<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-8157191427767672214</id><updated>2012-01-24T11:34:27.876+05:30</updated><category term='महंगाई'/><category term='रेखांकन'/><category term='राजनीति में नैतिकता'/><category term='यादें'/><category term='भोजन के अधिकार'/><category term='बाबा रामदेव और भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन'/><category term='अर्थव्यवस्था'/><category term='अमीरों पर टैक्स'/><category term='मई दिवस'/><category term='जीवन और समाज'/><category term='भ्रष्टाचार मतलब कार्पोरेट लूट'/><category term='भ्रष्टाचार'/><category term='विदेश मामले'/><category term='सूचना का अधिकार'/><category term='नोकिया के खिलाफ सत्याग्रह अभियान'/><category term='संकट में अमेरिकी/वैश्विक अर्थव्यवस्था'/><category term='कविता'/><category term='प्रेम का अर्थ'/><category term='कश्मीर'/><category term='यू.पी.ए बनाम एन.ए.सी'/><category term='जनसंख्या और महिलाएं'/><category term='यू.पी.ए-दो'/><category term='मुश्किल में माल्या'/><category term='बैठे-ठाले : रविवारी गपशप'/><category term='उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव&apos;12'/><category term='कथादेश:इलेक्ट्रानिक मीडिया'/><category term='राजनीतिक अर्थशास्त्र'/><category term='आक्युपाई वाल स्ट्रीट'/><category term='मायावती का उत्तर प्रदेश'/><category term='दिल्ली डायरी'/><category term='राजनीति'/><category term='अरब जगत में परिवर्तन'/><category term='लीबिया और गद्दाफी'/><category term='सूचना'/><category term='खाद्य सुरक्षा'/><category term='मीडिया : टैम और टी.आर.पी'/><category term='कांग्रेस पार्टी'/><category term='खुदरा व्यापार में एफ.डी.आई'/><category term='बाबू सिंह कुशवाहा'/><category term='युवा'/><category term='पुस्तक समीक्षा'/><category term='भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन'/><category term='आज़ादी के ६४ वर्ष'/><category term='वाम राजनीति'/><category term='बिनायक सेन को न्याय'/><category term='तमाशा मेरे आगे'/><category term='तेल संकट'/><category term='तेलंगाना'/><category term='मजीठिया वेतन आयोग'/><category term='क्यों पिछड़ा उत्तर भारत?'/><category term='मीडिया मुग़ल रूपर्ट मर्डोक'/><category term='भाजपा'/><category term='वैकल्पिक मीडिया'/><category term='नरेगा'/><category term='शिक्षा'/><category term='कृषि क्षेत्र'/><category term='मीडिया उद्योग में संकेन्द्रण'/><category term='पद्मनाभ स्वामी का खजाना'/><category term='यमुना एक्सप्रेस-वे'/><category term='शुभकामनाएं'/><category term='कर्नाटक'/><category term='अपील'/><category term='उत्तर प्रदेश का विभाजन'/><category term='गरीबी रेखा'/><category term='भारतीय अर्थव्यवस्था'/><category term='मीडिया'/><category term='ओसामा का अंत'/><category term='कार्पोरेट मीडिया'/><title type='text'>तीसरा रास्ता</title><subtitle type='html'>आनंद प्रधान</subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://teesraraasta.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8157191427767672214/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://teesraraasta.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><link rel='next' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8157191427767672214/posts/default?start-index=101&amp;max-results=100'/><author><name>आनंद प्रधान</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05288123571817148120</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_r2d8D7rSfq8/SzcAjql1JOI/AAAAAAAAAGg/C6og8D0qeWE/S220/anand+pradhan+in+class.jpg'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>380</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8157191427767672214.post-5650859731071822746</id><published>2012-01-24T11:34:00.002+05:30</published><updated>2012-01-24T11:34:27.889+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मीडिया'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कार्पोरेट मीडिया'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मीडिया उद्योग में संकेन्द्रण'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='वैकल्पिक मीडिया'/><title type='text'>लोकतंत्र और मीडिया उद्योग के लिए रिलायंस-टी.वी 18 डील के निहितार्थ</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;span style="color: blue; font-size: large;"&gt;&lt;strong&gt;मीडिया का बढ़ता कारपोरेटीकरण और उसके मायने&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/-T0MVAKW5Ngc/Tx5Gik7kmvI/AAAAAAAABh4/FWPvXTaSujI/s1600/images%255B6%255D.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; cssfloat: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="240" nfa="true" src="http://3.bp.blogspot.com/-T0MVAKW5Ngc/Tx5Gik7kmvI/AAAAAAAABh4/FWPvXTaSujI/s320/images%255B6%255D.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;भारतीय मीडिया और खासकर टी.वी उद्योग में इन दिनों खासी हलचल है. वर्ष २०१२ की शुरुआत बहुत धमाकेदार रही. देश में शेयर बाजार में लिस्टेड कंपनियों में बाजार पूंजीकरण के लिहाज से सबसे बड़ी कंपनी, मुकेश अंबानी की रिलायंस इंडस्ट्रीज ने टी.वी-18/नेटवर्क-18 (मनोरंजन चैनल कलर्स और न्यूज चैनल सी.एन.एन-आई.बी.एन, सी.एन.बी.सी आदि) में कोई 17 अरब रूपये के निवेश का एलान करके सबको चौंका दिया. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस डील के तहत रिलायंस के मालिकाने वाले इंडिपेंडेंट मीडिया ट्रस्ट ने टी.वी-18/नेटवर्क-18 में 1700 करोड़ रूपये का निवेश किया है जिसके बदले में टी.वी-18/नेटवर्क-18 ने इनाडु टी.वी समूह के सभी क्षेत्रीय समाचार चैनलों को पूरी तरह और मनोरंजन चैनलों में बड़ी हिस्सेदारी खरीद ली है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस डील के साथ एक ही झटके में मुकेश अंबानी और उनकी कंपनी रिलायंस मीडिया और मनोरंजन उद्योग की एक बड़ी खिलाड़ी बन गई है. खबरें यह भी हैं कि रिलायंस टी.वी वितरण के क्षेत्र में भी घुसने का रास्ता तलाश रही है और उसकी कई वितरण कंपनियों से उनके अधिग्रहण के लिए सौदा पटाने की कोशिश कर रही है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसके अलावा वह कुछ खेल चैनलों को भी अधिग्रहीत करने के प्रयास में भी है. उल्लेखनीय है कि रिलायंस आई.पी.एल क्रिकेट में सबसे महँगी टीमों में से एक मुंबई इंडियन की भी मालिक है. इसके अलावा रिलायंस को पूरे भारत में चौथी पीढ़ी (4 जी) ब्राडबैंड सेवाएं उपलब्ध करने का भी लाइसेंस मिल गया है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/-nRppT20j3mI/Tx5Gt1P2UiI/AAAAAAAABiA/Dydnh6XH52A/s1600/images%255B9%255D.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; cssfloat: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="189" nfa="true" src="http://3.bp.blogspot.com/-nRppT20j3mI/Tx5Gt1P2UiI/AAAAAAAABiA/Dydnh6XH52A/s320/images%255B9%255D.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;रिलायंस के ताजा फैसले से जाहिर है कि मुकेश अंबानी की तैयारी अब नेपथ्य से मीडिया की राजनीतिक-रणनीतिक ताकत और प्रभाव का इस्तेमाल करने के बजाय खुद उसके एक बड़े खिलाड़ी की तरह खेल में उतरने की है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हालांकि यह डील खुद में बहुत जटिल प्रक्रिया के जरिये पूरी होगी और उसकी बारीकियां अभी भी स्पष्ट नहीं हैं लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इसके जरिये मुकेश अंबानी की नेटवर्क18 में कोई 44 फीसदी और टी.वी18 में 28.5 फीसदी हिस्सेदारी होगी और वे इन कंपनियों में अकेले सबसे बड़े हिस्सेदार होंगे. तात्पर्य यह कि वे इन कंपनियों के वास्तविक मालिक होंगे. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;साफ़ है कि मुकेश अंबानी और रिलायंस को अब मीडिया और मनोरंजन उद्योग में व्यवसाय की दृष्टि से भी बेहतर संभावनाएं दिखने लगी हैं और रिलायंस के विस्तार के नए क्षेत्रों में मीडिया व्यवसाय भी एक महत्वपूर्ण क्षेत्र है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पिछले एक-डेढ़ दशक में भारतीय मीडिया और मनोरंजन उद्योग का जिस गति और पैमाने पर विस्तार हुआ है, उसके कारण कई बड़े उद्योग और कारोबारी समूहों की उसमें दिलचस्पी बढ़ी है. पिछले वर्ष की फिक्की-के.पी.एम.जी मीडिया और मनोरंजन उद्योग रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में मीडिया उद्योग 2009 में 587 अरब रूपये का था जो 11 फीसदी की वृद्धि दर के साथ बढ़कर वर्ष 2010 में 652 अरब रूपये का हो गया. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/-SQ4aQllxWZs/Tx5HM2vMr4I/AAAAAAAABiI/na5pqEEsDjg/s1600/imagesCA190EUH.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; cssfloat: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="212" nfa="true" src="http://3.bp.blogspot.com/-SQ4aQllxWZs/Tx5HM2vMr4I/AAAAAAAABiI/na5pqEEsDjg/s320/imagesCA190EUH.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;इस रिपोर्ट का अनुमान है कि पिछले साल कोई 13 फीसदी की बढोत्तरी के साथ इसका आकार बढ़कर 738 अरब रूपये हो जाएगा. यही नहीं, इस रिपोर्ट का यह भी आकलन है कि भारतीय मीडिया और मनोरंजन उद्योग आनेवाले वर्षों में औसतन 14 फीसदी सालाना की वृद्धि दर के साथ वर्ष 2015 में लगभग 1275 अरब रूपये का विशाल उद्योग हो जाएगा. साफ़ है कि मीडिया और मनोरंजन उद्योग का तेजी से विस्तार हो रहा है. इसके साथ ही, इसमें दांव ऊँचे और बड़े होते जा रहे हैं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्वाभाविक तौर पर इसके विस्तार के साथ इसमें बड़ी देशी-विदेशी पूंजी की दिलचस्पी भी बढ़ रही है. इसका सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि आमतौर पर छोटी-मंझोली पूंजी के इस असंगठित उद्योग में पिछले डेढ़-दो दशकों में कई मीडिया कंपनियों ने शेयर बाजार से पूंजी उठाई है और उनमें देशी-विदेशी निवेशकों ने पैसा लगाया है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज ऐसी दर्जनों मीडिया कंपनियां हैं जो शेयर बाजार में लिस्टेड हैं और जिनमें देशी-विदेशी पूंजी लगी हुई है. इनमें से कुछ कम्पनियाँ परंपरागत मीडिया कम्पनियाँ हैं जो पिछले कई दशकों से समाचारपत्र और फिल्म कारोबार में सक्रिय थीं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मौजूदा ट्रेंड को देखते हुए कहा जा सकता है कि आनेवाले वर्षों में देर-सबेर इनमें से अधिकांश शेयर बाजार में आएँगी और लिस्टेड कंपनी होंगी. इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि मीडिया और मनोरंजन उद्योग में जिस तरह से गलाकाट प्रतियोगिता बढ़ रही है और दांव ऊँचे से ऊँचे होते जा रहे हैं, उसमें अधिकांश कंपनियों के लिए बड़ी पूंजी की शरण में जाने के अलावा और कोई विकल्प नहीं बचा है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/-jMMbTGgVeYw/Tx5HYJNcPiI/AAAAAAAABiQ/qfoeEKxvNUs/s1600/images%255B3%255D.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; cssfloat: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="320" nfa="true" src="http://1.bp.blogspot.com/-jMMbTGgVeYw/Tx5HYJNcPiI/AAAAAAAABiQ/qfoeEKxvNUs/s320/images%255B3%255D.jpg" width="254" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;आश्चर्य नहीं कि टी.वी-18 को रिलायंस की शरण में जाना पड़ा है. जाहिर है कि रिलायंस कोई मामूली कंपनी नहीं है. बाजार पूंजीकरण के लिहाज से वह लगभग 257089 करोड़ रूपये की कंपनी है जिसका अर्थ यह हुआ कि उसके आगे अधिकांश मीडिया कम्पनियाँ बहुत बौनी हैं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यहाँ तक कि शेयर बाजार में लिस्टेड सभी मीडिया और मनोरंजन कंपनियों के मौजूदा कुल पूंजीकरण को भी जोड़ दिया जाए तो रिलायंस के पूंजीकरण के आधे से भी कम हैं. यही नहीं, रिलायंस नगद जमा कंपनी के मामले में भी देश की सबसे बड़ी कंपनियों में से एक है जिसके पास 30 सितम्बर’11 को लगभग 14 अरब डालर यानी 70000 करोड़ रूपये का नगद जमा था जिसके इस वित्तीय वर्ष के आखिर तक बढ़कर 25 अरब डालर (125000 करोड़ रूपये) हो जाने का अनुमान है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मजे की बात यह है कि बाजार में इस बाबत कयास लगाये जा रहे हैं कि रिलायंस इतने अधिक नगद जमा का क्या और कैसे इस्तेमाल करेगा? उसपर दबाव है कि वह इस पैसे कोई अधिक से अधिक मुनाफा देनेवाले उद्योगों/कारोबारों में इस्तेमाल करे. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसका अर्थ यह है कि अगर रिलायंस अपने नगद जमा का 10 फीसदी भी मीडिया और मनोरंजन कारोबार में लगाये तो जी नेटवर्क और सन नेटवर्क को छोडकर वह सभी टी.वी कंपनियों को खरीद सकता है. यहाँ यह उल्लेख करना भी जरूरी है कि दुनियाभर में खासकर अमेरिका समेत कई विकसित देशों में सक्रिय बड़ी बहुराष्ट्रीय मीडिया कम्पनियाँ वास्तव में बड़े उद्योग समूहों की उपांग है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उदाहरण के लिए, दुनिया की सबसे बड़ी मीडिया कंपनी जनरल इलेक्ट्रिक (जी.ई) है जिसके मीडिया कारोबार के दर्जनों चैनल और अन्य मीडिया उत्पाद है लेकिन यह उसका मुख्य कारोबार नहीं है. वह अमेरिका की छठी सबसे बड़ी कंपनी है और उसका मुख्य कारोबार उर्जा, टेक्नोलोजी इन्फ्रास्ट्रक्चर, वित्त, उपभोक्ता सामान आदि क्षेत्रों में है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसे कई और उदाहरण हैं. दूसरी ओर, दुनिया की कई ऐसी बड़ी बहुराष्ट्रीय मीडिया कम्पनियाँ हैं जिन्होंने पिछले दो-ढाई दशकों में दर्जनों छोटी और मंझोली मीडिया कंपनियों को अधिग्रहीत या समावेशन (एक्विजेशन और मर्जर) के जरिये गड़प कर लिया है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/-PPUj5oeU0qU/Tx5H1qJS99I/AAAAAAAABiY/bN_Trvq_eAI/s1600/imagesCAZM3O1A.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; cssfloat: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="320" nfa="true" src="http://2.bp.blogspot.com/-PPUj5oeU0qU/Tx5H1qJS99I/AAAAAAAABiY/bN_Trvq_eAI/s320/imagesCAZM3O1A.jpg" width="280" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;असल में, यह पूंजीवाद का सहज चरित्र है जिसमें बड़ी मछली, छोटी मछली को निगल जाती है. इसी तरह बड़ी पूंजी धीरे-धीरे छोटी और मंझोली पूंजी को निगलती और बड़ी होती जाती है. अमेरिका में यह प्रक्रिया 70 के दशक के मध्य में शुरू हुई और 80 और 90 के दशक में आकर पूरी हो गई जहां आज सिर्फ छह बड़ी मीडिया कंपनियों का पूरे अमेरिकी मीडिया और मनोरंजन उद्योग पर एकछत्र राज है जबकि 1983 तक वहां लगभग 50 बड़ी मीडिया कम्पनियाँ थीं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसका अर्थ यह हुआ कि आनेवाले महीनों और वर्षों में छोटी, मंझोली और यहाँ तक कि कुछ बड़ी मीडिया कंपनियों के लिए तीखी प्रतियोगिता में टिके रहना बहुत मुश्किल होता चला जाएगा. खासकर उन मीडिया कंपनियों को बहुत मुश्किल होनेवाली है जो इक्का-दुक्का न्यूज चैनलों या एक अखबार/पत्रिका या रेडियो चैनल पर टिकी कम्पनियाँ हैं और किसी बड़े उद्योग या मीडिया समूह का हिस्सा नहीं हैं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यहाँ यह उल्लेख करना भी जरूरी है कि मीडिया उद्योग में यह प्रक्रिया पिछले कई वर्षों से जारी है लेकिन उसकी गति धीमी थी. उदाहरण के लिए, पिछले कुछ वर्षों में कई क्षेत्रीय मीडिया समूह बड़ी मीडिया कंपनियों से मुकाबले में कमजोर हुए हैं और प्रतिस्पर्द्धा में बाहर होते जा रहे हैं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्पष्ट है कि मीडिया उद्योग में संकेन्द्रण यानी कुछ बड़ी कंपनियों के और बड़ी होने और छोटी-मंझोली कंपनियों के खत्म होने की प्रवृत्ति जोर पकड़ रही है जिसके गहरे राजनीतिक-सामाजिक और आर्थिक निहितार्थ हैं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मीडिया उद्योग में बढ़ते कारपोरेटीकरण के साथ तेज होती संकेन्द्रण की प्रक्रिया का सीधा अर्थ यह है कि पाठकों/दर्शकों को सूचनाओं, विचारों और मनोरंजन के लिए मुट्ठी भर कंपनियों पर निर्भर रहना होगा. यह संभव है कि उनके पास चयन के लिए मात्रात्मक तौर पर कई अखबार/पत्रिकाएं और चैनल उपलब्ध हों लेकिन गुणात्मक तौर पर बहुत कम विकल्प हों. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/-3bgUqug6XfA/Tx5JC9038TI/AAAAAAAABig/uaHOgTzrpyw/s1600/imagesCA201ZWE.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; cssfloat: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="320" nfa="true" src="http://4.bp.blogspot.com/-3bgUqug6XfA/Tx5JC9038TI/AAAAAAAABig/uaHOgTzrpyw/s320/imagesCA201ZWE.jpg" width="241" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;इसकी वजह यह होगी कि उनमें से कई अखबार/चैनल/फिल्म/रेडियो एक ही मीडिया समूह के हों. जाहिर है कि उनका सुर कमोबेश एक सा ही होगा. इस तरह मीडिया उद्योग में विविधता और बहुलता कम होगी जो किसी भी गतिशील लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लोकतंत्र की बुनियाद विचारों की विविधता और बहुलता पर टिकी है और एक सर्व सूचित और सक्रिय नागरिक के लिए जरूरी है कि उसके पास सूचनाओं और विचारों के अधिकतम संभव स्रोत हों. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यही नहीं, यह भी देखा गया है कि प्रतियोगिता में जितने ही कम खिलाड़ी रह जाते हैं, उनमें विचारों और सृजनात्मकता के स्तर पर एक-दूसरे की नक़ल बढ़ती जाती है और जोखिम लेने की प्रवृत्ति कम होती जाती है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यही नहीं, बड़ी कंपनियों के लिए दांव इतने ऊँचे होते हैं कि वे मुनाफे के लिए मीडिया और पत्रकारिता के मूल्यों और उसूलों को तोड़ने में हिचकते नहीं हैं. ऊँचे दांव के कारण बड़ा कारपोरेट मीडिया अकसर सत्ता और दूसरी प्रभावशाली शक्तियों के करीब दिखाई देती हैं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;असल में, मीडिया के कारपोरेटीकरण के साथ यह सबसे बड़ा खतरा होता है कि उन कंपनियों के आर्थिक हित शासक वर्गों के साथ इतनी गहराई से जुड़े होते हैं कि वे आमतौर पर शासक वर्गों की भोपूं और यथास्थितिवाद के सबसे बड़े पैरोकार बन जाते हैं या अपने हितों के अनुकूल बदलाव की लाबीइंग करते हैं. उनमें वैकल्पिक स्वरों के लिए न के बराबर जगह रह जाती है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यही नहीं, वे शासक वर्गों के पक्ष में जनमत बनाने से लेकर अपने राजनीतिक-सामाजिक और आर्थिक एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए अख़बारों/चैनलों का पूरी बेशर्मी से इस्तेमाल करते हैं. इसके अलावा चूँकि बड़ी मीडिया कंपनियों का मुनाफा मुख्य रूप से विज्ञापनों से आता है, इसलिए बड़े विज्ञापनदाता परोक्ष रूप से इन मीडिया कंपनियों के कंटेंट को भी नियंत्रित और प्रभावित करने लगते हैं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/-vq4P-aaDu_w/Tx5JQxHP9nI/AAAAAAAABio/yrjW_LtYmkg/s1600/imagesCA8U07XS.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; cssfloat: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="212" nfa="true" src="http://2.bp.blogspot.com/-vq4P-aaDu_w/Tx5JQxHP9nI/AAAAAAAABio/yrjW_LtYmkg/s320/imagesCA8U07XS.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;आश्चर्य नहीं कि कारपोरेट मीडिया में जहां राजनेताओं/अफसरों के भ्रष्टाचार की खबरें और भंडाफोड दिख जाते हैं लेकिन ऐसी रिपोर्टें अपवाद स्वरुप ही दिखती हैं जिनमें कारपोरेट क्षेत्र के भ्रष्टाचार और अनियमितताओं का पर्दाफाश किया गया हो. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसे में, मीडिया और मनोरंजन उद्योग में बड़ी देशी-विदेशी कारपोरेट पूंजी के निर्बाध प्रवेश और बढ़ते संकेन्द्रण के खतरे और भी स्पष्ट हो गए हैं. इसे अनदेखा करना बहुत बड़ी भूल होगी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;&lt;em&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;('राजस्थान&amp;nbsp;पत्रिका' के २२ जनवरी'१२&amp;nbsp;के अंक में रविवारी संस्करण में प्रकाशित लेख का असंपादित पूर्ण संस्करण...इस मुद्दे पर और विस्तार से पढने के लिए कृपया, 'कथादेश' के फरवरी'१२ अंक में स्तम्भ 'इलेक्टानिक मीडिया' देखें..)&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/em&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8157191427767672214-5650859731071822746?l=teesraraasta.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://teesraraasta.blogspot.com/feeds/5650859731071822746/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8157191427767672214&amp;postID=5650859731071822746' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8157191427767672214/posts/default/5650859731071822746'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8157191427767672214/posts/default/5650859731071822746'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://teesraraasta.blogspot.com/2012/01/18.html' title='लोकतंत्र और मीडिया उद्योग के लिए रिलायंस-टी.वी 18 डील के निहितार्थ'/><author><name>आनंद प्रधान</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05288123571817148120</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_r2d8D7rSfq8/SzcAjql1JOI/AAAAAAAAAGg/C6og8D0qeWE/S220/anand+pradhan+in+class.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/-T0MVAKW5Ngc/Tx5Gik7kmvI/AAAAAAAABh4/FWPvXTaSujI/s72-c/images%255B6%255D.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8157191427767672214.post-4663374539055538542</id><published>2012-01-23T11:12:00.000+05:30</published><updated>2012-01-23T11:38:44.248+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राजनीति'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='भ्रष्टाचार'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव&apos;12'/><title type='text'>एन.आर.एच.एम घोटाले की जड़ में है भ्रष्ट-माफिया तंत्र</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color: blue; font-size: large;"&gt;उत्तर प्रदेश इटली के कुख्यात माफिया तंत्र की राह पर चल पड़ा है &lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/-sTdukiHB_Pw/TxztEetq66I/AAAAAAAABhQ/tN6OB0JOgmY/s1600/images%255B2%255D.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; cssfloat: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="260" nfa="true" src="http://4.bp.blogspot.com/-sTdukiHB_Pw/TxztEetq66I/AAAAAAAABhQ/tN6OB0JOgmY/s320/images%255B2%255D.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;उत्तर प्रदेश में चुनावों के शोर के बीच राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन (एन.आर.एच.एम) के बारे में आई सी.ए.जी की ताजा रिपोर्ट ने भी इसकी पुष्टि कर दी है कि राज्य के ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाने के लिए शुरू की गई यह महत्वाकांक्षी योजना नेताओं-अफसरों-ठेकेदारों-अपराधियों की चौकड़ी की लूट और भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गई है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस रिपोर्ट से यह खुलासा हुआ है कि इस योजना के लिए २००५ से २०११ के बीच छह वर्षों में ८६५७ करोड़ रूपये आवंटित किये गए लेकिन उसमें से कोई ४९३८ करोड़ रूपये यानी ५७ फीसदी राशि का कोई हिसाब-किताब नहीं मिल रहा है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यही नहीं, सी.ए.जी की रिपोर्ट में ब्यौरेवार बताया गया है कि किस तरह इस योजना में तमाम नियमों और निर्देशों को धता बताते हुए लूटपाट की गई. घोटालेबाज इतने बेख़ौफ़ थे कि वे इस योजना के तहत किराये पर ली गई गाड़ियों में स्कूटर, मोपेड, मोटरसाइकिल और ट्रैक्टर के अलावा शाहजहांपुर के जिलाधिकारी की सरकारी कार का नंबर डालने में भी नहीं घबराए. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जाहिर है कि घोटालेबाजों को यह हिम्मत इसलिए हुई क्योंकि उन्हें पता था कि इसमें नीचे से लेकर ऊपर तक सभी की हिस्सेदारी है और उनका बाल भी बांका नहीं होगा. उन्हें यह भी पता था कि जो इस लूट में अडंगा लगाने या सवाल उठाने की कोशिश करेगा, उसे रास्ते से हटाने के लिए यह भ्रष्ट तंत्र किसी हद तक जा सकता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह हुआ भी. एन.आर.एच.एम में लूटपाट में रोड़ा बन रहे दो चीफ मेडिकल आफिसरों की राजधानी लखनऊ में हत्या कर दी गई और उनमें से एक की हत्या के आरोप में जेल में बंद डिप्पटी सी.एम.ओ की जेल में रहस्यमय परिस्थितियों में मौत हो गई. घरवालों का आरोप है कि उनकी भी हत्या की गई. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/-ZDdN_hSvO-g/TxztRGQrz6I/AAAAAAAABhY/BQ45CDoIfnM/s1600/imagesCAYUH3R8.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; cssfloat: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="320" nfa="true" src="http://4.bp.blogspot.com/-ZDdN_hSvO-g/TxztRGQrz6I/AAAAAAAABhY/BQ45CDoIfnM/s320/imagesCAYUH3R8.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;साफ़ है कि उत्तर प्रदेश में लुटेरों ने केवल सार्वजनिक धन की लूट ही नहीं की बल्कि उनके हाथ खून से भी सने हुए हैं. इससे पता चलता है कि यह भ्रष्ट तंत्र किस तरह से एक भ्रष्ट-माफिया तंत्र में बदलता जा रहा है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;असल में, एन.आर.एच.एम घोटाला इस बात का एक और प्रमाण है कि उत्तर प्रदेश में नेता-अफसर-ठेकेदार और माफिया गठजोड़ किस तरह सार्वजनिक धन खासकर विकास के पैसे की लूट पर फल-फूल रहा है. राज्य में सरकार चाहे जिस पार्टी या गठबंधन की हो, इस भ्रष्ट-माफिया तंत्र की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ता है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नतीजा यह कि राज्य में हर विकास योजना और गरीबी उन्मूलन योजना खुले भ्रष्टाचार, अनियमितता और लूटपाट के कारण भ्रष्ट-माफिया तंत्र की भेंट चढ़ जा रही है और सबसे बड़ी बात यह कि हर बड़ी योजना और उसके साथ आ रही विशाल राशि के साथ इस भ्रष्ट-माफिया तंत्र की ताकत मजबूत और जड़ें गहरी होती जा रही हैं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सच पूछिए तो उत्तर प्रदेश में राज्य शासन को इस भ्रष्ट-माफिया तंत्र ने बंधक बना लिया है. राज्य के सभी मुख्य राजनीतिक दल इसके कब्जे में हैं. नौकरशाही- सिविल और पुलिस दोनों ने उसके आगे न सिर्फ घुटने टेक दिए हैं बल्कि इस तंत्र की हिस्सेदार बन गई है. राजनेता, ठेकेदार और अपराधियों में फर्क करना दिन पर दिन मुश्किल होता जा रहा है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हालत यह हो गई है कि उत्तर प्रदेश में सत्ता की दावेदार सभी प्रमुख राजनीतिक पार्टियों में जिला स्तर से लेकर राज्य स्तर पर उनके नेताओं/कार्यकर्ताओं में ठेकेदारों, थाना-ब्लाक-बैंक-कचहरी के दलालों, अपराधियों और लफंगों की भरमार हो गई है जो विकास के धन की लूट पर फल-फूल रही है. इस मायने में उत्तर प्रदेश इटली के कुख्यात माफिया तंत्र में बदलता जा रहा है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/-uETU-AL_1hw/TxztgucCWGI/AAAAAAAABhg/z4Pt79wCuaU/s1600/corrupt+politicians+cartoon.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; cssfloat: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="275" nfa="true" src="http://2.bp.blogspot.com/-uETU-AL_1hw/TxztgucCWGI/AAAAAAAABhg/z4Pt79wCuaU/s320/corrupt+politicians+cartoon.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;यही नहीं, राजनीति के जिस अपराधीकरण की इतनी चर्चा होती है, उसकी जड़ में विकास के पैसों की यही लूट है. यह लूट इतनी संस्थाबद्ध हो चुकी है कि उसे तोड़े बिना राजनीति का अपराधीकरण खत्म नहीं होगा बल्कि बढ़ता ही जाएगा. अगर विकास के इस पैसे की लूट को रोक दिया जाए तो राजनीति का अपराधीकरण कल खत्म हो जाएगा. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नब्बे के दशक में राजनीति के अपराधीकरण पर बनी वोहरा समिति ने भी इस ओर इशारा करते हुए कहा था कि शासन ने राजनेताओं-अफसरों-ठेकेदारों-अपराधियों के गठजोड़ के आगे समर्पण कर दिया है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अफसोस की बात यह है कि नब्बे के दशक की तुलना में स्थितियां बद से बदतर ही हुई हैं. जैसे-जैसे विकास योजनाओं के मद में राशि बढ़ी है, दांव ऊँचे हुए हैं, यह गठजोड़ न सिर्फ और व्यापक और मजबूत हुआ है बल्कि वह शासन का पर्याय बन गया है. दूसरी ओर, इस भ्रष्ट माफिया तंत्र के कारण राज्य की सेहत बिगडती चली जा रही है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उदाहरण के लिए, राज्य में स्वास्थ्य सेवाओं को ही लीजिए जो कोमा में चली गई हैं. सरकारी अस्पतालों और स्वास्थ्य केन्द्रों का बुरा हाल है. वहां न डाक्टर हैं, न चिकित्सा सुविधाएँ और न साजों-सामान और दवाएं. अगर यह हाल न होता तो चाहे शिशु मृत्यु दर हो या मात् मृत्यु दर या कोई और स्वास्थ्य सूचकांक, उत्तर प्रदेश पूरे देश में सबसे निचले पायदान पर नहो होता. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/-X1UXsjwvoUI/Txzwnpdp8-I/AAAAAAAABho/CHrJvxoShmU/s1600/imagesCA3IHUNR.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; cssfloat: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="212" nfa="true" src="http://1.bp.blogspot.com/-X1UXsjwvoUI/Txzwnpdp8-I/AAAAAAAABho/CHrJvxoShmU/s320/imagesCA3IHUNR.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;इसे ही ठीक करने के लिए एन.आर.एच.एम की शुरुआत की गई. इससे अधिक शर्मनाक बात और क्या हो सकती है कि जो राज्य स्वास्थ्य के सभी मानकों पर पूरे देश में आखिरी पायदान पर है, वहां इस योजना के तहत छह वर्षों में आठ हजार करोड़ रूपये से अधिक खर्च करने के बावजूद एक भी नया स्वास्थ्य उपकेन्द्र नहीं बनाया जा सका. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हालत कितनी गंभीर है, इसका अंदाज़ा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि पिछले दो दशकों (१९९०-२०११) में राज्य में सिर्फ ३६८ नए स्वाथ्य उपकेन्द्र बनाए गए. यानी हर साल औसतन १७ नए स्वास्थ्य उपकेन्द्र. जो स्वास्थ्य केन्द्र हैं, वे खुद इतने बीमार हैं और वहां इतनी लूटपाट है कि गरीब भी वहां नहीं जाना चाहते हैं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आश्चर्य नहीं कि सार्वजनिक स्वास्थ्य की इस कब्र पर पूरे राज्य में एक समानांतर निजी अस्पतालों/क्लिनिक्स/नर्सिंग होम्स का जबरदस्त नेटवर्क खड़ा हो गया है. उत्तर प्रदेश के किसी भी शहर या जिला मुख्यालय या बड़े कसबे में चले जाइए, आपको सबसे अधिक फलता-फूलता कारोबार प्राइवेट नर्सिंग होम्स/अस्पतालों का ही है जहां गरीब और आम आदमी जमीन-गहना बेचकर इलाज करने को मजबूर है. मजे की बात यह है कि इन निजी अस्पतालों के साथ भ्रष्ट-माफिया तंत्र के बहुत गहरे रिश्ते हैं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/-EJloOvxCXyI/TxzyaAs3RsI/AAAAAAAABhw/ZxrSemA5XJ8/s1600/images%255B3%255D.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; cssfloat: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="224" nfa="true" src="http://4.bp.blogspot.com/-EJloOvxCXyI/TxzyaAs3RsI/AAAAAAAABhw/ZxrSemA5XJ8/s320/images%255B3%255D.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;लेकिन एन.आर.एच.एम घोटाले में आरोपों-प्रत्यारोपों के बीच यह असली सवाल चर्चाओं से गुम कर दिया गया है कि राज्य में उस भ्रष्ट-माफिया तंत्र की लगातार गहरी होती पकड़ को तोड़े बिना ऐसे घोटालों से मुक्ति संभव नहीं है जिसने सभी राजनीतिक दलों को अपनी चपेट में ले लिया है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;('नया इंडिया' में २३ जनवरी को सम्पादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित आलेख)&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8157191427767672214-4663374539055538542?l=teesraraasta.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://teesraraasta.blogspot.com/feeds/4663374539055538542/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8157191427767672214&amp;postID=4663374539055538542' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8157191427767672214/posts/default/4663374539055538542'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8157191427767672214/posts/default/4663374539055538542'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://teesraraasta.blogspot.com/2012/01/blog-post_23.html' title='एन.आर.एच.एम घोटाले की जड़ में है भ्रष्ट-माफिया तंत्र'/><author><name>आनंद प्रधान</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05288123571817148120</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_r2d8D7rSfq8/SzcAjql1JOI/AAAAAAAAAGg/C6og8D0qeWE/S220/anand+pradhan+in+class.