शनिवार, मई 14, 2011

पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव के नतीजे : कुछ उम्मीद, कुछ सबक

मतदाताओं ने भ्रष्टाचार और नव उदारवादी आर्थिक नीतियों को नाकारा



पांच राज्यों की विधानसभाओं के चुनावी नतीजों में तमिलनाडु को छोड़कर बाकी राज्यों के नतीजे बहुत हद तक अनुमानों और उम्मीद के मुताबिक ही हैं. लेकिन अगर इसमें सचमुच कोई चौंकानेवाला नतीजा है तो वह तमिलनाडु का है जहां यू.पी.ए यानी डी.एम.के-कांग्रेस गठबंधन का सूपड़ा साफ़ हो गया है. यह कहना गलत नहीं होगा कि तमिलनाडु के नतीजों ने राजनीतिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण पश्चिम बंगाल के नतीजों को भी फीका कर दिया है जहां वाम मोर्चे की करारी हार हुई है.

ऐसा मानने की वजह यह है कि पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चे की पहले से ही तय थी. वहां वाम मोर्चे राजनीतिक ढलान बहुत पहले शुरू हो चुकी थी और २००९ के लोकसभा चुनाव, पंचायतों और नगरपालिकाओं में वाम मोर्चे की लगातार हार के बाद विधानसभा चुनाव में हार उसी की तार्किक परिणति है.

लेकिन तमिलनाडु के नतीजे इसलिए ज्यादा महत्वपूर्ण हैं कि वहां मतदाताओं ने साफ़ तौर पर डी.एम.के-कांग्रेस गठबंधन के भ्रष्टाचार और उसके प्रतीक बन चुके २ जी घोटाले और धनबल की राजनीति को नकार दिया है. हालांकि तमिलनाडु के नतीजों के महत्व को यह कहकर कम करने की कोशिश की जा रही है कि वहां हर पांच साल पर सरकार बदल जाती है लेकिन सच्चाई इसके ठीक उलट है.

तथ्य यह है कि तमिलनाडु में २००६ के चुनावों में डी.एम.के-कांग्रेस गठबंधन ने इस भ्रामक धारणा को तोड़कर चुनाव जीता था. यही नहीं, २००९ के लोकसभा चुनावों में भी अनुमानों के विपरीत यू.पी.ए यानी डी.एम.के-कांग्रेस गठबंधन ने अच्छा प्रदर्शन किया. फिर २००९ से २०११ के बीच ऐसा क्या हुआ कि इस बार राज्य में यू.पी.ए चारों खाने चित्त हो गई?


कहने की जरूरत नहीं है कि इन दो वर्षों में न सिर्फ केन्द्र की यू.पी.ए सरकार में शीर्ष स्तर पर जारी भ्रष्टाचार के मामलों का एक के बाद एक खुलासा हुआ है बल्कि इस महा भ्रष्टाचार के प्रतीक बन चुके २ जी घोटाले ने देश के जनमानस को झकझोर कर रख दिया है.

कांग्रेस माने या न माने लेकिन सच यही है कि तमिलनाडु में भ्रष्टाचार खासकर २ जी घोटाला और उसमें सीधे मुख्यमंत्री करूणानिधि के परिवार के महत्वपूर्ण सदस्यों का शामिल होना बहुत बड़ा मुद्दा था. यह सही है कि राज्य में मतदाताओं के पास कोई वास्तविक राजनीतिक विकल्प नहीं था क्योंकि भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद और निरंकुश व्यवहार के मामले में दोनों द्रविड़ पार्टियों और उनके नेताओं- करूणानिधि और जयललिता में कोई खास फर्क नहीं है.

लेकिन इस चुनाव में मतदाताओं के सामने कठघरे में करूणानिधि थे. मतदाता भ्रष्टाचार के मुद्दे पर ए.आई.डी.एम.के और उसकी नेता जयललिता को पिछली बार सबक सिखा चुके थे. जाहिर है कि इस बार बारी डी.एम.के-कांग्रेस गठबंधन की थी. हालांकि भ्रष्टाचार के मुद्दे को मिक्सी-ग्राइंडर जैसे सस्ते चुनावी वायदों और खुलेआम रूपये बांटकर जनता की निगाह से ओझल करने की कोशिश हुई.

लेकिन नतीजों से साफ है कि लोगों ने यू.पी.ए यानी डी.एम.के और कांग्रेस दोनों को माफ नहीं किया. आश्चर्य नहीं कि डी.एम.के के साथ-साथ कांग्रेस की भी बुरी गत हुई है. राज्य में अपनी वापसी का सपना देख रही कांग्रेस की सीटों की संख्या दहाई में भी नहीं पहुंच पाई जबकि पार्टी ने डी.एम.के के साथ मोलतोल करके पिछली बार की तुलना में अधिक सीटें लड़ी थीं.    


निश्चय ही, राष्ट्रीय राजनीति के लिहाज से तमिलनाडु के नतीजे यू.पी.ए खासकर कांग्रेस के लिए चेतावनी की घंटी हैं. हालांकि वह इसे सुनने के लिए तैयार नहीं है. कांग्रेस पांच राज्यों में से तीन में अपनी या अपने गठबंधन की जीत को यू.पी.ए खासकर कांग्रेस के पक्ष में जनता का फैसला बताकर अपनी पीठ ठोंकने में लगी हुई है लेकिन सच यह है कि इन नतीजों में वाम मोर्चे के साथ-साथ कांग्रेस के लिए भी आत्मावलोकन के वास्ते बहुत कुछ है.

