मतदाताओं ने भ्रष्टाचार और नव उदारवादी आर्थिक नीतियों को नाकारा
पांच राज्यों की विधानसभाओं के चुनावी नतीजों में तमिलनाडु को छोड़कर बाकी राज्यों के नतीजे बहुत हद तक अनुमानों और उम्मीद के मुताबिक ही हैं. लेकिन अगर इसमें सचमुच कोई चौंकानेवाला नतीजा है तो वह तमिलनाडु का है जहां यू.पी.ए यानी डी.एम.के-कांग्रेस गठबंधन का सूपड़ा साफ़ हो गया है. यह कहना गलत नहीं होगा कि तमिलनाडु के नतीजों ने राजनीतिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण पश्चिम बंगाल के नतीजों को भी फीका कर दिया है जहां वाम मोर्चे की करारी हार हुई है.
ऐसा मानने की वजह यह है कि पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चे की पहले से ही तय थी. वहां वाम मोर्चे राजनीतिक ढलान बहुत पहले शुरू हो चुकी थी और २००९ के लोकसभा चुनाव, पंचायतों और नगरपालिकाओं में वाम मोर्चे की लगातार हार के बाद विधानसभा चुनाव में हार उसी की तार्किक परिणति है.
लेकिन तमिलनाडु के नतीजे इसलिए ज्यादा महत्वपूर्ण हैं कि वहां मतदाताओं ने साफ़ तौर पर डी.एम.के-कांग्रेस गठबंधन के भ्रष्टाचार और उसके प्रतीक बन चुके २ जी घोटाले और धनबल की राजनीति को नकार दिया है. हालांकि तमिलनाडु के नतीजों के महत्व को यह कहकर कम करने की कोशिश की जा रही है कि वहां हर पांच साल पर सरकार बदल जाती है लेकिन सच्चाई इसके ठीक उलट है.
तथ्य यह है कि तमिलनाडु में २००६ के चुनावों में डी.एम.के-कांग्रेस गठबंधन ने इस भ्रामक धारणा को तोड़कर चुनाव जीता था. यही नहीं, २००९ के लोकसभा चुनावों में भी अनुमानों के विपरीत यू.पी.ए यानी डी.एम.के-कांग्रेस गठबंधन ने अच्छा प्रदर्शन किया. फिर २००९ से २०११ के बीच ऐसा क्या हुआ कि इस बार राज्य में यू.पी.ए चारों खाने चित्त हो गई?
कहने की जरूरत नहीं है कि इन दो वर्षों में न सिर्फ केन्द्र की यू.पी.ए सरकार में शीर्ष स्तर पर जारी भ्रष्टाचार के मामलों का एक के बाद एक खुलासा हुआ है बल्कि इस महा भ्रष्टाचार के प्रतीक बन चुके २ जी घोटाले ने देश के जनमानस को झकझोर कर रख दिया है.
कांग्रेस माने या न माने लेकिन सच यही है कि तमिलनाडु में भ्रष्टाचार खासकर २ जी घोटाला और उसमें सीधे मुख्यमंत्री करूणानिधि के परिवार के महत्वपूर्ण सदस्यों का शामिल होना बहुत बड़ा मुद्दा था. यह सही है कि राज्य में मतदाताओं के पास कोई वास्तविक राजनीतिक विकल्प नहीं था क्योंकि भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद और निरंकुश व्यवहार के मामले में दोनों द्रविड़ पार्टियों और उनके नेताओं- करूणानिधि और जयललिता में कोई खास फर्क नहीं है.
लेकिन इस चुनाव में मतदाताओं के सामने कठघरे में करूणानिधि थे. मतदाता भ्रष्टाचार के मुद्दे पर ए.आई.डी.एम.के और उसकी नेता जयललिता को पिछली बार सबक सिखा चुके थे. जाहिर है कि इस बार बारी डी.एम.के-कांग्रेस गठबंधन की थी. हालांकि भ्रष्टाचार के मुद्दे को मिक्सी-ग्राइंडर जैसे सस्ते चुनावी वायदों और खुलेआम रूपये बांटकर जनता की निगाह से ओझल करने की कोशिश हुई.
लेकिन नतीजों से साफ है कि लोगों ने यू.पी.ए यानी डी.एम.के और कांग्रेस दोनों को माफ नहीं किया. आश्चर्य नहीं कि डी.एम.के के साथ-साथ कांग्रेस की भी बुरी गत हुई है. राज्य में अपनी वापसी का सपना देख रही कांग्रेस की सीटों की संख्या दहाई में भी नहीं पहुंच पाई जबकि पार्टी ने डी.एम.के के साथ मोलतोल करके पिछली बार की तुलना में अधिक सीटें लड़ी थीं.