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/-sTdukiHB_Pw/TxztEetq66I/AAAAAAAABhQ/tN6OB0JOgmY/s72-c/images%255B2%255D.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8157191427767672214.post-3766433766961710557</id><published>2012-01-19T16:40:00.000+05:30</published><updated>2012-01-19T16:40:32.341+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मीडिया'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='तमाशा मेरे आगे'/><title type='text'>‘कौन बनेगा मुख्यमंत्री’ उर्फ चैनलों का चुनावी जनतंत्र</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: blue; font-size: large;"&gt;&lt;strong&gt;चैनलों ने चुनावों को तमाशा बना दिया है&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt; &lt;br /&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/-GXGlsMKI5U8/TxcIIz11fdI/AAAAAAAABgo/CJZTmalOQLs/s1600/imagesCAJI4JZD.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; cssfloat: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="211" nfa="true" src="http://1.bp.blogspot.com/-GXGlsMKI5U8/TxcIIz11fdI/AAAAAAAABgo/CJZTmalOQLs/s320/imagesCAJI4JZD.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;उत्तरप्रदेश समेत पांच राज्यों में विधानसभा चुनावों का बिगुल बज चुका है. ये चुनाव राजनीतिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण हैं क्योंकि इनसे न सिर्फ इन राज्यों की बल्कि राष्ट्रीय राजनीति की दिशा भी तय होनी है. यही कारण है कि इन चुनावों को २०१४ के आम चुनावों से पहले का सेमीफाइनल माना जा रहा है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसमें कांग्रेस-भाजपा जैसी बड़ी राष्ट्रीय पार्टियों से लेकर सपा-बसपा-अकाली दल जैसी छोटी पार्टियों और राहुल गाँधी-मायावती-मुलायम सिंह जैसे नेताओं का बहुत कुछ दांव लगा हुआ है. यही नहीं, ये चुनाव अन्ना हजारे के उस भ्रष्टाचार विरोधी और जन-लोकपाल आंदोलन की छाया में हो रहे हैं जिसने देश को झकझोर कर रख दिया. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्वाभाविक तौर पर इन चुनावों की ओर पूरे देश की निगाहें लगी हुई हैं. ऐसे में, न्यूज चैनल कहाँ पीछे रहने वाले हैं? जहां दर्शक, वहां चैनल. आश्चर्य नहीं कि इस चुनावी महा-संग्राम में सत्ता की दावेदार राजनीतिक पार्टियों, उनके स्टार प्रचारकों और उम्मीदवारों के साथ-साथ न्यूज चैनल भी मैदान में कूद पड़े हैं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नतीजा, चैनलों पर लंबे अरसे बाद क्रिकेट, सिनेमा, क्राइम और सेलेब्रिटीज से इतर राजनीतिक खबरों की वापसी हुई है. नियमित और स्पेशल बुलेटिनों के अलावा प्राइम टाइम बहसों में राजनीतिक मुद्दों खासकर चुनावी घमासान को अच्छी-खासी कवरेज मिलने लगी है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/-jQeVkXZyUoM/TxcIXxa4tnI/AAAAAAAABgw/7ptCLwxYZkE/s1600/tv+channels.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; cssfloat: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="188" nfa="true" src="http://1.bp.blogspot.com/-jQeVkXZyUoM/TxcIXxa4tnI/AAAAAAAABgw/7ptCLwxYZkE/s320/tv+channels.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;हालांकि चुनाव पांच राज्यों में हो रहे हैं लेकिन न्यूज चैनलों का सबसे अधिक फोकस उत्तर प्रदेश पर है. उत्तर प्रदेश चुनाव को 24x7 कवरेज देने के लिए एक दर्जन से ज्यादा प्रमुख हिंदी न्यूज चैनलों के अलावा जी न्यूज-यू.पी, ईटीवी-यू.पी, सहारा-यू.पी, महुआ-यू.पी और जनसंदेश जैसे आधा दर्जन से अधिक क्षेत्रीय न्यूज चैनल भी कमर कसकर मैदान में उतर पड़े हैं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चैनलों पर ‘कौन बनेगा मुख्यमंत्री’ जैसे दर्जनों कार्यक्रम शुरू हो गए हैं जिनमें प्रमुख शहरों से विभिन्न पार्टियों के उम्मीदवारों की तू-तू-मैं-मैं से लेकर चुनावी रिपोर्टें और समीकरण समझाए जा रहे हैं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यही नहीं, राहुल गाँधी जैसे स्टार प्रचारकों की चुनावी सभाओं के लाइव कवरेज दिखाए जा रहे हैं. राजनीतिक पार्टियों और उनके बड़े नेताओं की प्रेस कांफ्रेंस दिल्ली और लखनऊ से लाइव हो रही है. इस तरह पार्टियों के बीच श्लील-अश्लील आरोप-प्रत्यारोपों से लेकर नेताओं के दलबदल, टिकट और उम्मीदवारी के लिए मारामारी, बागियों की धमाचौकड़ी तक सब कुछ लाइव है या आगे-पीछे चैनलों पर है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चुनाव आयोग के निर्देश पर चुनावी आचार संहिता को लागू करने के लिए नगद रूपयों से लेकर शराब जब्ती की रिपोर्टों के अलावा नेताओं/प्रत्याशियों के हर उल्टे-सीधे कारनामों पर न्यूज चैनलों के कैमरों की निगाहें लगी हुई हैं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/-1uzGo8_bUGc/TxcJCaV_oPI/AAAAAAAABg4/SEOOhiRGmgk/s1600/imagesCA1BX0SL.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; cssfloat: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="257" nfa="true" src="http://2.bp.blogspot.com/-1uzGo8_bUGc/TxcJCaV_oPI/AAAAAAAABg4/SEOOhiRGmgk/s320/imagesCA1BX0SL.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;इस तरह न्यूज चैनल खासकर क्षेत्रीय चैनल इस हाई वोल्टेज चुनाव के नए अखाड़े बन गए हैं. यह दिखने और दिखाने का दौर है. मान लिया गया है कि जो जितना दिखेगा, वह चुनावों में उतना ही चमकेगा. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक मायने में यह राजनीति और चुनावों के टीवीकरण का दौर हैं. चैनलों से हवा बनाने में मदद मिलती है. जाहिर है कि पार्टियों और नेताओं में न्यूज चैनलों पर अधिक से अधिक एयर टाइम जुगाड़ने की होड़ लगी हुई है. यह भी किसी से छुपा नहीं है कि इन चुनावों में पैसा पानी की तरह बह रहा है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चैनलों के लिए भी चुनाव हर्रे लगे, न फिटकिरी, रंग चोखा के तर्ज पर अच्छी कमाई का मौका हो गए हैं. आश्चर्य नहीं कि मंदी की मार से दबे न्यूज चैनलों के लिए चुनाव संजीवनी की तरह हो गए हैं. जब हजारों करोड़ रूपये दांव पर लगे हों तो न्यूज चैनल भी अपनी झोली भरने में पीछे नहीं रहना चाहते हैं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चुनावी विज्ञापनों से कमाई के अलावा चैनलों खासकर क्षेत्रीय चैनलों पर दबे-छुपे ‘पेड न्यूज’ भी चल रहा है. हालांकि इसे साबित करना मुश्किल है लेकिन अगर इन चैनलों पर चलनेवाली बहुतेरी चुनावी खबरों और चुनावी सभाओं-रैलियों की लाइव कवरेज को गौर से देखिए तो उसमें एक पैटर्न और झुकाव साफ़ दिखाई देता है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/-C5aA-fNgxfk/TxcJMiYNV_I/AAAAAAAABhA/Dd6ngCOLK5A/s1600/images%255B4%255D.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; cssfloat: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="192" nfa="true" src="http://3.bp.blogspot.com/-C5aA-fNgxfk/TxcJMiYNV_I/AAAAAAAABhA/Dd6ngCOLK5A/s320/images%255B4%255D.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;लेकिन लाख टके का सवाल यह है कि इस कवरेज से दर्शकों को क्या मिल रहा है? लोकतंत्र कितना समृद्ध हो रहा है? इक्का-दुक्का अपवादों को छोडकर इस सवाल का जवाब निराश करनेवाला है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चैनलों की चुनावी कवरेज में दर्शकों उर्फ वोटरों को सूचनाएं कम और प्रचार अधिक, चुनाव की बारीकियां कम और शोर-शराबा अधिक, मुद्दों की स्पष्टता कम और भ्रम अधिक, विचार कम और पूर्वाग्रह अधिक, जमीनी हकीकत कम और राजनीतिक चंडूखाने की गप्पें अधिक छाई हुई हैं. रिपोर्टर ठोस सूचनाएं और जानकारियां कम और विचार ज्यादा उगलते दिखते हैं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यही नहीं, चैनलों पर होनेवाली प्राइम टाइम बहसों में पार्टियों और उनके नेताओं की तू-तू, मैं-मैं और हंगामे के बीच असली मुद्दे गुम से हो जाते हैं. बहस का मतलब वाकयुद्ध और भाषाई कुश्ती हो गई है. इससे थोड़ी देर के लिए चैनलों के परदे पर खासी उत्तेजना और सनसनी भले पैदा हो जाए.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन इसका सबसे बड़ा नुकसान यह होता है कि पार्टियों, उनके नेताओं और उम्मीदवारों की जवाबदेही नहीं तय हो पाती है. पिछले पांच सालों तक सरकार और विपक्ष में उनके प्रदर्शन का हिसाब-किताब नहीं हो पाता है. वे उन असुविधाजनक और तीखे सवालों का जवाब देने से बच निकलते हैं जो चुनावों के मौके पर उनसे जरूर पूछी जानी चाहिए. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/-9yD2Tt6EWtI/TxcJn8-7YYI/AAAAAAAABhI/3cdSInR5Rvs/s1600/imagesCA0PSG7U.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; cssfloat: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="214" nfa="true" src="http://2.bp.blogspot.com/-9yD2Tt6EWtI/TxcJn8-7YYI/AAAAAAAABhI/3cdSInR5Rvs/s320/imagesCA0PSG7U.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;लेकिन ज्यादातर यह दिखाई पड़ता है कि चैनलों के एंकर और उनके रिपोर्टर बिना किसी तैयारी, शोध और गहरी छानबीन के नेताओं और उम्मीदवारों से ऐसे सवाल पूछते हैं जो पी.आर पत्रकारिता की हद में आते हैं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कहना मुश्किल है कि ऐसा नासमझी में होता है या किसी समझदारी के साथ. इसके अलावा चैनलों के चुनावी जनतंत्र में व्यक्तियों (नेताओं/उम्मीदवारों) पर इतना अधिक फोकस होता है कि असली मुद्दे और सवाल नेपथ्य में चले जाते हैं. जमीनी हलचलें और बदलाव निगाहों से ओझल हो जाती हैं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;पार्टियां और उनके नेता यही चाहते हैं. चैनल भी जाने-अनजाने उनके इस खेल में हिस्सेदार बन जाते हैं और चुनावों को तमाशा बना डालते हैं. बताने की जरूरत नहीं है कि इस तमाशे में बेवकूफ कौन बनता है? &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;('तहलका' के ३० जनवरी के अंक में प्रकाशित स्तम्भ. आप चाहें तो इस लेख पर अपनी टिपण्णी यहाँ भी दे सकते हैं:http://www.tehelkahindi.com/stambh/diggajdeergha/forum/1081.html#en )&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8157191427767672214-3766433766961710557?l=teesraraasta.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://teesraraasta.blogspot.com/feeds/3766433766961710557/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8157191427767672214&amp;postID=3766433766961710557' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8157191427767672214/posts/default/3766433766961710557'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8157191427767672214/posts/default/3766433766961710557'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://teesraraasta.blogspot.com/2012/01/blog-post_19.html' title='‘कौन बनेगा मुख्यमंत्री’ उर्फ चैनलों का चुनावी जनतंत्र'/><author><name>आनंद प्रधान</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05288123571817148120</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_r2d8D7rSfq8/SzcAjql1JOI/AAAAAAAAAGg/C6og8D0qeWE/S220/anand+pradhan+in+class.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/-GXGlsMKI5U8/TxcIIz11fdI/AAAAAAAABgo/CJZTmalOQLs/s72-c/imagesCAJI4JZD.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8157191427767672214.post-4271503259827907185</id><published>2012-01-18T11:42:00.000+05:30</published><updated>2012-01-18T11:42:53.258+05:30</updated><title type='text'>न्यू मीडिया के खिलाफ क्यों हैं सरकारें?</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color: blue; font-size: large;"&gt;वैकल्पिक मीडिया की जरूरत पहले से भी ज्यादा बढ़ गई है &lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color: #274e13;"&gt;दूसरी और आखिरी किस्त &lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/-oIMydUFgsgA/TxRErzQ31vI/AAAAAAAABgI/_CpSs_sdEzQ/s1600/Assange+2.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; cssfloat: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="192" kba="true" src="http://4.bp.blogspot.com/-oIMydUFgsgA/TxRErzQ31vI/AAAAAAAABgI/_CpSs_sdEzQ/s320/Assange+2.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;दुनिया की सबसे ताकतवर सरकारों ने जिस तरह से विकीलिक्स और उसके मुखिया जूलियन असांज को बर्बाद करने में कोई कोर कसर नहीं उठा रखी है, वह इसका प्रमाण है कि नए माध्यमों को काबू में करने के लिए खुद को लोकतंत्र का सबसे बड़ा पहरुआ बतानेवाली सरकारें कहाँ तक जा सकती हैं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यही नहीं, विकीलिक्स की मदद से यह भी खुलासा हुआ है कि दुनिया भर में सरकारें कितने बड़े पैमाने पर आम नागरिकों की जासूसी कर रही हैं. भारत भी इसका अपवाद नहीं है. नए माध्यमों खासकर सोशल नेटवर्किंग साइट्स को सेंसर करने और उन्हें ‘साफ़-सुथरा’ बनाने (सैनिटाइज) को लेकर संचार मंत्री कपिल सिब्बल के बयान को इसी सिलसिले में देखा जाना चाहिए.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन सिब्बल के बयानों और कोशिशों का जिस तरह से विरोध हुआ है, उससे यह उम्मीद बंधी है कि कारपोरेट मीडिया से निराश और नए माध्यमों पर मौजूद आज़ादी का लुत्फ़ उठा रहे लोग इतनी आसानी से हथियार नहीं डालने वाले हैं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अलबत्ता नए माध्यमों को सरकार और प्रभावशाली हित समूहों के बाद जिससे सबसे अधिक खतरा है, वह और कोई नहीं बल्कि उनके प्रोमोटर्स हैं जिनके बड़ी पूंजी से बहुत गहरे रिश्ते हैं. इस बारे में किसी भ्रम में नहीं रहना चाहिए. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सच यह है कि गूगल से लेकर फेसबुक तक और ट्विटर से लेकर यू-ट्यूब तक में अरबों डालर की पूंजी लगी हुई है और उनके दांव बहुत ऊँचे हैं. वे भी एक सीमा से अधिक जोखिम नहीं उठा सकते हैं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/-bl9v-idOPa0/TxRE-4vPgWI/AAAAAAAABgQ/SshXhK3BLBI/s1600/News+and+nation.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; cssfloat: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="320" kba="true" src="http://3.bp.blogspot.com/-bl9v-idOPa0/TxRE-4vPgWI/AAAAAAAABgQ/SshXhK3BLBI/s320/News+and+nation.jpg" width="294" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;हैरानी की बात नहीं है कि गूगल ने विभिन्न देशों की सरकारों से मिले अनुरोधों/निर्देशों के आधार पर ऐसा बहुत सारा कंटेंट हटाया है जिसमें राजनीतिक या राजनेताओं की आलोचना थी. लेकिन इसके बावजूद नए साल में गहराते आर्थिक-राजनीतिक संकट और उथल-पुथल के बीच नए माध्यमों खासकर सोशल नेटवर्किंग साइट्स, विकीलिक्स जैसे साइट्स के अलावा वैकल्पिक राजनीति और विचारों को आगे बढ़ाने वाले रैडिकल समूहों और राजनीतिक संगठनों/दलों की वेब साइट्स की प्रासंगिकता बनी रहेगी. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वे लोगों में सूचना-विचार और संवाद की साझेदारी को बढ़ाने, उन्हें गोलबंद करने और सामूहिक कार्रवाइयों में उतारने में उल्लेखनीय भूमिका निभाते रहेंगे. लेकिन इसके साथ ही, सरकारों द्वारा उनकी सख्त निगरानी और उनके उपयोगकर्ताओं को व्यक्तिगत तौर पर दण्डित करने के मामले भी बढ़ेंगे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;---------xxxxxx-------&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बीते वर्ष में भारत में भी भ्रष्टाचार विरोधी प्रदर्शनों और जन लोकपाल के समर्थन में अन्ना हजारे के भूख हडतालों में लोगों खासकर शहरी मध्य वर्ग की अच्छी खासी भागीदारी दिखी. भारतीय न्यूज खासकर इलेक्ट्रानिक मीडिया ने इस मौके को पेड न्यूज और नीरा राडिया प्रकरणों से अपनी साख पर लगे धक्के और अपने दाग-धब्बों को धोने के लिए किया. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कारपोरेट मीडिया खासकर न्यूज चैनलों ने अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम को जिस तरह से गोद ले लिया और उस आंदोलन की गंगा में डुबकी लगाने लगे, उससे एकबारगी उनके खुद के पापों की चर्चा थम सी गई और वे ‘राजनीतिक रूप से सही जगह’ (पोलिटिकली करेक्ट) खड़े दिखाई पड़ने लगे. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन सच्चाई बहुत दिनों तक छिप नहीं सकी और जैसे-जैसे आंदोलन का ज्वार उतरने लगा, न्यूज चैनलों की असलियत भी सामने आने लगी. कारपोरेट भ्रष्टाचार के बारे में उनकी चुप्पी बोलने लगी. नतीजा, साल के उत्तरार्ध में प्रेस काउन्सिल के नए अध्यक्ष जस्टिस मार्कंडेय काटजू ने जिस तरह से न्यूज चैनलों के खिलाफ मोर्चा खोला और उसे लोगों का समर्थन भी मिला, उससे चैनलों के रेगुलेशन का सवाल फिर से सुर्ख़ियों में आ गया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/-eT45mqlZVGA/TxRFQ8pWB8I/AAAAAAAABgY/D0QGNHMah04/s1600/Journalistic+ethics.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; cssfloat: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="320" kba="true" src="http://3.bp.blogspot.com/-eT45mqlZVGA/TxRFQ8pWB8I/AAAAAAAABgY/D0QGNHMah04/s320/Journalistic+ethics.jpg" width="234" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;न्यूज चैनलों की एसोशियेशन- एन.बी.ए और ब्राडकास्ट एडीटर्स एसोशियेशन- बी.ई.ए सक्रिय हो गए और एक बार फिर से स्व-नियमन का राग अलापा जाने लगा. जस्टिस काटजू की झिडकी के बाद चैनलों ने सामूहिक रूप से तय किया कि वे एश्वर्य राय के बच्ची के जन्म की ‘खबर’ को संयत तरीके से कवर करेंगे. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मजे की बात यह है कि उन्होंने यह कर दिखाया. लेकिन कहते हैं कि हाथी के दांत खाने के और, दिखाने के और. एश्वर्य राय के मामले में सामूहिक कसम खाकर आत्म-नियमन का उदाहरण पेश कर चुके चैनल जल्दी ही अपने फार्म में आ गए. हैरानी की बात नहीं है कि साल के आखिरी दिनों में चैनल अचानक ‘गायब’ हो गईं पाकिस्तानी राखी सावंत कही जानेवाली टी.वी कलाकार वीना मलिक को खोजते नजर आए. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वीना मलिक के लिए चैनलों की चिंता और बेचैनी देखने लायक थी. लेकिन यह कोई अकेला उदाहरण नहीं है और न ही कोई अपवाद है. अलबत्ता इससे तो यही लगता है कि एश्वर्य राय की बच्ची के मामले में चैनलों का संयम और धैर्य अपवाद था. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नियम अब भी सिनेमा, क्रिकेट, क्राइम, सेलिब्रिटीज ही हैं. वे ही अधिकांश चैनलों का न्यूज एजेंडा तय कर रहे हैं. साफ़ है कि आत्म-नियमन और बाजार में हमेशा बाजार ही हावी रहेगा. बाजार यानी टी.आर.पी की चौखट पर आत्म-नियमन की कुर्बानी चढ़ती रहेगी. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मजे की बात यह है कि इस साल न्यूज चैनलों में गुमशुदा ‘खबरों की वापसी’ की अफवाहें भी बहुत सुनाई पड़ती रहीं. लेकिन साल के गुजरते-गुजरते यह कहना मुश्किल है कि चैनलों पर खबरें कितनी लौटी हैं? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/-PKvQujiNcK8/TxRFdWHq6zI/AAAAAAAABgg/Wpa7cLIbyTQ/s1600/news+channels+ob.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; cssfloat: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="239" kba="true" src="http://2.bp.blogspot.com/-PKvQujiNcK8/TxRFdWHq6zI/AAAAAAAABgg/Wpa7cLIbyTQ/s320/news+channels+ob.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;अलबत्ता खबरों के नाम पर इस साल हिंदी न्यूज चैनलों पर जिस तरह से स्पीड न्यूज, बुलेट न्यूज, न्यूज २०-२० और उनके दर्जनों क्लोन छा गए, उसे देखते हुए ‘खबरों की वापसी’ की रही-सही उम्मीद भी जाती रही. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;समाप्त &lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;('कथादेश' के जनवरी'१२ के अंक में प्रकाशित स्तम्भ)&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8157191427767672214-4271503259827907185?l=teesraraasta.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://teesraraasta.blogspot.com/feeds/4271503259827907185/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8157191427767672214&amp;postID=4271503259827907185' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8157191427767672214/posts/default/4271503259827907185'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8157191427767672214/posts/default/4271503259827907185'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://teesraraasta.blogspot.com/2012/01/blog-post_18.html' title='न्यू मीडिया के खिलाफ क्यों हैं सरकारें?'/><author><name>आनंद प्रधान</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05288123571817148120</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_r2d8D7rSfq8/SzcAjql1JOI/AAAAAAAAAGg/C6og8D0qeWE/S220/anand+pradhan+in+class.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/-oIMydUFgsgA/TxRErzQ31vI/AAAAAAAABgI/_CpSs_sdEzQ/s72-c/Assange+2.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8157191427767672214.post-5526275086652289676</id><published>2012-01-17T11:44:00.001+05:30</published><updated>2012-01-17T11:44:24.836+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मीडिया'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कथादेश:इलेक्ट्रानिक मीडिया'/><title type='text'>विरोध का जनतंत्र बनाम कारपोरेट मीडिया प्रबंधित जनतंत्र</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color: blue; font-size: large;"&gt;कार्पोरेट मीडिया की विश्वसनीयता दिन पर दिन रसातल में जा रही है&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;&lt;strong&gt;पहली किस्त &amp;nbsp;&lt;/strong&gt;&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/-r9tEtFfkMKM/TxRAZAZ5w9I/AAAAAAAABfg/nOzhBTnPvR0/s1600/protest+in+egypt.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; cssfloat: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="320" kba="true" src="http://1.bp.blogspot.com/-r9tEtFfkMKM/TxRAZAZ5w9I/AAAAAAAABfg/nOzhBTnPvR0/s320/protest+in+egypt.jpg" width="269" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;देश-दुनिया में राजनीतिक झंझावातों और छोटे-बड़े राजनीतिक परिवर्तनों, सामाजिक-आर्थिक उथल-पुथल और प्राकृतिक-मानव निर्मित त्रासदियों के बीच एक और साल गुजर गया. कई मामलों में काफी हद तक गुजरे सालों से मिलता-जुलता होने के बावजूद कई मामलों में यह साल बहुत खास रहा. देश के लिए भी और दुनिया के लिए भी. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;निश्चय ही, इस साल को पारिभाषित करने वाली सबसे महत्वपूर्ण परिघटना दुनिया भर में कारपोरेट लूट, भ्रष्टाचार, बढ़ती सामाजिक-आर्थिक गैर बराबरी-विषमता और तानाशाही के खिलाफ और सच्चे जनतंत्र के लिए भड़के आन्दोलनों, विरोध प्रदर्शनों और कब्ज़ा-घेराव-धरना-हड़ताल में आम लोगों खासकर मध्य वर्ग की बड़े पैमाने पर हिस्सेदारी थी. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आश्चर्य नहीं कि मशहूर समाचार पत्रिका “टाइम” ने वर्ष २०११ के ‘पर्सन आफ द इयर’ के बतौर उन ‘प्रदर्शनकारियों’ को चुना है जिन्होंने अरब जगत में ट्यूनीशिया से लेकर मिस्र में दमनकारी तानाशाहियों, यूरोप में बड़ी पूंजी को खुश करने के लिए सामाजिक सुरक्षा में कटौतियों और अमेरिका में कारपोरेट और आवारा पूंजी के लालच और हवस के खिलाफ ‘वाल स्ट्रीट कब्ज़ा करो’ (आक्युपाई वाल स्ट्रीट) से लेकर भारत में कारपोरेट और राजनीतिक भ्रष्टाचार के खिलाफ लोकपाल के लिए शुरू हुए आन्दोलनों की अगुवाई की है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन आम प्रदर्शनकारियों ने इस साल को बहुत खास बना दिया. इसमें कोई दो राय नहीं है कि ये आंदोलन, विरोध प्रदर्शन और प्रदर्शनकारी कई मायनों में पहले के आन्दोलनों, विरोधों और प्रदर्शनकारियों से अलग थे. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उनकी सक्रियता, भागीदारी, गोलबंदी से लेकर विरोध प्रदर्शनों के तरीकों और सबसे बढ़कर उनके द्वारा उठाए गए मुद्दों ने न सिर्फ देश-दुनिया का ध्यान खींचा बल्कि उसके राजनीतिक-आर्थिक-सामाजिक एजेंडे पर कई नए सवालों और मुद्दों को खड़ा कर दिया है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/-SJiIjYEit1I/TxRAjWJKK9I/AAAAAAAABfo/c3utO39NUls/s1600/protest+march.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; cssfloat: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="240" kba="true" src="http://2.bp.blogspot.com/-SJiIjYEit1I/TxRAjWJKK9I/AAAAAAAABfo/c3utO39NUls/s320/protest+march.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इन आन्दोलनों ने एक बार फिर बहुत मजबूती से यह साबित करने की कोशिश की है कि लोकतंत्र को लोकतंत्र बनाने में लोगों की सक्रिय भागीदारी, गोलबंदी, उनके आन्दोलनों और विरोध प्रदर्शनों की बहुत बड़ी भूमिका है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सच पूछिए तो लोकतंत्र की आत्मा है स्थापित-यथास्थितिवादी सत्ताओं और शासक वर्गों और उनके एजेंडे के खिलाफ असहमति के स्वर, विरोध प्रदर्शन और उन्हें चुनौती देनेवाले बदलाव के आंदोलन. इस मायने में बीते साल दुनिया भर में कारपोरेट भूमंडलीकरण, नव उदारवादी अर्थनीतियों, आवारा पूंजी की मनमानी और तानाशाही के बीच निरंतर सिकुड़ते और दमनकारी होते पूंजीवादी लोकतंत्रों में असहमति की तेज होती आवाजों और विरोध प्रदर्शनों की नई लहरों ने लोकतंत्र की आत्मा को पुनरुज्जीवित करने की कोशिश की है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यही नहीं, इन आन्दोलनों ने राजनीति के नए मुहावरे गढे हैं, उनके मुद्दों-नारों ने समतामूलक, न्यायपूर्ण और सच्चे लोकतंत्र की लड़ाइयों को नया आवेग दिया है और लोगों खासकर मध्यवर्ग को घरों से बाहर सड़कों पर उतरने के लिए प्रेरित किया है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन इन विरोध प्रदर्शनों और आन्दोलनों के बीच मुख्यधारा का मीडिया खासकर इलेक्ट्रानिक मीडिया कहाँ खड़ा है? यह ऐसा सवाल है जो कारपोरेट मीडिया को खुद से जरूर पूछना चाहिए. यह सवाल इसलिए भी जरूरी है क्योंकि जो कारपोरेट मीडिया खुद को ‘जन माध्यम’ (मास मीडिया) कहता है, उसका ‘जन यथार्थ’ (मास रीयलिटी) से कितना सम्बन्ध रह गया है? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कहने की जरूरत नहीं है कि दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में तानाशाही और नव उदारवादी अर्थनीति के खिलाफ फूट पड़े इन विरोध प्रदर्शनों और आन्दोलनों के प्रति कारपोरेट मीडिया का शुरूआती रुख उपेक्षा और सिरे से ख़ारिज करने का था. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन जब नजरंदाज करना मुश्किल होने लगा तो उसके प्रति एक शक-संदेह और हैरानी से भरा भाव सामने आया और उसकी खिल्ली उड़ाने की कोशिश की गई. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/-ZAE2SY5bv3w/TxRA7ro9BiI/AAAAAAAABfw/Sxfvx-tDuv0/s1600/media+monopoly.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; cssfloat: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="170" kba="true" src="http://1.bp.blogspot.com/-ZAE2SY5bv3w/TxRA7ro9BiI/AAAAAAAABfw/Sxfvx-tDuv0/s320/media+monopoly.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;लेकिन जब विरोध प्रदर्शनों और आन्दोलनों का दायरा बढ़ने और उनकी आवाज़ और तेज होने लगी तो कारपोरेट मीडिया ने अपना ट्रैक बदलकर एक ओर उन्हें यूटोपियन, आदर्शवादी, अव्यवहारिक और अराजक बताना शुरू कर दिया, वहीँ दूसरी ओर, उसे हड़पने में भी जुट गया. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यही कारण है कि जो विरोध प्रदर्शन उसके अपने निहित स्वार्थों और हितों के अनुकूल थे, उन्हें उसने बढ़-चढ़कर समर्थन दिया, यहाँ तक कि इन प्रदर्शनों को गोद ले लिया लेकिन जहां भी ये विरोध प्रदर्शन और आंदोलन सीधे उनके कारपोरेट हितों पर चोट कर रहे थे, उन्हें यूटोपियन से लेकर खलनायक बनाने में कोई कोर कसर नहीं उठा रखी. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उदाहरण के लिए पश्चिमी कारपोरेट मीडिया ने जिस तरह से अरब वसंत से लेकर रूस में पुतिन विरोधी प्रदर्शनों तक को हाथों-हाथ लिया, उसी तरह का उत्साह आक्युपाई वाल स्ट्रीट और ग्रीस से लेकर इटली में बजट और सामाजिक सुरक्षा में कटौतियों के खिलाफ भड़के विरोध प्रदर्शनों के प्रति नहीं दिखाई पड़ा. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैश्विक कारपोरेट मीडिया में अरब वसंत खासकर सीरिया और लीबिया में हुए विरोध प्रदर्शनों के प्रति न सिर्फ अतिरिक्त उत्साह दिखाई पड़ा बल्कि उन्होंने असद और गद्दाफी सरकार के खिलाफ एक तरह का मोर्चा खोल दिया. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पश्चिमी मीडिया का यह पूर्वाग्रह खुलकर दिखाई पड़ा. उन्होंने सीरिया, ईरान और लीबिया में मानवीय आधार और परमाणु हथियारों के खतरे के मद्देनजर नाटो/अमेरिकी सैन्य कार्रवाई के लिए जनमत बनाने की पूरी कोशिश की. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/-o268ZAd6x7U/TxRBRqcHu7I/AAAAAAAABf4/ALq_dXsFK8U/s1600/G-8+and+Gaddafi.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; cssfloat: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="169" kba="true" src="http://2.bp.blogspot.com/-o268ZAd6x7U/TxRBRqcHu7I/AAAAAAAABf4/ALq_dXsFK8U/s320/G-8+and+Gaddafi.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;हैरानी की बात नहीं है कि लीबिया में गद्दाफी को एक क्रूर तानाशाह के बतौर पेश करते हुए पश्चिमी मीडिया ने नाटो की सैन्य कार्रवाई को खुलकर समर्थन दिया. हालांकि इसमें कुछ भी नया नहीं है. यह पश्चिमी वैश्विक कारपोरेट मीडिया की पुरानी रणनीति है. इस मायने में वह काफी हद तक अमेरिकी विदेश विभाग और नाटो के प्रवक्ता की तरह काम करता है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सच यह है कि वह ऐसी सैन्य कार्रवाइयों के लिए जनमत बनाने के जरिये जमीन तैयार करता है. लीबिया में गद्दाफी शासन के अंत के बाद इस वैश्विक कारपोरेट मीडिया के निशाने पर सीरिया, ईरान और उत्तर कोरिया हैं जिनके खलनायकीकरण का अभियान जोर-शोर से जारी है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आश्चर्य नहीं होगा अगर वर्ष २०१२ में वैश्विक कारपोरेट मीडिया की मदद से अमेरिका/नाटो इन्हें सैन्य निशाना भी बनाएं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन इसके ठीक उलट इन बहुराष्ट्रीय वैश्विक मीडिया कंपनियों ने यूरोप और अमेरिका में कारपोरेट पूंजीवाद और नव उदारवादी अर्थनीतियों के खिलाफ भड़के लोगों के गुस्से, विरोध प्रदर्शनों और आन्दोलनों को उस तरह का सहानुभूतिपूर्ण कवरेज तो दूर उन्हें तथ्यपूर्ण, वस्तुनिष्ठ और निष्पक्ष कवरेज भी नहीं दिया. यह स्वाभाविक भी था. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;असल में, इन विरोध प्रदर्शनों और आन्दोलनों खासकर आक्युपाई वाल स्ट्रीट प्रदर्शनों में सिर्फ बड़े कारपोरेट समूह, सत्ता प्रतिष्ठान और राजनीतिक वर्ग ही निशाने पर नहीं थे बल्कि खुद कारपोरेट मीडिया और उसका झूठ भी निशाने पर थे. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सच पूछिए तो इस आंदोलन ने जिस तरह से मुख्यधारा के कारपोरेट मीडिया को नकार दिया और नए और वैकल्पिक मीडिया के जरिये लोगों के बीच सूचना-संवाद-बहस और गोलबंदी शुरू की है, वह भविष्य की ओर संकेत करता है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/-ENocBacwFko/TxRBkp42b2I/AAAAAAAABgA/XXORw065gms/s1600/Don%2527t+trust+corporate+media.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; cssfloat: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="320" kba="true" src="http://3.bp.blogspot.com/-ENocBacwFko/TxRBkp42b2I/AAAAAAAABgA/XXORw065gms/s320/Don%2527t+trust+corporate+media.jpg" width="261" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;यह कारपोरेट मीडिया के लिए खतरे की घंटी है. उसकी विश्वसनीयता दिन पर दिन नीचे की ओर जा रही है. बीते साल में भी कई ऐसी घटनाएँ हुईं जिनसे वैश्विक कारपोरेट मीडिया की विश्वसनीयता और साख को और गहरा धक्का लगा है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खासकर ब्रिटेन में जिस तरह से मीडिया मुग़ल रूपर्ट मर्डोक और उनकी कंपनी न्यूज इंटरनेशनल की गैरकानूनी और अनैतिक गतिविधियां सामने आईं हैं और उसके खिलाफ लोगों का गुस्सा फूटा है, वह इस बात का सबूत है कि बड़े वैश्विक मीडिया समूहों के लिए आगे का रास्ता इतना आसान नहीं होगा. उनकी सार्वजनिक जांच पड़ताल बढ़ेगी और उनसे अब कहीं ज्यादा जवाबदेह होने की मांग की जायेगी. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यही नहीं, उनके लिए शासक वर्गों के हित में सूचनाओं और विमर्शों का प्रबंधन करना भी उतना आसान नहीं रह गया है. इस मायने में बीता साल पारंपरिक कारपोरेट मीडिया का नहीं बल्कि नए माध्यमों खासकर विकीलिक्स जैसे मंचों और सोशल नेटवर्किंग साइट्स का था. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रैडिकल समूहों ने लोगों को जागरूक बनाने से लेकर उन्हें गोलबंद करने और सामूहिक कार्रवाइयों में उतारने में इन नए माध्यमों का जिस तरह से खुलकर उपयोग किया है, उसने कारपोरेट मीडिया के साथ-साथ सत्ता प्रतिष्ठानों और शासक वर्गों को भी सतर्क कर दिया है. आश्चर्य नहीं कि इस साल सरकारों के निशाने पर ये नए माध्यम भी आ गए हैं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जारी...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;('कथादेश' के जनवरी'१२ के अंक में प्रकाशित स्तम्भ की पहली किस्त)&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8157191427767672214-5526275086652289676?l=teesraraasta.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://teesraraasta.blogspot.com/feeds/5526275086652289676/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8157191427767672214&amp;postID=5526275086652289676' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8157191427767672214/posts/default/5526275086652289676'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8157191427767672214/posts/default/5526275086652289676'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://teesraraasta.blogspot.com/2012/01/blog-post_17.html' title='विरोध का जनतंत्र बनाम कारपोरेट मीडिया प्रबंधित जनतंत्र'/><author><name>आनंद प्रधान</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05288123571817148120</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_r2d8D7rSfq8/SzcAjql1JOI/AAAAAAAAAGg/C6og8D0qeWE/S220/anand+pradhan+in+class.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/-r9tEtFfkMKM/TxRAZAZ5w9I/AAAAAAAABfg/nOzhBTnPvR0/s72-c/protest+in+egypt.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8157191427767672214.post-3625937024203414883</id><published>2012-01-16T10:18:00.000+05:30</published><updated>2012-01-16T10:18:39.636+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='भारतीय अर्थव्यवस्था'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अर्थव्यवस्था'/><title type='text'>अर्थव्यवस्था के साथ नीमहकीमी</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;span style="color: blue; font-size: large;"&gt;&lt;strong&gt;सरकार का कन्फ्यूजन अर्थव्यवस्था के लिए भारी&amp;nbsp;पड़ रहा है&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/-wc-0mRC4dws/TxOq3Y1i4XI/AAAAAAAABfA/I3wGWb-GbIY/s1600/Manmohan+Singh.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; cssfloat: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="320" kba="true" src="http://2.bp.blogspot.com/-wc-0mRC4dws/TxOq3Y1i4XI/AAAAAAAABfA/I3wGWb-GbIY/s320/Manmohan+Singh.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;अर्थव्यवस्था को लेकर यू.पी.ए सरकार की नीमहकीमी जारी है. सरकार को न तो अर्थव्यवस्था के असली मर्ज और मुश्किलों का सटीक अंदाज़ा है और न ही उसके इलाज को लेकर स्पष्टता है. मनमोहन सिंह सरकार अर्थव्यवस्था को लेकर कितनी ‘कन्फ्यूज्ड’ है, इसका अंदाज़ा सरकार के अंदर से आ रहे परस्पर अंतर्विरोधी बयानों और फैसलों में देखा जा सकता है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खुद प्रधानमंत्री का मानना है कि भारतीय अर्थव्यवस्था कठिन दौर से गुजर रही है और चालू वित्तीय वर्ष में जी.डी.पी की वृद्धि दर ७ फीसदी ही रह पाएगी. हालांकि इसके ठीक एक दिन पहले वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने इस साल जी.डी.पी के ७.३० प्रतिशत रहने का अनुमान जताया था. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन असल बात यह है कि पिछले साल जी.डी.पी की वृद्धि दर ८.५ फीसदी थी और वित्त मंत्री ने बजट भाषण में चालू वित्तीय वर्ष में जी.डी.पी के ९ फीसदी रहने का अनुमान जाहिर किया था. साफ़ है कि अर्थव्यवस्था लड़खड़ा रही है और ऐसे संकेत हैं कि वह पटरी से उतर भी सकती है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खासकर जब औद्योगिक उत्पादन की दर अक्टूबर महीने में गिरकर नकारात्मक -४.७ प्रतिशत हो गई थी. सरकार के अंदर और बाहर निराशा और घबराहट का माहौल बन गया. लेकिन जैसे ही पिछले सप्ताह नवंबर महीने के औद्योगिक उत्पादन के सकारात्मक आंकड़े आए और उत्पादन दर बढ़कर ५.९ प्रतिशत हो गया और पिछले तीन सप्ताहों से खाद्य मुद्रास्फीति दर के आंकड़े नकारात्मक आए, सरकार के आर्थिक मैनेजर अपने पुराने फार्म में वापस लौट आए. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कहा जाने लगा कि अर्थव्यवस्था की सेहत ठीक है और वैश्विक कारणों से धीमी पड़ी उसकी रफ़्तार जल्दी ही फिर से पटरी पर दौड़ने लगेगी. इस तरह से अर्थव्यवस्था को लेकर सरकार में एक बार फिर निश्चिन्तता और खुशफहमी बढ़ने लगी है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन सरकार और उसके आर्थिक मैनेजरों की यह निश्चिन्तता और खुशफहमी अर्थव्यवस्था को बहुत भारी पड़ सकती है. इसकी वजह यह है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था में मौजूद अनिश्चितता बढ़ती जा रही है, अमेरिकी अर्थव्यवस्था अभी भी पटरी पर नहीं लौटी है जबकि यूरोपीय आर्थिक संकट थमने के बजाय और गहराता जा रहा है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/-9GlkSLHJjx0/TxOrENsWKHI/AAAAAAAABfI/oAzwziy4ALA/s1600/Economic+Crisis+2.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; cssfloat: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="320" kba="true" src="http://2.bp.blogspot.com/-9GlkSLHJjx0/TxOrENsWKHI/AAAAAAAABfI/oAzwziy4ALA/s320/Economic+Crisis+2.jpg" width="264" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;अब यह तय है कि यूरोप २०१२ में मंदी की चपेट में आने से नहीं बच पायेगा. जाहिर है कि इसका असर भारत समेत तमाम विकासशील देशों की अर्थव्यवस्थाओं पर भी पड़ेगा. विकसित देशों की अर्थव्यवस्थाओं के संकट में फंसे होने का सीधा असर विदेशी पूंजी के प्रवाह, निवेश और निर्यात में गिरावट के रूप में दिखाई पड़ने लगा है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसे में, भारतीय अर्थव्यवस्था के पास सिवाय अंदर की ओर देखने के कोई और उपाय नहीं है. लेकिन मुश्किल यह है कि यू.पी.ए सरकार पर अभी भी विदेशी पूंजी का मोह इस कदर हावी है कि वह उसे आकर्षित करने के लिए जमीन-आसमान एक किये हुए है. प्रधानमंत्री से लेकर दूसरे आर्थिक मैनेजरों तक सभी खुदरा व्यापार को विदेशी पूंजी के लिए खोलने के वायदे को दोहराने से लेकर शेयर बाजार में विदेशी निवेश को और ढीला करने जैसे फैसले कर रहे हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन इन टोटकों से कोई मदद मिलनेवाली नहीं है. आवारा विदेशी पूंजी मौजूदा वैश्विक अनिश्चितता के माहौल में सुरक्षित ठिकानों का रुख कर रही है. अगर नियमों को ढीला करने और निवेश को अधिक से अधिक लुभावना बनाने भर से विदेशी पूंजी किसी देश की ओर दौड़ पड़ती तो लातीनी अमेरिका और अफ्रीका से लेकर एशिया के सभी गरीब मुल्कों में विदेशी पूंजी की बहार होती. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;साफ़ है कि विदेशी पूंजी खासकर वित्तीय पूंजी उन्हीं मुल्कों का रूख करती है जहां उसे सबसे अधिक मुनाफा हो. उसे अपने मुनाफे की जितनी चिंता होती है, उतनी किसी देश की अर्थव्यवस्था की नहीं. लेकिन किसी देश के लिए पहली चिंता उसकी अपनी अर्थव्यवस्था, समग्र और समावेशी विकास और अपने नागरिकों की बेहतरी होनी चाहिए न कि विदेशी पूंजी के लिए अधिक से अधिक मुनाफे की गारंटी करना. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अफसोस की बात यह है कि देश के नीति-नियंताओं से लेकर आर्थिक मैनेजरों तक की आँख पर नव उदारवादी आर्थिक नीतियों का ऐसा चश्मा चढ़ा हुआ है कि उन्हें विदेशी पूंजी में ही देश और अर्थव्यवस्था की सभी समस्याओं का हल और मुक्ति दिखाई देती है. इस कारण उन्हें देश के अंदर मौजूद संभावनाएं नहीं दिखाई देती हैं या वे जान-बूझकर उससे आँखें मूंदे रहते हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/-kEQXccoglMg/TxOrPXllrHI/AAAAAAAABfQ/0hyeRDQuMAk/s1600/indian+economy.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; cssfloat: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="320" kba="true" src="http://1.bp.blogspot.com/-kEQXccoglMg/TxOrPXllrHI/AAAAAAAABfQ/0hyeRDQuMAk/s320/indian+economy.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;उदाहरण के लिए, इस समय अर्थव्यवस्था के सामने सबसे बड़ी चुनौती निवेश बढ़ाने की है. इसका सबसे बड़ा सबूत यह है कि नवंबर महीने में औद्योगिक उत्पादन की दर में वृद्धि के बावजूद पूंजीगत सामानों की उत्पादन दर लगातार तीसरे महीने नकारात्मक – ४.६ फीसदी रही है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;साफ़ है कि नया निवेश नहीं हो रहा है. इसके कारण अर्थव्यवस्था लड़खड़ा रही है. ऐसा नहीं है कि देश में निवेश की गुंजाइश नहीं है. अर्थव्यवस्था के सभी क्षेत्रों लेकिन खासकर कृषि, इन्फ्रास्ट्रक्चर, सामाजिक क्षेत्र में बड़े पैमाने पर निवेश की गुंजाइश है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सच पूछिए तो अर्थव्यवस्था इसके लिए भूखी है. लेकिन निजी क्षेत्र इन क्षेत्रों में आने के लिए बहुत उत्सुक नहीं है. दूसरी ओर, सरकार का रोना है कि उसके पास संसाधन नहीं है. लेकिन यह सच नहीं है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सच यह है कि सरकार के पास संसाधनों की कोई कमी नहीं है बशर्ते अगर वह वित्तीय घाटे के आब्शेसन से बाहर निकल सके. सरकार की सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों के पास इस समय दो लाख करोड़ रूपये से अधिक का नगद और बैंक जमा पड़ा हुआ है. सरकार अगर इन कंपनियों को प्रेरित करे तो वे निवेश बढ़ा सकती हैं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन हैरानी की बात यह है कि इस मुद्दे पर सरकार के अंदर से दो परस्पर विरोधी संकेत आ रहे हैं. एक ओर प्रधानमंत्री कार्यालय के प्रधान सचिव पुलोक चैटर्जी ने पिछले सप्ताह सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों के प्रमुखों की बैठक करके उनसे निवेश बढ़ाने को कहा. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अखबारों में खबरें आईं कि सरकार अर्थव्यवस्था को 'स्टिमुलेट' करने के लिए कमर कस चुकी है. निश्चय ही, यह अच्छी पहल थी. इस स्तम्भ में हमने पहले ही यह सुझाव दिया था क्योंकि माना जाता है कि सार्वजनिक निवेश बढ़ने से निजी निवेशक भी निवेश करने के लिए प्रोत्साहित होते हैं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/-kxrA4asyxe4/TxOrjnBHYLI/AAAAAAAABfY/JOh4gJ4uipM/s1600/pranab+mukherjee+%25282%2529.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; cssfloat: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="266" kba="true" src="http://3.bp.blogspot.com/-kxrA4asyxe4/TxOrjnBHYLI/AAAAAAAABfY/JOh4gJ4uipM/s320/pranab+mukherjee+%25282%2529.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;लेकिन अब वित्त मंत्रालय के सचिव आर. गोपालन इन कंपनियों को निवेश बढ़ाने के बजाय अपने नगद से अधिक लाभांश देने की मांग कर रहे हैं ताकि वित्तीय घाटा कम किया जा सके. जाहिर है कि अगर ये कम्पनियाँ ज्यादा लाभांश देंगी तो निवेश नहीं बढ़ा पाएंगी. सवाल यह है कि यह सरकार क्या चाहती है? यह 'कन्फ्यूजन' अर्थव्यवस्था के लिए घातक साबित हो रहा है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;('नया इंडिया' में १६ जनवरी को सम्पादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित आलेख)&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8157191427767672214-3625937024203414883?l=teesraraasta.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://teesraraasta.blogspot.com/feeds/3625937024203414883/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8157191427767672214&amp;postID=3625937024203414883' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8157191427767672214/posts/default/3625937024203414883'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8157191427767672214/posts/default/3625937024203414883'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://teesraraasta.blogspot.com/2012/01/blog-post_16.html' title='अर्थव्यवस्था के साथ नीमहकीमी'/><author><name>आनंद प्रधान</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05288123571817148120</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_r2d8D7rSfq8/SzcAjql1JOI/AAAAAAAAAGg/C6og8D0qeWE/S220/anand+pradhan+in+class.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/-wc-0mRC4dws/TxOq3Y1i4XI/AAAAAAAABfA/I3wGWb-GbIY/s72-c/Manmohan+Singh.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8157191427767672214.post-9044092551696135931</id><published>2012-01-11T09:59:00.000+05:30</published><updated>2012-01-11T09:59:22.128+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='भ्रष्टाचार'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव&apos;12'/><title type='text'>विधानसभा चुनावों में भ्रष्टाचार बड़ा मुद्दा है...कोई शक?</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color: blue; font-size: large;"&gt;कोई भी पार्टी नहीं चाहती है&amp;nbsp;भ्रष्टाचार मुद्दा बने क्योंकि कहीं न कहीं सभी की पूंछ दबी है &lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/-85ZuLYr_d58/TwxMCOIEY3I/AAAAAAAABeQ/pJ6KqCkvSDc/s1600/images%255B5%255D.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; cssfloat: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="238" kba="true" src="http://2.bp.blogspot.com/-85ZuLYr_d58/TwxMCOIEY3I/AAAAAAAABeQ/pJ6KqCkvSDc/s320/images%255B5%255D.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;पांच राज्यों में विधानसभा चुनावों की सरगर्मियां तेज होने लगी है. इन चुनावों खासकर राजनीतिक रूप से संवेदनशील उत्तर प्रदेश के नतीजों पर पूरे देश की निगाहें लगी हैं. इन चुनावों से न सिर्फ इन राज्यों में मौजूदा राज्य सरकारों और उन्हें चुनौती दे रही पार्टियों के भाग्य का फैसला होगा बल्कि इनसे केन्द्र की सत्ता और आगे की राष्ट्रीय राजनीति की दिशा भी तय होगी. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन चुनावों को यूँ ही २०१४ के आम चुनावों के महासंग्राम से पहले का सेमीफाइनल नहीं माना जा रहा है. लेकिन ये चुनाव इसलिए भी बहुत महत्वपूर्ण हो गए हैं कि पिछले साल अन्ना हजारे की अगुवाई में चले भ्रष्टाचार विरोधी और जन लोकपाल समर्थक आंदोलन की छाया में हो रहे हैं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन ने पिछले साल जिस तरह से देश भर में आम जनमानस को झकझोरा और समूचे राजनीतिक तंत्र को कटघरे में खड़ा कर दिया, उसके राजनीतिक-सामाजिक और नैतिक प्रभाव की असली परीक्षा का समय आ गया है. सवाल यह है कि क्या इन चुनावों में भ्रष्टाचार मुद्दा है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसमें कोई दो राय नहीं है कि इन सभी राज्यों में मौजूदा राज्य सरकारें भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों से घिरी हैं. चाहे वह उत्तर प्रदेश में बसपा की मायावती सरकार हो या पंजाब में शिरोमणि अकाली दल-भाजपा की प्रकाश सिंह बादल और उत्तराखंड में भाजपा की पहले रमेश पोखरियाल निशंक और अब भुवन चन्द्र खंडूरी की सरकार या फिर गोवा और मणिपुर में कांग्रेस की दिगंबर कामत और इबोबी सिंह की सरकारें- भ्रष्टाचार के मामले में कोई किसी से पीछे नहीं है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/-J3zc7ywCRbw/TwxMQrrFjGI/AAAAAAAABeY/3BiE9EXmDTk/s1600/corrupt+politicians+cartoon.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; cssfloat: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="275" kba="true" src="http://3.bp.blogspot.com/-J3zc7ywCRbw/TwxMQrrFjGI/AAAAAAAABeY/3BiE9EXmDTk/s320/corrupt+politicians+cartoon.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;सभी ने पांच वर्षों तक जमकर सत्ता का दुरुपयोग किया है और सार्वजनिक धन की लूट के नए रिकार्ड बना दिए हैं. यह किसी से छुपा नहीं है कि इन सभी राज्यों में सत्ता चाहे किसी भी पार्टी की हो लेकिन एक बात आम है कि सत्ता के शीर्ष पर बैठे एक छोटे से गिरोह के नेतृत्व में केंद्रीकृत और संगठित लूट की खुली व्यवस्था कायम कर दी गई है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नतीजा, इन राज्यों में भ्रष्टाचार इस तरह संस्थाबद्ध हो चुका है कि आम नागरिकों खासकर गरीबों और कमजोर वर्गों को हर छोटे-बड़े सरकारी काम के लिए कदम-कदम पर नेताओं, सत्ता के दलालों, छोटे-बड़े सरकारी अफसरों और अपराधियों की लूट-खसोट का शिकार होना पड़ता है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यही नहीं, उनके वाजिब हकों और गरीबों और कमजोर वर्गों के लिए बनी सरकारी योजनाओं के पैसे को ऊपर ही ऊपर लूट लिया जाता है. कहने की जरूरत नहीं है कि इन राज्यों में आम लोगों के लिए यह भ्रष्टाचार एक बड़ा मुद्दा है. लोग लूट-खसोट की व्यवस्था का अंत और इससे मुक्ति चाहते हैं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यही कारण है कि इन सभी राज्यों में बदलाव का माहौल है. लेकिन आम वोटरों के सामने सबसे बड़ी मुश्किल यह है कि वे किस पर भरोसा करें? सत्ता की दावेदार सभी पार्टियां, चाहे वे सरकार में हों या विपक्ष में, बिना किसी अपवाद के भ्रष्टाचार के दलदल में डूबी हुई हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यही कारण है कि आम वोटरों के बीच भ्रष्टाचार एक बड़ा मुद्दा होते हुए भी पार्टियों के लिए यह कोई बड़ा मुद्दा नहीं रह गया है. असल में, सत्ता की दावेदार किसी भी पार्टी में भ्रष्टाचार के मुद्दे को उठाने का नैतिक साहस नहीं है क्योंकि सभी के दामन पर भ्रष्टाचार के छींटें चमक रहे हैं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/-Hsr-XUY_ym8/TwxMb-giLLI/AAAAAAAABeg/D4xxj338rOY/s1600/imagesCA2SD5FX.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; cssfloat: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="270" kba="true" src="http://3.bp.blogspot.com/-Hsr-XUY_ym8/TwxMb-giLLI/AAAAAAAABeg/D4xxj338rOY/s320/imagesCA2SD5FX.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;आश्चर्य नहीं कि कांग्रेस-भाजपा जैसे राष्ट्रीय दलों से लेकर बसपा, सपा, अकाली दल जैसे क्षेत्रीय दलों तक सभी एक-दूसरे पर भ्रष्टाचार के आरोप जरूर लगा रहे हैं लेकिन इस मुद्दे पर आम वोटरों को कोई भी दल उद्वेलित नहीं कर पा रहा है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इससे सत्ता की होड़ में शामिल राजनीतिक पार्टियों को यह भ्रम हो गया है कि वोटरों के लिए भ्रष्टाचार कोई मुद्दा नहीं है. इससे उनका हौसला इतना बढ़ गया है कि वे एक ओर धड़ल्ले से जातिवादी-सांप्रदायिक-क्षेत्रीय कार्ड खेल रही हैं, वहीँ दूसरी ओर, वोटरों को खरीदने के लिए पानी की तरह पैसा बहाया जा रहा है और अपराधियों-माफियाओं का सहारा लिया जा रहा है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हैरानी की बात नहीं है कि हमेशा ‘चाल, चरित्र और चेहरे’ की दुहाई देनेवाली और ‘भय, भूख और भ्रष्टाचार’ मुक्त राजनीति के दावे करनेवाली भाजपा ने उत्तर प्रदेश में बसपा राज में घोटालों के प्रतीक बन गए बाबू सिंह कुशवाहा समेत बसपा सरकार से भ्रष्टाचार के आरोपों में निकाले गए कई पूर्व मंत्रियों को न सिर्फ पार्टी में ससम्मान शामिल किया है बल्कि उनमें से अधिकांश को चुनाव मैदान में भी उतार दिया है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;साफ़ है कि भाजपा के लिए चुनावों में भ्रष्टाचार कोई मुद्दा नहीं है. उनके लिए यह सिर्फ प्रचार का मुद्दा है, व्यवहार का नहीं. उसके लिए सबसे बड़ा मुद्दा किसी भी तरह से चुनाव जीतना है. चुनाव जीतने के लिए वह कुछ भी करने को तैयार है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/-9wr4eVpp0ak/TwxNZSALP3I/AAAAAAAABew/CQu65v5Ns1M/s1600/vinay+katiyar.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; cssfloat: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="224" kba="true" src="http://2.bp.blogspot.com/-9wr4eVpp0ak/TwxNZSALP3I/AAAAAAAABew/CQu65v5Ns1M/s320/vinay+katiyar.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;लेकिन इसके साथ ही यह भी उतना ही सच है कि कुछ हद तक वामपंथी पार्टियों को छोडकर इस बीमारी से भाजपा ही नहीं, कोई भी पार्टी अछूती नहीं है. फर्क यह है कि इस बार भाजपा व्यावहारिक राजनीति के नाम पर उत्तर प्रदेश में कुछ ज्यादा ही नंगी और बेशर्म हो गई है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;निश्चय ही, इस स्थिति को भांप कर ही अन्ना हजारे ने इन चुनावों से दूर रहने का फैसला किया है क्योंकि उनके कांग्रेस विरोधी प्रचार की धार भ्रष्टाचार के मामले में उसी तरह नंगे और बेशर्म विपक्ष ने कुंद कर दी है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन क्या इसका अर्थ यह है कि भ्रष्टाचार के मुद्दे पर शुरू हुई लड़ाई मंजिल पर पहुँचने से पहले ही लड़खड़ाने लगी है? ऐसा सोचना थोड़ी जल्दबाजी होगा. सच यह है कि इस देश में वोटरों ने अपने फैसले से राजनीतिक तंत्र को हमेशा चौंकाया और छकाया है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसलिए इन चुनावों में बहुत संभव है कि भ्रष्टाचार के मुद्दे पर आम वोटरों के गुस्से का निशाना सत्तारूढ़ पार्टियां बनें और विपक्ष को इसका नकारात्मक फायदा मिल जाए. इस देश में सरकारों और पार्टियों को सबक सिखाने का वोटरों का अपना ही तरीका है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/-4tub34Rf8rs/TwxNnBF14II/AAAAAAAABe4/54I-UcYKUVg/s1600/imagesCADGYZ1K.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; cssfloat: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="216" kba="true" src="http://3.bp.blogspot.com/-4tub34Rf8rs/TwxNnBF14II/AAAAAAAABe4/54I-UcYKUVg/s320/imagesCADGYZ1K.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;लेकिन इस आधार पर किसी पार्टी विशेष के जीतने से यह निष्कर्ष निकालने की भूल न की जाए कि आम लोगों के लिए भ्रष्टाचार कोई मुद्दा नहीं है. अलबत्ता, उसके लिए भ्रष्टाचार चुनाव से ज्यादा सड़क की लड़ाई बन गई है क्योंकि चुनावों में सभी पार्टियों ने एक नापाक गठजोड़ बनाकर एक मुद्दे के बतौर भ्रष्टाचार को बेमानी बनाने में कोई कसर नहीं उठा रखा है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;(दैनिक 'नया इंडिया' में ९ जनवरी को सम्पादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित आलेख)&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8157191427767672214-9044092551696135931?l=teesraraasta.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://teesraraasta.blogspot.com/feeds/9044092551696135931/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8157191427767672214&amp;postID=9044092551696135931' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8157191427767672214/posts/default/9044092551696135931'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8157191427767672214/posts/default/9044092551696135931'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://teesraraasta.blogspot.com/2012/01/blog-post_11.html' title='विधानसभा चुनावों में भ्रष्टाचार बड़ा मुद्दा है...कोई शक?'/><author><name>आनंद प्रधान</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05288123571817148120</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_r2d8D7rSfq8/SzcAjql1JOI/AAAAAAAAAGg/C6og8D0qeWE/S220/anand+pradhan+in+class.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/-85ZuLYr_d58/TwxMCOIEY3I/AAAAAAAABeQ/pJ6KqCkvSDc/s72-c/images%255B5%255D.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8157191427767672214.post-1845105467887289529</id><published>2012-01-10T10:06:00.000+05:30</published><updated>2012-01-10T10:06:13.989+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राजनीति में नैतिकता'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='बाबू सिंह कुशवाहा'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='भाजपा'/><title type='text'>भ्रष्ट और अपराधी तत्वों की आखिरी शरणस्थली बन गई है भाजपा</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="color: blue; font-size: large;"&gt;&lt;strong&gt;दागियों पर पर्दा डालने के लिए &lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color: blue; font-size: large;"&gt;&lt;strong&gt;राष्ट्रवाद और देशभक्ति&amp;nbsp;को&amp;nbsp;आड़ की&amp;nbsp;तरह&amp;nbsp;इस्तेमाल करती&amp;nbsp;है भाजपा &amp;nbsp;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;दूसरी और आखिरी किस्त &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/-0HT4L204YA4/Twu-KlsXybI/AAAAAAAABdw/hAcL_mrORrY/s1600/imagesCATFV9W3.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; cssfloat: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="301" rea="true" src="http://2.bp.blogspot.com/-0HT4L204YA4/Twu-KlsXybI/AAAAAAAABdw/hAcL_mrORrY/s320/imagesCATFV9W3.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;असल में, भाजपा की राजनीति में बाबू सिंह कुशवाहा प्रकरण कोई पहली घटना नहीं है और न ही यह कोई अपवाद है. पार्टी की राजनीति को नजदीक से देखने वाले जानते हैं कि ९० के दशक में कांग्रेसी नेता और तत्कालीन संचार मंत्री सुखराम के भ्रष्टाचार के आरोपों में पकडे जाने के मुद्दे पर कार्रवाई की मांग को लेकर संसद ठप्प कर देनेवाली भाजपा को हिमाचल प्रदेश में सत्ता के लिए सुखराम के साथ हाथ मिलाने में कोई शर्म नहीं आई. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसी तरह, यू.पी.ए सरकार के मंत्री शिबू सोरेन को दागी बताकर मंत्रिमंडल से निकलने की मांग को लेकर भाजपा ने संसद के अंदर और बाहर खूब हंगामा किया लेकिन झारखण्ड में जोड़तोड़ करके उन्हीं शिबू सोरेन के साथ सत्ता की मलाई चाट रही है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यही नहीं, भाजपा ने उत्तर प्रदेश में पहले कल्याण सिंह के नेतृत्व में दलबदलुओं, अपराधियों, भ्रष्टाचारियों और दागियों के साथ सबसे बड़ा मंत्रिमंडल बनाके और फिर मायावती के नेतृत्व में बसपा के साथ सत्ता की साझेदारी करके राजनीतिक अवसरवाद का नया रिकार्ड बनाया. भाजपा के छोटे से राजनीतिक इतिहास में ऐसे अवसरवादी राजनीतिक समझौतों की एक पूरी श्रृंखला है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कर्नाटक में पार्टी ने खनन माफिया के बतौर कुख्यात रेड्डी बंधुओं की बगावत के बाद उनके आगे घुटने टेक दिए और बाद में भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों में फंसे येद्दियुरप्पा ने भी भाजपा नेतृत्व की पूरी फजीहत कराने के बाद ही इस्तीफा दिया. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सच पूछिए तो आज भ्रष्टाचारियों, अपराधियों और धनबलियों को राजनीतिक संरक्षण और प्रोत्साहन देने में भाजपा किसी भी मध्यमार्गी पार्टी से पीछे नहीं नहीं है. किसी भी अन्य पार्टी की तरह भाजपा में भी सत्ता के दलालों, भ्रष्ट और लुटेरे ठेकेदारों/कंपनियों, माफियाओं और अवसरवादी तत्वों की तूती बोल रही है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/-AVsAMdns3LY/Twu-XjYU3JI/AAAAAAAABd4/KgxpebkYuVc/s1600/imagesCA9EZP7B.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; cssfloat: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="229" rea="true" src="http://2.bp.blogspot.com/-AVsAMdns3LY/Twu-XjYU3JI/AAAAAAAABd4/KgxpebkYuVc/s320/imagesCA9EZP7B.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;पार्टी की राज्य इकाइयों से लेकर राष्ट्रीय नेतृत्व में भी ऐसे तत्वों की पैठ बहुत गहरी हो चुकी है. यह बहुत बड़ा भ्रम है कि भाजपा का शीर्ष नेतृत्व बहुत साफ़-सुथरा है और इसलिए निचले स्तर पर ऐसे भ्रष्ट/अपराधी/अवसरवादी तत्वों से कोई फर्क नहीं पड़ेगा. सच यह है कि भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने ऐसे तत्वों के आगे घुटने टेक दिए हैं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भाजपा के नेता भले स्वीकार न करें लेकिन तथ्य यह है कि इन भ्रष्ट और अपराधी तत्वों के आगे शीर्ष नेतृत्व पूरी तरह से लाचार हो चुका है. उसकी लाचारी का इससे बड़ा सबूत और क्या होगा कि आडवाणी से लेकर सुषमा स्वराज तक और उमा भारती से लेकर आर.एस.एस की कथित नाराजगी के बावजूद पार्टी बाबू सिंह कुशवाहा और अन्य दागियों को निकालने के लिए तैयार नहीं है? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आखिर भाजपा किसे धोखा दे रही है? क्या यह संभव है कि पार्टी के शीर्ष नेता और यहाँ तक कि आर.एस.एस भी जिस फैसले से नाराज हो, उसे पलटना इतना मुश्किल हो? यह तभी संभव है जब या तो पार्टी के शीर्ष नेताओं की कथित नाराजगी सिर्फ सार्वजनिक दिखावे के लिए हो या फिर उन्होंने ऐसे तत्वों के आगे घुटने टेक दिए हों? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भाजपा और उसके शीर्ष नेताओं के लिए ये दोनों ही बातें सही हैं. असल में, वे गुड भी खाना चाहते हैं और गुलगुले से परहेज का नाटक भी करते हैं. सच यह है कि एक राष्ट्रीय पार्टी के बतौर भाजपा की राजनीतिक-वैचारिक दरिद्रता जैसे-जैसे उजागर होती जा रही है, उसके लिए सत्ता, साधन के बजाय साध्य बनती जा रही है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/-NZ37ILzRJQM/Twu_uCY8cII/AAAAAAAABeA/yOoZnlnMmSA/s1600/images%255B7%255D.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; cssfloat: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="320" rea="true" src="http://4.bp.blogspot.com/-NZ37ILzRJQM/Twu_uCY8cII/AAAAAAAABeA/yOoZnlnMmSA/s320/images%255B7%255D.jpg" width="192" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;जाहिर है कि जब सत्ता ही साध्य बन जाए तो उसे हासिल करने के लिए पार्टी को कोई भी जोड़तोड़ करने, किसी भी तिकड़म का सहारा लेने और भ्रष्ट/अपराधी तत्वों के साथ गलबहियां करने में कोई संकोच नहीं रह गया है. इसलिए उत्तर प्रदेश में जो रहा है, वह भाजपा के इसी राजनीतिक-वैचारिक स्खलन से पैदा हुए अवसरवाद की राजनीति का नया मुकाम है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसमें कोई दो राय नहीं है कि यह राजनीतिक-वैचारिक दरिद्रता और स्खलन एक ऐसी सर्वव्यापी और सर्वग्रासी परिघटना बन चुकी है जिससे सत्ता के खेल में शामिल कोई भी पार्टी अछूती नहीं बची है. हैरानी की बात नहीं कि दागी तत्व बहुत सहजता के साथ एक से दूसरी पार्टी और तीसरी से चौथी पार्टी में प्रवेश, सम्मान और निर्णायक मक़ाम हासिल करने में कामयाब होते हैं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक पार्टी के लिए दागी, दूसरे के लिए राजनीतिक सफलता की कुंजी है. यहाँ तक कि सिद्धांतत: मान लिया गया है कि यही व्यवहारिक राजनीति है और व्यावहारिक राजनीति, विचार, सिद्धांत और मूल्यों से नहीं चलती है. मतलब यह कि इसमें अगर आप सफल हैं तो सब कुछ जायज है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जाहिर है कि भाजपा भी इस नई व्यावहारिक राजनीतिक संस्कृति की अपवाद नहीं है. लेकिन भाजपा के साथ खास बात यह है कि वह राजनीतिक नैतिकता, शुचिता और सदाचार की जितनी ही अधिक डींगे हांकती है, उतनी ही बेशर्मी से उनकी धज्जियाँ भी उड़ाती है. इसमें उसे कोई संकोच या असुविधा महसूस नहीं होती है. इस मामले में उसके साहस का शायद ही कोई और पार्टी मुकाबला कर पाए. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;असल में, भाजपा जिस उग्र हिंदुत्व और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की वैचारिकी पर आधारित राजनीति करती है, उसमें उसके पास दागियों को हिंदुत्व और राष्ट्रवाद के मुखौटे के पीछे छुपाने की अवसरवादी सुविधा है. यह सुविधा किसी भी और पार्टी के पास नहीं है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/-I1Z0f4ePFmk/Twu_30zw8WI/AAAAAAAABeI/FfPLIdGLKew/s1600/images%255B4%255D.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; cssfloat: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="196" rea="true" src="http://4.bp.blogspot.com/-I1Z0f4ePFmk/Twu_30zw8WI/AAAAAAAABeI/FfPLIdGLKew/s320/images%255B4%255D.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;सैमुएल जानसन ने कहा था कि ‘राष्ट्रवाद और देशभक्ति लफंगों की आखिरी शरणस्थली होती है.’ भाजपा के मामले में यह बात सौ फीसदी सच है. भ्रष्ट/अपराधी और दागी तत्वों को भाजपा इसीलिए बहुत आकर्षित करती है. ऐसे तत्व भाजपा में आ कर न सिर्फ राष्ट्रवाद और हिंदुत्व के झंडे के नीचे अपने सभी पापों को ढंकने-छुपाने में कामयाब हो जाते हैं बल्कि बड़े आराम से अपने काले कारबार को भी जारी रख पाते हैं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जाने-अनजाने मुख्तार अब्बास नकवी ने भाजपा की गंगा से तुलना करते हुए हिंदुत्व के प्रतीक का ही इस्तेमाल किया. भाजपा की राजनीति की यही असलियत है. लेकिन हिंदुत्व और राष्ट्रवाद की संकीर्ण और घृणा आधारित राजनीति से और उम्मीद भी क्या की जा सकती है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;('जनसत्ता' के ९ जनवरी के अंक में प्रकाशित लेख की दूसरी और आखिरी किस्त)&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8157191427767672214-1845105467887289529?l=teesraraasta.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://teesraraasta.blogspot.com/feeds/1845105467887289529/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8157191427767672214&amp;postID=1845105467887289529' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8157191427767672214/posts/default/1845105467887289529'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8157191427767672214/posts/default/1845105467887289529'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://teesraraasta.blogspot.com/2012/01/blog-post_10.html' title='भ्रष्ट और अपराधी तत्वों की आखिरी शरणस्थली बन गई है भाजपा'/><author><name>आनंद प्रधान</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05288123571817148120</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_r2d8D7rSfq8/SzcAjql1JOI/AAAAAAAAAGg/C6og8D0qeWE/S220/anand+pradhan+in+class.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/-0HT4L204YA4/Twu-KlsXybI/AAAAAAAABdw/hAcL_mrORrY/s72-c/imagesCATFV9W3.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8157191427767672214.post-3693269654984121686</id><published>2012-01-09T15:11:00.002+05:30</published><updated>2012-01-09T15:13:23.509+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राजनीति में नैतिकता'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='बाबू सिंह कुशवाहा'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='भाजपा'/><title type='text'>भाजपा के ‘चाल, चरित्र और चेहरे’ की असलियत</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: blue; font-size: large;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size: x-large;"&gt;अवसरवाद का दूसरा नाम भाजपा है&lt;/span&gt; &lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पहली किस्त&lt;br /&gt;&amp;nbsp; &lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/-rih5seoQnHI/Twq1StIihLI/AAAAAAAABdQ/VytRiYoJTVY/s1600/images%255B4%255D.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; cssfloat: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="196" rea="true" src="http://3.bp.blogspot.com/-rih5seoQnHI/Twq1StIihLI/AAAAAAAABdQ/VytRiYoJTVY/s320/images%255B4%255D.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;भारतीय जनता पार्टी को दाग अच्छे लगने लगे हैं. पार्टी के आशीर्वाद से इन दिनों उत्तरप्रदेश की राजनीति में दागियों की चांदी हो गई है. विधानसभा चुनावों से ठीक पहले भ्रष्टाचार के आरोपों में बहुजन समाज पार्टी से निकाले गए पूर्व मंत्री बाबू सिंह कुशवाहा सहित कई और मंत्रियों और विधायकों के लिए भारतीय जनता पार्टी ने अपने दरवाजे खोल दिए हैं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन दागी मंत्रियों, विधायकों और नेताओं को न सिर्फ ससम्मान भाजपा में शामिल कराया जा रहा है बल्कि उनमें से अधिकांश को पार्टी टिकट से भी नवाजा जा रहा है. इनके अलावा बलात्कार से लेकर घूस लेकर संसद में सवाल पूछने के दोषी नेताओं के नाम भी भाजपा के उम्मीदवारों की सूची में शामिल हैं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भाजपा के इस फैसले ने उसके बहुतेरे समर्थकों को स्तब्ध कर दिया है, विश्लेषकों को चौंका दिया है और ये सभी हैरानी जाहिर कर रहे हैं. इसकी वजह यह है कि जो पार्टी खुद को अपने ‘चाल, चरित्र और चेहरे’ के आधार पर सभी पार्टियों से अलग (पार्टी विथ डिफ़रेंस) बताती है और ‘भय, भूख और भ्रष्टाचार’ के खिलाफ लड़ने का नारा लगाते नहीं थकती है, वह दूसरी पार्टियों से भ्रष्टाचार के आरोपों में निकाले गए दागियों को थोक के भाव में पार्टी में कैसे और क्यों शामिल कर रही है? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सवाल यह भी उठ रहा है कि जो भाजपा दूसरी पार्टियों के दागियों के मुद्दे पर सिर आसमान पर उठाए रहती है, हप्तों संसद नहीं चलने दिया है और रामराज्य और सुशासन के दम भरती रहती है, वह किस मुंह से दागियों का बचाव कर रही है? दूसरी पार्टियों के दागी भाजपा में आकर पार्टी के लिए तिलक कैसे बन जाते हैं? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/-yFwvaFQbQGs/Twq1cBt7RvI/AAAAAAAABdY/qKPat0OGdaI/s1600/images%255B5%255D.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; cssfloat: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="224" rea="true" src="http://4.bp.blogspot.com/-yFwvaFQbQGs/Twq1cBt7RvI/AAAAAAAABdY/qKPat0OGdaI/s320/images%255B5%255D.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;मजे की बात यह है कि भाजपा नेता किरीट सोमैया ने सिर्फ चार दिन पहले जिन बाबू सिंह कुशवाहा को उत्तर प्रदेश में दस हजार करोड़ रूपयों से अधिक के बहुचर्चित राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन (एन.एच.आर.एम) घोटाले का सूत्रधार बताया था और जो सी.बी.आई जांच के घेरे में फंसे हैं, उन्हें भाजपा के राष्ट्रीय नेतृत्व की पूरी सहमति से ससम्मान पार्टी में शामिल करा लिया गया. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन कुशवाहा अकेले दागी नेता नहीं हैं, जिन्हें भाजपा ने इस तरह बाहें फैलाकर स्वागत किया है. ऐसे बसपाई मंत्रियों, विधायकों और नेताओं की तादाद अच्छी खासी है जिन्हें उनकी चुनाव जीतने की काबिलियत के आधार पर पार्टी में शामिल कराया गया है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसे नेताओं में मायावती सरकार के एक और पूर्व मंत्री बादशाह सिंह हैं जिन्हें लोकायुक्त जांच में दोषी पाए जाने के कारण हटाया गया था. कुछ और मंत्रियों जैसे अवधेश वर्मा, ददन मिश्र आदि को भी मायावती ने ऐसे ही आरोपों में मंत्रिमंडल से बाहर का रास्ता दिखा दिया. भाजपा ने इन सभी को हाथों-हाथ लिया है. कई और पूर्व बसपाई मंत्री/विधायक और सांसद कतार में हैं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कहने की जरूरत नहीं है कि थोक के भाव में दागियों को पार्टी में शामिल करने और उन्हें चुनावों में उम्मीदवार बनाने के फैसले की मीडिया और बौद्धिक हलकों में खूब आलोचना हुई है. यही नहीं, भाजपा में पार्टी के अंदर भी निचले स्तर पर विरोध के इक्का-दुक्का स्वर उभरे हैं और अखबारी रिपोर्टों के मुताबिक, लालकृष्ण आडवाणी समेत कई वरिष्ठ नेता भी नाराज हैं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/-bD8tZZmw7yE/Twq1lS7GodI/AAAAAAAABdg/bao7mDa3yyE/s1600/imagesCATFV9W3.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; cssfloat: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="301" rea="true" src="http://2.bp.blogspot.com/-bD8tZZmw7yE/Twq1lS7GodI/AAAAAAAABdg/bao7mDa3yyE/s320/imagesCATFV9W3.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;लेकिन घोषित तौर पर पार्टी प्रवक्ता और उनके नेता भांति-भांति के तर्कों से इस फैसले को जायज ठहराने में जुटे हैं. पार्टी प्रवक्ता मुख्तार अब्बास नकवी के मुताबिक, ‘भाजपा वह गंगा है जिसमें कई परनाले गिरते हैं लेकिन उससे गंगा की निर्मलता पर कोई फर्क नहीं पड़ता है.’ &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दूसरी प्रवक्ता निर्मला सीतारमण के अनुसार, ‘यह फैसला किसी जल्दबाजी में नहीं बल्कि बहुत सोच-समझकर लिया गया है. इसका उद्देश्य पिछड़ी खासकर अति पिछड़ी जातियों के नेतृत्व को आगे बढ़ाना है.’ वरिष्ठ भाजपा नेता यशवंत सिन्हा को बाबू सिंह कुशवाहा में मायावती की भ्रष्ट सरकार के खिलाफ ‘व्हिसल-ब्लोवर’ दिख रहा है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन भाजपा नेताओं और उनके समर्थक बुद्धिजीवियों को अहसास है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ बने देशव्यापी जनमत और राजनीतिक माहौल में पार्टी का मध्यमवर्गीय आधार इस फैसले को पचा नहीं पा रहा है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसकी बेचैनी को भांपते हुए टी.वी चर्चाओं में कई भाजपा नेता और बुद्धिजीवी मध्यमवर्गीय जनमत को इस आधार पर आश्वस्त करने की कोशिश कर रहे हैं कि चूँकि ये दागी पार्टी में निचले स्तर के नेता हैं और रहेंगे और पार्टी का शीर्ष नेतृत्व साफ़-सुथरा है, इसलिए ये दागी पार्टी की नीतियों और सरकार को प्रभावित करने की स्थिति में नहीं हैं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस फैसले का बचाव ‘व्यावहारिक राजनीति के तकाजों’ के आधार पर भी किया जा रहा है कि उत्तर प्रदेश में बसपा, सपा और कांग्रेस के माफियाओं और भ्रष्ट उम्मीदवारों से निपटने के लिए भाजपा को भी ऐसे तत्वों को मैदान में उतारना जरूरी है जो चुनाव जीत सकें. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/-1MZ4A0gB_T4/Twq1uLC9dSI/AAAAAAAABdo/SIABZymQ48k/s1600/imagesCAPSR2YZ.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; cssfloat: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="221" rea="true" src="http://3.bp.blogspot.com/-1MZ4A0gB_T4/Twq1uLC9dSI/AAAAAAAABdo/SIABZymQ48k/s320/imagesCAPSR2YZ.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;कहने की जरूरत नहीं है कि भाजपा की इन दलीलों में कोई दम नहीं है. ये तर्क उसके चरम राजनीतिक अवसरवाद पर पर्दा डालने की कोशिश भर हैं. सच पूछिए तो भाजपा के इस फैसले पर हैरानी से अधिक हंसी आती है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भाजपा के लिए यह कोई नई बात नहीं है. पार्टी इस खेल में माहिर हो चुकी है. उसके लिए अवसरवाद अब सिर्फ रणनीतिक मामला भर नहीं है बल्कि उसके राजनीतिक दर्शन का हिस्सा बन चुका है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आश्चर्य नहीं कि भाजपा तात्कालिक राजनीतिक लाभ और सत्ता के लिए अपने घोषित राजनीतिक सिद्धांतों और मूल्यों की बिना किसी अपवाद के बलि चढ़ाती आई है. यह उसकी राजनीति की सबसे बड़ी पहचान बन गई है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="color: #660000;"&gt;जारी...&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;('जनसत्ता' में ९ जनवरी को सम्पादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित लेख की पहली किस्त...बाकी कल)&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8157191427767672214-3693269654984121686?l=teesraraasta.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://teesraraasta.blogspot.com/feeds/3693269654984121686/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8157191427767672214&amp;postID=3693269654984121686' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8157191427767672214/posts/default/3693269654984121686'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8157191427767672214/posts/default/3693269654984121686'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://teesraraasta.blogspot.com/2012/01/blog-post_09.html' title='भाजपा के ‘चाल, चरित्र और चेहरे’ की असलियत'/><author><name>आनंद प्रधान</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05288123571817148120</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_r2d8D7rSfq8/SzcAjql1JOI/AAAAAAAAAGg/C6og8D0qeWE/S220/anand+pradhan+in+class.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/-rih5seoQnHI/Twq1StIihLI/AAAAAAAABdQ/VytRiYoJTVY/s72-c/images%255B4%255D.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8157191427767672214.post-6215858724147055124</id><published>2012-01-03T09:38:00.000+05:30</published><updated>2012-01-03T09:38:35.807+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='भारतीय अर्थव्यवस्था'/><title type='text'>२०११ में अर्थव्यवस्था:महंगाई की सुरसा के आगे लाचार सरकार</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color: blue; font-size: large;"&gt;सरकार के पास इन सभी समस्याओं का एक ही जादुई हल है- खुदरा व्यापार में विदेशी निवेश को न्यौता&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/-OBAaCP3Bs-g/TvyhHTw9l7I/AAAAAAAABcQ/1SwkOsbIbP4/s1600/Manmohan+singh+down.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; cssfloat: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="231" rea="true" src="http://1.bp.blogspot.com/-OBAaCP3Bs-g/TvyhHTw9l7I/AAAAAAAABcQ/1SwkOsbIbP4/s320/Manmohan+singh+down.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;यही हाल महंगाई यानी मुद्रास्फीति का है जो साल भर अर्थव्यवस्था और आम आदमी दोनों के लिए सबसे बड़ी मुसीबत बनी रही. लेकिन मजा देखिए कि सरकार महंगाई के साथ लाल बुझक्कडों की तरह निपटने की कोशिश करती रही. प्रधानमंत्री से लेकर वित्त मंत्रालय के अफसर तक मुद्रास्फीति दर के काबू में आने की तारीख पर तारीख घोषित करते रहे लेकिन महंगाई बेकाबू बनी रही. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सरकार और अर्थव्यवस्था के मैनेजर महंगाई के मर्ज को कभी ठीक से समझ नहीं पाए और आखिरकार महंगाई से निपटने का सारा जिम्मा रिजर्व बैंक को सौंप कर खुद हाथ पर हाथ धरकर बैठ गए. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रिजर्व बैंक के पास मौद्रिक उपायों के अलावा और कोई उपाय नहीं था. नतीजा, रिजर्व बैंक ने इस साल आधा दर्जन से अधिक बार ब्याज दरों में वृद्धि की लेकिन मुद्रास्फीति की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ा. लगभग पूरे साल मुद्रास्फीति की दर दोहरे अंकों के आसपास बनी रही. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हालांकि साल के आखिरी सप्ताहों में खाद्य मुद्रास्फीति की दरों में अच्छी खासी गिरावट दर्ज की गई है लेकिन अभी यह स्पष्ट नहीं है कि इस गिरावट का आम मुद्रास्फीति दर पर कितना असर पड़ा है क्योंकि नवंबर महीने तक मुद्रास्फीति की दर ९.११ फीसदी पर टिकी हुई है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;/div&gt;दूसरी बात यह है कि मुद्रास्फीति की दर में गिरावट का मतलब यह नहीं है कि महंगाई कम हो रही है. सच यह है कि मुद्रास्फीति की दर में यह कमी सांख्यिकीय चमत्कार है जो पिछले वर्ष के ऊँचे आधार के कारण संभव हुई है. इसके अलावा मुद्रास्फीति की दर में यह कमी कुछ खाद्य वस्तुओं खासकर फलों, सब्जियों आदि की कीमतों में आई सीजनल कमी के कारण है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/-0uaI7zpcnX0/TvyhoLuQZcI/AAAAAAAABcw/OvfDzs3g7rM/s1600/inflation+2.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; cssfloat: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="315" rea="true" src="http://3.bp.blogspot.com/-0uaI7zpcnX0/TvyhoLuQZcI/AAAAAAAABcw/OvfDzs3g7rM/s320/inflation+2.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;इससे उपभोक्ताओं को थोड़ी राहत जरूर मिली है लेकिन इसके स्थाई होने में संदेह है क्योंकि आम खाद्य वस्तुओं की कीमतों में कोई कमी नहीं आई है. इसके अलावा महंगाई मैन्युफैक्चरिंग वस्तुओँ को अपने लपेटे में ले चुकी है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन इसके साथ ही भारतीय अर्थव्यवस्था के विरोधाभास भी खुलकर सामने आने लगे हैं. एक ओर सब्जियों आदि की कीमतों में कमी के कारण खाद्य मुद्रास्फीति दर में कमी पर खुशियाँ मनाई जा रही हैं लेकिन दूसरी ओर, पंजाब से लेकर महाराष्ट्र तक और गुजरात से लेकर उत्तराखंड तक के किसान अपने उत्पादों खासकर आलू, प्याज और टमाटर की उचित कीमत न मिलने के कारण रो रहे हैं. नाराजगी में अपनी फसल सडकों पर फेंक रहे हैं. कल तक आम आदमी महंगाई से त्रस्त था और आज किसान लुटा-पिटा महसूस कर रहा है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हैरानी की बात नहीं है कि एक बार फिर देश के कई हिस्सों से किसानों की आत्महत्या की खबरें आ रही हैं. किसानों की हताशा का अंदाज़ा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि आंध्र प्रदेश में पहली बार पूर्वी गोदावरी जिले के किसानों ने ‘कृषि अवकाश’ यानी खेत खाली छोड़ने का फैसला किया है. इस सामान्य घटना नहीं है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह खतरे की घंटी है खासकर यह देखते हुए कि सरकार ने आख़िरकार काफी ना-नुकुर और दाएं-बाएं करने के बाद भोजन के अधिकार का कानून बनाने के लिए पहला कदम बढ़ा दिया है. सरकार जितनी जल्दी हो, यह समझ जाए ले कि भोजन के अधिकार का कानून कृषि और किसानों की उपेक्षा करके लागू नहीं किया जा सकता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/-QsM3gx3UHOc/Tvyh15M6TqI/AAAAAAAABc8/3AeaCo93HnY/s1600/Retail.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; cssfloat: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="277" rea="true" src="http://4.bp.blogspot.com/-QsM3gx3UHOc/Tvyh15M6TqI/AAAAAAAABc8/3AeaCo93HnY/s320/Retail.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;लेकिन सरकार के पास इन सभी समस्याओं का एक ही जादुई हल है और वह है- खुदरा व्यापार में विदेशी निवेश को न्यौता. आप भले सिर खुजाते रहें लेकिन प्रधानमंत्री से लेकर युवराज राहुल गाँधी तक सभी पूरी तरह से मुतमईन हैं कि कृषि, किसानों और आम उपभोक्ताओं सभी की समस्याओं को अब वाल मार्ट और टेस्को जैसी बड़ी विदेशी कम्पनियाँ ही सुलझा सकती हैं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैसे ही जैसे सरकार ने मान लिया कि देश में गरीबी, बेरोजगारी, भूखमरी जैसी सभी समस्याओं के हल की कुंजी तेज विकास दर में है. मुद्रास्फीति से मुक्ति का जिम्मा रिजर्व बैंक के मत्थे है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जैसे इतना ही काफी नहीं था. सरकार यह भी माने बैठी है कि गिरती वृद्धि दर खासकर औद्योगिक उत्पादन की दर में गिरावट से निपटने का जिम्मा भी उद्योग जगत का है. उद्योग जगत ही अर्थव्यवस्था में नया निवेश करेगा और उसे गति देगा. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सरकार और उद्योग जगत दोनों की राय है कि सरकार का असली काम सिर्फ आर्थिक सुधारों को तेजी से आगे बढ़ाना और निजी पूंजी निवेश के अनुकूल माहौल बनाना है. गोया आर्थिक सुधार नहीं हुए, जादू की छड़ी हो गई जिसे घुमाते ही अर्थव्यवस्था की सारी दिक्कतें दूर हो जाएँगी. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/-6EeAfUP7ZCE/TvyiJ4hILNI/AAAAAAAABdI/zz7qcLULODI/s1600/pranab+mukherjee+%25282%2529.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; cssfloat: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="266" rea="true" src="http://3.bp.blogspot.com/-6EeAfUP7ZCE/TvyiJ4hILNI/AAAAAAAABdI/zz7qcLULODI/s320/pranab+mukherjee+%25282%2529.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;यह और बात है कि अर्थव्यवस्था की बहुतेरी समस्याएं इन्हीं नव उदारवादी आर्थिक सुधारों के कारण पैदा हुई हैं. जैसे औद्योगिक उत्पादन की दर में गिरावट के पीछे एक बड़ा कारण सरकार का वित्तीय घाटे को कम करने के प्रति अतिरिक्त मोह है जिसके कारण अर्थव्यवस्था में सार्वजनिक निवेश में कटौती की गई. नतीजा सबके सामने है. लेकिन लगता नहीं है कि सरकार में २०११ में इससे कोई सबक सीखा है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;('राष्ट्रीय सहारा' के हस्तक्षेप में ३१ दिसम्बर'११ में प्रकाशित आलेख की दूसरी और आखिरी किस्त)&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8157191427767672214-6215858724147055124?l=teesraraasta.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://teesraraasta.blogspot.com/feeds/6215858724147055124/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8157191427767672214&amp;postID=6215858724147055124' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8157191427767672214/posts/default/6215858724147055124'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8157191427767672214/posts/default/6215858724147055124'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://teesraraasta.blogspot.com/2012/01/blog-post_03.html' title='२०११ में अर्थव्यवस्था:महंगाई की सुरसा के आगे लाचार सरकार'/><author><name>आनंद प्रधान</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05288123571817148120</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_r2d8D7rSfq8/SzcAjql1JOI/AAAAAAAAAGg/C6og8D0qeWE/S220/anand+pradhan+in+class.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/-OBAaCP3Bs-g/TvyhHTw9l7I/AAAAAAAABcQ/1SwkOsbIbP4/s72-c/Manmohan+singh+down.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8157191427767672214.post-5551074181124061853</id><published>2012-01-02T14:24:00.001+05:30</published><updated>2012-01-02T14:24:11.251+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='भारतीय अर्थव्यवस्था'/><title type='text'>२०११ में अर्थव्यवस्था:लड़खड़ाती अर्थव्यवस्था और लाल बुझक्कड़ सरकार</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color: blue; font-size: large;"&gt;लेकिन नव उदारवादी सुधारों के प्रति व्यामोह से&amp;nbsp;स्थिति&amp;nbsp;और&amp;nbsp;बिगड़&amp;nbsp;रही&amp;nbsp;है&amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: #274e13;"&gt;&amp;nbsp;&lt;strong&gt;पहली किस्त &lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/-R-Y7htstxO8/TvydgLdzkLI/AAAAAAAABbg/7yA1L8LbJ4c/s1600/imagesCAFNGGDH.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; cssfloat: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="264" rea="true" src="http://3.bp.blogspot.com/-R-Y7htstxO8/TvydgLdzkLI/AAAAAAAABbg/7yA1L8LbJ4c/s320/imagesCAFNGGDH.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;उम्मीदों के विपरीत भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए यह साल कोई खास अच्छा नहीं रहा. अर्थव्यवस्था के लिए इस साल की शुरुआत उम्मीदों के साथ हुई लेकिन साल का मध्य आते-आते अर्थव्यवस्था को जैसे झटके लगने लगे, उससे यह साफ़ होने लगा कि स्थिति कोई खास बेहतर नहीं रहनेवाली है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अमेरिका से लेकर यूरोप तक में गहराते आर्थिक और वित्तीय संकट के कारण वैश्विक अर्थव्यवस्था पर मंडराते संकट के बादलों से यह स्पष्ट हो चुका था कि हालात बद से बदतर होनेवाले हैं. डी-कपलिंग के तमाम दावों के बावजूद २००८ की अमेरिकी मंदी के अनुभव से यह साफ़ हो चुका था कि वैश्विक अर्थव्यवस्था की दोबारा डावांडोल होती स्थिति के प्रभाव से भारतीय अर्थव्यवस्था भी अछूती नहीं रहनेवाली है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रही-सही कसर देश के अंदर भ्रष्टाचार और घोटालों के गंभीर आरोपों से घिरी और अपने ही अंतर्विरोधों में फंसी यू.पी.ए सरकार के अनिर्णय और नव उदारवादी सुधारों के प्रति व्यामोह ने पूरी कर दी. नतीजा, साल के खत्म होते-होते अर्थव्यवस्था को लेकर एक गहरी निराशा का माहौल बन गया है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अर्थव्यवस्था से आ रहे अधिकांश संकेत इस निराशा को गहरी कर रहे हैं. उदाहरण के लिए, चालू वित्तीय वर्ष की दूसरी तिमाही में जी.डी.पी की वृद्धि दर गिरकर ६.९ प्रतिशत रह गई है जो पिछले दो वर्षों में अर्थव्यवस्था का सबसे खराब प्रदर्शन है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हालांकि अमेरिका से लेकर यूरोप तक दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में यह फिर भी बेहतर प्रदर्शन है लेकिन अगर साल की शुरुआत खासकर फ़रवरी में पेश बजट में इस साल जी.डी.पी के ८.७५ प्रतिशत रहने के अनुमान से इसकी तुलना करें तो साफ़ है कि अर्थव्यवस्था की स्थिति कमजोर हुई है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/-TQKHE38bNYI/Tvydshe3WJI/AAAAAAAABbs/f-K1jbDmPOU/s1600/imagesCAPTTEBT.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; cssfloat: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="320" rea="true" src="http://2.bp.blogspot.com/-TQKHE38bNYI/Tvydshe3WJI/AAAAAAAABbs/f-K1jbDmPOU/s320/imagesCAPTTEBT.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;यही नहीं, साल की शुरुआत में वित्त मंत्री से लेकर अर्थव्यवस्था के मैनेजरों तक सभी इतने अपबीट थे कि जी.डी.पी के नौ प्रतिशत तक पहुँचने के दावे किये जा रहे थे. लेकिन अब हालत यह है कि खुद वित्त मंत्री चालू वित्तीय वर्ष में जी.डी.पी के ७.५ फीसदी रहने की उम्मीद जता रहे हैं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन अर्थव्यवस्था के अधिकांश स्वतंत्र विश्लेषकों की राय है कि वित्त मंत्री के भाग्य अच्छे हुए तो वृद्धि दर ६.५ फीसदी से ७ फीसदी के बीच रह सकती है. अन्यथा स्थिति और भी बदतर हो सकती है. इसके संकेत भी मिल रहे हैं. जैसे औद्योगिक उत्पादन की वृद्धि दर फिसलकर अक्टूबर में नकारात्मक – ५.१ प्रतिशत हो गई है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पिछले २८ महीनों में औद्योगिक क्षेत्र का यह सबसे बदतर प्रदर्शन है. इसका सीधा असर शेयर बाजार के संवेदी सूचकांक- सेंसेक्स पर भी दिखाई पड़ रहा है जो पिछले साल की तुलना में इस साल कोई २३ फीसदी नीचे लुढ़क चुका है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यही नहीं, डालर के मुकाबले रूपये की कीमत में भी अच्छी-खासी लगभग १५ फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है. तथ्य यह है कि एशिया की अन्य मुद्राओं की तुलना में रूपये का प्रदर्शन सबसे बदतर है. रूपये की कीमत में गिरावट की एक बड़ी वजह यह है कि विदेशी निवेशक बाजार से डालर निकाल रहे हैं और नया विदेशी निवेश नहीं आ रहा है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इससे रूपये पर दबाव बढ़ा है. कई बाजार विश्लेषकों का मानना है कि रूपये की कीमत में आई तेज गिरावट इस बात का सबूत है कि भारतीय अर्थव्यवस्था के प्रति विदेशी निवेशकों का विश्वास कमजोर हुआ है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन दूसरी ओर सरकार का दावा है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था की कमजोरियों और समस्याओं के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था की रफ़्तार धीमी हुई है पर चिंता की कोई बात नहीं है. अर्थव्यवस्था के बुनियादी आधारतत्व (फंडामेंटल्स) मजबूत हैं और जल्दी ही अर्थव्यवस्था फिर से पटरी पर आ जायेगी और तेज रफ़्तार से दौड़ने लगेगी. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/-_B77tcuyHO0/TvyeBUvR7WI/AAAAAAAABb4/p4sKHXxfw7Q/s1600/SENSEX.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; cssfloat: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="231" rea="true" src="http://3.bp.blogspot.com/-_B77tcuyHO0/TvyeBUvR7WI/AAAAAAAABb4/p4sKHXxfw7Q/s320/SENSEX.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;कहने की जरूरत नहीं है कि सरकार के दावे में एक तरह की निश्चिन्तता और खुशफहमी दिखती है जबकि बाजार विश्लेषकों के आकलन में जरूरत से ज्यादा घबराहट और निराशा दिखाई पड़ती है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सच्चाई इन दोनों से अलग है. निश्चय ही, मौजूदा वैश्विक और घरेलू माहौल में ६.५ से लेकर ७ फीसदी की जी.डी.पी वृद्धि दर भी पर्याप्त है बशर्ते आप जी.डी.पी वृद्धि दर को ही अर्थव्यवस्था की मुक्ति न मानते हों और हमेशा नौ से दस फीसदी वृद्धि दर का राग अलापने में न जुटे रहते हों. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुश्किल यह है कि मनमोहन सिंह सरकार खुद ही मुंगेरीलाल के हसीन सपनों की तरह नौ से दस फीसदी की ऊँची वृद्धि दर के सपने देखती और दिखाती रहती है. ऐसे में, उसकी खुद की बनाई कसौटी पर अर्थव्यवस्था का प्रदर्शन कमजोर है, इस तथ्य को वह कैसे नकार सकती है? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसमें कोई दो राय नहीं है कि इस साल भारतीय अर्थव्यवस्था का प्रदर्शन उसकी क्षमताओं और उम्मीदों से कहीं कम है. लेकिन मुद्दा केवल अर्थव्यवस्था की विकास दर नहीं है और न ही अकेले यह उसकी सेहत और बेहतरी का सबूत है. सच यह है कि अर्थव्यवस्था की तेज दर के बावजूद पिछले वर्षों में आम लोगों की स्थिति में कोई खास सुधार हुआ है और न ही उनकी परेशानियां और तकलीफें कम हुई हैं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उदाहरण के लिए, पिछले वर्ष जी.डी.पी की अपेक्षाकृत ८.५ फीसदी की तेज रफ़्तार के बावजूद आम लोगों को आसमान छूती महंगाई रुलाती रही. यही नहीं, एन.एस.एस.ओ की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ष २००४-०९ के बीच ऊँची विकास दर के बावजूद यह ‘रोजगारविहीन विकास’ था जिसके कारण इन पांच वर्षों में रोजगार में वृद्धि दर लगभग नगण्य रही. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आश्चर्य नहीं कि इस साल विकसित देशों के संगठन – ओ.ई.सी.डी द्वारा जारी एक रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले वर्षों में जब देश में जी.डी.पी तेज वृद्धि दर के साथ बढ़ रही थी, उसी दौरान देश में अमीर-गरीब के बीच खाई भी तेजी से बढ़ रही थी. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/-BFWVvU7Zk5g/TvyeT-zLJDI/AAAAAAAABcE/onD-6AgXBU0/s1600/POOR+DESTITUTE.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; cssfloat: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="320" rea="true" src="http://4.bp.blogspot.com/-BFWVvU7Zk5g/TvyeT-zLJDI/AAAAAAAABcE/onD-6AgXBU0/s320/POOR+DESTITUTE.jpg" width="282" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;इस रिपोर्ट के अनुसार, भारत उन देशों में शामिल है जहां नव उदारवादी सुधारों के इस दौर में तेज विकास दर के बावजूद सबसे अधिक गैर बराबरी बढ़ी है. इसका सबसे बड़ा सबूत तो गरीबी रेखा के बारे में योजना आयोग का सुप्रीम कोर्ट में दिया गया वह हलफनामा है जिसमें ग्रामीण इलाकों में प्रति दिन २६ और शहरी इलाकों में ३२ रूपये से ऊपर की आमदनी वाले लोगों को गरीबी रेखा से बाहर कर दिया गया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हैरानी की बात नहीं है कि गरीबी का मजाक उड़ानेवाली इस गरीबी रेखा को लेकर इस साल खूब हंगामा हुआ. सरकार ने भी माना कि यह गरीबी की वास्तविक रेखा नहीं है. लेकिन विडम्बना देखिए कि जिस गरीबी रेखा को ख़ारिज करने की बात की गई, वही गरीबी रेखा साल के बीतते-बीतते भोजन के अधिकार विधेयक में एक बार फिर आधिकारिक रेखा बनकर करोड़ों लोगों की रोटी का फैसला करने आ गई. कहते हैं कि ‘चीजें जितनी बदलती हैं, उतनी ही पहले की तरह रहती हैं.’ गरीबी की परिभाषा पर इतनी सारी बहसों और चर्चाओं के बावजूद गरीबी रेखा जस की तस बनी हुई है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;कल भी जारी...&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;('राष्ट्रीय सहारा' के हस्तक्षेप के ३१ दिसंबर के अंक में प्रकाशित टिप्पणी की पहली किस्त)&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8157191427767672214-5551074181124061853?l=teesraraasta.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://teesraraasta.blogspot.com/feeds/5551074181124061853/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8157191427767672214&amp;postID=5551074181124061853' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8157191427767672214/posts/default/5551074181124061853'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8157191427767672214/posts/default/5551074181124061853'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://teesraraasta.blogspot.com/2012/01/blog-post.html' title='२०११ में अर्थव्यवस्था:लड़खड़ाती अर्थव्यवस्था और लाल बुझक्कड़ सरकार'/><author><name>आनंद प्रधान</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05288123571817148120</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_r2d8D7rSfq8/SzcAjql1JOI/AAAAAAAAAGg/C6og8D0qeWE/S220/anand+pradhan+in+class.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/-R-Y7htstxO8/TvydgLdzkLI/AAAAAAAABbg/7yA1L8LbJ4c/s72-c/imagesCAFNGGDH.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8157191427767672214.post-7390467676038423582</id><published>2011-12-31T13:28:00.000+05:30</published><updated>2011-12-31T13:28:16.277+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='गरीबी रेखा'/><title type='text'>गरीबी रेखा से ही तय होगा भोजन के अधिकार का फैसला</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color: blue; font-size: large;"&gt;इस कानून से देश में खाद्य असुरक्षा बढ़ेगी &lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: #274e13;"&gt;&lt;em&gt;दूसरी और आखिरी किस्त &lt;/em&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/-Qcn2fhjNK7U/TvyOgzlBE6I/AAAAAAAABa8/-WONUrVmXKc/s1600/poor+labour.