आदर्श हाउसिंग से लेकर कामनवेल्थ घोटालों में फंसी कांग्रेस के लिए यह सचमुच चिंता की बात है कि उसे न सिर्फ तमिलनाडु के अलावा पुदुच्चेरी में हार का मुंह देखना पड़ा है बल्कि केरल में भी अनुकूल राजनीतिक परिस्थितियों के बावजूद वह किसी तरह बहुमत के पास पहुंच पाई है.

सच पूछिए तो केरल में अगर वाम मोर्चे खासकर माकपा के अंदर खुली गुटबाजी नहीं होती और पार्टी नेतृत्व ने मुख्यमंत्री वी.एस. अच्युतानंदन की भ्रष्टाचार विरोधी लड़ाई में खुलकर साथ दिया होता तो कांग्रेस की वापसी संभव नहीं होती. यही नहीं, केरल में खुद गुटों में बंटी कांग्रेस के लिए इतने बारीक़ बहुमत के साथ सरकार चलाना आसान नहीं होगा.

लेकिन कांग्रेस के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द आंध्र प्रदेश के कडप्पा उपचुनाव में वाई.एस.आर के बेटे जगन मोहन रेड्डी और उनकी पत्नी की जीत है. कांग्रेस की केन्द्रीय सत्ता में पुनर्वापसी में आंध्र प्रदेश का योगदान किसी से छुपा नहीं है लेकिन पहले तेलंगाना और अब जगन की चुनौती ने कांग्रेस को अंदर से हिला कर रख दिया है. इस चुनौती से निपटना उसके लिए आसान नहीं होगा. 

कहने का अर्थ यह है कि पश्चिम बंगाल और केरल में वाम मोर्चे की हार पर जश्न मना रही यू.पी.ए सरकार और कांग्रेस को इन नतीजों से राजनीतिक रूप से कोई खास राहत नहीं मिलने जा रही है. उल्टे भ्रष्टाचार के मुद्दे पर उसपर दबाव और बढ़ेगा. हालांकि इस सम्भावना से इनकार नहीं किया जा सकता है कि आनेवाले दिनों में कांग्रेस २ जी घोटाले का सारा आरोप डी.एम.के पर मढ़कर उससे किनारा करने और ए.आई.डी.एम.के के साथ दोस्ती गांठने की कोशिश करे.

लेकिन इससे बहुत फायदा नहीं होनेवाला है. आखिर कौन नहीं जानता कि भ्रष्टाचार के मामले में खुद कांग्रेस का दामन डी.एम.के से कम गन्दा नहीं है? दूसरे, कांग्रेस जानती है कि जयललिता के साथ दोस्ती की अपनी ही कीमत है. तीसरे, पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस की भारी जीत के बाद ममता बैनर्जी की बढ़ी राजनीतिक हैसियत भी कांग्रेस का सिरदर्द बढानेवाली है.

लेकिन भ्रष्टाचार के खिलाफ स्पष्ट फैसले के अलावा इन नतीजों से यह भी पता चलता है कि मतदाता नव उदारवादी आर्थिक नीतियों खासकर कारपोरेट विकास के नाम पर जबरिया लोगों की जमीन और रोजगार छीनने के खिलाफ हैं. पश्चिम बंगाल में लोगों ने वाम मोर्चे खासकर माकपा की गरीबों और खेत मजदूरों-छोटे किसानों के हितों की कीमत पर कारपोरेट विकास के एजेंडे को ठुकरा दिया है.

कहने की जरूरत नहीं है कि जो विश्लेषक पश्चिम बंगाल के नतीजे को वामपंथी राजनीति के नकार या उसके अंत जैसी भविष्यवाणियां कर रहे हैं और राष्ट्रीय राजनीति के कांग्रेस और भाजपा के बीच द्वि-ध्रुवीय होने के सपने देख रहे हैं, वे बहुत जल्दबाजी में दिख रहे हैं.

सच यह है कि यह वाम राजनीति का नकार नहीं है बल्कि पिछले कुछ वर्षों में माकपा सिंगुर, नंदीग्राम से लेकर लालगढ़ तक जिस तरह की गरीब विरोधी राजनीति को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रही थी, मतदाताओं ने उसे नकारा है. यहां उल्लेखनीय है कि बंगाल में ममता बैनर्जी वाम मोर्चे के बुर्जुआ भटकावों के खिलाफ माँ, माटी और मानुषजैसे वाम नारों और एजेंडे के साथ मैदान में थीं.

उन्होंने बहुत चतुराई से बंगाल की राजनीति की पहचान बन गए वाम मिजाज और अंदाज़ को अपनाकर वाम मोर्चे को मात दी है. आश्चर्य नहीं कि वाम मोर्चे के भटकावों से नाराज वाम बुद्धिजीवियों के एक बड़े हिस्से ने माकपा को सबक सिखाने के इरादे से तृणमूल कांग्रेस का समर्थन किया है.    

सच यह है कि वाम मोर्चे ने डेढ़-दो दशकों और खासकर पिछले कुछ वर्षों में जैसी राजनीतिक-वैचारिक-प्रशासनिक गलतियां की हैं, उसे भुनाने में ममता बैनर्जी ने कोई गलती नहीं की है. असल में, पिछले चौंतीस वर्षों के शासन ने वाम मोर्चे खासकर माकपा में जिस तरह का राजनीतिक अहंकार पैदा कर दिया है, उसके कारण वह अपनी राजनीतिक-वैचारिक फिसलन को पकड़ नहीं पाई.