निश्चय ही, राष्ट्रीय राजनीति के लिहाज से तमिलनाडु के नतीजे यू.पी.ए खासकर कांग्रेस के लिए चेतावनी की घंटी हैं. हालांकि वह इसे सुनने के लिए तैयार नहीं है. कांग्रेस पांच राज्यों में से तीन में अपनी या अपने गठबंधन की जीत को यू.पी.ए खासकर कांग्रेस के पक्ष में जनता का फैसला बताकर अपनी पीठ ठोंकने में लगी हुई है लेकिन सच यह है कि इन नतीजों में वाम मोर्चे के साथ-साथ कांग्रेस के लिए भी आत्मावलोकन के वास्ते बहुत कुछ है.
आदर्श हाउसिंग से लेकर कामनवेल्थ घोटालों में फंसी कांग्रेस के लिए यह सचमुच चिंता की बात है कि उसे न सिर्फ तमिलनाडु के अलावा पुदुच्चेरी में हार का मुंह देखना पड़ा है बल्कि केरल में भी अनुकूल राजनीतिक परिस्थितियों के बावजूद वह किसी तरह बहुमत के पास पहुंच पाई है.
सच पूछिए तो केरल में अगर वाम मोर्चे खासकर माकपा के अंदर खुली गुटबाजी नहीं होती और पार्टी नेतृत्व ने मुख्यमंत्री वी.एस. अच्युतानंदन की भ्रष्टाचार विरोधी लड़ाई में खुलकर साथ दिया होता तो कांग्रेस की वापसी संभव नहीं होती. यही नहीं, केरल में खुद गुटों में बंटी कांग्रेस के लिए इतने बारीक़ बहुमत के साथ सरकार चलाना आसान नहीं होगा.
लेकिन कांग्रेस के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द आंध्र प्रदेश के कडप्पा उपचुनाव में वाई.एस.आर के बेटे जगन मोहन रेड्डी और उनकी पत्नी की जीत है. कांग्रेस की केन्द्रीय सत्ता में पुनर्वापसी में आंध्र प्रदेश का योगदान किसी से छुपा नहीं है लेकिन पहले तेलंगाना और अब जगन की चुनौती ने कांग्रेस को अंदर से हिला कर रख दिया है. इस चुनौती से निपटना उसके लिए आसान नहीं होगा.
कहने का अर्थ यह है कि पश्चिम बंगाल और केरल में वाम मोर्चे की हार पर जश्न मना रही यू.पी.ए सरकार और कांग्रेस को इन नतीजों से राजनीतिक रूप से कोई खास राहत नहीं मिलने जा रही है. उल्टे भ्रष्टाचार के मुद्दे पर उसपर दबाव और बढ़ेगा. हालांकि इस सम्भावना से इनकार नहीं किया जा सकता है कि आनेवाले दिनों में कांग्रेस २ जी घोटाले का सारा आरोप डी.एम.के पर मढ़कर उससे किनारा करने और ए.आई.डी.एम.के के साथ दोस्ती गांठने की कोशिश करे.
लेकिन इससे बहुत फायदा नहीं होनेवाला है. आखिर कौन नहीं जानता कि भ्रष्टाचार के मामले में खुद कांग्रेस का दामन डी.एम.के से कम गन्दा नहीं है? दूसरे, कांग्रेस जानती है कि जयललिता के साथ दोस्ती की अपनी ही ‘कीमत’ है. तीसरे, पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस की भारी जीत के बाद ममता बैनर्जी की बढ़ी राजनीतिक हैसियत भी कांग्रेस का सिरदर्द बढानेवाली है.
लेकिन भ्रष्टाचार के खिलाफ स्पष्ट फैसले के अलावा इन नतीजों से यह भी पता चलता है कि मतदाता नव उदारवादी आर्थिक नीतियों खासकर कारपोरेट विकास के नाम पर जबरिया लोगों की जमीन और रोजगार छीनने के खिलाफ हैं. पश्चिम बंगाल में लोगों ने वाम मोर्चे खासकर माकपा की गरीबों और खेत मजदूरों-छोटे किसानों के हितों की कीमत पर कारपोरेट विकास के एजेंडे को ठुकरा दिया है.
कहने की जरूरत नहीं है कि जो विश्लेषक पश्चिम बंगाल के नतीजे को वामपंथी राजनीति के नकार या उसके अंत जैसी भविष्यवाणियां कर रहे हैं और राष्ट्रीय राजनीति के कांग्रेस और भाजपा के बीच द्वि-ध्रुवीय होने के सपने देख रहे हैं, वे बहुत जल्दबाजी में दिख रहे हैं.
सच यह है कि यह वाम राजनीति का नकार नहीं है बल्कि पिछले कुछ वर्षों में माकपा सिंगुर, नंदीग्राम से लेकर लालगढ़ तक जिस तरह की गरीब विरोधी राजनीति को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रही थी, मतदाताओं ने उसे नकारा है. यहां उल्लेखनीय है कि बंगाल में ममता बैनर्जी वाम मोर्चे के बुर्जुआ भटकावों के खिलाफ ‘माँ, माटी और मानुष’ जैसे वाम नारों और एजेंडे के साथ मैदान में थीं.
