वास खो रहा हूँ...शायद ये इलेक्ट्रानिक मीडिया का विनोद कापडी कल्चर है जो कुछ चैनलों के खून में बस चुका है और टी.आर.पी नामक अस्पताल में हमारा इलाज तो संभव नहीं...”

- चैनल छोड़ चुके एक युवा पत्रकार की व्यथा जो उसने मीडिया स्टडीज ग्रुप के सर्वेक्षण के दौरान बताई


ये कुछ बानगियाँ हैं जो बताती हैं कि आज न्यूज चैनलों के अंदर काम करनेवाले पत्रकारों की क्या स्थिति है? चैनलों में ऐसी आपबीतियों की कमी नहीं है. आप चैनलों के पत्रकारों से न्यूजरूम के अंदर कामकाज की परिस्थितियों के बारे में पूछिए और सम्भावना यह है कि लगभग ६० से ७५ प्रतिशत टी.वी पत्रकारों से आपको ऐसी ही शिकायतें और आपबीती सुनने को मिले.

इसमें कोई शक नहीं है कि न्यूज चैनलों के बीच गलाकाट प्रतियोगिता के कारण न्यूजरूम के अंदर पत्रकारों पर खासा दबाव और तनाव रहता है लेकिन यह दबाव और तनाव हाल के वर्षों में जिस तरह से बढ़ा है, उसका सीधा असर पत्रकारों के स्वास्थ्य और कामकाज पर भी पड़ रहा है.

हालांकि न्यूज चैनलों के अंदर के इस दमघोंटू माहौल के बारे टी.वी पत्रकारों खासकर युवा पत्रकारों के बीच कानाफूसियाँ बहुत दिनों से होती रही हैं. लेकिन पिछले महीने जब मैंने फेसबुक, गूगल-बज और आई.आई.एम.सी पूर्व छात्र ग्रुप मेल पर टी.वी पत्रकारों से उनके वेतन, सेवाशर्तों और कामकाज की परिस्थितियों के बारे में उनकी राय मांगी तो विभिन्न चैनलों के अनेकों टी.वी पत्रकारों ने लिखित और मौखिक रूप में जो बताया, वह कई मामलों में भयावह और रोंगटे खड़े कर देनेवाला और अधिकांश मामलों में चिंतित और परेशान करनेवाला है. उसकी कुछ बानगियाँ ऊपर दी हैं और जगह की कमी के कारण कई छोड़नी पड़ रही हैं.

असल में, चैनलों के स्क्रीन पर दिखने वाली खबरों, रिपोर्टों और कार्यक्रमों, चैनलों के नजरिये और प्रस्तुति को लेकर जितनी चर्चा होती है, उसका एक प्रतिशत भी चैनलों के अंदर की दुनिया और उसके पत्रकारों की स्थिति पर चर्चा नहीं होती है. जबकि चैनलों के अंदर के माहौल और पत्रकारों के वेतन और अन्य सेवाशर्तों का उनके कामकाज पर सीधा असर पड़ता है.

आखिरकार ये गेटकीपर (पत्रकार) ही चैनलों की व्यापक सम्पादकीय लाइन के तहत रोजाना खबरों के चयन से लेकर उनकी प्रस्तुति का फैसला करते हैं. ऐसे में, इस तथ्य से इनकार नहीं किया जा सकता है कि उनकी मानसिक और शारीरिक स्थिति निश्चित ही उनके कामकाज को प्रभावित करती है.

इसके बावजूद चैनलों के अंदर न्यूजरूम के माहौल और उसमें कार्यरत पत्रकारों के वेतन और सेवाशर्तों को चर्चा के लायक नहीं समझा जाता है. न्यूज मीडिया में इसे लेकर जिस तरह की ख़ामोशी और अनदेखा करने की प्रवृत्ति दिखाई पड़ती है, वह काफी हद तक एक तरह की ‘षड्यंत्रपूर्ण चुप्पी’ है. कुछ चुनिन्दा चैनलों को छोड़ दिया जाए तो अधिकांश चैनलों में पत्रकारों की स्थिति अच्छी नहीं है और उन्हें भारी तनाव और दबाव में काम करना पड़ता है.