उसे यह दिखाई नहीं पड़ा कि पार्टी में खासकर निचले स्तर पर अपराधियों, दलालों, ठेकेदारों और भ्रष्ट लोगों का जमावड़ा हावी हो चुका है. उल्टे उसने इसी अहंकार में नंदीग्राम से लेकर लालगढ़ तक हर विरोध को ताकत के बल पर कुचलने की कोशिश की. इससे उसका मुख्य राजनीतिक आधार उससे अलग होता चला गया जिसकी कीमत उसे इन चुनावों में चुकानी पड़ी है.

लेकिन एक मायने में यह नतीजे वाम राजनीति के भविष्य के लिए उम्मीद भी पैदा करते हैं. असल में, वाम मोर्चे खासकर माकपा के लिए उसकी राज्य सरकारें ही उसके विकास के लिए सबसे बड़ी बाधा बन गई थीं. उसकी सारी राजनीति और वैचारिकी इन राज्य सरकारों को किसी तरह से बचाने तक सीमित हो गई थी.

यहां तक कि इन राज्य सरकारों खासकर पश्चिम बंगाल की सरकार को बचाने के लिए वह अपनी राजनीति और विचार को भी कुर्बान करने में संकोच नहीं कर रही थी. यही कारण है कि एक ओर वह नव उदारवादी आर्थिक नीतियों का विरोध करती थी और दूसरी ओर, पश्चिम बंगाल में उसकी सरकार उन्हीं नीतियों को लागू करने के लिए अपने लोगों का खून बहाने में हिचकिचा नहीं रही थी.

यही नहीं, माकपा को सत्ता के साथ चिपके रहने को रोग इस तरह लग गया था कि वह आंदोलनकारी विपक्ष की भूमिका निभाने की जरूरत भी भूलती जा रही थी. इसके बजाय पिछले एक-डेढ़ दशक से वह राष्ट्रीय राजनीति में जोड़तोड़ करके कभी तीसरा मोर्चा खड़ा करने के कसरत में लगी रही और कभी साम्प्रदायिकता से लड़ने के नाम पर यू.पी.ए-कांग्रेस को बाहर से अवसरवादी समर्थन देने में जुटी रही.

हैरानी की बात नहीं है कि पिछले एक दशक में नव उदारवादी आर्थिक नीतियों और कारपोरेट विकास के नाम पर गरीबों-आदिवासियों की जल-जंगल-जमीन छीनने की कोशिशों के खिलाफ चलनेवाले आन्दोलनों का नेतृत्व कहीं भी वाम मोर्चा या माकपा के पास नहीं है. उल्टे कई जगहों खासकर पश्चिम बंगाल में माकपा इन आन्दोलनों के खिलाफ खड़ी दिखाई पड़ी.  

उम्मीद करनी चाहिए कि अब जब माकपा सत्ता से बाहर है, वह न सिर्फ अपनी राजनीति और वैचारिक विचलनों पर जरूर पुनर्विचार करेगी बल्कि वाम राजनीति को जनता के आन्दोलनों से जोड़ने के लिए गंभीर प्रयास करेगी.

आखिर आज के दौर में वाम राजनीति की भूमिका इसके अलावा और क्या हो सकती है कि वह एक ओर कारपोरेट लूट, सत्ता के शीर्ष पर भ्रष्टाचार और नव उदारवादी आर्थिक नीतियों के खिलाफ सड़कों पर उतारकर जनसंघर्षों का नेतृत्व करे और दूसरी ओर, सांप्रदायिक ताकतों को राष्ट्रीय राजनीति में केन्द्रीय भूमिका में आने से रोकने के लिए जनता को गोलबंद करे?

लेकिन सवाल है कि क्या वाम मोर्चा खासकर माकपा इसके लिए तैयार है?

(जनसत्ता के १४ मई के अंक में सम्पादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित)        

सोमवार, मई 09, 2011

माया का मेगापोलिस

जमीन की लूट के लिए मायावती सरकार ने किसानों के खिलाफ युद्ध सा छेड दिया है




दिल्ली के पास ग्रेटर नोयडा के भट्टा-पारसौल गांव से भडकी किसान आंदोलन की चिंगारी मुख्यमंत्री मायावती के प्रिय प्रोजेक्ट यमुना एक्सप्रेसवे के किनारे-किनारे आगरा और मथुरा तक फ़ैल गई है. लेकिन किसानों की मांगों पर सहानुभूति से विचार करने या उनसे संवाद करने के बजाय सर्वजन की सरकार ने पिछले चार महीनों से जमीन के मनमाने अधिग्रहण या कहिये लूट के खिलाफ आंदोलनरत किसानों के मनोबल को तोड़ने के लिए पुलिस-पी.ए.सी को उतार दिया है.

कहने की जरूरत नहीं है कि उत्तर प्रदेश पुलिस-पी.ए.सी वहां वही कर रही है जिसके लिए वह दशकों से कुख्यात है. पंतनगर से लेकर मलियाना-हाशिमपुरा और रामपुर चौराहा तक जनसंहार, लूट और बलात्कार की दोषी पी.ए.सी के इतिहास से कौन नहीं परिचित है? वही पुलिस-पी.ए.सी किसानों पर फायरिंग, उनकी फसलों-घरों और संपत्ति को जलाने से लेकर अपने दो साथियों की मौत से इस कदर पागल हो गई है कि वह गांवों और किसानों के घरों में घुसकर बूढ़े-बच्चों और महिलाओं की पिटाई कर रही है. अंधाधुंध गिरफ्तारियां हो रही हैं.  