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; cssfloat: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="244" rea="true" src="http://3.bp.blogspot.com/-Qcn2fhjNK7U/TvyOgzlBE6I/AAAAAAAABa8/-WONUrVmXKc/s320/poor+labour.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;यह विधेयक खाद्य सुरक्षा के दायरे को बढ़ाने के बजाय कई मामलों में और सीमित कर देता है. इसमें खाद्य सुरक्षा के लाभार्थियों को ‘प्राथमिकता’ और ‘सामान्य’ के दो खांचों में बांटा गया है जो वास्तव में पहले से मौजूद बी.पी.एल और ए.पी.एल श्रेणियों के ही नए नाम हैं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विधेयक में प्राथमिकता श्रेणी में शामिल लाभार्थियों में प्रत्येक व्यक्ति को सस्ते दर (दो रूपये किलो गेहूं और तीन रूपये किलो चावल) पर सात किलो अनाज मिलेगा जबकि सामान्य श्रेणी में शामिल प्रत्येक लाभार्थी को अनाज के न्यूनतम समर्थन मूल्य की आधी कीमत (मौजूदा कीमतों के आधार पर ६.५० रूपये किलो गेहूं और ५.५० रूपये किलो चावल) पर तीन किलो अनाज मिलेगा. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;साफ़ है कि सामान्य श्रेणी के लाभार्थियों को न सिर्फ अनाजों की दोगुनी से लेकर तिगुनी कीमत चुकानी पड़ेगी बल्कि उन्हें प्राथमिकता श्रेणी की तुलना में अनाज भी आधे से कम मिलेगा. इस तरह लगभग सभी व्यावहारिक अर्थों में सामान्य श्रेणी के लाभार्थियों को खाद्य सुरक्षा नाम पर एक झुनझुना भर थमा दिया गया है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यही नहीं, खाद्य सुरक्षा का यह केन्द्रीय कानून तमिलनाडु जैसे राज्यों में जहां पी.डी.एस का दायरा कहीं ज्यादा बड़ा है, उसे भी सीमित कर देगा. इसके अलावा देश के कई राज्यों में प्रस्तावित कानून की तुलना में कहीं ज्यादा सस्ता अनाज राज्य सरकारें पहले से दे रही हैं, उसपर भी रोक लग जायेगी. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खाद्य सुरक्षा का यह विधेयक कितना सीमित है, इसका अंदाज़ा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि इसके तहत कथित खाद्य सुरक्षा का लाभ ग्रामीण क्षेत्र के ७५ प्रतिशत और शहरी क्षेत्र के ५० प्रतिशत नागरिकों को मिलेगा. लेकिन इसमें भी प्राथमिकता (पूर्व बी.पी.एल) श्रेणी के लाभार्थियों की संख्या विधेयक के मुताबिक, ग्रामीण इलाकों में ४६ फीसदी और शहरी इलाकों में २८ फीसदी होगी. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/-hZg5mFHBKy4/TvyPEcVNapI/AAAAAAAABbI/9MiVKqZcpec/s1600/imagesCAY6CUT4.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; cssfloat: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="206" rea="true" src="http://3.bp.blogspot.com/-hZg5mFHBKy4/TvyPEcVNapI/AAAAAAAABbI/9MiVKqZcpec/s320/imagesCAY6CUT4.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;यह और कुछ नहीं बल्कि तेंदुलकर समिति द्वारा तय गरीबी रेखा के नीचे गुजर-बसर कर रहे लोगों की संख्या में १० फीसदी और जोड़कर बनाई गई सीमा है. इस तरह ना-ना करते हुए भी वही पुरानी गरीबी रेखा फिर से भूखमरी के शिकार करोड़ों लोगों के भाग्य का फैसला करने आ गई.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह साफ़ तौर पर यू.पी.ए सरकार की वायदाखिलाफी है. याद रहे कि ग्रामीण क्षेत्रों में २६ रूपये और शहरी क्षेत्रों में ३२ रूपये से कम की आय वाले लोगों को ही गरीब मानने वाले योजना आयोग के हलफनामे के बाद पूरे देश में जबरदस्त हंगामा हुआ था. उस समय केन्द्रीय ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश और योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलुवालिया ने वायदा किया था कि इस गरीबी रेखा को भोजन के अधिकार के लाभार्थियों के साथ नहीं जोड़ा जाएगा. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन संसद में पेश विधेयक से साफ़ है कि गरीबी निर्धारण के नाम पर गरीबों का मजाक उड़ानेवाली गरीबी रेखा से ही यह तय होगा कि देश में कितने और कौन लोगों को खाद्य सुरक्षा का लाभ मिलेगा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;साफ़ है कि यू.पी.ए सरकार ने इस विधेयक के जरिये न सिर्फ भोजन के सार्वभौम (यूनिवर्सल) अधिकार यानी सभी नागरिकों के लिए खाद्य सुरक्षा के अधिकार को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया है बल्कि करोड़ों गरीबों और भूखमरी के शिकार लोगों को प्राथमिकता और सामान्य श्रेणियों के कृत्रिम विभाजन में बांटकर करोड़ों भूखे लोगों को भी ठेंगा दिखा दिया है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन इस मजाक के लिए सिर्फ यू.पी.ए सरकार ही नहीं बल्कि खुद कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी और उनके नेतृत्व में काम करनेवाली एन.ए.सी भी उतनी ही जिम्मेदार है. एन.ए.सी ने ही सबसे पहले प्राथमिकता और सामान्य श्रेणियों के इस कृत्रिम विभाजन का प्रस्ताव करके सरकार को और मनमानी करने की छूट दे दी. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/-eYo7wSC3des/TvyPcrMWf2I/AAAAAAAABbU/oWwO44pi4Yg/s1600/poor+family.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; cssfloat: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="256" rea="true" src="http://3.bp.blogspot.com/-eYo7wSC3des/TvyPcrMWf2I/AAAAAAAABbU/oWwO44pi4Yg/s320/poor+family.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;लेकिन मजा देखिए कि इतने सीमित प्रावधानों बावजूद अभी भी इस विधेयक का सरकार के अंदर और बाहर नव उदारवादी आर्थिक सुधारों के पैरोकारों की ओर से जितना कड़ा विरोध हो रहा है, उसे देखते हुए इस आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता है कि इस सीमित कानून को भी लागू करने को लेकर सरकार बहुत उत्सुक और उत्साहित नहीं है. साफ़ है कि भोजन के मौलिक अधिकार की लड़ाई अभी लंबी चलनी है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;समाप्त &lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;('समकालीन जनमत' के जनवरी'१२ में प्रकाशित टिप्पणी की दूसरी और अंतिम किस्त)&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8157191427767672214-7390467676038423582?l=teesraraasta.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://teesraraasta.blogspot.com/feeds/7390467676038423582/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8157191427767672214&amp;postID=7390467676038423582' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8157191427767672214/posts/default/7390467676038423582'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8157191427767672214/posts/default/7390467676038423582'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://teesraraasta.blogspot.com/2011/12/blog-post_31.html' title='गरीबी रेखा से ही तय होगा भोजन के अधिकार का फैसला'/><author><name>आनंद प्रधान</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05288123571817148120</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_r2d8D7rSfq8/SzcAjql1JOI/AAAAAAAAAGg/C6og8D0qeWE/S220/anand+pradhan+in+class.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/-Qcn2fhjNK7U/TvyOgzlBE6I/AAAAAAAABa8/-WONUrVmXKc/s72-c/poor+labour.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8157191427767672214.post-6204320040598485798</id><published>2011-12-30T17:04:00.000+05:30</published><updated>2011-12-30T17:04:24.058+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='खाद्य सुरक्षा'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='भोजन के अधिकार'/><title type='text'>खाद्य सुरक्षा के नाम पर भूखों को फिर ठेंगा</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color: blue; font-size: large;"&gt;भोजन&amp;nbsp;के&amp;nbsp;अधिकार&amp;nbsp;की&amp;nbsp;आड़&amp;nbsp;में&amp;nbsp;पी.डी.एस&amp;nbsp;को&amp;nbsp;ठिकाने&amp;nbsp;लगाने&amp;nbsp;की&amp;nbsp;तैयारी&amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color: #38761d;"&gt;पहली किस्त&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/-sA6nZXH-6aM/TvyJmZvaf4I/AAAAAAAABZ8/-IcEIUaPlU0/s1600/POOR+DESTITUTE.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; cssfloat: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="320" rea="true" src="http://1.bp.blogspot.com/-sA6nZXH-6aM/TvyJmZvaf4I/AAAAAAAABZ8/-IcEIUaPlU0/s320/POOR+DESTITUTE.jpg" width="282" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;काफी ना-नुकुर, खींचतान और दांवपेंच के बाद आख़िरकार यू.पी.ए सरकार ने खाद्य सुरक्षा विधेयक संसद में पेश कर दिया. पिछले दो सालों से अधिक समय से सरकार के अंदर और बाहर इस कानून के मसौदे को लेकर बहस चल रही थी. दूसरी ओर, देश भर में खाद्य सुरक्षा यानी सभी नागरिकों को भोजन के अधिकार की मांग को लेकर आंदोलन तेज हो रहे थे. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सरकार पर नैतिक और राजनीतिक दोनों दबाव थे. सचमुच इससे अधिक शर्म की बात और क्या हो सकती है कि जी.डी.पी की तेज रफ़्तार और भारत के आर्थिक और सैन्य महाशक्ति बनने के दावों के बीच देश में गंभीर भूखमरी के शिकार लोगों की कुल तादाद बढ़कर २७ करोड़ से अधिक पहुँच गई है? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यही नहीं, दुनिया भर में भूखमरी के शिकार लोगों की कुल आबादी का एक चौथाई से ज्यादा हिस्सा अकेले भारत में रहता है. आश्चर्य नहीं कि वैश्विक भूख सूचकांक (हंगर इंडेक्स) पर ८४ देशों में भारत कई अत्यधिक गरीब अफ़्रीकी और एशियाई देशों से भी नीचे ६७ वें स्थान पर है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विडम्बना देखिए कि पिछले डेढ़-दो दशकों खासकर १९९० से २००५ के बीच तेज वृद्धि दर के कारण जहां भारत के जी.डी.पी का आकार दुगुना हो गया और प्रति व्यक्ति आय में तिगुनी वृद्धि दर्ज की गई, उसी दौरान देश में गंभीर भूखमरी के शिकार लोगों की तादाद में कमी आने के बजाय उनकी संख्या में लगभग ६.५ करोड़ की और बढोत्तरी हो गई. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हालात कितने गंभीर हैं, इसका अंदाज़ा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि देश में कोई ४८ फीसदी बच्चे और ४० फीसदी वयस्क भरपेट और पर्याप्त पोषणयुक्त भोजन न मिलने के कारण कुपोषण के शिकार हैं. कहने की जरूरत नहीं है कि इस कानून से देश के उन करोड़ों लोगों को बहुत उम्मीदें और अपेक्षाएं थीं जो आज़ादी के ६३ साल बाद आज भी भूखे पेट सोने के लिए मजबूर हैं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/-1bjcgw-JDYM/TvyJ-2crYvI/AAAAAAAABaY/Qa8CGJFE1aA/s1600/poor+people.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; cssfloat: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="256" rea="true" src="http://1.bp.blogspot.com/-1bjcgw-JDYM/TvyJ-2crYvI/AAAAAAAABaY/Qa8CGJFE1aA/s320/poor+people.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;लेकिन इतनी उम्मीदों, सरकार के भारी-भरकम दावों और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी की व्यक्तिगत दिलचस्पी के बाद जो विधेयक संसद में पेश किया गया है, उसका मकसद कहीं से भी सबको भोजन का मौलिक अधिकार देना नहीं है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसके उलट सच यह है कि खाद्य सुरक्षा का यह विधेयक न सिर्फ बहुत सीमित, आधा-अधूरा, विसंगतियों और अंतर्विरोधों से भरा हुआ है बल्कि यह देश में खाद्य असुरक्षा बढ़ानेवाला कानून साबित होगा. यही नहीं, खाद्य सुरक्षा के नाम पर यह भूखे लोगों का मजाक उड़ानेवाला विधेयक है जिसका असली मकसद खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने की आड़ में खादयान्नों के कारोबार से जुड़ी बड़ी देशी-विदेशी कंपनियों की मदद करना है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस कानून के जरिये सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पी.डी.एस) में सुधार के नाम पर उसे पूरी तरह बर्बाद करने की तैयारी कर ली गई है जिससे सबसे ज्यादा फायदा बड़ी बहुराष्ट्रीय खाद्यान्न कंपनियों को होगा. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;असल में, यू.पी.ए सरकार इसके लिए बहुत दिनों से मौका खोज रही थी. यह किसी से छुपा नहीं है कि पी.डी.एस में सुधार के नाम पर उसे समेटने और बंद करने की कोशिशें लंबे समय से चल रही थीं. पी.डी.एस में सुधार की आड़ में उसे पहले ही लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली (टी.पी.डी.एस) में बदलकर कमजोर और खोखला किया जा चुका है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसी नव उदारवादी एजेंडे को आगे बढाने के लिए अब खाद्य सुरक्षा विधेयक को एक मौके की तरह इस्तेमाल किया गया है जिसमें यह प्रावधान किया गया है कि इस कानून को लागू करने के लिए सभी राज्यों को पी.डी.एस में सुधार करना होगा. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/-2IO51ySM-24/TvyKigRHJ5I/AAAAAAAABak/sn_H8xv6_Fw/s1600/images%255B3%255D.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; cssfloat: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="233" rea="true" src="http://1.bp.blogspot.com/-2IO51ySM-24/TvyKigRHJ5I/AAAAAAAABak/sn_H8xv6_Fw/s320/images%255B3%255D.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;इसमें कोई दो राय नहीं है कि पी.डी.एस व्यवस्था में जितना भ्रष्टाचार और अराजकता है, उसे देखते हुए उसमें सुधार की और उसे भ्रष्टाचारमुक्त, प्रभावी और जन नियंत्रण में लाने की सख्त जरूरत है. लेकिन सरकार का इरादा उसमें सुधार करके उसे सशक्त और प्रभावी बनाने का नहीं है. इसके उलट वह पी.डी.एस में सुधार के बहाने उसमें अत्यंत विवादास्पद आधार पहचानपत्र (यूनिक आइडेंटिफिकेशन नंबर) को घुसेड़ना चाहती है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन इस विधेयक में सबसे खतरनाक प्रावधान यह किया गया है कि केन्द्र सरकार जिस दिन से और जिस क्षेत्र में अनाज की जगह कैश ट्रान्सफर, फ़ूड कूपन जैसी योजनाओं को लागू करना चाहेगी, राज्य सरकारों को उसे लागू करना होगा. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;साफ़ है कि सरकार का असली इरादा लोगों को पी.डी.एस के माध्यम से अनाज मुहैया कराके खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करना नहीं बल्कि कैश ट्रांसफर और फ़ूड कूपन के बहाने खाद्यान्न के बड़े व्यापारियों और बड़ी कंपनियों को मोटे मुनाफे की गारंटी करना है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह किसी से छुपा नहीं है कि पहले एन.डी.ए और अब यू.पी.ए सरकार पिछले कई वर्षों से राशन लाभार्थियों को अनाज के बजाय नकद पैसा या फ़ूड कूपन देने की पेशकश करते रहे हैं जिसका इस्तेमाल करके वह खुले बाजार से अपनी पसंद का अनाज खरीद ले. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऊपर से देखने पर यह योजना बहुत आकर्षक लगती है कि लाभार्थी को राशन की दूकान और उसमें मिलनेवाले घटिया अनाज से मुक्ति मिल जायेगी और वह अपनी सुविधा और पसंद से अनाज खरीद सकता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन सच यह है कि सुधार के नाम पर गरीबों और भूखमरी से जूझ रहे लोगों को भ्रष्ट पी.डी.एस के बजाय खुले बाजार की मनमानी के भरोसे छोड़ा जा रहा है. आखिर कितने गरीब खुले बाजार से फ़ूड कूपन या नकद से अपनी इच्छा या पसंद से अनाज खरीद पाएंगे? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/-DFjfB8EYUIo/TvyK_gd7U6I/AAAAAAAABaw/Rrys8juLM6I/s1600/imagesCADH2CHE.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; cssfloat: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="285" rea="true" src="http://1.bp.blogspot.com/-DFjfB8EYUIo/TvyK_gd7U6I/AAAAAAAABaw/Rrys8juLM6I/s320/imagesCADH2CHE.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;दूसरी ओर, एक बड़ा सवाल यह भी है कि अगर सरकार कैश ट्रांसफर या फ़ूड कूपन को आगे बढ़ाने जा रही है तो उसके अपने अनाज भण्डार का क्या होगा? अगर सरकार पी.डी.एस से अनाज का वितरण नहीं करना चाहती है तो उसे किसानों से न्यूनतम समर्थन मूल्य पर अनाज खरीदने और अनाज भण्डार रखने की भी क्या जरूरत है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मतलब साफ़ है. सरकार का असली मकसद न सिर्फ पी.डी.एस को खत्म करना है बल्कि वह किसानों से न्यूनतम समर्थन मूल्य पर अनाज खरीदने की जिम्मेदारी से भी मुक्ति चाहती है. इस तरह वह किसानों को भी बाजार और बड़े अनाज व्यापारियों और कंपनियों के रहमो-करम पर छोड़ना चाहती है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कहने की जरूरत नहीं है कि इससे सबसे ज्यादा खुशी अनाज के कारोबार से जुड़े बड़े व्यापारियों और देशी-विदेशी कंपनियों को होगी. लेकिन इसका अर्थ यह भी है कि किसानों और राशन लाभार्थियों दोनों को बाजार के भरोसे छोडकर सरकार वास्तव में देश की खाद्य सुरक्षा को दांव पर लगाने जा रही है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यही इस विधेयक की असलियत है. सच यह है कि खाद्य सुरक्षा विधेयक में नया कुछ भी नहीं है. इसमें मौजूदा व्यवस्था को ही नए नाम से पेश कर दिया गया है. &lt;br /&gt;&amp;nbsp; &lt;br /&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;बाकी कल...&lt;/span&gt; &lt;br /&gt;&amp;nbsp; &lt;br /&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;('समकालीन जनमत' के जनवरी'१२ के अंक में प्रकाशित टिप्पणी की पहली किस्त)&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8157191427767672214-6204320040598485798?l=teesraraasta.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://teesraraasta.blogspot.com/feeds/6204320040598485798/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8157191427767672214&amp;postID=6204320040598485798' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8157191427767672214/posts/default/6204320040598485798'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8157191427767672214/posts/default/6204320040598485798'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://teesraraasta.blogspot.com/2011/12/blog-post_30.html' title='खाद्य सुरक्षा के नाम पर भूखों को फिर ठेंगा'/><author><name>आनंद प्रधान</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05288123571817148120</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_r2d8D7rSfq8/SzcAjql1JOI/AAAAAAAAAGg/C6og8D0qeWE/S220/anand+pradhan+in+class.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/-sA6nZXH-6aM/TvyJmZvaf4I/AAAAAAAABZ8/-IcEIUaPlU0/s72-c/POOR+DESTITUTE.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8157191427767672214.post-4355125366782729739</id><published>2011-12-28T21:12:00.000+05:30</published><updated>2011-12-28T21:12:59.088+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='भारतीय अर्थव्यवस्था'/><title type='text'>लड़खड़ाती अर्थव्यवस्था और सरकार का अनिर्णय</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color: blue; font-size: large;"&gt;सरकार और उद्योग जगत के बीच टकराव बढ़ रहा&amp;nbsp;है&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/-6g9NLljRhWU/Tvs3C7AU7fI/AAAAAAAABY4/Rf3snMsxxHo/s1600/Manmohan+Singh+%25282%2529.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; cssfloat: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="320" rea="true" src="http://2.bp.blogspot.com/-6g9NLljRhWU/Tvs3C7AU7fI/AAAAAAAABY4/Rf3snMsxxHo/s320/Manmohan+Singh+%25282%2529.jpg" width="256" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;यह किसी से छुपा नहीं है कि भारतीय अर्थव्यवस्था की हालत अच्छी नहीं है. लेकिन प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री दोनों की शिकायत है कि उद्योग जगत देश में बेवजह निराशा और चिंता का माहौल बना रहा है. इसके कारण स्थिति सुधरने के बजाय और बिगड़ती जा रही है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस मामले में उद्योग जगत के नकारात्मक रवैये से प्रधानमंत्री इतने नाराज हैं कि उन्होंने देश के शीर्ष उद्योगपतियों के साथ एक हालिया बैठक में उन्हें झिड़कने से भी परहेज नहीं किया. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रधानमंत्री उद्योग जगत के उन बयानों से अधिक नाराज हैं जिनमें अर्थव्यवस्था की लड़खड़ाती स्थिति के लिए यू.पी.ए सरकार के ‘नीतिगत पक्षाघात’ को जिम्मेदार ठहराया गया है. कहने की जरूरत नहीं है कि प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री दोनों उद्योग जगत की इस राय से न सिर्फ इत्तेफाक नहीं रखते हैं बल्कि उन्हें लगता है कि उनकी सरकार को बदनाम और अस्थिर करने की कोशिश हो रही है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसमें कोई दो राय नहीं है कि ऐसे बयानों से अनिश्चितता बढ़ती है. लेकिन इससे भी बड़ी बात यह है कि इन बयानों से यह पता चलता है कि यू.पी.ए सरकार और उद्योग जगत के बीच सब कुछ ठीक-ठाक नहीं चल रहा है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उल्टे ऐसा लगता है कि दोनों के बीच अविश्वास और टकराव बढ़ता जा रहा है. दोहराने की जरूरत नहीं है कि मनमोहन सिंह सरकार को लेकर उद्योग जगत खासकर बड़ी देशी-विदेशी पूंजी की निराशा और हताशा बढ़ती जा रही है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसे लगने लगा है कि यह सरकार जिस तरह से अपने ही अंतर्विरोधों में फंसती और अपना राजनीतिक इकबाल गंवाती जा रही है, उसके कारण आर्थिक सुधारों को आगे बढ़ाने का एजेंडा पीछे छूटता जा रहा है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/-u6izC3EoOp8/Tvs3lVDJHhI/AAAAAAAABZE/OoFAgpK3fBs/s1600/Parliament+house.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; cssfloat: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="229" rea="true" src="http://2.bp.blogspot.com/-u6izC3EoOp8/Tvs3lVDJHhI/AAAAAAAABZE/OoFAgpK3fBs/s320/Parliament+house.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;दरअसल, इस सरकार से उद्योग जगत को बहुत उम्मीदें और अपेक्षाएं थीं. उद्योग जगत को विश्वास था कि वामपंथी पार्टियों के दबाव से मुक्त यू.पी.ए-२ सरकार न सिर्फ नव उदारवादी सुधारों को तेजी से आगे बढ़ाएगी बल्कि देश भर में नए औद्योगिक प्रोजेक्ट्स की राह में आ रही बाधाओं को भी हटाएगी. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन पिछले ढाई साल में यह सरकार उनमें से ज्यादातर अपेक्षाओं और उम्मीदों को पूरा नहीं कर पाई. इसके भी कारण किसी से छुपे नहीं हैं. एक तो यह सरकार भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों के कारण राजनीतिक रूप से घिर गई और आपसी झगडों में उलझ गई और दूसरी ओर, देश भर में जल-जंगल-जमीन और पर्यावरण को लेकर किसानों-आदिवासियों और स्थानीय समुदायों का विरोध और संघर्ष तेज होता गया. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नतीजा, यह सरकार चाहकर भी उद्योग जगत की इच्छाएं पूरी नहीं कर पाई. यही नहीं, भ्रष्टाचार के मामलों में राजनेताओं और अफसरों के साथ उद्योग जगत की कई बड़ी हस्तियों को भी जेल जाना पड़ा है. इससे उद्योग जगत की बेचैनी बढ़ी है. आश्चर्य नहीं कि इसी निराशा और बेचैनी में उद्योग जगत का एक हिस्सा न सिर्फ सरकार की मुखर आलोचना करने लगा है बल्कि इस सरकार के राजनीतिक विकल्पों की खोज भी करने लगा है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसी प्रक्रिया में पिछले कुछ महीनों में उद्योग जगत की ओर से सरकार की आलोचना के स्वर मुखर हुए हैं. यही नहीं, कई बड़े उद्योगपतियों ने गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी और बिहार के मुख्यमंत्री नितीश कुमार की उम्मीदवारी को भी आगे बढ़ाना शुरू कर दिया है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/-OpXu11f6VEg/Tvs33xotVMI/AAAAAAAABZQ/D8bTvjaJH-s/s1600/pranab+mukherjee+%25282%2529.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; cssfloat: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="266" rea="true" src="http://1.bp.blogspot.com/-OpXu11f6VEg/Tvs33xotVMI/AAAAAAAABZQ/D8bTvjaJH-s/s320/pranab+mukherjee+%25282%2529.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;जाहिर है कि इससे मनमोहन सिंह सरकार में नाराजगी है. लेकिन वह जानती है कि उद्योग जगत के नाराज करके सत्ता में टिके रहना मुश्किल है. इसलिए उसने उद्योग जगत को खुश करने की बहुत कोशिश की है. पिछले डेढ़ महीने में सरकार ने आनन-फानन में ऐसे कई फैसले किये जिनका असली मकसद बड़ी पूंजी को खुश करना है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;निश्चित ही, इनमें सबसे बड़ा फैसला खुदरा व्यापार में विदेशी पूंजी की इजाजत देने का था. लेकिन अपने राजनीतिक अंतर्विरोधों और देशव्यापी विरोध प्रदर्शनों के कारण सरकार को यह फैसला वापस लेना पड़ा. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इससे उद्योग जगत और सरकार के बीच खिंचाव और अविश्वास बढ़ा है. उद्योग जगत को लगता है कि सरकार ने इस महत्वपूर्ण फैसले के बचाव के लिए उतनी गंभीर कोशिश नहीं की जितनी परमाणु डील के समय की थी. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सरकार का तर्क है कि उद्योग जगत गठबंधन राजनीति की मजबूरियों को समझ नहीं पा रहा है. इस तरह सरकार और उद्योग जगत के बीच टकराव बढ़ता ही जा रहा है. इस टकराव के कारण जो ‘नीतिगत पक्षाघात’ की स्थिति बन गई है, उसका सीधा असर अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह किसी से छुपा नहीं है कि औद्योगिक उत्पादन दर के साथ-साथ जी.डी.पी की वृद्धि दर भी गिर रही है. साफ़ है कि अर्थव्यवस्था में नया निवेश नहीं हो रहा है. घरेलू और वैश्विक अर्थव्यवस्था में अनिश्चितता के कारण बड़ी निजी पूंजी नया निवेश नहीं कर रही है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इससे मांग भी मंद पड़ रही है. इस प्रक्रिया में अर्थव्यवस्था एक तरह के दुष्चक्र में फंसती हुई दिखाई दे रही है. अगर अर्थव्यवस्था को इस दुष्चक्र से निकालने की तुरंत कोशिश नहीं की गई तो स्थिति सचमुच बद से बदतर हो सकती है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/-DCjke0lSR5g/Tvs4hPSjgzI/AAAAAAAABZk/O7qMNpzqDv4/s1600/pm%2527s+economic+advisors.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; cssfloat: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="175" rea="true" src="http://2.bp.blogspot.com/-DCjke0lSR5g/Tvs4hPSjgzI/AAAAAAAABZk/O7qMNpzqDv4/s320/pm%2527s+economic+advisors.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;अच्छी बात यह है कि भारतीय अर्थव्यवस्था की स्थिति उतनी बुरी नहीं है जितनी गुलाबी अखबार और उद्योग जगत बताने की कोशिश कर रहे हैं. उनकी इस कोशिश के पीछे उनका अपना एजेंडा है. वे सरकार पर दबाव बनाने और आर्थिक सुधारों की गति तेज करने की कोशिश कर रहे हैं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन इससे स्थिति में कोई सुधार नहीं आनेवाला है. इसके उलट अगर सरकार में इच्छाशक्ति हो तो वह अर्थव्यवस्था खासकर आधारभूत ढांचे में सार्वजनिक निवेश को बढाकर अर्थव्यवस्था को संभाल सकती है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन मुश्किल यह है कि यू.पी.ए सरकार खुद नव उदारवादी सुधारों से इस कदर मोहग्रस्त है कि वह सार्वजनिक निवेश बढ़ाने के लिए तैयार नहीं है. इसकी वजह यह है कि नव उदारवादी आर्थिक सैद्धांतिकी में अर्थव्यवस्था में राज्य की भूमिका घटाने और निजी क्षेत्र को प्रोत्साहित करने पर अधिक जोर दिया जाता है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसके लिए तर्क यह दिया जाता है कि सार्वजनिक क्षेत्र की तुलना में निजी क्षेत्र किसी बिजनेस को चलाने में ज्यादा सक्षम और प्रभावी होता है. इनकी नजर में सार्वजनिक क्षेत्र भ्रष्टाचार और काहिली का पर्याय है. यही कारण है कि आर्थिक सुधारों के पिछले डेढ़-दो दशकों में सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों को विनिवेश के नाम पर औने-पौने दामों पर निजी क्षेत्र को सौंप दिया गया है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन मनमोहन सिंह सरकार यह भूल रही है कि इस समय जब देश औद्योगिक मंदी के खतरे के सामने है और निजी क्षेत्र निवेश के लिए आगे नहीं आ रहा है तो उस समय निवेश के बजाय विनिवेश की कोशिश अर्थव्यवस्था के लिए बहुत घातक साबित हो सकती है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;असल में , इस समय निजी निवेश को भी&amp;nbsp;प्रोत्साहित&amp;nbsp;करने के लिए जरूरी है कि सार्वजनिक निवेश को ज्यादा से ज्यादा बढ़ाया जाए. इससे अर्थव्यवस्था में पूंजीगत से लेकर अन्य औद्योगिक उत्पादों की मांग बढ़ेगी जो निजी क्षेत्र को नए निवेश के लिए आकर्षित करेगी. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/-uLl1JQu-M6A/Tvs44fWfJ-I/AAAAAAAABZw/At3mWP5j_0c/s1600/Manmohan+Singh+3+%25282%2529.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; cssfloat: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="266" rea="true" src="http://2.bp.blogspot.com/-uLl1JQu-M6A/Tvs44fWfJ-I/AAAAAAAABZw/At3mWP5j_0c/s320/Manmohan+Singh+3+%25282%2529.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;लगता है कि यह सरकार पूंजीवादी अर्थशास्त्र में कीन्स के इस महत्वपूर्ण सिद्धांत को भूल गई है जो कहता है कि मंदी के समय निजी निवेश को प्रोत्साहित करने के लिए सार्वजनिक निवेश को बढ़ाना चाहिए. यही नहीं, सरकार के पास संसाधनों की भी कमी नहीं है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अलबत्ता, मनमोहन सिंह सरकार में राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी साफ़ दिखाई पड़ रही है. यह सचमुच हैरानी की बात है कि सार्वजनिक क्षेत्र की कोई दो दर्जन कम्पनियों के पास इस समय २०५२५५ करोड़ रूपये का नगद और बैंक डिपोजिट है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन ये कम्पनियाँ इसे नई परियोजनाओं में निवेश नहीं कर रही हैं. उल्टे सरकार इन कंपनियों का विनिवेश करने पर तुली हुई है. लेकिन सरकार अगर इन कम्पनियों को निवेश खासकर आधारभूत ढांचा क्षेत्र में निवेश के लिए प्रोत्साहित करे तो औद्योगिक विकास में आ रही गिरावट को रोका जा सकता है. क्या सरकार इसके लिए तैयार है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;&lt;em&gt;(दैनिक 'नया इंडिया' में २६ दिसंबर और&amp;nbsp;'जनसंदेश टाइम्स' में&amp;nbsp;२८&amp;nbsp;दिसंबर&amp;nbsp;को&amp;nbsp;सम्पादकीय&amp;nbsp;पृष्ठ&amp;nbsp;पर&amp;nbsp;प्रकाशित&amp;nbsp;लेख)&lt;/em&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8157191427767672214-4355125366782729739?l=teesraraasta.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://teesraraasta.blogspot.com/feeds/4355125366782729739/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8157191427767672214&amp;postID=4355125366782729739' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8157191427767672214/posts/default/4355125366782729739'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8157191427767672214/posts/default/4355125366782729739'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://teesraraasta.blogspot.com/2011/12/blog-post_28.html' title='लड़खड़ाती अर्थव्यवस्था और सरकार का अनिर्णय'/><author><name>आनंद प्रधान</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05288123571817148120</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_r2d8D7rSfq8/SzcAjql1JOI/AAAAAAAAAGg/C6og8D0qeWE/S220/anand+pradhan+in+class.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/-6g9NLljRhWU/Tvs3C7AU7fI/AAAAAAAABY4/Rf3snMsxxHo/s72-c/Manmohan+Singh+%25282%2529.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8157191427767672214.post-2698368796132022231</id><published>2011-12-24T11:47:00.000+05:30</published><updated>2011-12-24T11:47:40.461+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='भारतीय अर्थव्यवस्था'/><title type='text'>सरकार के न्यौते पर आई है औद्योगिक मंदी</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;span style="color: blue; font-size: large;"&gt;&lt;strong&gt;सरकार के पास संसाधनों की नहीं बल्कि राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी है&amp;nbsp;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/-B_wrXsQGo94/TvVd6Prg7pI/AAAAAAAABXk/MRiYIm2rKPk/s1600/images%255B1%255D.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; cssfloat: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="212" rea="true" src="http://1.bp.blogspot.com/-B_wrXsQGo94/TvVd6Prg7pI/AAAAAAAABXk/MRiYIm2rKPk/s320/images%255B1%255D.