वेतन और सेवाशर्तों के मामले में भी स्थिति दिन पर दिन बिगड़ती जा रही है. खासकर २००८-०९ की आर्थिक मंदी के बाद हुई छंटनियों के कारण काम का बोझ बढ़ता जा रहा है. लेकिन इसपर चर्चा और सुधार के बजाय चैनलों का प्रबंधन यहाँ तक कि कई संपादक भी मौजूदा स्थितियों का बचाव करते और उसे जायज ठहराते दिख जाते हैं.

सच यह है कि न्यूज चैनलों के पत्रकारों के वेतन, भत्तों, सेवाशर्तों आदि में गंभीर विषमताएं और विसंगतियाँ हैं. वेतन और सेवाशर्तों के मामले में कोई एकरूपता या समानता नहीं है. आमतौर पर अंग्रेजी न्यूज चैनलों में पत्रकारों का वेतन और सेवाशर्तें हिंदी और दूसरी भाषाओँ के न्यूज चैनलों की तुलना में बेहतर हैं.

लेकिन ऐसा नहीं है कि अंग्रेजी न्यूज चैनल में सब कुछ बेहतर ही है. वहां भी काम के घंटों, काम के बोझ और छुट्टियों आदि के मामले में कोई आदर्श स्थिति नहीं है. यही नहीं, कई अंग्रेजी चैनलों खासकर सबसे बडबोले अंग्रेजी चैनल में कामकाज का माहौल बहुत दमघोंटू और तनावपूर्ण है. बात-बात पर गाली-गलौज और अपमानित करने की शिकायतें भी आती रहती हैं.

लेकिन हिंदी न्यूज चैनलों में स्थिति और खराब है. यह सही है कि कुछ बड़े मीडिया समूहों के न्यूज चैनलों में पत्रकारों का वेतन तुलनात्मक रूप में ठीक-ठाक है. लेकिन तथ्य यह भी है कि वेतन वृद्धि के मामले में पिछले दो-ढाई सालों में स्थिति बिगड़ी है. छोटे-बड़े सभी चैनलों ने २००८-०९ की आर्थिक मंदी को बहाना बनाकर न सिर्फ वेतन वृद्धि नहीं की बल्कि बड़े पैमाने पर घोषित-अघोषित छंटनी की और काम का बोझ बढ़ा दिया. ‘स्टाफ रैशनालाइजेशन’ के नाम पर नई भर्तियाँ नहीं हो रही हैं या इक्का-दुक्का भर्तियाँ हो रही हैं. यही नहीं, बड़े और सफल चैनलों में भी निचले और मंझोले स्तर की भर्तियों में वेतन पहले की तुलना में कम हो गया है.

तर्क यह दिया जा रहा है कि न्यूज चैनलों में यह ‘वेतन के रैशनालाइजेशन’ का दौर है. इसके मुताबिक, शुरूआती दौर में टी.वी पत्रकारों खासकर प्रशिक्षित पत्रकारों की कमी के कारण पत्रकारों को प्रिंट मीडिया की तुलना में काफी ऊँची तनख्वाहें मिलीं. उस समय बार्गेनिंग की शक्ति टी.वी पत्रकारों के पक्ष में झुकी हुई थी.

लेकिन प्रबंधकों के अनुसार, यह स्थिति ज्यादा दिनों तक नहीं चल सकती थी क्योंकि इससे मीडिया उद्योग में वेतन के मामले में एक तरह का ‘डिस्टार्शन’ पैदा हो गया था. कहने की जरूरत नहीं है कि आर्थिक मंदी ने न्यूज चैनलों के मालिकों और प्रबंधकों को इस कथित ‘डिस्टार्शन’ को सुधारने का मौका दे दिया जिसका उन्होंने जमकर फायदा उठाया है.

('कथादेश' के अगस्त अंक में प्रकाशित स्तम्भ की पहली किस्त..बाकी कल)