पुलिसिया आतंक का यह हाल है कि किसान गांव छोड़कर भाग गए हैं. यही नहीं, पुलिस किसानों के नेता मनवीर सिंह तेवतिया और उनके साथियों को ऐसे ही खोज रही है, जैसे अमेरिका ओसामा बिन लादेन को खोज रहा था. उसने तेवतिया पर ५० हजार रूपये का इनाम घोषित कर दिया है. पुलिस के रवैये से साफ है कि उसने आंदोलनकारी किसानों को सबक सिखाने का फैसला कर लिया है. निश्चय ही, इस पूरे दमन अभियान को खुद मुख्यमंत्री मायावती का समर्थन हासिल है क्योंकि उत्तर प्रदेश शासन में बिना उनके इशारे के पत्ता भी नहीं खड़कता है.

ऐसा लगता है कि मायावती सरकार ने बिल्डरों, रीयल इस्टेट कंपनियों और देशी-विदेशी बड़ी कंपनियों के हक में उत्तर प्रदेश में किसानों के खिलाफ एक तरह से युद्ध सा छेड दिया है. सीधे-सीधे सरकार की अगुवाई में बड़े पैमाने पर किसानों की जमीन लूटी जा रही है. कहीं यमुना एक्सप्रेस-वे के नाम से और कहीं गंगा एक्सप्रेस-वे के नाम पर. यह कितनी बड़ी विडम्बना है कि जिस गंगा-यमुना के किनारे एक पूरी सभ्यता-संस्कृति विकसित हुई और उसके उपजाऊ मैदानों में किसानों ने कड़ी मेहनत से लाखों-करोड़ों का पेट भरा, उन्हीं किसानों और उनके साथ इस पूरी सभ्यता को उजाड़ने का अभियान चल रहा है.

लेकिन विकास के नाम पर गंगा-जमुनी तहजीब की इस धरती पर कहीं फार्मूला वन की रेसिंग का ट्रैक बन रहा है, कहीं गोल्फ कोर्स, कहीं क्रिकेट स्टेडियम बन रहा है और कहीं लक्जरी अपार्टमेंट. इसके लिए किसानों की जमीनें जबरदस्ती छिनी जा रही हैं. मायावती सरकार के पास इस सवाल का कोई जवाब नहीं है कि आखिर छह लेन के यमुना एक्सप्रेस-वे या गंगा एक्सप्रेस-वे की क्या जरूरत है? यह भी कि रेसिंग ट्रैक, गोल्फ कोर्स और लक्जरी अपार्टमेंट जरूरी हैं या करोड़ों किसानों की आजीविका और वह उपजाऊ जमीन जिससे पैदा होनेवाले अनाज से करोड़ों लोगों का पेट भर रहा है?

लेकिन मायावती राज में ऐसे सवाल बेमानी हो गए हैं. जमीन की लूट का आलम यह है कि एक सरकारी नोटिफिकेशन के जरिये इस साल फरवरी में मायावती सरकार ने एक झटके में यमुना एक्सप्रेस-वे के किनारे छह जिलों के करीब ११८७ गांवों की पूरी जमीन को ग्रामीण-कृषि भूमि से शहरी भूमि घोषित कर दिया. इसके तहत यमुना एक्सप्रेस-वे के बाईं ओर से यमुना के किनारे तक का १०-१५ किलोमीटर का पूरा इलाका रातों-रात शहरी और यमुना एकस्प्रेस-वे इंडस्ट्रियल डेवेलपमेंट अथारिटी के अधीन आ गया है.

हालांकि मायावती सरकार का दावा है कि इससे एक्सप्रेस-वे के किनारे संगठित और सुनियोजित विकास हो पायेगा लेकिन हकीकत यह है कि सर्वजन की सरकार ने एक झटके में ११८७ गांवों की लगभग २,३६,६८२ हेक्टेयर जमीन भू-माफिया, बिल्डरों और रीयल इस्टेट कंपनियों की खुली लूट के लिए थाली में परोस करके दे दी है. यह पूरी जमीन नोयडा और दिल्ली के कुल क्षेत्रफल से अभी अधिक है. इसमें दस से अधिक नोयडा बन सकते हैं.

मतलब यह कि मायावती मोहम्मद तुगलक की तरह अपना दौलताबाद यानी दिल्ली से भी बड़ा मेगापोलिस बनाना चाहती हैं. वैसे भी बहन जी का स्माल इज ब्यूटीफुल में कोई भरोसा नहीं है. उनका विशाल और भव्य से प्रेम किसी से छुपा नहीं है. चूँकि उनकी सरकार के अफसर मानते हैं कि देश का भविष्य शहरीकरण में है, इसलिए वे नए शहर बनाने में जुटे हैं. यह और बात है कि इन नए शहरों में गरीबों और दलितों के लिए कोई जगह नहीं है. दूसरी ओर, उत्तर प्रदेश के पुराने शहर बहन जी की अनदेखी के कारण बदहाल और बर्बाद होते जा रहे हैं.        

लेकिन बहन जी अपनी इन तुगलकी योजनाओं के खिलाफ कुछ भी सुनने को तैयार नहीं हैं. ऐसा लगता है कि उत्तर प्रदेश में सरकार जे.पी. समूह चला रहा है. अन्यथा क्या कारण है कि करोड़ों किसानों की आजीविका की चिंता करने के बजाय बहन जी जे.पी. समूह के हितों की रक्षा के लिए इस कदर उद्वेलित हैं? जे.पी समूह के प्रति उनका यह अत्यधिक स्नेह समझ से बाहर है. उसके लिए उन्हें किसानों का खून बहाने में भी संकोच नहीं हो रहा है.

लेकिन जे.पी समूह से प्रेम के मामले में बहन जी अकेली राजनेता नहीं हैं. जे.पी का फैन क्लब भाजपा से लेकर कांग्रेस तक फैला हुआ है. चाहे गुजरात में नरेंद्र मोदी हों या मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान हों या हिमाचल प्रदेश के प्रेम सिंह धूमल या पूर्व भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह या फिर कांग्रेस के कमलनाथ या दिग्विजय सिंह या फिर सपा के मुलायम सिंह यादव. यह लिस्ट बहुत लंबी है. स्वाभाविक भी है. आखिर जे.पी कोई छोटी-मोटी कंपनी तो है नहीं.