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;भारतीय अर्थव्यवस्था लड़-खड़ाकर पटरी से उतर रही है. यह एक ऐसी कड़वी सच्चाई है जिसे अनदेखा करना अब मुश्किल है. इसका सबसे ताजा सबूत यह है कि अक्टूबर महीने में औद्योगिक विकास की दर फिसलकर नकारात्मक हो गई है. ताजा आंकड़ों के मुताबिक, सवा दो वर्षों में पहली बार औद्योगिक उत्पादन की वृद्धि दर अक्टूबर महीने में तेज गिरावट के साथ (–) ५.१ प्रतिशत रह गई है. पिछले वर्ष इसी महीने में औद्योगिक उत्पादन की वृद्धि दर ११.३ फीसदी थी. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;औद्योगिक विकास की दर के नकारात्मक होने की गंभीरता को इस तथ्य से समझा जा सकता है कि इससे पहले अमेरिकी वित्तीय संकट और उसके कारण पैदा हुई वैश्विक मंदी के बीच औद्योगिक उत्पादन की दर दिसंबर’०८ से लगातार छह महीने तक नकारात्मक रही थी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन इसमें चौंकानेवाली कोई बात नहीं है. सच यह है कि औद्योगिक उत्पादन की दर में गिरावट की आशंका काफी पहले से जाहिर की जा रही थी. इसके संकेत भी पहले से मिलने लगे थे. जैसे, इससे ठीक पहले सितम्बर महीने में औद्योगिक उत्पादन की वृद्धि दर लुढ़ककर मात्र १.९ फीसदी रह गई थी. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यही नहीं, इस वित्तीय वर्ष में जुलाई से सितम्बर की तिमाही में औद्योगिक उत्पादन दर सिर्फ ३ फीसदी रही और अप्रैल से सितम्बर के बीच छह महीनों में औद्योगिक उत्पादन की दर सिर्फ ५ फीसदी रही जबकि पिछले वर्ष की इसी अवधि में यह दर ८.२ फीसदी थी. साथ ही, इस वित्तीय वर्ष के पहले छह महीनों में जी.डी.पी की वृद्धि दर गिरकर सिर्फ ६.९ प्रतिशत रह गई है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;साफ़ है कि औद्योगिक उत्पादन में आई गिरावट न तो अचानक है और न ही अप्रत्याशित. लेकिन इस गिरावट की गहराई जरूर अप्रत्याशित और चिंतित करनेवाली है. यह गिरावट इसलिए भी गंभीर और चिंतित करनेवाली है क्योंकि गिरावट का दायरा और गहराई औद्योगिक उत्पादन के कुछ क्षेत्रों तक सीमित नहीं है बल्कि उसके प्रभाव से कोई भी क्षेत्र अछूता नहीं बचा है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/-AZFloLU2H0I/TvVeEAfCt4I/AAAAAAAABXw/VMaXH_xDfZg/s1600/images%255B4%255D.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; cssfloat: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="217" rea="true" src="http://2.bp.blogspot.com/-AZFloLU2H0I/TvVeEAfCt4I/AAAAAAAABXw/VMaXH_xDfZg/s320/images%255B4%255D.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;उदाहरण के लिए, औद्योगिक उत्पादन के सबसे महत्वपूर्ण घटक मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र में वृद्धि दर नकारात्मक (-) ६ फीसदी और खनन (माइनिंग) क्षेत्र में भी वृद्धि दर नकारात्मक (-) ७.२ फीसदी रही. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यही नहीं, मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र में भी किसी भी क्षेत्र- चाहे बेसिक गुड्स हो या इंटरमीडिएट गुड्स या कैपिटल गुड्स या फिर कंज्यूमर गुड्स में धनात्मक वृद्धि दर नहीं दर्ज की गई है. यहाँ तक कि पूंजीगत सामानों (कैपिटल गुड्स) की वृद्धि दर में सबसे तेज और भारी गिरावट दर्ज की गई है जहां ऋणात्मक वृद्धि दर (-) २५.५ तक पहुँच गई. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसमें भी विद्युत मशीनरी और उपकरणों में (-) ५८.८ प्रतिशत और अन्य मशीनरी और उपकरणों में (-) १२.१ फीसदी की भारी गिरावट दर्ज की गई है. दूसरी ओर, खनन क्षेत्र में गिरावट का आलम यह है कि चालू वित्तीय वर्ष में लगातार तीसरे महीने इस क्षेत्र में ऋणात्मक वृद्धि दर्ज की गई है. इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि संकट कितना गहरा और गंभीर है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कहने की जरूरत नहीं है कि औद्योगिक उत्पादन में मौजूदा गिरावट के कई कारण हैं. अर्थव्यवस्था के सरकारी मैनेजर इसका सारा दोष अमेरिकी और यूरोपीय अर्थव्यवस्था के संकट और उसके कारण वैश्विक अर्थव्यवस्था में ठहराव और अनिश्चितता के मत्थे मढ़कर बच निकलने की कोशिश कर रहे हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जबकि उद्योग जगत और गुलाबी अखबार इसका सारा ठीकरा यू.पी.ए सरकार के ‘नीतिगत पक्षाघात’ यानी आर्थिक सुधारों को आगे बढ़ाने में नाकामी और रिजर्व बैंक की सख्त मौद्रिक नीति पर फोड़ रहे हैं. लेकिन न तो सरकार और न ही उद्योग जगत पूरी सच्चाई बता रहे हैं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह सच है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था की अनिश्चितता और कमजोरी का भारतीय अर्थव्यवस्था खासकर औद्योगिक उत्पादन पर असर पड़ा है. इसका प्रभाव खासकर भारतीय निर्यात में आए गिरावट में दिख रहा है जिससे औद्योगिक उत्पादों के मांग में कमी आई है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह भी सही है कि पिछले डेढ़ साल से रिजर्व बैंक ने आसमान छूती मुद्रास्फीति को काबू में करने के लिए जिस तरह से ब्याज दरों में वृद्धि की है, उसके कारण नए निवेश खासकर निजी पूंजी निवेश में भारी गिरावट आई है जो औद्योगिक उत्पादन खासकर कैपिटल गुड्स में भारी गिरावट की एक बड़ी वजह है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/-Req9moSbZ8Q/TvVeRjOgzmI/AAAAAAAABX8/XDKRb-PolPk/s1600/Manmohan+singh+down.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; cssfloat: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="231" rea="true" src="http://2.bp.blogspot.com/-Req9moSbZ8Q/TvVeRjOgzmI/AAAAAAAABX8/XDKRb-PolPk/s320/Manmohan+singh+down.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;यही नहीं, नए निवेश में गिरावट की एक वजह सरकार का अनिर्णय और ‘नीतिगत पक्षाघात’ भी है लेकिन यह वह ‘पक्षाघात’ नहीं है जो उद्योग जगत और गुलाबी अखबार बता रहे हैं. दरअसल, औद्योगिक उत्पादन में ऋणात्मक वृद्धि की सबसे बड़ी और बुनियादी वजह यह है कि औद्योगिक उत्पादों की मांग में निरंतर और व्यापक वृद्धि का अभाव और इस कारण नए निवेश में वृद्धि का न होना. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसके लिए सरकार की नीतियां जिम्मेदार हैं. इस मायने में इस औद्योगिक मंदी को सरकार ने निमंत्रित किया है. तथ्य यह है कि नव उदारवादी आर्थिक सुधारों के प्रति अति व्यामोह (आब्सेशन) के कारण सरकार ने औद्योगिक क्षेत्र को पूरी तरह से निजी क्षेत्र के भरोसे छोड़ दिया है. लेकिन निजी क्षेत्र औद्योगिक क्षेत्र खासकर आधारभूत ढांचागत क्षेत्र में निवेश को लेकर बहुत उत्साहित नहीं दिखता है या अपनी शर्तों पर और भारी मुनाफे की गारंटी के साथ निवेश करना चाहता है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;केन्द्र और राज्य सरकारों ने ‘विकास’ के नाम पर देशी-विदेशी बड़ी निजी पूंजी की इन मांगों को सहर्ष स्वीकार भी किया है लेकिन मुश्किल यह है कि आम लोग खासकर गरीब किसान, आदिवासी और हाशिए पर पड़े लोग इसे स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसका नतीजा यह हुआ है कि हाल के वर्षों में देश भर में जहां भी बड़ी देशी-विदेशी पूंजी नई परियोजनाएँ शुरू करने की कोशिश कर रही है, स्थानीय जनता के साथ जल, जंगल और जमीन से लेकर खनिजों के दोहन को लेकर तीखा संघर्ष शुरू हो जा रहा है. लोगों की आजीविका से लेकर पर्यावरण के सवाल उठ रहे हैं. इसके कारण स्टील से लेकर बिजली और खनन से लेकर रीयल इस्टेट तक अनेकों बड़ी-छोटी परियोजनाएं ठप्प पड़ी हैं या उनमें काम की रफ़्तार बहुत धीमी है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कहने की जरूरत नहीं है कि इन टकरावों में चाहे वह केन्द्र सरकार हो या राज्य सरकारें, वे बड़ी पूंजी के साथ खड़ी हैं. वे निजी पूंजी को हर तरह की रियायतें देने से लेकर उनपर सार्वजनिक संसाधनों को लुटाने (बतर्ज २ जी) में अब भी संकोच नहीं कर रही हैं. लेकिन दूसरी ओर, दमन के बावजूद गरीब लोग पीछे हटने को तैयार नहीं हैं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/-8oPbmufH3tY/TvVfqOkHuCI/AAAAAAAABYI/0JOoIkwhNKM/s1600/imagesCAD9TPKN.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; cssfloat: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="320" rea="true" src="http://3.bp.blogspot.com/-8oPbmufH3tY/TvVfqOkHuCI/AAAAAAAABYI/0JOoIkwhNKM/s320/imagesCAD9TPKN.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;उनके लिए यह जीवन-मरण का प्रश्न बन गया है. सरकार चाहकर भी उन्हें हटा नहीं पा रही है. दूसरी ओर, उद्योग जगत अभी भी गरीब किसानों की भावनाओं और जरूरतों को समझने के लिए तैयार नहीं है. वह न तो मुनाफे की भूख को कम करने के लिए राजी है और न ही अपने मुनाफे में स्थानीय समुदायों और गरीबों को उनकी न्यायोचित हिस्सेदारी देने के लिए तैयार है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नतीजा यह कि एक गतिरोध बन गया है. इस गतिरोध को उद्योग जगत और उनके भोंपू गुलाबी अखबार ‘नीतिगत पक्षाघात’ बता रहे हैं और चाहते हैं कि सरकार न सिर्फ अर्थव्यवस्था को विदेशी पूंजी के लिए और खोले बल्कि मौजूदा परियोजनाओं के रास्ते में आ रही बाधाओं को भी दूर करे. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यू.पी.ए सरकार अपनी ‘राजनीतिक और लोकतान्त्रिक मजबूरियों’ के बीच यह कोशिश भी कर रही है लेकिन उतनी कामयाब नहीं हो पा रही है जितनी उद्योग जगत अपेक्षा कर रहा है. जाहिर है कि इसके कारण निजी निवेश पर नकारात्मक असर पड़ रहा है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/-mDHmzAWBm6Q/TvVgo6g97gI/AAAAAAAABYU/FDPYStxli-s/s1600/poor+adivasi+protest.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; cssfloat: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="212" rea="true" src="http://4.bp.blogspot.com/-mDHmzAWBm6Q/TvVgo6g97gI/AAAAAAAABYU/FDPYStxli-s/s320/poor+adivasi+protest.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;लेकिन अब समय आ गया है जब सरकार और उद्योग जगत विकास के नाम पर विस्थापन और गरीबों की आजीविका छीनने और पर्यावरण को ठेंगा दिखाने की नीति से बाज आयें. साफ है कि औद्योगिकीकरण की प्रक्रिया में लोगों को बराबरी का हक दिए बिना आगे बढ़ना संभव नहीं है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन इसके साथ ही यह भी सच है कि निजी निवेश में कमी इस कारण भी आ रही है क्योंकि आधारभूत ढांचा क्षेत्र की लंबे अरसे से उपेक्षा और अपेक्षित निवेश न होने से निजी निवेश के लिए नए निवेश में अपेक्षित प्रोत्साहन नहीं है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसे में, यह जरूरी है कि सरकार निजी निवेश को प्रोत्साहित करने के लिए अर्थव्यवस्था खासकर आधारभूत ढांचा क्षेत्र में निवेश बढ़ाए. इससे रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे, उससे मांग बढ़ेगी और निजी क्षेत्र के निवेश के लिए अनुकूल माहौल बनेगा. एक बात साफ़ है कि घरेलू मांग को बढ़ाए बिना औद्योगिक मंदी को रोक पाना असंभव है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन जब भी अर्थव्यवस्था में सार्वजनिक निवेश और उसके जरिये मांग को बढ़ाने की बात होती है, सरकार तुरंत संसाधनों की कमी का रोना रोने लगती है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन यह सच नहीं है. सच यह है कि सरकार के पास संसाधनों की नहीं बल्कि राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी है. यह सचमुच हैरानी की बात है कि सार्वजनिक क्षेत्र की कोई दो दर्जन कम्पनियों के पास इस समय २०५२५५ करोड़ रूपये का नगद और बैंक डिपोजिट है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन ये कम्पनियाँ इसे नई परियोजनाओं में निवेश नहीं कर रही हैं. उल्टे सरकार इन कंपनियों का विनिवेश करने पर तुली हुई है. लेकिन सरकार अगर इन कम्पनियों को निवेश खासकर आधारभूत ढांचा क्षेत्र में निवेश के लिए प्रोत्साहित करे तो औद्योगिक विकास में आ रही गिरावट को रोका जा सकता है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/-RhD2NYMAtyI/TvVuYhZ4iUI/AAAAAAAABYs/4MufNMkmXMM/s1600/images%255B7%255D+%25282%2529.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; cssfloat: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="175" rea="true" src="http://2.bp.blogspot.com/-RhD2NYMAtyI/TvVuYhZ4iUI/AAAAAAAABYs/4MufNMkmXMM/s320/images%255B7%255D+%25282%2529.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;उदाहरण के लिए, चीन इस समय अपने रेल नेटवर्क के भारी विस्तार में जुटा है. साथ ही, वह आधारभूत ढांचा में भारी निवेश के जरिये घरेलू मांग को बढ़ाने की नीति पर चल रहा है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस मामले में चीन से सीखने की जरूरत है. लेकिन इसके लिए नव उदारवादी आर्थिक सैद्धांतिकी के व्यामोह से बाहर आना पड़ेगा. क्या यू.पी.ए सरकार इसके लिए तैयार है? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;('राष्ट्रीय सहारा' के हस्तक्षेप में प्रकाशित आलेख:&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&amp;nbsp;&lt;a href="http://rashtriyasahara.samaylive.com/epapermain.aspx?queryed=17"&gt;http://rashtriyasahara.samaylive.com/epapermain.aspx?queryed=17&lt;/a&gt; )&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8157191427767672214-2698368796132022231?l=teesraraasta.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://teesraraasta.blogspot.com/feeds/2698368796132022231/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8157191427767672214&amp;postID=2698368796132022231' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8157191427767672214/posts/default/2698368796132022231'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8157191427767672214/posts/default/2698368796132022231'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://teesraraasta.blogspot.com/2011/12/blog-post_24.html' title='सरकार के न्यौते पर आई है औद्योगिक मंदी'/><author><name>आनंद प्रधान</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05288123571817148120</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_r2d8D7rSfq8/SzcAjql1JOI/AAAAAAAAAGg/C6og8D0qeWE/S220/anand+pradhan+in+class.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/-B_wrXsQGo94/TvVd6Prg7pI/AAAAAAAABXk/MRiYIm2rKPk/s72-c/images%255B1%255D.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8157191427767672214.post-6303308945946976069</id><published>2011-12-21T21:03:00.000+05:30</published><updated>2011-12-21T21:03:17.659+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='तमाशा मेरे आगे'/><title type='text'>कपिल सिब्बल को गुस्सा क्यों आता है?</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: blue; font-size: large;"&gt;&lt;strong&gt;कहीं पे निगाहें, कहीं पे निशाना : आपत्तिजनक कंटेंट तो बहाना है, रैडिकल समूह असली निशाना हैं &lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/-yUjk0dtXWiM/TvH7F3fI1sI/AAAAAAAABXA/MQp6VP9T_qQ/s1600/Kapil+Sibbal.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; cssfloat: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="280" oda="true" src="http://1.bp.blogspot.com/-yUjk0dtXWiM/TvH7F3fI1sI/AAAAAAAABXA/MQp6VP9T_qQ/s320/Kapil+Sibbal.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;संचार मंत्री कपिल सिब्बल फेसबुक, गूगल और याहू जैसे इंटरनेट और सोशल नेटवर्किंग साइट्स से खासे नाराज हैं. उनकी नाराजगी की वजह खुद उनके मुताबिक यह है कि इन साइट्स पर ऐसा ‘बहुत कुछ आपत्तिजनक’ है जो न सिर्फ ‘भारतीय लोगों की संवेदनाओं और धार्मिक भावनाओं को चोट’ पहुंचा सकता है बल्कि दंगे-फसाद की वजह बन सकता है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसलिए सिब्बल साहब चाहते हैं कि ये साइट्स न सिर्फ ऐसे ‘आपत्तिजनक’ कंटेंट को तुरंत हटाएँ बल्कि ऐसी व्यवस्था करें कि इस तरह का ‘आपत्तिजनक’ कंटेंट इन साइट्स पर अपलोड होने से पहले फिल्टर किया जाए. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन सिब्बल ने यह कहकर जैसे बर्र के छत्ते को छेड दिया. इंटरनेट और खासकर सोशल नेटवर्किंग साइट्स की आभासी दुनिया से लेकर न्यूज चैनलों के स्टूडियो तक में हंगामा और बहसें शुरू हो गईं. सिब्बल के असली इरादों पर सवाल उठने लगे. माना गया कि वे इंटरनेट खासकर सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर अपनी सरकार और नेताओं की आलोचनाओं से बौखलाए हुए हैं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह भी कि सिब्बल सरकार विरोधी आन्दोलनों खासकर भ्रष्टाचार विरोधी लोकपाल आंदोलन में लोगों को जोड़ने और सक्रिय करने में इन साइट्स की उल्लेखनीय भूमिका से भी घबराए हुए हैं. इसी नाराजगी और घबराहट में वे इन साइट्स पर सेंसरशिप आयद करने और उन्हें काबू में करने की कोशिश कर रहे हैं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/-eKPtIsfotxE/TvH7iZk-gWI/AAAAAAAABXI/MSL4A1tX60o/s1600/tote.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; cssfloat: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="238" oda="true" src="http://2.bp.blogspot.com/-eKPtIsfotxE/TvH7iZk-gWI/AAAAAAAABXI/MSL4A1tX60o/s320/tote.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;हालांकि इन तीखी आलोचनाओं ने सिब्बल को सफाई पेश करने के लिए मजबूर कर दिया और वे अब दावा कर रहे हैं कि इंटरनेट पर सेंसरशिप थोपने का उनका कोई इरादा नहीं है. वे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की कसमें भी खा रहे हैं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सिब्बल का कहना है कि वे तो सिर्फ इतना चाहते हैं कि ये साइट्स ‘आपत्तिजनक’ कंटेंट के मामले में आत्म-नियमन (सेल्फ-रेगुलेशन) का पालन करें. अहा! सिब्बल साहब की इस मासूमियत पर कौन न कुर्बान हो जाए? बकौल ग़ालिब, ‘इस सादगी पर कौन न मर जाए ऐ खुदा, लड़ते हैं और हाथ में तलवार भी नहीं.’ &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन सिब्बल, सिब्बल हैं. वे अपनी तलवार जितनी छुपाने की कोशिश करें, वह छुप नहीं पा रही है. वे एक ओर अभिव्यक्ति की आज़ादी के प्रति अपनी वचनबद्धता की दुहाईयां भी दे रहे हैं लेकिन दूसरी ही सांस में इन साइट्स को चेताने से भी बाज नहीं आ रहे हैं कि उन्हें ‘भारतीय संवेदनशीलताओं’ का ध्यान रखना होगा. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सिब्बल के मुताबिक, वे इन साइट्स पर लोगों की धार्मिक भावनाओं को चोट पहुंचाने वाले ‘आपत्तिजनक’ कंटेंट को बर्दाश्त नहीं करेंगे. साफ़ है कि सिब्बल पीछे हटने के लिए तैयार नहीं हैं. यह भी कि वे पूरी तैयारी के साथ मैदान में उतरे हैं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कहने की जरूरत नहीं है कि इस तैयारी के तहत ही वे इन साइट्स पर धार्मिक भावनाओं को आहत करनेवाले कंटेंट पर अंकुश लगाने की आड़ ले रहे हैं. अन्यथा किसे पता नहीं है कि उनके गुस्से और घबराहट की असली वजह क्या है? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/-f7K-Q3nCqzg/TvH7w85creI/AAAAAAAABXQ/5WGr2EtVeyw/s1600/Truth+1.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; cssfloat: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="239" oda="true" src="http://2.bp.blogspot.com/-f7K-Q3nCqzg/TvH7w85creI/AAAAAAAABXQ/5WGr2EtVeyw/s320/Truth+1.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;सिब्बल साहब मानें या न मानें लेकिन सच यह है कि वे मध्यवर्ग खासकर युवाओं के बीच सूचना, संवाद, चर्चा और संगठन के नए, ज्यादा खुले और वैकल्पिक मंच के बतौर उभरे इन साइट्स की बढ़ती लोकप्रियता से घबराए हुए हैं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसमें कोई दो राय नहीं है कि सरकार और व्यवस्था विरोधी रैडिकल समूहों और व्यक्तियों के लिए ये साइट्स मुख्यधारा के कारपोरेट मीडिया की तुलना में ज्यादा सुलभ और खुली हुई हैं. बेशक, इन समूहों की उपस्थिति ने इन साइट्स अभिव्यक्ति का वैकल्पिक मंच बना दिया है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन साइट्स के प्रति सिब्बल साहब के गुस्से की बड़ी वजह यही है. उनकी बौखलाहट इस खीज से निकली है कि अभी तक वे इस मंच को कारपोरेट मीडिया की तरह ‘मैनेज’ करने के तरीके नहीं खोज पाए हैं. इन मंचों पर उनकी घुसपैठ अभी सीमित है, उसे काबू में करने की तो बात ही दूर है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन यह सिर्फ सिब्बल की खीज और गुस्सा नहीं है. सिब्बल सिर्फ एक प्रतीक भर हैं. असल में, सत्ता और व्यवस्था विरोधी समूहों ने दुनिया भर में जिस तरह से इंटरनेट और उसपर मौजूद ब्लॉग, सोशल नेटवर्किंग साइट्स जैसे नए माध्यमों को लोगों तक सूचनाएं पहुंचाने, महत्वपूर्ण मुद्दों पर खुली चर्चाएँ छेड़ने और लोगों को संगठित करने के लिए इस्तेमाल किया है, उससे इस नए खतरे को लेकर सरकारों और शासक वर्गों की नींद खुल गई है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नतीजा, भारत ही नहीं, पूरी दुनिया के कपिल सिब्बल एकजुट हो रहे हैं. इसके साथ ही, इन नए माध्यमों को काबू करने, उनमें घुसपैठ करने, उन्हें मैनेज करने और उनकी निगरानी की कोशिशें बड़े पैमाने पर शुरू हो गईं हैं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/-fxwDo_dwWPA/TvH8Dug1UnI/AAAAAAAABXY/jl485ZJwfY0/s1600/Don%2527t+trust+corporate+media.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; cssfloat: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="320" oda="true" src="http://2.bp.blogspot.com/-fxwDo_dwWPA/TvH8Dug1UnI/AAAAAAAABXY/jl485ZJwfY0/s320/Don%2527t+trust+corporate+media.jpg" width="261" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;कहीं आतंकवाद से निपटने के नाम पर, कहीं धार्मिक भावनाओं की हिफाजत के बहाने और कहीं समाज को ‘आपत्तिजनक’ कंटेंट से बचाने के नाम पर नए माध्यमों की घेराबंदी शुरू हो गई है. कहने की जरूरत नहीं है कि जब तक ये नए माध्यम लोगों के मनोरंजन, सतही चैट और सस्ती पोर्नोग्राफी के माध्यम थे, सत्ता और शासक वर्गों को कोई शिकायत नहीं थी. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन जैसे ही इन माध्यमों को सत्ता की पोल खोलने, वैकल्पिक विमर्शों और आन्दोलनों को आगे बढ़ाने के लिए इस्तेमाल किया जाने लगा, सरकारों को उनमें देश-समाज-समुदायों के लिए खतरा दिखने लगा है. वे इन माध्यमों खासकर इन्हें इस्तेमाल करने वाले समूहों/व्यक्तियों के खिलाफ टूट पड़ी हैं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस मायने में, आज जूलियन असान्जे और विकिलिक्स के साथ जो हो रहा है, वह सिर्फ ट्रेलर है. इससे निश्चय ही, कपिल सिब्बल जैसों की हिम्मत बढ़ी है. वे चुप नहीं बैठनेवाले हैं. हैरानी नहीं होगी, अगर आने वाले दिनों में इन साइट्स और उनसे ज्यादा इनका इस्तेमाल करनेवाले रैडिकल समूहों और व्यक्तियों पर सिब्बलों और उन जैसों की गाज गिरे. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बिहार में नितीश कुमार के ‘सुशासन’ की फेसबुक पर कलई खोलने वाले मुसाफिर बैठा और अरुण नारायण को जिस तरह से इसकी कीमत चुकानी पड़ी है, उससे साफ़ है कि इस मामले में कपिल सिब्बलों और नितीश कुमारों के बीच कोई फर्क नहीं है. यह भी कि आगे क्या होनेवाला है? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;&lt;strong&gt;('तहलका' के ३१ दिसंबर'११&amp;nbsp;के अंक में प्रकाशित स्तम्भ का पूरा हिस्सा)&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8157191427767672214-6303308945946976069?l=teesraraasta.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://teesraraasta.blogspot.com/feeds/6303308945946976069/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8157191427767672214&amp;postID=6303308945946976069' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8157191427767672214/posts/default/6303308945946976069'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8157191427767672214/posts/default/6303308945946976069'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://teesraraasta.blogspot.com/2011/12/blog-post_21.html' title='कपिल सिब्बल को गुस्सा क्यों आता है?'/><author><name>आनंद प्रधान</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05288123571817148120</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_r2d8D7rSfq8/SzcAjql1JOI/AAAAAAAAAGg/C6og8D0qeWE/S220/anand+pradhan+in+class.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/-yUjk0dtXWiM/TvH7F3fI1sI/AAAAAAAABXA/MQp6VP9T_qQ/s72-c/Kapil+Sibbal.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8157191427767672214.post-5072576521080677411</id><published>2011-12-13T15:32:00.000+05:30</published><updated>2011-12-13T15:32:08.271+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='महंगाई'/><title type='text'>महंगाई नहीं, मुद्रास्फीति कम हुई है</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color: blue; font-size: large;"&gt;महंगाई की हकीकत आंकड़ों में नहीं, आम आदमी की थाली में दिखाई देती है&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/-bmDb7wURgws/TuchZAiggTI/AAAAAAAABWY/pHBOolmRPEY/s1600/inflation+2.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; cssfloat: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="315" oda="true" src="http://4.bp.blogspot.com/-bmDb7wURgws/TuchZAiggTI/AAAAAAAABWY/pHBOolmRPEY/s320/inflation+2.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;पिछले ढाई-तीन सालों से यू.पी.ए सरकार के लिए बड़ा सिरदर्द बनी हुई खाद्य मुद्रास्फीति की दर २६ नवंबर को खत्म हुए सप्ताह में गिरकर ६.६ प्रतिशत क्या हुई, सरकार के आर्थिक मैनेजरों के चेहरों पर न सिर्फ खुशी लौट आई है बल्कि उनमें अपनी और एक-दूसरे की पीठ थपथपाने की होड़ शुरू हो गई है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यही नहीं, एक बार फिर से बड़बोले दावों का दौर शुरू हो गया है. दावा किया जा रहा है कि अगले मार्च तक थोक मूल्य सूचकांक पर आधारित खाद्य मुद्रास्फीति और आम मुद्रास्फीति की दर पूरी तरह से काबू में आ जायेगी और सात फीसदी से नीचे की आरामदेह स्थिति में होगी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसके साथ ही सरकार के राजनीतिक और आर्थिक मैनेजरों में महंगाई पर काबू पाने की चुनौती को लेकर एक निश्चिन्तता और खुशफहमी का भाव भी दिखाई पड़ने लगा है. हालांकि जल्दबाजी में महंगाई की आग में कई बार हाथ जला चुके ये मैनेजर खुलकर यह कह नहीं पा रहे हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन उनके हालिया बयानों का निष्कर्ष यही है कि मुद्रास्फीति खासकर खाद्य मुद्रास्फीति न सिर्फ काबू में आ गई है बल्कि वह उतनी बड़ी आर्थिक समस्या नहीं रह गई है जितनी कि उसे लेकर राजनीतिक शोर मचाया जा रहा है. संसद में महंगाई पर हुई चर्चा में वित्त मंत्री के जवाब और सरकार द्वारा पेश अर्थव्यवस्था की छमाही समीक्षा में इसकी झलक देखी जा सकती है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन यह पूरा सच नहीं है. पूरा सच यह है कि मुद्रास्फीति की दर भले कम हुई है लेकिन महंगाई कम नहीं हुई है. तथ्य यह है कि मुद्रास्फीति की दर और वास्तविक महंगाई के बीच बहुत बड़ा फासला है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यही कारण है कि सरकार और उसके आर्थिक मैनेजर भले ही मुद्रास्फीति की दर में कमी और उसके ७ फीसदी से कम होने का जश्न मना रहे हों लेकिन हकीकत यह है कि आसमान छूती महंगाई की मार से आम लोगों को अभी भी कोई खास राहत नहीं मिली है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/-uqZS2WecXoA/TuchrqE_0vI/AAAAAAAABWo/tU4M04RBx0s/s1600/Food+inflation.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; cssfloat: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="236" oda="true" src="http://1.bp.blogspot.com/-uqZS2WecXoA/TuchrqE_0vI/AAAAAAAABWo/tU4M04RBx0s/s320/Food+inflation.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;यह ठीक है कि अच्छे मानसून के कारण सब्जियों और कुछ खाद्य वस्तुओं की कीमतों में तात्कालिक तौर पर थोड़ी नरमी आई है लेकिन उससे महंगाई की आंच पर कोई खास फर्क नहीं पड़ा है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;असल में, मुद्रास्फीति की दर में हालिया गिरावट के आधार पर महंगाई में कमी का दावा इस कारण थोथा है क्योंकि मुद्रास्फीति की दर में गिरावट काफी हद तक एक ‘सांख्कीय चमत्कार’ भर है. यह पिछले वर्षों के ऊँचे आधार प्रभाव यानी बेस इफेक्ट के कारण संभव हुआ है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चूँकि पिछले वर्ष इन्हीं महीनों और सप्ताहों में मुद्रास्फीति की वृद्धि दर ९ से १० फीसदी की असहनीय ऊँचाई पर थी, इसलिए इस वर्ष कीमतों में वृद्धि के बावजूद मुद्रास्फीति की वृद्धि दर तुलनात्मक रूप से कम दिखाई दे रही है. लेकिन सच यह है कि महंगाई कम होने के बजाय बढ़ी है और उसकी मार इसलिए और भी तीखी है क्योंकि पिछले तीन वर्षों से कीमतें लगातार ऊपर ही जा रही हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगर आप अब भी नहीं समझे तो इस ‘सांख्कीय चमत्कार’ को इस तरह से समझिए. जैसे पिछले वर्ष किसी वस्तु/उत्पाद जिसकी कीमत १०० रूपये थी और उसकी कीमत में १० रूपये की वृद्धि हुई. इस तरह पिछले वर्ष उस वस्तु की मुद्रास्फीति वृद्धि दर १० फीसदी हुई. इस वर्ष उसकी कीमत में फिर ७ रूपये की वृद्धि हुई और उसकी कीमत बढ़कर ११७ रूपये हो गई लेकिन उसकी मुद्रास्फीति की दर में सिर्फ ६.३ फीसदी की वृद्धि दर्ज होगी. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस तरह मुद्रास्फीति की दर में पिछले वर्ष के १० फीसदी की तुलना में इस वर्ष ६.३ फीसदी की दर काफी कम दिखाई देगी लेकिन वास्तविकता यह है कि आम उपभोक्ता के लिए उस वस्तु की कीमत में कोई कमी नहीं आई है और उसे अभी भी ऊँची कीमत चुकानी पड़ रही है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जाहिर है कि इस ‘सांख्कीय चमत्कार’ से अर्थशास्त्री और सरकार के आर्थिक मैनेजर खुश हो सकते हैं लेकिन इससे आम आदमी कैसे खुश हो सकता है? इसीलिए कहते हैं कि ‘झूठ, महाझूठ और सांख्कीय.’ &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/-9LR1v1k6bWU/Tuch4CgITAI/AAAAAAAABWw/-I8xPMOVnDw/s1600/pranab+mukherjee+%25282%2529.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; cssfloat: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="266" oda="true" src="http://1.bp.blogspot.com/-9LR1v1k6bWU/Tuch4CgITAI/AAAAAAAABWw/-I8xPMOVnDw/s320/pranab+mukherjee+%25282%2529.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;अफसोस की बात यह है कि महंगाई के मामले में सरकारें इसी सांख्कीय झूठ का सहारा लेकर अपनी पीठ थपथपाती रही हैं लेकिन दूसरी ओर, आम आदमी की पीठ महंगाई के बोझ से दोहरी होती गई है. यू.पी.ए सरकार भी इसकी अपवाद नहीं है. वह भी इस आधार पर अपनी पीठ ठोंकने में जुट गई है कि मार्च तक मुद्रास्फीति की दर ७ फीसदी से नीचे आ जायेगी. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दोहराने की जरूरत नहीं है कि उसके इस दावे के पीछे महंगाई को कम करने की ठोस कोशिशों से ज्यादा उसी ‘सांख्कीय चमत्कार’ पर भरोसा है जिसके कारण मुद्रास्फीति की दर गिरकर फिलहाल ६.६ फीसदी हो गई है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;असल में, पिछले वर्ष आम मुद्रास्फीति की दर दिसम्बर से लेकर जनवरी तक क्रमश: ९.४५, ९.४७, ९.५७ और ९.६८ फीसदी थी. यही नहीं, वर्ष २०१० में इन्हीं महीनों में खाद्य मुद्रास्फीति की दर १६ से २० फीसदी के बीच थी और पिछले वर्ष २०११ के इन महीनों में यह दर ७ से १० फीसदी के बीच थी. इसी आधार पर आर्थिक मैनेजरों को उम्मीद है कि इस साल दिसंबर से लेकर अगले साल के जनवरी-मार्च के महीनों में मुद्रास्फीति की दर ७ फीसदी से नीचे आ जायेगी. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दूसरी बात यह है कि थोक मूल्य सूचकांक पर आधारित खाद्य और आम मुद्रास्फीति की दर से वास्तविक महंगाई का इसलिए भी पता नहीं चलता है क्योंकि आम आदमी को खुदरा स्तर पर जो कीमत चुकानी पड़ती है, उसमें और थोक मूल्य में काफी अंतर होता है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यही नहीं, थोक मूल्य सूचकांक में आम आदमी की बुनियादी जरूरत की अधिकांश चीजों का भारांक कम है जिसके कारण उनकी कीमतों में वृद्धि सूचकांक में उस तीखेपन के साथ नहीं दिखाई पड़ती है जो आम आदमी को झेलनी पड़ती है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/-48sw1BNJUio/TuciL-a12bI/AAAAAAAABW4/RR7Ni-deRps/s1600/Manmohan+Singh+3+%25282%2529.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; cssfloat: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="266" oda="true" src="http://4.bp.blogspot.com/-48sw1BNJUio/TuciL-a12bI/AAAAAAAABW4/RR7Ni-deRps/s320/Manmohan+Singh+3+%25282%2529.