उन्होंने बहुत चतुराई से बंगाल की राजनीति की पहचान बन गए वाम मिजाज और अंदाज़ को अपनाकर वाम मोर्चे को मात दी है. आश्चर्य नहीं कि वाम मोर्चे के भटकावों से नाराज वाम बुद्धिजीवियों के एक बड़े हिस्से ने माकपा को सबक सिखाने के इरादे से तृणमूल कांग्रेस का समर्थन किया है.
सच यह है कि वाम मोर्चे ने डेढ़-दो दशकों और खासकर पिछले कुछ वर्षों में जैसी राजनीतिक-वैचारिक-प्रशासनिक गलतियां की हैं, उसे भुनाने में ममता बैनर्जी ने कोई गलती नहीं की है. असल में, पिछले चौंतीस वर्षों के शासन ने वाम मोर्चे खासकर माकपा में जिस तरह का राजनीतिक अहंकार पैदा कर दिया है, उसके कारण वह अपनी राजनीतिक-वैचारिक फिसलन को पकड़ नहीं पाई.
उसे यह दिखाई नहीं पड़ा कि पार्टी में खासकर निचले स्तर पर अपराधियों, दलालों, ठेकेदारों और भ्रष्ट लोगों का जमावड़ा हावी हो चुका है. उल्टे उसने इसी अहंकार में नंदीग्राम से लेकर लालगढ़ तक हर विरोध को ताकत के बल पर कुचलने की कोशिश की. इससे उसका मुख्य राजनीतिक आधार उससे अलग होता चला गया जिसकी कीमत उसे इन चुनावों में चुकानी पड़ी है.
लेकिन एक मायने में यह नतीजे वाम राजनीति के भविष्य के लिए उम्मीद भी पैदा करते हैं. असल में, वाम मोर्चे खासकर माकपा के लिए उसकी राज्य सरकारें ही उसके विकास के लिए सबसे बड़ी बाधा बन गई थीं. उसकी सारी राजनीति और वैचारिकी इन राज्य सरकारों को किसी तरह से बचाने तक सीमित हो गई थी.
यहां तक कि इन राज्य सरकारों खासकर पश्चिम बंगाल की सरकार को बचाने के लिए वह अपनी राजनीति और विचार को भी कुर्बान करने में संकोच नहीं कर रही थी. यही कारण है कि एक ओर वह नव उदारवादी आर्थिक नीतियों का विरोध करती थी और दूसरी ओर, पश्चिम बंगाल में उसकी सरकार उन्हीं नीतियों को लागू करने के लिए अपने लोगों का खून बहाने में हिचकिचा नहीं रही थी.
यही नहीं, माकपा को सत्ता के साथ चिपके रहने को रोग इस तरह लग गया था कि वह आंदोलनकारी विपक्ष की भूमिका निभाने की जरूरत भी भूलती जा रही थी. इसके बजाय पिछले एक-डेढ़ दशक से वह राष्ट्रीय राजनीति में जोड़तोड़ करके कभी तीसरा मोर्चा खड़ा करने के कसरत में लगी रही और कभी साम्प्रदायिकता से लड़ने के नाम पर यू.पी.ए-कांग्रेस को बाहर से अवसरवादी समर्थन देने में जुटी रही.
हैरानी की बात नहीं है कि पिछले एक दशक में नव उदारवादी आर्थिक नीतियों और कारपोरेट विकास के नाम पर गरीबों-आदिवासियों की जल-जंगल-जमीन छीनने की कोशिशों के खिलाफ चलनेवाले आन्दोलनों का नेतृत्व कहीं भी वाम मोर्चा या माकपा के पास नहीं है. उल्टे कई जगहों खासकर पश्चिम बंगाल में माकपा इन आन्दोलनों के खिलाफ खड़ी दिखाई पड़ी.
उम्मीद करनी चाहिए कि अब जब माकपा सत्ता से बाहर है, वह न सिर्फ अपनी राजनीति और वैचारिक विचलनों पर जरूर पुनर्विचार करेगी बल्कि वाम राजनीति को जनता के आन्दोलनों से जोड़ने के लिए गंभीर प्रयास करेगी.
आखिर आज के दौर में वाम राजनीति की भूमिका इसके अलावा और क्या हो सकती है कि वह एक ओर कारपोरेट लूट, सत्ता के शीर्ष पर भ्रष्टाचार और नव उदारवादी आर्थिक नीतियों के खिलाफ सड़कों पर उतारकर जनसंघर्षों का नेतृत्व करे और दूसरी ओर, सांप्रदायिक ताकतों को राष्ट्रीय राजनीति में केन्द्रीय भूमिका में आने से रोकने के लिए जनता को गोलबंद करे?
लेकिन सवाल है कि क्या वाम मोर्चा खासकर माकपा इसके लिए तैयार है?
(जनसत्ता के १४ मई के अंक में सम्पादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित)






