ऐसी तेजी से बढ़ती कंपनी से दोस्ती कौन नहीं करेगा जिसका राजस्व १६ हजार करोड़ रूपये तक पहुंच चुका है. आश्चर्य नहीं कि आज जे.पी के चाहनेवाले हर पार्टी में मौजूद हैं जो जल्दी ही खींसे निपोरते हुए कहने लगेंगे कि विकास जरूर होना चाहिए लेकिन किसानों के हितों का ध्यान भी रखा जाना चाहिए. गौर करिए, जरूर और भी का अंतर. ये महानुभाव मायावती की जमकर लानत-मलामत करेंगे लेकिन विकास की तरफदारी भी करेंगे. कहने की जरूरत नहीं है कि विकास के नाम पर जमीन की लूट के सवाल पर सभी राजनीतिक दलों में आम सहमति बन चुकी है.       

ऐसे में, किसान क्या करें? उनके पास विकल्प क्या है? हैरानी की बात नहीं है कि इस जमीन लूट के खिलाफ किसानों में नोयडा से लेकर अलीगढ़ और आगरा से मथुरा तक आग धधक रही है. किसानों के लिए यह अब जीवन-मरण की लड़ाई बन गई है. यह बात मायावती भी जानती हैं. उन्हें पता है कि अगर इस बार किसानों का आंदोलन साम-दाम-दंड-भेद का सहारा लेकर नहीं कुचला गया तो फिर उनका मेगापोलिस बनाने का सपना हमेशा के लिए टूट जायेगा. इसलिए वह किसानों का आंदोलन तोड़ने के लिए उनका मनोबल तोड़ने की कोशिश कर रही हैं.

एक ओर किसानों को अपराधी और अराजक साबित करने की कोशिश की जा रही है, उनके नेताओं को मोस्ट वांटेड घोषित किया जा रहा है और दूसरी ओर, उन्हें फुसलाने की कोशिशें हो रही हैं. एक ओर पुलिस-पी.ए.सी को दमन-उत्पीडन की खुली छूट दे दी गई है और दूसरी ओर, किसानों को प्रलोभन दिए जा रहे हैं. यानी वह हर तौर तरीका इस्तेमाल किया जा रहा है जिससे किसानों का मनोबल तोडा जा सके. अलीगढ़ के टप्पल में वह यह प्रयोग कर चुकी हैं. भट्टा-पारसौल में भी वही दोहराने की कोशिश की जा रही है. 

                        

शुक्रवार, मई 06, 2011

अन्ना से अमर ‘क्रांति’ तक

एक अति से दूसरी अति के बीच झूलते चैनल



कहते हैं कि कई बार क्रांतियां अपने ही संतानों को खा जाती हैं. उसमें भी अगर वह क्रांति मीडिया खासकर न्यूज चैनलों और न्यू मीडिया के कन्धों पर चढकर आई हो तो यह खतरा कई गुना बढ़ जाता है. आखिर मीडिया एक दुधारी तलवार है. वह दोनों ओर से घाव करती है.

ऐसा लगता है कि अन्ना हजारे की भ्रष्टाचार विरोधी क्रांति के साथ भी यही हो रहा है. न्यूज चैनलों और समाचार मीडिया ने जिस उत्साह के साथ अन्ना की भ्रष्टाचार विरोधी क्रांति को गढा और आसमान पर चढ़ाया, अब वे ही उसकी संतानों के पीछे पड़ गए हैं.


नतीजा यह कि चैनलों और अख़बारों में अब अन्ना हजारे से अधिक अमर सिंह दिख रहे हैं. लोकपाल से अधिक चर्चा उस रहस्यमय सी.डी उर्फ पप्पू की हो रही है जिसके पापा का पता नहीं है. यही नहीं, समाचार मीडिया का एक हिस्सा जोरशोर से सिविल सोसायटी के सदस्यों की जन्मपत्री खंगालने में जुटा है.

गड़े मुर्दे उखाड़े जा रहे हैं. कीचड उछालने का खेल शुरू हो चुका है. हैरानी की बात यह है कि चैनलों के कठघरे में अब भ्रष्ट नेता और मंत्री नहीं बल्कि जन लोकपाल कानून का मसौदा तैयार करने के लिए गठित समिति के गैर सरकारी सदस्य खासकर शांति और प्रशांत भूषण खड़े हैं.


जाहिर है कि अमर सिंह रातों-रात न्यूजमेकर आफ द डे बन चुके हैं. चैनलों पर अन्ना वाणी की जगह अमर वाणी ने ले ली है. चैनलों पर बहुत दिनों बाड़ प्राइम टाइम में अमर सिंह छाए हुए हैं. उनका अहर्निश प्रलाप चल रहा है.

कल तक जंतर-मंतर से क्रांति की लाइव रिपोर्ट कर रहे न्यूज चैनलों पर अमर सिंह बैठे हैं और एंकर पूछ रहे हैं कि गंभीर आरोपों को देखते हुए क्या भूषण पिता-पुत्र को जन लोकपाल समिति से इस्तीफा नहीं दे देना चाहिए?


मजा यह कि सूप तो सूप, चलनी भी यह सवाल पूछ रही है जिसमें सैकड़ों छेद हैं. आश्चर्य नहीं कि बक स्टाप्स हियर में बरखा दत्त ने जब यह सवाल स्वामी अग्निवेश से पूछा तो उन्होंने पलटकर पूछा कि बरखा जी, अगर एक बड़े चैनल के एंकर पर भ्रष्टाचार में शामिल होने का आरोप लगता है तो क्या उस एंकर को खुद को पूरी तरह से पाक-साफ़ होने से पहले भ्रष्टाचार पर बहस करने की इजाजत होनी चाहिए? लेकिन मीडिया के पास ऐसे सवाल सुनने और उनका जवाब देने का साहस कहां है?


वहां तो सिर्फ फैसला होता है और वह फैसला हो चुका है. भूषण पिता-पुत्र पर कालिख पोती जा चुकी है. वैसे भी न्यूज चैनल तुरता न्याय में विश्वास करते हैं. वे अतियों के बीच जीने के आदी हो चुके हैं. ऐसे में, उन्हें किसी को आसमान पर चढ़ाने या पाताल में धकेलने में समय नहीं लगता है.

इसकी वजह यह भी है कि इस मामले में अधिकांश न्यूज चैनल एक खास तरह के दृष्टि दोष के शिकार हैं. उन्हें काले और सफ़ेद के अलावा और कुछ नहीं दिखता है. संतुलन और अनुपात जैसे शब्द उनकी न्यूज डिक्शनरी से पहले ही गायब हो चुके हैं.

आश्चर्य नहीं कि भूषण पिता-पुत्र के मामले में भी न्यूज चैनल न सिर्फ जल्दबाजी में हैं बल्कि उन्हें इस मामले में काले-सफ़ेद के अलावा और कुछ नहीं दिख रहा है. इस मामले में चैनलों की सक्रियता देखते ही बनती है. वे एक अति से दूसरी अति पर पहुंच चुके हैं.

कहने की जरूरत नहीं है कि जंतर-मंतर पर अन्ना के अनशन की 24x7 कवरेज और उसे क्रांति घोषित करना भी एक अति थी. लेकिन अब उसे प्रतिक्रांति घोषित करने में भी वैसी ही जल्दबाजी दिखाई जा रही है.


इससे ऐसा लगता है कि समाचार मीडिया खासकर न्यूज चैनल अन्ना के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन और उसके सिविल सोसायटी सदस्यों को रातों-रात आसमान पर चढ़ाने की अति का पश्चाताप करने में लग गए हैं. लेकिन पश्चाताप का यह तरीका जल्दबाजी में पुरानी गलती को दोहराने की तरह है और अगले पश्चाताप की जमीन तैयार कर रहा है.

क्या चैनल जल्दबाजी में एक अति से दूसरी अति तक की पेंडुलम यात्रा से बच नहीं सकते हैं? न्यूज चैनलों के लिए संतुलन, अनुपात, तथ्य-पूर्णता और वस्तुनिष्ठता को बरतना इतना मुश्किल क्यों हो जाता है?

क्या चैनलों के लिए भूषण पिता-पुत्र पर लगे आरोपों की स्वतंत्र जांच-पड़ताल करना और सच्चाई को सामने लाने की कोशिश करना इतना मुश्किल था कि वे हिज मास्टर्स वायस की तरह सुबह से शाम तक उन आरोपों को दोहराते रहे?

यह सोचने की बात है कि इतने संसाधनों के बावजूद चैनल किसी विवादस्पद मामले में अपनी ओर से छानबीन और क्रास चेक करने और तथ्य जुटाने के बजाय क्यों आरोप-प्रत्यारोप को दोहराने वाले साउंड बाईट और प्राइम टाइम तू-तू,मैं-मैं पर ज्यादा भरोसा करते हैं? जांच-पड़ताल और खबर की तह तक जाने का जिम्मा अभी भी मुख्यतः अखबारों पर है.


लेकिन इस साउंड बाईट और तू-तू, मैं-मैं पत्रकारिता में परपीडक सुख और सड़क छाप कौतूहल चाहे जितना हो पर दर्शकों की जानकारी और समझ में शायद ही कोई विस्तार होता हो. यही नहीं, न्यूज चैनलों की यह तू-तू, मैं-मैं पत्रकारिता उन्हें जाने-अनजाने एक अति से दूसरी अति की ओर भी धकेलती रहती है.

इस अति का फायदा कभी-कभार अन्ना और उनके मुद्दों को जरूर मिल जाता है लेकिन ज्यादातर मौकों पर इसका फायदा अमर सिंह जैसों को ही होता है. वजह यह कि चैनलों के लोकतंत्र में  शांति-प्रशांत भूषण और अमर सिंह में कोई फर्क नहीं है. आश्चर्य नहीं कि चैनलों पर अमर क्रांति, अन्ना क्रांति को निपटाने में जुट गई है.

(पाक्षिक 'तहलका' के १५ मई'११ के अंक में प्रकाशित स्तम्भ)

सोमवार, मई 02, 2011

अमेरिका को अब ओसामा की जरूरत नहीं रह गई थी

 आखिर अगले साल ओबामा को दोबारा चुनाव भी लड़ना है


अमेरिका ने एलान कर दिया है कि दुनिया का सबसे बड़ा आतंकवादी और अल कायदा का नेता ओसामा बिन लादेन मारा गया. अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की मानें तो अमेरिकी फौजियों की एक इलीट टुकड़ी ने ओसामा बिन लादेन को एक ख़ुफ़िया आपरेशन में इस्लामाबाद के पास एबटाबाद में मार गिराया है. ओबामा के मुताबिक, यह एक ख़ुफ़िया अमेरिकी आपरेशन था जो सीधे उनके निर्देश में चला. 

अमेरिकी टी.वी चैनलों और समाचार माध्यमों के मुताबिक, इस खबर के बाद से अमेरिका में जश्न का माहौल है. यही नहीं, ब्रिटेन से लेकर आस्ट्रेलिया तक के प्रधानमंत्रियों और राष्ट्रपतियों की ओर से खुशी और बधाई के सन्देश चैनलों पर गूंज रहे हैं.

भारतीय न्यूज चैनल भी अमेरिकी प्रतिष्ठान के हवाले से आ रही खबरों को पूरे उत्साह के साथ दोहराने में लगे हैं. हमेशा की तरह विजेता के बतौर अमेरिकी वीरता और पराक्रम की कहानियां मिर्च-मसाला लगाकर सुनाई जा रही हैं. इस सबके बीच सिर्फ अब यही बाकी बच गया है कि मारे गए ओसामा की छाती पर पैर रखे और हाथों में बंदूक ओबामा की तस्वीरें नहीं दिखाई गई हैं.

लेकिन सच बात यह है कि कहानी बहुत सरल और सीधी है. न्यूज चैनलों पर मत जाइए, उनका तो काम है कि कहानी में सनसनी, सस्पेंस और ड्रामा डालने के लिए एक से एक पेंच और ट्विस्ट घुसाएँ.

यह ठीक है कि ओसामा बिन लादेन कल मारा गया. लेकिन उसका यह अंत पहले दिन से ही तय था. सच तो यह है कि अगर वह कल तक जिन्दा था तो इसकी वजह भी यह थी कि उसे और उससे भी ज्यादा उसके नाम के आतंक को खुद अमेरिका ने जिन्दा रखा था. आखिर यह जिहादी आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक युद्ध का सवाल था!    

अमेरिका को ओसामा के नाम और आतंक की जरूरत कई कारणों से थी. ओसामा को पकड़ने और अल कायदा को खत्म करने के नाम पर अफगानिस्तान पर हमला किया गया. इसके लिए उसे बहुत बहाना नहीं बनाना पड़ा. साथ ही, पाकिस्तान में घुसपैठ बढ़ाने का मौका मिला. इसके साथ ही मध्य एशिया में पैर ज़माने की जगह मिली. इराक पर हमले के लिए जमीन तैयार करने में बहुत कसरत नहीं करना पड़ा.

साफ है कि इस सबके लिए ओसामा का जिन्दा रहना बहुत जरूरी था. वैसे भी अमेरिका बिना एक वैश्विक दुश्मन के नहीं रह सकता है. इस दुश्मन के नाम पर ही अमेरिकी सैन्य औद्योगिक गठजोड़ का खरबों डालर का कारोबार चलता है. आश्चर्य नहीं कि अमेरिका ने शीत युद्ध के बाद सभ्यताओं के संघर्ष की फर्जी सैद्धांतिकी के आधार पर ओसामा बिन लादेन के रूप में एक वैश्विक दुश्मन खड़ा किया.

अन्यथा यह सच किससे छुपा है कि ओसामा और उसके साथियों को जेहाद के नारे के साथ खड़ा करने में अमेरिका की सबसे बड़ी भूमिका थी? लेकिन अब अमेरिका को ओसामा की जरूरत नहीं रह गई थी. न सशरीर और न ही आतंक के एक प्रतीक के रूप में. कारण यह कि अब अमेरिका अफगानिस्तान से सम्मानजनक तरीके से  निकलना चाहता है. वह यह लड़ाई नैतिक रूप से ही नहीं बल्कि सैन्य तौर पर भी हार रहा था.

ओबामा ने बहुत पहले ही घोषित कर दिया था कि उनकी प्राथमिकता अफगानिस्तान की लड़ाई को जल्दी से जल्दी जीतकर वहां से बाहर निकलना है. लेकिन पिछले तीन साल में यह साफ़ हो चुका था कि अमेरिका अफगानिस्तान में जीतने नहीं जा रहा है. उल्टे उसे और खासकर नाटो के सैनिकों को काफी नुकसान उठाना पड़ रहा था. सबसे बड़ी बात अमेरिका को यह भी लगने लगा था कि अफगानिस्तान से कुछ खास मिलनेवाला भी नहीं है. मतलब न वहां तेल है और न ही कोई और बेशकीमती खनिज. फिर वहां रुकने से क्या फायदा?

लेकिन अमेरिका को वहां से निकलने के लिए जीत जरूरी थी. यह जीत इसलिए भी जरूरी थी क्योंकि अगले साल अमेरिका में राष्ट्रपति के चुनाव हैं. यह भी किसी से छुपा नहीं है कि पिछले कुछ महीनों ओबामा की लोकप्रियता लगातार ढलान पर थी. उनके दोबारा जीत के लिए कुछ ड्रामैटिक होना जरूरी था. इसके लिए ओसामा बिन लादेन से उम्दा प्रत्याशी और कोई नहीं था.

जाहिर है कि ओबामा की जीत के लिए लादेन का मरना जरूरी था. और लादेन मारा गया.

कहानी खत्म, बच्चों बजाओ ताली!

रविवार, मई 01, 2011

मजदूर आन्दोलन को अवांछित घोषित करने की साजिश

एयर इंडिया के पायलटों के साथ आज जो हो रहा है, वह कल सबके साथ होगा

आज मई दिवस है. आज दुनिया भर में पूंजी की तानाशाही के खिलाफ संघर्षरत मजदूरों के लड़ाकू संघर्षों की याद में प्रदर्शन और रैलियां हो रही हैं. मई दिवस दुनिया भर के मजदूरों के संघर्षों और उनकी एकजुटता का जुझारू इजहार है.


यह दिन उन मजदूर साथियों की याद दिलाता है जिन्होंने श्रम के सम्मान और अधिकारों को लेकर लड़ाइयां लड़ीं और कुर्बानियां दीं. उनके लड़ाकू संघर्षों के कारण ही हमें आठ घंटे काम की समय सीमा से लेकर साप्ताहिक छुट्टी और काम की बेहतर सेवा शर्तें हासिल हैं.  

अपने देश में भी लगभग हर शहर और कस्बे में मई दिवस कहीं पूरे जोशो-खरोश से और कहीं रूटीन की तरह मनाया जा रहा है. अधिकांश जगहों पर इसे एक औपचारिकता की तरह निभाया जा रहा है. सबसे अफसोस की बात यह है कि यह मई दिवस एक ऐसे मौके पर आया है जब देश में मजदूर आंदोलन में एक थकान और ठहराव दिखाई पड़ रहा है. उसकी छाया मई दिवस कार्यक्रमों पर भी देखी जा सकती है.
आज मई दिवस पर यह सोचने की बात है कि आज जब मजदूरों के अधिकारों पर हमले बढ़ रहे हैं, लंबी लड़ाइयों के बाद हासिल अधिकार एक-एक करके छीने जा रहे हैं और काम की स्थितियाँ बद से बदतर होती जा रही हैं, मजदूर आंदोलन ढलान पर है. उसकी आवाज़ मंद पड़ती जा रही है. संघर्ष कमजोर पड़ता जा रहा है.


दूर क्यों जाएं, खुद देश की राजधानी में मई दिवस से ठीक दो दिन पहले एक जूते की फैक्टरी में आग से दस मजदूर जिन्दा जल गए लेकिन कहीं कोई पत्ता तक नहीं खडका. जैसे मजदूरों के जीवन की कोई कीमत ही नहीं है. यह घटना अपवाद नहीं है. राजधानी और उसके आसपास नोयडा, गुडगाँव, फरीदाबाद, साहिबाबाद तक हजारों छोटी-बड़ी फैक्टरियों में मजदूरों को जिन अमानवीय और दमघोंटू परिस्थितियों में काम करना पड़ रहा है, वह किसी से छुपा नहीं है.


इन फैक्टरियों में कोई श्रम कानून नहीं चलता, मजदूरों को भेंड-बकरी की तरह इस्तेमाल किया जाता है और उनके जीवन की कोई कीमत नहीं है. उन्हें उचित वेतन, काम के निश्चित घंटे, कार्यस्थल पर संरक्षा, साप्ताहिक छुट्टी से लेकर स्वास्थ्य सुविधाएँ और यूनियन बनाने के अधिकार तक के बुनियादी संवैधानिक अधिकार तक हासिल नहीं हैं.


मजदूरों के साथ बर्ताव के मामले में बहुराष्ट्रीय से लेकर देशी कंपनियों के बीच कोई अंतर नहीं है. श्रम विभाग के अधिकारियों, जिला प्रशासन के अफसरों, नेताओं-विधायकों-सांसदों, स्थानीय अपराधियों और सरकारी ट्रेड यूनियनों की मदद से कंपनियां मजदूरों का खून चूसने में लगी हुई हैं.

लेकिन इस सबकी कहीं कोई चर्चा नहीं होती. यही नहीं, उत्तर उदारीकरण और निजीकरण के इस दौर में ट्रेड यूनियनों को अपराधी और आर्थिक आतंकवादी तक घोषित कर दिया गया है. यूनियन बनाने और अपने मांगों-अधिकारों के लिए संघर्ष करने, धरना-प्रदर्शन और हड़ताल करने के संवैधानिक और मानव अधिकारों को अपराध और देशद्रोह साबित किया जा रहा है.


एक तरह से मजदूर आंदोलन को अवांछित घोषित कर दिया गया है. सबसे हैरानी और चिंता की बात यह है कि छोटी से लेकर बड़ी अदालतें तक हडतालों को अवैध घोषित करने लगी हैं. हडताली कर्मचारियों को अवमानना की नोटिस भेजने लगी हैं. सबसे ताजा मामला एयर इंडिया के हडताली पायलटों का है. सरकार इस हड़ताल को कुचलने में जुटी है. यूनियन की मान्यता रद्द कर दी गई है. हडताली पायलटों को बर्खास्त किया जा रहा है. एयर इंडिया में तालाबंदी की चेतावनी दी जा रही है.


पायलटों की कुछ मांगों से असहमति हो सकती है. लेकिन उनके कई सवाल बहुत जरूरी और सरकार और एयर इंडिया प्रबंधन के भ्रष्टाचार और मनमानी की पोल खोलने वाले हैं. इसके बावजूद सरकार जिस तरह से बातचीत के बजाय एकतरफा दमनात्मक कदम उठा रही है, उसे किस लोकतंत्र में स्वीकार किया जा सकता है?


याद रखिये, आज जो एयर इंडिया के पायलटों के साथ हो रहा है, वह कल बाकी मजदूरों और कर्मचारियों के आन्दोलनों के साथ भी होगा बल्कि हो रहा है. अभी ज्यादा दिन नहीं गुजरे जब दिल्ली विश्वविद्यालय के शिक्षकों के आंदोलन को ऐसे ही निपटाया गया. मतलब बिल्कुल साफ़ है. आप अपनी जुबान बंद रखिये. जो मिल गया, उसमें खुश रहिये और दुआ दीजिए.


मई दिवस पर लोकतंत्र की इस तानाशाही पर गहराई से विचार जरूरी हो गया है क्योंकि हर जोर-जुल्म के टक्कर में संघर्ष हमारा अधिकार है को खत्म करने की साजिश मजबूत होती जा रही है.