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;इस कारण सरकार मुद्रास्फीति में कमी के आधार पर भले महंगाई में कमी के दावे करे लेकिन साफ़ है कि महंगाई के मामले में न्यूटन का गुरुत्वाकर्षण नियम लागू नहीं होता है. सच यह है कि महंगाई के मामले में इस नियम का उल्टा लागू होता है यानी जो कीमतें ऊपर जाती हैं, वे कभी नीचे नहीं आती हैं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुद्रास्फीति और महंगाई के इस खेल की यही कड़वी सच्चाई है जिसमें आंकड़े चाहे जो कहें, आम आदमी का कोई पुरसाहाल नहीं है. सच्चाई यह है कि महंगाई की हकीकत आंकड़ों में नहीं, आम आदमी की थाली में दिखाई देती है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;('नया इंडिया' में १२ दिसंबर और 'जनसंदेश टाइम्स' के १३ दिसंबर के अंक में&amp;nbsp;सम्पादकीय&amp;nbsp;पृष्ठ&amp;nbsp;पर&amp;nbsp;प्रकाशित&amp;nbsp;लेख)&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8157191427767672214-5072576521080677411?l=teesraraasta.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://teesraraasta.blogspot.com/feeds/5072576521080677411/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8157191427767672214&amp;postID=5072576521080677411' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8157191427767672214/posts/default/5072576521080677411'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8157191427767672214/posts/default/5072576521080677411'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://teesraraasta.blogspot.com/2011/12/blog-post_13.html' title='महंगाई नहीं, मुद्रास्फीति कम हुई है'/><author><name>आनंद प्रधान</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05288123571817148120</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_r2d8D7rSfq8/SzcAjql1JOI/AAAAAAAAAGg/C6og8D0qeWE/S220/anand+pradhan+in+class.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/-bmDb7wURgws/TuchZAiggTI/AAAAAAAABWY/pHBOolmRPEY/s72-c/inflation+2.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8157191427767672214.post-5080986626800739459</id><published>2011-12-07T18:51:00.000+05:30</published><updated>2011-12-07T18:51:40.744+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='भारतीय अर्थव्यवस्था'/><title type='text'>टोटकों से नहीं संभलेगी लड़खड़ाती अर्थव्यवस्था</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;span style="color: blue; font-size: large;"&gt;&lt;strong&gt;मंदी का डर दिखाकर नव उदारवादी सुधारों को अनिवार्य साबित करने की कोशिश की जा रही है &lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/-YLbegNKRS2Y/Tt9mzPXo9aI/AAAAAAAABVo/Hczxir88qlE/s1600/images%255B5%255D+%25282%2529.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; cssfloat: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="320" mda="true" src="http://4.bp.blogspot.com/-YLbegNKRS2Y/Tt9mzPXo9aI/AAAAAAAABVo/Hczxir88qlE/s320/images%255B5%255D+%25282%2529.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;भारतीय अर्थव्यवस्था लड़खड़ा रही है. चालू वित्तीय वर्ष की दूसरी तिमाही में जी.डी.पी. की वृद्धि दर गिरकर ६.९ प्रतिशत रह गई है. यह पिछले दो वर्षों की किसी भी तिमाही की सबसे धीमी रफ़्तार है. इसमें सबसे अधिक चिंता की बात यह है कि मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र की वृद्धि दर सिर्फ २.७ फीसदी रह गई है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कृषि क्षेत्र की वृद्धि दर भी घटकर ३.२ फीसदी रह गई है. दूसरी ओर, पिछले कई महीनों से आश्चर्यजनक रूप से लगातार बेहतर प्रदर्शन कर रहे निर्यात की वृद्धि दर में भी सुस्ती दिखाई पड़ने लगी है. अक्टूबर महीने में निर्यात की वृद्धि दर १०.८ प्रतिशत रह गई है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यही नहीं, मुद्रास्फीति की वृद्धि दर में मामूली गिरावट के बावजूद खाद्य वस्तुओं की थोक मुद्रास्फीति दर ८ फीसदी पर बनी हुई है. इस बीच, रिजर्व बैंक के लिए मुद्रास्फीति के साथ-साथ नया सिरदर्द डालर के मुकाबले रूपये की लगातार गिरती कीमत है. डालर के मुकाबले रूपया लुढकते हुए ५२ रूपये के नए रिकार्ड पर पहुँच गया है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसके साथ ही, नव उदारवादी अर्थव्यवस्था के स्वास्थ्य का बैरोमीटर माने-जानेवाले शेयर बाजार की हालत भी खस्ता है. विदेशी संस्थागत निवेशकों (एफ.आई.आई) के भारतीय बाजारों से निकलने के कारण बाजार न सिर्फ कराह रहा है बल्कि डालर की मांग बढ़ने के कारण रूपये पर दबाव बढ़ रहा है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जैसे इतना ही काफी न हो. रिपोर्टों के मुताबिक, सरकार की वित्तीय स्थिति भी काफी नाजुक है. राजस्व वृद्धि दर उम्मीदों से कम है जबकि खर्चों में वृद्धि की दर तेज है. इसके कारण अप्रैल से अक्टूबर के बीच सिर्फ सात महीनों में वित्तीय घाटे के लक्ष्य का ७४ फीसदी पूरा हो चुका है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खुद वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने स्वीकार किया है कि इस साल वित्तीय घाटे को जी.डी.पी के ४.६ फीसदी के अनुमान के भीतर रख पाना संभव नहीं होगा. कई स्वतंत्र खासकर बाजार विश्लेषकों का मानना है कि वित्तीय घाटा जी.डी.पी के ५ से लेकर ५.५ फीसदी तक पहुँच सकता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/-vHlCxM52vFI/Tt9nBnKpR0I/AAAAAAAABVw/6AwjKP--yis/s1600/images%255B1%255D+%25282%2529.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; cssfloat: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="256" mda="true" src="http://2.bp.blogspot.com/-vHlCxM52vFI/Tt9nBnKpR0I/AAAAAAAABVw/6AwjKP--yis/s320/images%255B1%255D+%25282%2529.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;कहने की जरूरत नहीं है कि अर्थव्यवस्था से आ रही इन नकारात्मक और बुरी ख़बरों से बाजार में घबड़ाहट और बेचैनी का माहौल है. बाजार से फील गुड फैक्टर गायब है और निराशा का माहौल हावी होता जा रहा है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दूसरी ओर, देश में राजनीतिक अनिश्चितता और वैश्विक स्तर पर आर्थिक अनिश्चितता के कारण भी अर्थव्यवस्था के प्रमुख घटकों में घबड़ाहट का माहौल है. इससे स्थिति और खराब होने की आशंका बढ़ती जा रही है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसकी वजह यह है कि नव उदारवादी अर्थव्यवस्था में बहुत कुछ ‘मार्केट सेंटिमेंट’ पर चलता है. अगर बाजार में अनिश्चितता और निराशा का माहौल है तो निजी निवेशक नया निवेश नहीं करेंगे या निवेश के फैसले को स्थगित कर देंगे जिससे अर्थव्यवस्था में सुस्ती आने लगती है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसे माहौल में आरोप-प्रत्यारोप शुरू हो जाते हैं. बाजार विश्लेषकों खासकर नव उदारवादी आर्थिक सुधारों के पैरोकारों का आरोप है कि अर्थव्यवस्था की मौजूदा स्थिति के लिए यू.पी.ए सरकार जिम्मेदार है जिसकी ‘नीतिगत पक्षाघात’ की स्थिति के कारण अर्थव्यवस्था में अनिश्चितता का माहौल बना है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उनका यह भी कहना है कि मौजूदा स्थिति से निकलने के लिए जरूरी है कि सरकार आर्थिक सुधारों को तेजी से आगे बढ़ाए. गुलाबी अख़बारों से लेकर औद्योगिक-वाणिज्यिक संगठनों के सम्मेलनों तक में इन मुखर आवाजों को सुना जा सकता है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मजे की बात यह है कि सरकार में बैठे अर्थव्यवस्था के मैनेजर भी काफी हद तक इन आरोपों और सुझावों से सहमत दिखते हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/-OrPbBBMr7s8/Tt9nQrbndOI/AAAAAAAABV4/HIbH8u7oJS8/s1600/imagesCAVRGJGD.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; cssfloat: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="201" mda="true" src="http://2.bp.blogspot.com/-OrPbBBMr7s8/Tt9nQrbndOI/AAAAAAAABV4/HIbH8u7oJS8/s320/imagesCAVRGJGD.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;आश्चर्य नहीं कि पिछले एक पखवाड़े में यू.पी.ए सरकार ने बाजार में फील गुड का माहौल पैदा करने के लिए न सिर्फ आर्थिक सुधारों को तेजी से आगे बढ़ाने का फैसला किया बल्कि धड़ाधड़ कई फैसलों को एलान कर दिया. पेंशन, नई मैन्युफैक्चरिंग नीति से लेकर खुदरा व्यापार में ५१ फीसदी एफ.डी.आई जैसे कई फैसले बाजार और बड़ी पूंजी को खुश करने के लिए ही किये गए हैं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यू.पी.ए सरकार इन फैसलों के जरिये बाजार खासकर विदेशी पूंजी को यह सन्देश देने की कोशिश कर रही है कि सरकार आर्थिक सुधारों को आगे बढ़ाने और उसके लिए राजनीतिक जोखिम भी उठाने को तैयार है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हालांकि सरकार और बाजार विश्लेषक इन फैसलों के पक्ष में यह तर्क भी दे रहे हैं कि भारतीय अर्थव्यवस्था की लड़खड़ाती स्थिति के लिए एक बड़ा कारण आर्थिक सुधारों का ठहर जाना है. इसके कारण देशी-विदेशी निवेशकों का भारतीय अर्थव्यवस्था में भरोसा कमजोर हुआ है. वे नया निवेश नहीं कर रहे हैं. वे अपना पैसा निकालकर वापस जा रहे हैं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस तरह नव उदारवादी आर्थिक सुधारों को आगे बढ़ाने के पक्ष में अर्थव्यवस्था की लड़खड़ाती स्थिति को लेकर ऐसा डरावना माहौल बनाया जाता है जिससे इन सुधारों को जायज ठहराया जा सके. लोगों को यह कहकर डराया जाता है कि अगर आर्थिक सुधारों को आगे नहीं बढ़ाया गया तो अर्थव्यवस्था की हालत और पतली और खस्ता होगी. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/-DLH0aN_P7dI/Tt9nrqnRAyI/AAAAAAAABWA/WNDkPPRQExk/s1600/Economic+Crisis+2.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; cssfloat: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="320" mda="true" src="http://3.bp.blogspot.com/-DLH0aN_P7dI/Tt9nrqnRAyI/AAAAAAAABWA/WNDkPPRQExk/s320/Economic+Crisis+2.jpg" width="264" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;जबकि सच्चाई यह है कि अर्थव्यवस्था की पतली होती स्थिति के लिए ये नव उदारवादी सुधार ही जिम्मेदार हैं. इनके कारण ही मौजूदा वैश्विक आर्थिक संकट पैदा हुआ है जिसका असर भारत पर भी पड़ रहा है. यही नहीं, अर्थव्यवस्था की कई मौजूदा समस्याओं के लिए भी यही सुधार जिम्मेदार हैं &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन मजा देखिए कि उनकी चर्चा नहीं हो रही है, उल्टे इन सुधारों के कथित तौर पर ठहर जाने को अर्थव्यवस्था के सारे मर्जों की वजह साबित करने की कोशिश हो रही है. इसी आधार पर इन मर्जों के इलाज के बतौर सुधारों के नए कड़वे डोज को लोगों के गले के नीचे जबरन उतारने की कोशिश हो रही है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन सवाल यह है कि क्या इससे अर्थव्यवस्था पटरी पर आ जायेगी? इसके आसार कम हैं क्योंकि अर्थव्यवस्था की समस्याओं के समाधान के नाम पर मनमोहन सिंह सरकार मर्ज का इलाज करने के बजाय टोटके कर रही है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाजार को खुश करने के लिए जल्दबाजी में किये गए फैसलों से स्थिति नहीं सुधरने वाली है क्योंकि भारतीय अर्थव्यवस्था की बुनियादी समस्याएं बाजार के लिए फील गुड पैदा करने से हल नहीं होने वाली हैं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;असल में, यू.पी.ए सरकार ‘नीतिगत पक्षाघात’ की शिकार है लेकिन यह ‘नीतिगत पक्षाघात’ वह नहीं है जो नव उदारवादी बाजार विश्लेषक, गुलाबी अखबार और औद्योगिक-वाणिज्यिक लाबी संगठन कह रहे हैं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/-6x24fVN8xNg/Tt9n6wHNFnI/AAAAAAAABWI/AaSYwPhcwsg/s1600/FCI+LOSS+OF+FOODGRAINS.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; cssfloat: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="201" mda="true" src="http://4.bp.blogspot.com/-6x24fVN8xNg/Tt9n6wHNFnI/AAAAAAAABWI/AaSYwPhcwsg/s320/FCI+LOSS+OF+FOODGRAINS.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;सच यह है कि यू.पी.ए सरकार के ‘नीतिगत पक्षाघात’ के कारण भोजन के अधिकार से लेकर कृषि और आधारभूत ढांचा क्षेत्र में सार्वजनिक बढ़ाने तक कई महत्वपूर्ण फैसले लटके हुए हैं. उदाहरण के लिए, भोजन के अधिकार को ही लीजिए, सरकार की हीलाहवाली और टालमटोल के कारण न सिर्फ करोड़ों गरीबों को भूखे पेट सोना पड़ रहा है बल्कि सरकार के अनाज भंडारों में रिकार्ड अनाज होते हुए भी एक ओर खाद्य वस्तुओं की महंगाई आसमान छू रही है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दूसरी ओर, सरकार की खाद्य सब्सिडी बढ़ रही है. यही नहीं, गोदामों में अनाज सड़ रहा है और सरकार कोई फैसला नहीं कर पा रही है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसके अलावा सरकार अर्थव्यवस्था में सार्वजनिक निवेश बढ़ाने के लिए भी तैयार नहीं है. माना जाता है कि जब अर्थव्यवस्था की रफ़्तार सुस्त पड़ रही हो तो सार्वजनिक निवेश बढ़ाने से निजी निवेश को भी प्रोत्साहन मिलता है. मौजूदा माहौल में इसकी सबसे ज्यादा जरूरत है क्योंकि सिर्फ फील गुड से निजी क्षेत्र निवेश के लिए आगे नहीं आएगा. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खासकर जब वैश्विक अर्थव्यवस्था में ऐसी अनिश्चितता और संकट हो. ऐसे समय में जरूरत घरेलू अर्थव्यवस्था को अपने पैरों पर खड़ा करने के लिए घरेलू मांग को बढ़ाने और उसके लिए सार्वजनिक निवेश पर जोर देने की है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जाहिर है कि सिर्फ निजी क्षेत्र पर भरोसा करने से बात नहीं बनेगी. सरकार को यह बात जितनी जल्दी समझ में आ जाए, उतना अच्छा होगा. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/-lKrkTQu8eAc/Tt9oROSEeNI/AAAAAAAABWQ/Se-U1N8Jcis/s1600/manmohan+4.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; cssfloat: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="239" mda="true" src="http://4.bp.blogspot.com/-lKrkTQu8eAc/Tt9oROSEeNI/AAAAAAAABWQ/Se-U1N8Jcis/s320/manmohan+4.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;लेकिन इसके लिए उसे मौजूदा नीतिगत पक्षाघात और उससे अधिक नव उदारवादी अर्थनीति के प्रति मानसिक सम्मोहन से निकलना होगा. वित्तीय घाटे की चिंता को छोड़ना होगा. क्या यू.पी.ए सरकार इसके लिए तैयार है? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;('नया इंडिया' के ५ दिसंबर'११ के अंक में सम्पादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित आलेख का पूरा हिस्सा)&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8157191427767672214-5080986626800739459?l=teesraraasta.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://teesraraasta.blogspot.com/feeds/5080986626800739459/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8157191427767672214&amp;postID=5080986626800739459' title='4 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8157191427767672214/posts/default/5080986626800739459'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8157191427767672214/posts/default/5080986626800739459'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://teesraraasta.blogspot.com/2011/12/blog-post_07.html' title='टोटकों से नहीं संभलेगी लड़खड़ाती अर्थव्यवस्था'/><author><name>आनंद प्रधान</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05288123571817148120</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_r2d8D7rSfq8/SzcAjql1JOI/AAAAAAAAAGg/C6og8D0qeWE/S220/anand+pradhan+in+class.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/-YLbegNKRS2Y/Tt9mzPXo9aI/AAAAAAAABVo/Hczxir88qlE/s72-c/images%255B5%255D+%25282%2529.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8157191427767672214.post-8483455684858089230</id><published>2011-12-06T12:19:00.000+05:30</published><updated>2011-12-06T12:19:14.816+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='तमाशा मेरे आगे'/><title type='text'>अपराध और दंड</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color: blue; font-size: large;"&gt;जो दूसरों की आज़ादी के हक में नहीं खड़ा होता, उसे अपनी आज़ादी को गंवाने के लिए तैयार रहना चाहिए&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/-_gt-QP8PBE0/Tt253bKyXxI/AAAAAAAABVA/OU-u1pK5NDg/s1600/Arnab+Goswami+with+chashma.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; cssfloat: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" dda="true" height="320" src="http://3.bp.blogspot.com/-_gt-QP8PBE0/Tt253bKyXxI/AAAAAAAABVA/OU-u1pK5NDg/s320/Arnab+Goswami+with+chashma.jpg" width="266" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;न्यूज चैनलों की ‘परपीड़क सुख’ की प्रवृत्ति किसी से छुपी नहीं है. अकसर देखा गया है कि चैनलों को दूसरों के दुःख या परेशानी या कष्ट की खिल्ली उड़ाने में बहुत मजा आता है. लेकिन कहते हैं कि कभी-कभी ऊंट भी पहाड़ के नीचे आ जाता है. संयोग देखिए कि कोई और नहीं बल्कि ‘परपीडक सुख’ में सबसे अधिक मजा लेने वाला चैनलों का चैनल ‘टाइम्स नाउ’ पहाड़ के नीचे आ गया है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हुआ यह कि सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज पी.बी. सावंत द्वारा दाखिल मानहानि के एक मुकदमे में पुणे की एक स्थानीय अदालत ने ‘टाइम्स नाउ’ पर १०० करोड़ रूपये का जुर्माना ठोंक दिया है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यही नहीं, इस फैसले के खिलाफ मुंबई हाई कोर्ट में ‘टाइम्स नाउ’ की अपील पर कोर्ट ने कोई राहत देने से पहले चैनल से कोर्ट में २० करोड़ रूपये और ८० करोड़ रूपये की बैंक गारंटी जमा करने का आदेश दिया है. चैनल ने इसके बाद राहत के लिए सुप्रीम कोर्ट में अपील की जिसे कोर्ट ने यह कहकर ख़ारिज कर दिया कि वह राहत के लिए हाई कोर्ट के पास ही जाए. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कहने की जरूरत नहीं है कि इस फैसले ने न्यूज चैनलों के साथ-साथ सभी समाचार माध्यमों को सन्न कर दिया है. एडिटर्स गिल्ड से लेकर प्रेस काउन्सिल के अध्यक्ष जस्टिस मार्कंडेय काटजू तक अनेक मीडिया संगठनों और बुद्धिजीवियों ने इस फैसले की आलोचना की है. अरुण जेटली जैसे इक्का-दुक्का नेताओं ने भी इस फैसले से असहमति जाहिर की है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/-zCtEWmfOkys/Tt26Akhl45I/AAAAAAAABVI/LBp7Gqo4wv8/s1600/images%255B2%255D+%25283%2529.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; cssfloat: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" dda="true" height="277" src="http://4.bp.blogspot.com/-zCtEWmfOkys/Tt26Akhl45I/AAAAAAAABVI/LBp7Gqo4wv8/s320/images%255B2%255D+%25283%2529.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;लेकिन विरोध के सुर बहुत तीखे नहीं बल्कि दबे-दबे और कुछ सहमे-सहमे से हैं. विरोध में औपचारिकता अधिक है और गर्मी और शोर कम. यही नहीं, इस फैसले का विरोध जुर्माने की भारी राशि को लेकर ज्यादा है. सभी मान रहे हैं कि ‘टाइम्स नाउ’ से गलती हुई है और वह गलती जान-बूझकर नहीं हुई है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसे में, वे हर्जाने की इतनी भारी राशि को पचा नहीं पा रहे हैं. रिपोर्टों के मुताबिक, मानहानि के किसी मुकदमे में यह पहला ऐसा मामला है जहां इतनी बड़ी राशि का हर्जाना ठोंका गया है. अच्छी बात यह है कि इस फैसले का किसी प्रमुख व्यक्ति ने खुलकर समर्थन नहीं किया है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो अलग-अलग कारणों से ‘टाइम्स नाउ’ पर ठोंके गए इस हर्जाने से अंदर ही अंदर खुश हैं. बहुतों को इसमें एक तरह का ‘परपीडक सुख’ मिल रहा है. यही कारण है कि देश में अभिव्यक्ति और प्रेस की आज़ादी के लिए गंभीर और गहरे निहितार्थों से भरे इस फैसले को लेकर वैसी बहस और चर्चा नहीं हो रही है, जैसीकि अपेक्षा थी. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह संयोग नहीं है कि देश में अभिव्यक्ति की आज़ादी और मानवाधिकार के लिए लड़ने और बोलने वाली चर्चित आवाजें इस मुद्दे पर खामोश हैं या उतनी मुखर नहीं हैं जितनी अकसर दिखाई पड़ती हैं? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह भी सिर्फ संयोग नहीं है कि ‘टाइम्स नाउ’ पर मानहानि का मुकदमा करनेवाले जस्टिस पी.बी. सावंत सुप्रीम कोर्ट के उदार जजों में माने जाते रहे हैं जिन्होंने वायु तरंगों को सार्वजनिक संपत्ति घोषित करने का ऐतिहासिक फैसला दिया था. इस फैसले ने ही दूरदर्शन-आकाशवाणी को स्वायत्तता देने के साथ-साथ निजी न्यूज चैनलों के लिए प्रसारण को आसान बनाया था. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/-4__ZBC2pRpk/Tt26LhJY5gI/AAAAAAAABVQ/xSzRgevH9po/s1600/images%255B2%255D+%25282%2529.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; cssfloat: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" dda="true" height="320" src="http://4.bp.blogspot.com/-4__ZBC2pRpk/Tt26LhJY5gI/AAAAAAAABVQ/xSzRgevH9po/s320/images%255B2%255D+%25282%2529.jpg" width="233" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;जस्टिस सावंत बाद में प्रेस काउन्सिल के मुखर और सक्रिय अध्यक्ष भी रहे जिन्होंने हमेशा अभिव्यक्ति और प्रेस की आज़ादी के हक में बोला और लिखा. आखिर ऐसा क्या हुआ कि उन जैसे उदार जज को ‘टाइम्स नाउ’ के खिलाफ मानहानि का मुकदमा करने के लिए मजबूर होना पड़ा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चैनलों के लिए यह सोच-विचार और आत्मावलोकन का समय है. मामला बहुत गंभीर है. उन्होंने अपने कारनामों से अभिव्यक्ति और प्रेस की आज़ादी को खतरे में डाल दिया है. इसमें कोई दो राय नहीं है कि ‘टाइम्स नाउ’ के मामले में पुणे कोर्ट का फैसला सिर्फ ‘टाइम्स नाउ’ तक सीमित मामला नहीं है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह एक तरह से टेस्ट केस है. अगर यह एक नजीर बन गई तो अख़बारों और चैनलों का आज़ादी और निर्भीकता के साथ काम करना बहुत मुश्किल हो जाएगा. इसका सबसे अधिक फायदा ताकतवर लोग और कंपनियां उठाएंगी. वे इस फैसले का दुरुपयोग चैनलों और न्यूज मीडिया को धमकाने और उनका मुंह बंद करने के लिए करने लगेंगे. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आश्चर्य नहीं होगा, अगर इस फैसले से प्रेरणा लेकर ताकतवर राजनेता, अफसर, कारोबारी और कम्पनियाँ सिर्फ परेशान करने के लिए चैनलों और अखबारों पर मुकदमे ठोंकने लगें. कितने अखबार और चैनल ये मुकदमे लड़ने के लिए संसाधन जुटा पायेंगे? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यही नहीं, आखिर कितने चैनल और अखबार १०० करोड़ रूपये का हर्जाना देकर चलते और छपते रह सकते हैं? ब्रिटेन और अमेरिका जैसे कई विकसित देशों में कड़े मानहानि कानूनों के कारण पत्रकारिता के तेवर पर असर पड़ा है. समाचार कक्षों में वकील नए गेटकीपर बन गए हैं. खबरों को संपादकों के साथ-साथ वकीलों के चश्मे से भी गुजरना पड़ता है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/-4wE9qzYMtMg/Tt26jD5p46I/AAAAAAAABVY/UvrvHworvMg/s1600/Arnab+Goswami.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; cssfloat: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" dda="true" height="256" src="http://3.bp.blogspot.com/-4wE9qzYMtMg/Tt26jD5p46I/AAAAAAAABVY/UvrvHworvMg/s320/Arnab+Goswami.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;इससे एक तरह की सेल्फ सेंसरशिप की स्थिति पैदा हो जायेगी जो वाचडाग पत्रकारिता के लिए घातक साबित हो सकती है. लेकिन यह कहने का अर्थ यह कतई नहीं है कि चैनलों को मनमानी करने, जान-बूझकर किसी पर कीचड़ उछालने और लापरवाही करने की छूट देनी चाहिए. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;निश्चय ही, चैनलों को खबरों और विजुअल के चयन और प्रस्तुति में तथ्यों, वस्तुनिष्ठता, संतुलन और निष्पक्षता जैसे सम्पादकीय मूल्यों के पालन पर जोर देना चाहिए. गलतियों को दोहराने से बचना चाहिए. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन हमें याद रखना चाहिए कि तमाम सावधानियों के बावजूद समाचार संकलन और माध्यम के साथ-साथ पत्रकारों की सीमाओं के कारण चैनलों से गलतियाँ होना असामान्य बात नहीं हैं. अलबत्ता, ध्यान दिलाने पर उन गलतियों खासकर तथ्यों सम्बन्धी भूलों को तुरंत दुरुस्त न करना कहीं बड़ी गलती है जो चैनल की बदनीयती को जाहिर करता है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जाहिर है कि बदनीयती का कोई इलाज नहीं है. ऐसे मामलों में कानून को अपना काम करना चाहिए. लेकिन अपराध और सजा के बीच भी कोई अनुपात, संतुलन और तर्क होना चाहिए. कहने की जरूरत नहीं कि ‘टाइम्स नाउ’ के मामले में अदालत के फैसले में यह संतुलन और अनुपात नहीं है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन बात यहीं खत्म नहीं होती. अभिव्यक्ति और प्रेस की आज़ादी की दुहाईयाँ देनेवाले चैनलों को इस बात का जवाब जरूर देना चाहिए कि वे खुद अपने आलोचकों का मुंह बंद करने के लिए मानहानि कानून की धमकी क्यों देने लगते हैं? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/-ZYLVu52Z01c/Tt2608Omb2I/AAAAAAAABVg/Cmn_PaqDtO8/s1600/images%255B3%255D+%25282%2529.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; cssfloat: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" dda="true" height="258" src="http://3.bp.blogspot.com/-ZYLVu52Z01c/Tt2608Omb2I/AAAAAAAABVg/Cmn_PaqDtO8/s320/images%255B3%255D+%25282%2529.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;ऐसे अनेकों मामले हैं जिनमें ‘टाइम्स नाउ’ जैसे बड़े चैनलों ने मीडिया साइटों, ब्लाग लेखकों को ऐसे कानूनी नोटिस भेजे हैं. उनमें अपनी आलोचना सुनने को लेकर इतनी तंगदिली क्यों है? यही नहीं, ‘टाइम्स नाउ’ वह चैनल है जिसने कश्मीर मसले पर अरुंधती राय के बयान को देशद्रोह बताते हुए उनके खिलाफ अभियान चलाया था. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्या यह दोहराने की जरूरत है कि जो दूसरों की आज़ादी के हक में नहीं खड़ा होता, उसे अपनी आज़ादी को गंवाने के लिए तैयार रहना चाहिए?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;&lt;strong&gt;('तहलका' के १५ दिसंबर'११ के अंक में प्रकाशित स्तम्भ)&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8157191427767672214-8483455684858089230?l=teesraraasta.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://teesraraasta.blogspot.com/feeds/8483455684858089230/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8157191427767672214&amp;postID=8483455684858089230' title='5 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8157191427767672214/posts/default/8483455684858089230'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8157191427767672214/posts/default/8483455684858089230'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://teesraraasta.blogspot.com/2011/12/blog-post_06.html' title='अपराध और दंड'/><author><name>आनंद प्रधान</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05288123571817148120</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_r2d8D7rSfq8/SzcAjql1JOI/AAAAAAAAAGg/C6og8D0qeWE/S220/anand+pradhan+in+class.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/-_gt-QP8PBE0/Tt253bKyXxI/AAAAAAAABVA/OU-u1pK5NDg/s72-c/Arnab+Goswami+with+chashma.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8157191427767672214.post-6716262312122729096</id><published>2011-12-03T21:03:00.000+05:30</published><updated>2011-12-03T21:03:34.249+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='खुदरा व्यापार में एफ.डी.आई'/><title type='text'>खुदरा व्यापार में विदेशी पूंजी के मुद्दे पर कांग्रेस और भाजपा के बीच नूराकुश्ती हो रही है</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color: blue; font-size: large;"&gt;राजनीति की कमान लोगों के हाथ में नहीं, बड़ी पूंजी के हाथ में&amp;nbsp;है&amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/-AuKA0AAY7jo/Tto_TncVvnI/AAAAAAAABUQ/0APeM_AkPXg/s1600/images%255B1%255D.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; cssfloat: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" dda="true" height="201" src="http://1.bp.blogspot.com/-AuKA0AAY7jo/Tto_TncVvnI/AAAAAAAABUQ/0APeM_AkPXg/s320/images%255B1%255D.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;ऐसा लगता है कि यू.पी.ए सरकार की अर्थव्यवस्था के साथ-साथ राजनीति पर से भी पकड़ छूटती जा रही है. इसका सबूत यह है कि राजनीति में उसकी टाइमिंग का सेंस न सिर्फ गड़बड़ा गया है बल्कि उसके फैसले उल्टे पड़ रहे हैं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगर ऐसा नहीं होता तो भ्रष्टाचार के गंभीर मामलों में उलझी और आसमान छूती महंगाई को काबू करने में नाकाम रही यू.पी.ए सरकार आग में घी डालने की तरह खुदरा व्यापार में ५१ फीसदी विदेशी पूंजी की इजाजत देने का फैसला करने से पहले कई बार सोचती. उसके राजनीतिक नतीजों के बारे में चिंता करती. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन बड़ी देशी-विदेशी पूंजी को खुश करने की जल्दबाजी में उसने एक तरह से राजनीतिक आत्महत्या का रास्ता चुन लिया है. यह ठीक है कि खुदरा व्यापार को बड़ी विदेशी पूंजी के लिए खोलने को लेकर यू.पी.ए सरकार पर बड़ी देशी-विदेशी पूंजी और कारपोरेट समूहों का जबरदस्त दबाव था. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसके लिए बड़े देशी कारपोरेट समूहों से लेकर वालमार्ट जैसी बड़ी विदेशी कम्पनियाँ काफी दिनों से लाबीइंग कर रही थीं. यहाँ तक कि पिछले साल भारत दौरे पर आए अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने भी घरेलू खुदरा व्यापार को विदेशी पूंजी के लिए खोलने का दबाव डाला था. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/-wd3E6llOTds/Tto_zgFcL_I/AAAAAAAABUY/py5WrRvnh4U/s1600/images%255B5%255D.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; cssfloat: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" dda="true" height="214" src="http://1.bp.blogspot.com/-wd3E6llOTds/Tto_zgFcL_I/AAAAAAAABUY/py5WrRvnh4U/s320/images%255B5%255D.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;यह भी किसी से छुपा नहीं है कि रिलायंस, भारती, गोयनका, बिरला और टाटा जैसे कई बड़े देशी कारपोरेट समूहों ने भी खुदरा व्यापार को विदेशी पूंजी के लिए खोलने की पैरवी कर रहे थे. इनमें से कई ने पहले से ही खुदरा व्यापार के क्षेत्र में दुनिया की बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के साथ समझौता कर रखा है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये सभी बेचैन थे और सरकार पर जल्दी फैसला करने का दबाव बनाए हुए थे. इनकी बेचैनी का कारण यह था कि २००९ में दोबारा सत्ता में आई यू.पी.ए सरकार से उनकी उम्मीदें बहुत बढ़ गईं थीं. बड़े कारपोरेट समूहों को उम्मीद थी कि वामपंथी दलों के दबाव से मुक्त यू.पी.ए सरकार दूसरे चरण के आर्थिक सुधारों को तेजी से आगे बढ़ाएगी. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन हुआ यह कि पिछले दो-ढाई सालों में भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों, सरकार के वरिष्ठ मंत्रियों के बीच आपसी तनातनी, कांग्रेस पार्टी और सरकार में खींचतान और अन्ना हजारे और जन लोकपाल आंदोलन जैसी नई राजनीतिक चुनौतियों ने मनमोहन सिंह सरकार को ऐसा उलझाया कि वह चाहकर भी बड़े कारपोरेट समूहों की उम्मीदों को पूरा नहीं कर पाई. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जाहिर है कि इससे देशी-विदेशी बड़ी पूंजी की सरकार से नाराजगी बढ़ती जा रही थी. गुलाबी अखबारों से लेकर औद्योगिक-वाणिज्यिक संगठनों की बैठकों में सरकार पर ‘नीतिगत पक्षाघात’ के आरोप लगने लगे थे. यहाँ तक कि आमतौर पर सरकार की खुली आलोचना से बचनेवाले बड़े उद्योगपति जैसे टाटा, मुकेश अम्बानी, अजीम प्रेमजी, नारायणमूर्ति और सुनील मित्तल आदि हाल के महीनों में खुलकर अपनी नाराजगी जाहिर करने लगे थे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/-5GR6NywEy5Y/TtpAEsD2FJI/AAAAAAAABUg/2aX7M4CafCI/s1600/Manmohan+Singh+%25282%2529.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; cssfloat: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" dda="true" height="320" src="http://3.bp.blogspot.com/-5GR6NywEy5Y/TtpAEsD2FJI/AAAAAAAABUg/2aX7M4CafCI/s320/Manmohan+Singh+%25282%2529.jpg" width="256" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;कहने का अर्थ यह कि सरकार भारी दबाव में थी. वह अपने ऊपर लग रहे ‘नीतिगत पक्षाघात’ के आरोपों से पीछा छुड़ाना चाह रही थी. इसके बावजूद सरकार ने जिस जल्दबाजी और झटके के साथ खुदरा व्यापार को विदेशी पूंजी के लिए खोलने का फैसला किया है, उससे ऐसा लगता है कि उसे बड़े कारपोरेट समूहों की ओर से नोटिस मिल गई थी. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसे यह भय सता रहा था कि बड़ी देशी-विदेशी पूंजी और कारपोरेट समूहों को नाराज करके सत्ता में टिके रहना मुश्किल होगा. हाल के महीनों में कई बड़े कारपोरेटों ने जिस तरह से भाजपा के नरेन्द्र मोदी की वाहवाही शुरू की है, उससे भी कांग्रेस में बेचैनी थी. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसा लगता है कि इसी हताशा और हड़बड़ी में उसने बड़ी पूंजी को खुश करने के लिए यह राजनीतिक जोखिम उठाने का फैसला कर लिया. कहने की जरूरत नहीं है कि यू.पी.ए सरकार का यह फैसला बड़ी पूंजी का खोया हुआ भरोसा जीतने की कोशिश है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन बड़ी पूंजी के प्रति वफादारी निभाने के चक्कर में सरकार खासकर कांग्रेस ने राजनीतिक आत्मघात का रास्ता चुन लिया है. खासकर भ्रष्टाचार और महंगाई जैसे मुद्दों से घिरी सरकार ने अपने लिए एक और गड्ढा खोद लिया है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यही नहीं, उत्तर प्रदेश सहित राजनीतिक रूप से संवेदनशील कई राज्यों के विधानसभा चुनावों और संसद सत्र के ठीक पहले इस फैसले का औचित्य समझ से बाहर है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;साफ़ है कि सरकार बड़ी पूंजी को खुश करने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार है. लेकिन इससे विपक्ष खासकर भाजपा को सरकार को घेरने का न सिर्फ एक और बड़ा मुद्दा मिल गया है बल्कि अपने वोट बैंक को कंसोलिडेट करने का अवसर भी हाथ आ गया है. क्या यू.पी.ए खासकर कांग्रेस को इस खतरे का अनुमान नहीं है? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सच यह है कि सरकार और कांग्रेस नेतृत्व को इस फैसले के राजनीतिक जोखिम का अंदाज़ा भले न हो लेकिन आम कांग्रेसियों की बेचैनी से जाहिर है कि उन्हें अच्छी तरह पता है कि यह राजनीतिक रूप से बहुत ज्वलनशील मुद्दा है. सिर्फ छोटे-बड़े दुकानदार ही नहीं, गरीब रेहडी-पटरी वाले भी विरोध कर रहे हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/-lUzdhGWLDuI/TtpAWmsBOpI/AAAAAAAABUo/1Y_jceSTiaM/s1600/corporate+power+2.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; cssfloat: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" dda="true" src="http://2.bp.blogspot.com/-lUzdhGWLDuI/TtpAWmsBOpI/AAAAAAAABUo/1Y_jceSTiaM/s1600/corporate+power+2.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;इसके बावजूद सरकार ने यह फैसला किया है तो इसका एक ही अर्थ है कि राजनीति की कमान बड़ी पूंजी के हाथों में है. उसमें लोगों की इच्छाओं और आकांक्षाओं के लिए जगह नहीं रह गई है. असल में, नव उदारवादी अर्थनीति की यह सबसे बड़ी पहचान हो गई है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मार्क्स ने ठीक कहा था कि ‘राजनीति, अर्थनीति का ही संकेंद्रित रूप है.’ आश्चर्य नहीं कि भारतीय राजनीति की मुख्यधारा की सभी पार्टियां बड़ी देशी-विदेशी पूंजी द्वारा जोर-शोर से आगे बढ़ाई गई नव उदारवादी आर्थिक नीतियों और सुधारों का खुलकर समर्थन करती रही हैं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भाजपा भी इसकी अपवाद नहीं है. सच यह है कि वह अपने को नव उदारवादी आर्थिक नीतियों और सुधारों का असली चैम्पियन मानती है. आडवाणी ने बहुत पहले शिकायत की थी कि नव उदारवादी अर्थनीति मूलतः भाजपा(जनसंघ) की अर्थनीति है जिसे १९९१ में कांग्रेस की नरसिम्हा राव सरकार ने चुरा लिया था. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हैरानी की बात नहीं है कि भाजपा के नेतृत्व वाली एन.डी.ए सरकार के कार्यकाल में आर्थिक सुधारों को जोर-शोर से आगे बढ़ाया गया और स्वदेशी को हाशिए पर डाल दिया गया था. मजे की बात यह है कि आज खुदरा व्यापार में विदेशी पूंजी के विरोध में आसमान उठाये भाजपा तब इसकी घोषित समर्थक थी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तथ्य यह है कि अगर २००४ के चुनावों में एन.डी.ए की हार नहीं होती तो चुनावों के तुरंत बाद वाजपेयी सरकार खुदरा व्यापार में कम से कम २६ फीसदी विदेशी पूंजी की इजाजत दे चुकी होती. भाजपा ने २००४ के चुनावों से पहले जारी विजन डाक्यूमेंट में इसका वायदा किया था. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/-SmR_i0AcTQs/TtpA12M33CI/AAAAAAAABUw/wcYN8RtwOrk/s1600/images%255B9%255D.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; cssfloat: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" dda="true" height="306" src="http://3.bp.blogspot.com/-SmR_i0AcTQs/TtpA12M33CI/AAAAAAAABUw/wcYN8RtwOrk/s320/images%255B9%255D.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;तत्कालीन वित्त मंत्री जसवंत सिंह ने कई अखबारों को दिए इंटरव्यू में भी इस वायदे के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई थी. यही नहीं, इससे पहले २००२ में एन.डी.ए सरकार के तत्कालीन वाणिज्य मंत्री मुरासोली मारन ने खुदरा व्यापार में १०० फीसदी विदेशी पूंजी का प्रस्ताव किया था जिसपर सरकार के एक जी.ओ.एम में विचार चल रहा था. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दूर क्यों जाएं, पिछले साल इस मुद्दे पर अपनी राय देते हुए भाजपा शासित गुजरात और पंजाब की राज्य सरकारों ने खुदरा व्यापार में विदेशी पूंजी को इजाजत देने का समर्थन किया था. यही नहीं, कई भाजपा शासित राज्यों जैसे मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, कर्नाटक और पंजाब में भारती-वालमार्ट ने कैश और कैरी स्टोर्स खोल रखे हैं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;साफ है कि भाजपा खुदरा व्यापार में विदेशी पूंजी की सिद्धांततः विरोधी नहीं है. हो भी नहीं सकती है. अगर आप नव उदारवादी अर्थनीति के पैरोकार हैं तो आप खुदरा व्यापार में विदेशी पूंजी के विरोधी नहीं हो सकते हैं क्योंकि यह फैसला इस अर्थनीति का ही तार्किक विस्तार है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भाजपा ही क्यों, इस मुद्दे पर विरोध में बोल रहे तृणमूल, डी.एम.के और कुछ हद तक वाम पार्टियां भी अवसरवादी रुख अपनाती रही है. इनमें से अधिकतर नव उदारवादी अर्थनीति की समर्थक रही है. सच यह है कि या तो आप नव उदारवादी अर्थनीति के साथ हैं या फिर विरोधी हैं, किसी बीच की और ‘किन्तु-परन्तु’ के लिए जगह नहीं है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसलिए भाजपा का मौजूदा विरोध उसकी मौकापरस्ती की राजनीति का ही एक और उदाहरण है. असल में, इस विरोध के जरिये वह खुदरा व्यापार सहित अन्य मुद्दों पर सरकार के खिलाफ बन रहे जनमत को भुनाने की कोशिश कर रही है. एक मायने में विरोध का नाटक करके भाजपा यू.पी.ए सरकार के खिलाफ उठ रहे वास्तविक विरोध को हड़पने की कोशिश कर रही है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/-ZRhzikUWZi0/TtpBMi9uIHI/AAAAAAAABU4/0R0gyWKrfaE/s1600/images%255B2%255D.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; cssfloat: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" dda="true" height="212" src="http://3.bp.blogspot.com/-ZRhzikUWZi0/TtpBMi9uIHI/AAAAAAAABU4/0R0gyWKrfaE/s320/images%255B2%255D.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;लेकिन यह भाजपा भी जानती है कि बड़ी पूंजी के हितों को नजरंदाज करते हुए इस विरोध को बहुत आगे नहीं ले जा सकती है. आश्चर्य नहीं होगा अगर अगले कुछ दिनों में खुदरा व्यापार में विदेशी पूंजी को इजाजत देने के मुद्दे पर कांग्रेस और भाजपा बीच का रास्ता निकाल लें, जिससे भाजपा और कांग्रेस दोनों ‘देशहित’ में राजनीतिक जीत का दावा कर सकें. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन सब जानते हैं कि उत्तर उदारीकरण-भूमंडलीकरण दौर में ‘देशहित’ का असली मतलब बड़ी देशी-विदेशी पूंजी का हित हो गया है. इसलिए खुदरा व्यापार के मुद्दे पर भी इस नूराकुश्ती में जीत अंततः राजनीति की नहीं, बड़ी पूंजी की ही होगी. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;('राष्ट्रीय सहारा' के ३ दिसम्बर'११&amp;nbsp;अंक&amp;nbsp;में&amp;nbsp;हस्तक्षेप&amp;nbsp;में&amp;nbsp;प्रकाशित&amp;nbsp;लेख&amp;nbsp;का&amp;nbsp;पूरा&amp;nbsp;संस्करण)&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8157191427767672214-6716262312122729096?l=teesraraasta.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://teesraraasta.blogspot.com/feeds/6716262312122729096/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8157191427767672214&amp;postID=6716262312122729096' title='3 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8157191427767672214/posts/default/6716262312122729096'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8157191427767672214/posts/default/6716262312122729096'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://teesraraasta.blogspot.com/2011/12/blog-post_03.html' title='खुदरा व्यापार में विदेशी पूंजी के मुद्दे पर कांग्रेस और भाजपा के बीच नूराकुश्ती हो रही है'/><author><name>आनंद प्रधान</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05288123571817148120</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_r2d8D7rSfq8/SzcAjql1JOI/AAAAAAAAAGg/C6og8D0qeWE/S220/anand+pradhan+in+class.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/-AuKA0AAY7jo/Tto_TncVvnI/AAAAAAAABUQ/0APeM_AkPXg/s72-c/images%255B1%255D.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8157191427767672214.post-1614649789559368487</id><published>2011-12-02T17:04:00.000+05:30</published><updated>2011-12-02T17:04:36.878+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कथादेश:इलेक्ट्रानिक मीडिया'/><title type='text'>मीडिया का सांप्रदायिक पूर्वाग्रह साफ़ दिखता है</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color: blue; font-size: large;"&gt;न्यूजरूम में&amp;nbsp;मुसलमान&amp;nbsp;पत्रकारों&amp;nbsp;की कमी&amp;nbsp;सांप्रदायिक पूर्वाग्रह&amp;nbsp;को&amp;nbsp;मजबूत&amp;nbsp;करती&amp;nbsp;है &amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="color: purple;"&gt;तीसरी और आखिरी किस्त &lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/-ZXMqDpeu5cQ/Tti3cdxvBbI/AAAAAAAABUI/ISaztZ_zn_I/s1600/On+Air.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; cssfloat: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" dda="true" height="228" src="http://4.bp.blogspot.com/-ZXMqDpeu5cQ/Tti3cdxvBbI/AAAAAAAABUI/ISaztZ_zn_I/s320/On+Air.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;निश्चय ही, यह मीडिया खासकर न्यूज चैनलों की पूर्वाग्रहग्रस्त रिपोर्टिंग का नतीजा है. इसी पूर्वाग्रह का विस्तार आम मुस्लिम मामलों, समस्याओं और मुद्दों की मीडिया और चैनलों में रिपोर्टिंग और कवरेज में भी दिखाई देती है. कभी गौर से देखिए कि चैनलों में मुस्लिम समुदाय से जुड़ी किस तरह की खबरों को सबसे ज्यादा कवरेज मिलती है? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यही नहीं, मुस्लिम मुद्दों पर समुदाय की राय पेश करने के लिए किन्हें अतिथि के बतौर बुलाया जाता है? आप पाएंगे कि मुस्लिम समुदाय के मुद्दों और समस्याओं के बतौर तलाक और शादी जैसे पर्सनल मामलों, मौलानाओं और मौलवियों द्वारा विभिन्न मामलों पर दिए जानेवाले फतवों, मस्जिद-कब्रिस्तान के झगडों आदि को ही उछाला जाता है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन रिपोर्टों से ऐसा लगता है जैसे मुसलमानों में सुरक्षा, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और अन्य बुनियादी जरूरतों की कोई समस्या ही नहीं है. ऐसा नहीं है कि इन मुद्दों पर कभी रिपोर्ट नहीं आती है लेकिन ऐसी यथार्थपूर्ण रिपोर्टों और गढ़ी हुई अतिरेकपूर्ण रिपोर्टों के बीच का अनुपात ०५:९५ का है. यानी ९५ फीसदी रिपोर्टें एक खास पूर्वाग्रह और सोच के साथ लिखी और पेश की जाती है जो मुस्लिम समुदाय की स्टीरियोटाइप छवियों को ही और मजबूत करती है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/-vUIF1CIgpis/Tti3UFLc40I/AAAAAAAABUA/KI-9nu0N_to/s1600/Muslim+children.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; cssfloat: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" dda="true" height="214" src="http://2.bp.blogspot.com/-vUIF1CIgpis/Tti3UFLc40I/AAAAAAAABUA/KI-9nu0N_to/s320/Muslim+children.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;इस पूर्वाग्रह के पीछे एक बड़ा कारण यह माना जाता रहा है कि चैनलों के न्यूज रूम में पर्याप्त मुस्लिम प्रतिनिधित्व नहीं है. इस कारण चैनलों की रिपोर्टिंग में वह सेंसिटिविटी नहीं दिखाई पड़ती है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसमें कोई शक नहीं है कि चैनलों के न्यूजरूम में मुस्लिम पत्रकारों की संख्या देश की आबादी में उनकी संख्या की तुलना में नगण्य है. निश्चित तौर पर इसका असर चैनलों की रिपोर्टिंग, उसके टोन और एंगल और दृष्टिकोण पर पड़ता है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यही नहीं, चैनलों में जो मुस्लिम पत्रकार हैं भी, वे नीति निर्णय में प्रभावशाली पदों पर नहीं हैं. जो इक्का-दुक्का मुस्लिम पत्रकार संपादक हैं भी वे मुख्यधारा से अलग-थलग पड़ने के डर से अपने चैनलों में कुछ भी अलग नहीं करते हैं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह सचमुच अफसोस की बात है कि हिंदी के जिन दो प्रमुख चैनलों में समाचार निदेशक और संपादक के पदों पर मुस्लिम पत्रकार हैं, उन चैनलों में भी आतंकवादी हमलों/बम विस्फोटों की रिपोर्टिंग और कवरेज उतनी ही पूर्वाग्रहग्रस्त, गैर जिम्मेदार, अतिरेकपूर्ण, सनसनीखेज और सांप्रदायिक होती है जितनी अन्य चैनलों की. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/-36cMjFZ_4S0/Tti3OxcLZRI/AAAAAAAABT4/_fecTpmgWxA/s1600/Media+muslim.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; cssfloat: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" dda="true" src="http://4.bp.blogspot.com/-36cMjFZ_4S0/Tti3OxcLZRI/AAAAAAAABT4/_fecTpmgWxA/s1600/Media+muslim.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;लब्बोलुआब यह कि मीडिया और न्यूज चैनलों में गहराई से बैठे सांप्रदायिक पूर्वाग्रहों और द्वेष के कारण मीडिया में मुस्लिम समुदाय और इस्लाम की ऐसी एकांगी छवि गढ़ी गई है जिसके कारण पूरा समुदाय और इस्लाम धर्म न सिर्फ निशाने पर है बल्कि अपने को अलग-थलग महसूस करने लगा है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;('कथादेश' के दिसंबर'११ अंक में प्रकाशित स्तम्भ की तीसरी और आखिरी किस्त)&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8157191427767672214-1614649789559368487?l=teesraraasta.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://teesraraasta.blogspot.com/feeds/1614649789559368487/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8157191427767672214&amp;postID=1614649789559368487' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8157191427767672214/posts/default/1614649789559368487'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8157191427767672214/posts/default/1614649789559368487'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://teesraraasta.blogspot.com/2011/12/blog-post_02.html' title='मीडिया का सांप्रदायिक पूर्वाग्रह साफ़ दिखता है'/><author><name>आनंद प्रधान</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05288123571817148120</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_r2d8D7rSfq8/SzcAjql1JOI/AAAAAAAAAGg/C6og8D0qeWE/S220/anand+pradhan+in+class.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/-ZXMqDpeu5cQ/Tti3cdxvBbI/AAAAAAAABUI/ISaztZ_zn_I/s72-c/On+Air.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8157191427767672214.post-1803402469118690425</id><published>2011-12-01T19:18:00.000+05:30</published><updated>2011-12-01T19:18:04.256+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कथादेश:इलेक्ट्रानिक मीडिया'/><title type='text'>इस्लामी आतंकवाद का हौव्वा खड़ा करने में लगा है मीडिया</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color: blue; font-size: large;"&gt;पुलिस और ख़ुफ़िया एजेंसियों की कहानियों पर कभी सवाल नहीं उठाते हैं चैनल &lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color: purple;"&gt;दूसरी किस्त &lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/-zVf-YEt_PO8/TteDZfQKzsI/AAAAAAAABTQ/BV4LcYVEjXw/s1600/images%255B10%255D.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; cssfloat: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" dda="true" height="238" src="http://1.bp.blogspot.com/-zVf-YEt_PO8/TteDZfQKzsI/AAAAAAAABTQ/BV4LcYVEjXw/s320/images%255B10%255D.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;चिंता की बात यह है कि पिछले डेढ़-दो दशकों की इस पूर्वाग्रहग्रस्त रिपोर्टिंग और कवरेज का नतीजा यह हुआ है कि पूरे मुस्लिम समुदाय की छवि आतंकवादी या आतंकवाद के समर्थक या उनके प्रति सहानुभूति रखने वाले समुदाय की बना दी गई है. यही नहीं, ‘इस्लामी आतंकवाद’ का ऐसा हौव्वा खड़ा किया गया है जिसकी आड़ में पिछले एक-डेढ़ दशक में होनेवाली हर आतंकवादी घटना को बिना किसी जांच-पड़ताल के इस्लाम और मुसलमानों से जोड़ देना बहुत आसान हो गया है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यहाँ तक कि कई मामलों में अपनी नाकामी को छुपाने के लिए पुलिस और ख़ुफ़िया एजेंसियां भी मीडिया की इस कमजोरी का फायदा उठाकर बम विस्फोटों और आतंकवादी हमलों का दोष मुस्लिम तंजीमों पर थोपती रही हैं और निर्दोष मुस्लिम युवाओं को इन हमलों में शामिल बताकर पकड़ती और अपनी पीठ ठोंकती रही हैं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसे एक नहीं दर्जनों उदाहरण हैं जिनमें निर्दोष मुस्लिम युवाओं को आतंकवादी बताकर पकड़ा गया और मीडिया ने बिना किसी छानबीन और पड़ताल के पुलिस और ख़ुफ़िया एजेंसियों की रिपोर्टों पर आँख मूंदकर भरोसा किया. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यही नहीं, न्यूज चैनलों में ख़ुफ़िया एजेंसियों और पुलिस द्वारा मुहैया कराई गई आधी-अधूरी, गढ़ी हुई और सच्ची-झूठी जानकारियों में और नमक-मिर्च लगाकर उसे एक्सक्लूसिव और खोजी रिपोर्ट के बतौर पेश करने की होड़ भी लगी रहती है. इसमें वे निर्दोष मुस्लिम युवाओं को पुलिस से आगे बढ़कर बिना किसी ट्रायल के ही आतंकवादी घोषित कर देते हैं. उनके खिलाफ पूरा मीडिया ट्रायल चलता है जिसके कारण आम जनमत के साथ-साथ न्यायपालिका भी प्रभावित हो जाती है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/-ZcTsySYL_nM/TteDi9SWnII/AAAAAAAABTY/PzLBJRD7sVk/s1600/images%255B10%255D+%25282%2529.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; cssfloat: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" dda="true" height="212" src="http://4.bp.blogspot.com/-ZcTsySYL_nM/TteDi9SWnII/AAAAAAAABTY/PzLBJRD7sVk/s320/images%255B10%255D+%25282%2529.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;हालत यह हो जाती है कि आतंकवादी घोषित कर दिए गए इन मुस्लिम युवाओं को निष्पक्ष ट्रायल के अधिकार से भी वंचित कर दिया जाता है. उन्हें वकील तक नहीं मिलते हैं. कोई वकील उनका मुकदमा नहीं लड़ना चाहता है और जो लड़ता है, उसे भी आतंकवादियों के समर्थक या उनसे सहानुभूति रखनेवाले के बतौर पेश किया जाता है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसके बावजूद ऐसे अनेकों मामले हैं जिनमें फर्जी सबूतों और कमजोर जांच के कारण अदालतों ने आतंकवादी घोषित किये गए युवाओं को निर्दोष बताकर रिहा कर दिया. लेकिन इन युवाओं के लिए एक सामान्य जीवन शुरू कर पाना बहुत मुश्किल होता है क्योंकि मीडिया ने उनकी जो छवि बना दी होती है, उस दाग को छुडा पाना आसान नहीं होता है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस मामले में कश्मीरी पत्रकार इफ्तेखार गिलानी की गिरफ्तारी और फिर उन्हें मीडिया के जरिये आतंकवादी और देशद्रोही घोषित करने के मामले का उल्लेख जरूरी है. गिलानी ने अपनी किताब में विस्तार से बताया है कि कैसे मीडिया ने उनके बारे में झूठी और गढ़ी हुई ‘खबरें’ पुलिस और ख़ुफ़िया एजेंसियों के हवाले से छापीं और दिखाईं जिसके कारण बनी उनकी छवि के कारण जेल में उनकी पिटाई होती थी. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अभी हाल में, मालेगांव बम विस्फोट मामले में पिछले पांच वर्ष से गिरफ्तार कोई आधा दर्जन मुस्लिम युवकों को जमानत पर छोड़ना पड़ा है क्योंकि यह सच्चाई सामने आ चुकी है कि इस मामले में असली मुजरिम हिंदू उग्रवादी संगठन हैं. हैदराबाद के मक्का मस्जिद मामले में भी यही हुआ था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/-J2l29Sn9-hk/TteD5xZB0NI/AAAAAAAABTg/OFU4ctGghb4/s1600/news+channels+ob.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; cssfloat: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" dda="true" height="239" src="http://4.bp.blogspot.com/-J2l29Sn9-hk/TteD5xZB0NI/AAAAAAAABTg/OFU4ctGghb4/s320/news+channels+ob.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;इन मामलों ने यह साबित कर दिया है कि पुलिस और ख़ुफ़िया एजेंसियों का किस हद तक साम्प्रदायिकीकरण हो चुका है. वे मीडिया और न्यूज चैनलों के जरिये खुद अपने ही फैलाये झूठ पर इतना विश्वास करने लगी हैं कि किसी भी आतंकवादी हमले या बम विस्फोट के बाद उनका सबसे पहला शक मुसलमानों खासकर मुस्लिम युवाओं पर जाता है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस कारण हाल के वर्षों में ऐसे मामलों की संख्या बढ़ी है जिनमें अपनी नाकामयाबी छुपाने और वाहवाही लूटने (ईनाम और प्रोमोशन) के लिए वे बिना किसी ठोस सबूत और जांच-पड़ताल के निर्दोष मुस्लिम युवाओं को पकड़ने में भी हिचकिचा नहीं रहे हैं. ऐसे मामले अक्सर अदालतों में मुंह के बल गिर रहे हैं लेकिन इससे उनके रवैये पर कोई फर्क नहीं पड़ रहा है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दरअसल, पुलिस, स्पेशल सेल, ए.टी.एस और अन्य ख़ुफ़िया एजेंसियों का साहस इसलिए भी बढ़ा हुआ है क्योंकि उन्हें मीडिया और न्यूज चैनलों का समर्थन मिला हुआ है. इक्का-दुक्का चैनलों को छोड़ दिया जाए तो अधिकांश न्यूज चैनलों ने आतंकवादी हमलों और बम विस्फोटों से लेकर इन मामलों में कथित दोषियों और आतंकवादी प्लाटों के कथित भंडाफोड के बाद होनेवाली गिरफ्तारियों तक के बारे में पुलिस और ख़ुफ़िया एजेंसियों की ‘कहानियों’ की न तो कभी स्वतंत्र जांच-पड़ताल करने और उनपर सवाल उठाने की कोशिश की और न ही कभी निर्दोष युवकों की खोज-खबर लेने की जरूरत समझी. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;असल में, इस ‘इस्लामी आतंकवाद’ का हौव्वा खड़ा करने के मामले में अखबार और चैनल और राष्ट्रीय और क्षेत्रीय सभी प्रकार के समाचार माध्यमों का रवैया कमोबेश एक समान ही रहता है. हालांकि इस हौव्वे को खड़ा करने में सबसे बड़ी भूमिका सरकार, शासक और सांप्रदायिक दलों और सुरक्षा-ख़ुफ़िया एजेंसियों की है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/-S0S1eXPVBR8/TteEtwZFPYI/AAAAAAAABTo/l6g_QLlQ7nY/s1600/imagesCAO23T8E.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; cssfloat: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" dda="true" height="320" src="http://1.bp.blogspot.com/-S0S1eXPVBR8/TteEtwZFPYI/AAAAAAAABTo/l6g_QLlQ7nY/s320/imagesCAO23T8E.jpg" width="239" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;लेकिन उनके इस प्रोपेगंडा अभियान के सबसे बड़े और विश्वसनीय भोंपू के बतौर मुख्यधारा के न्यूज चैनलों समेत समूचे समाचार मीडिया की सक्रिय भूमिका को नजरंदाज नहीं किया जा सकता है. यहाँ तक कि ‘इस्लामी आतंकवाद’ के भूत को खड़ा करने के लिए न्यूज चैनलों और अखबारों ने अक्सर खबरें ‘गढ़ने’ और ‘बनाने’ में भी संकोच नहीं किया है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चैनल और अखबार यह हौव्वा कैसे खड़ा करते हैं, इसका एक उल्लेखनीय उदाहरण है, पूर्वी उत्तर प्रदेश के जनपद आजमगढ़ को ‘आतंकगढ़’ और ‘आतंकवाद की नर्सरी’ घोषित कर देना. आजमगढ़ पर मीडिया की अतिरेक भरी रिपोर्टिंग के कारण जिले की ऐसी छवि गढ़ी गई, गोया यहाँ का हर युवा आतंकवादी हो गया हो. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नतीजा, आजमगढ़ के हर मुसलमान पर आतंकवादी या उसका समर्थक होने का शक किया जाने लगा. यहाँ की ऐसी छवि बन गई है कि यहाँ के मुस्लिम युवाओं के लिए जिले से बाहर जाकर पढाई और रोजगार करना मुश्किल हो गया है. उन्हें दिल्ली और मुंबई जैसे शहरों में किराये पर घर तक नहीं मिलते. यहाँ तक कि मुस्लिम बहुल इलाकों में भी उन्हें बहुत परेशानी का सामना करना पड़ रहा है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसी तरह, मीडिया की एकतरफा और अतिरेकपूर्ण कवरेज ने मदरसों की ‘इस्लामी आतंकवाद की नर्सरी’ की ऐसी छवि गढ़ दी है जिससे आम जनमानस मदरसों को शक की निगाह से देखने लगा है. मदरसों की यह छवि इतनी स्टीरियोटाइप है कि आम जनमानस को यह लगता है कि मदरसों में बच्चों को केवल धार्मिक शिक्षा दी जाती है, कुरआन पढाया जाता है, उनमें धार्मिक असहिष्णुता और घृणा के बीज बोये जाते हैं और दकियानूसी सोच भरी जाती है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/-YSfc5MgqQ8U/TteFZO30wfI/AAAAAAAABTw/WASI4AGO-6E/s1600/imagesCAW85C0W.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; cssfloat: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" dda="true" height="212" src="http://4.bp.blogspot.com/-YSfc5MgqQ8U/TteFZO30wfI/AAAAAAAABTw/WASI4AGO-6E/s320/imagesCAW85C0W.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;खासकर इलेक्ट्रानिक मीडिया में जब भी मदरसों पर कोई रिपोर्ट दिखाई जाती है उसमें एक खास विजुअल को ही बार-बार चलाया जाता है जिसमें टोपी लगाये बच्चों को कतार में बैठकर जोर-जोर से धार्मिक ग्रन्थ पढते हुए दिखाया जाता है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जारी...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;&lt;em&gt;('कथादेश' के दिसंबर'११ के अंक में प्रकाशित स्तम्भ की दूसरी किस्त)&lt;/em&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8157191427767672214-1803402469118690425?l=teesraraasta.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://teesraraasta.blogspot.com/feeds/1803402469118690425/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8157191427767672214&amp;postID=1803402469118690425' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8157191427767672214/posts/default/1803402469118690425'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8157191427767672214/posts/default/1803402469118690425'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://teesraraasta.blogspot.com/2011/12/blog-post.html' title='इस्लामी आतंकवाद का हौव्वा खड़ा करने में लगा है मीडिया'/><author><name>आनंद प्रधान</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05288123571817148120</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_r2d8D7rSfq8/SzcAjql1JOI/AAAAAAAAAGg/C6og8D0qeWE/S220/anand+pradhan+in+class.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/-zVf-YEt_PO8/TteDZfQKzsI/AAAAAAAABTQ/BV4LcYVEjXw/s72-c/images%255B10%255D.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8157191427767672214.post-5685458971846441157</id><published>2011-11-29T19:20:00.000+05:30</published><updated>2011-11-29T19:20:50.895+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कथादेश:इलेक्ट्रानिक मीडिया'/><title type='text'>क्या भारतीय मीडिया हिन्दूवादी मीडिया है?</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color: blue; font-size: large;"&gt;मुसलमान&amp;nbsp;और&amp;nbsp;इस्लाम&amp;nbsp;को&amp;nbsp;आतंकवाद&amp;nbsp;का&amp;nbsp;पर्याय&amp;nbsp;बनाने&amp;nbsp;में मीडिया की&amp;nbsp;भूमिका&amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color: blue; font-size: large;"&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color: purple;"&gt;पहली किस्त &lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/-oshv3f1X_IE/TtThqFSG3NI/AAAAAAAABSo/x9rvozO4dfc/s1600/images%255B4%255D.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; cssfloat: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" dda="true" height="320" src="http://3.bp.blogspot.com/-oshv3f1X_IE/TtThqFSG3NI/AAAAAAAABSo/x9rvozO4dfc/s320/images%255B4%255D.jpg" width="312" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;ऐसा लगता है कि मीडिया खासकर समाचार मीडिया को जवाबदेह बनाने और इसके लिए इलेक्ट्रानिक मीडिया को स्व-नियमन के बजाय प्रेस काउन्सिल जैसे किसी स्वतंत्र नियामक के दायरे में लाने मांग करके प्रेस काउन्सिल के नए अध्यक्ष जस्टिस मार्कंडेय काटजू ने बर्र के छत्ते में हाथ डाल दिया है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यही नहीं, उन्होंने पिछले कुछ वर्षों में समाचार मीडिया में उभरी कई नकारात्मक प्रवृत्तियों, विचलनों और पत्रकारीय मूल्यों और एथिक्स की अनदेखी और उल्लंघनों को आड़े हाथों लेते हुए इससे निपटने के लिए प्रेस काउन्सिल को दंडात्मक अधिकार देने की भी मांग की है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कहने की जरूरत नहीं है कि उनके हालिया बयानों और साक्षात्कारों पर मीडिया जगत में हंगामा मचा हुआ है. हालांकि कुछ मीडिया विश्लेषकों, संपादकों और पत्रकारों ने जस्टिस काटजू के बयानों खासकर उसकी मूल भावना के प्रति काफी हद तक सहमति जताई है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन कई संपादकों के साथ-साथ एडिटर्स गिल्ड, अखबार मालिकों के संगठन- आई.एन.एस से लेकर न्यूज चैनलों के मालिकों के संगठन- न्यूज ब्राडकास्टर्स एसोसियेशन (एन.बी.ए) और संपादकों के संगठन- ब्राडकास्टर्स एडिटर्स एसोसियेशन (बी.ई.ए) ने एक सुर में जस्टिस काटजू के बयानों की कड़ी आलोचना हुए उसे वापस लेने की मांग की है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन सभी की शिकायत है कि जस्टिस काटजू की समाचार मीडिया की समझ न सिर्फ बहुत सतही है बल्कि वे सभी अख़बारों, न्यूज चैनलों और पत्रकारों को एक साथ काले ब्रश से पेंट कर रहे हैं. उन्हें यह भी लग रहा है कि जस्टिस काटजू जवाबदेही के नाम पर समाचार माध्यमों गला दबाने का अधिकार मांग रहे हैं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/-OIWU_hkL7TM/TtThz4rSijI/AAAAAAAABSw/5W3bHAKeKoM/s1600/images%255B8%255D+%25282%2529.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; cssfloat: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" dda="true" height="320" src="http://4.bp.blogspot.com/-OIWU_hkL7TM/TtThz4rSijI/AAAAAAAABSw/5W3bHAKeKoM/s320/images%255B8%255D+%25282%2529.jpg" width="269" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;हालांकि जस्टिस काटजू ने अपने शुरूआती बयानों पर सफाई दी है और थोड़ा पीछे भी हटे हैं लेकिन कुलमिलाकर वे समाचार मीडिया खासकर न्यूज चैनलों को लेकर अपने मूल बयानों पर डटे हुए हैं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नतीजा, दोनों ओर से तलवारें खींच गईं हैं. जस्टिस काटजू पीछे हटने को तैयार नहीं हैं. न्यूज चैनलों पर कुछ हद तक इसका असर भी दिख रहा है. उदाहरण के लिए, मशहूर अभिनेत्री एश्वर्या राय की बेटी के जन्म की खबर पर चैनल बावले नहीं हुए. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह और बात है कि इसके लिए बी.ई.ए ने सदस्य चैनलों को दस सूत्री निर्देश जारी किया था. चैनल इसे अपने स्व-नियमन व्यवस्था की कामयाबी के बतौर पेश कर रहे हैं. न्यूज चैनलों का दावा है कि स्व-नियमन की यह व्यवस्था हर लिहाज से बेहतर है और इसे काम करने और अपनी जड़ें जमाने का मौका मिलना चाहिए. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस बहस और टकराव का नतीजा चाहे जो हो लेकिन इसमें कोई दो राय नहीं है कि जस्टिस काटजू के बयानों ने न्यूज चैनलों के नैतिक विचलनों, कंटेंट के छिछलेपन, सनसनी और पूर्वाग्रहों-झुकावों से लेकर उनके नियमन, उसके स्वरूप, तरीके और दंड की सीमा जैसे मुद्दों पर पहले से ही जारी बहस को और तेज कर दिया है. इसका स्वागत किया जाना चाहिए. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उम्मीद की जानी चाहिए कि इससे समाचार मीडिया को टीका-टिप्पणी और आलोचना से ऊपर एक ‘पवित्र गाय’ मानने की धारणा और उसपर खुद समाचार मीडिया के अंदर बरती जानेवाली ‘षड्यंत्रपूर्ण चुप्पी’ टूटेगी. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दरअसल, मीडिया का अपने कामकाज के तौर-तरीकों और प्रदर्शन पर खुद मीडिया में खुली चर्चा को प्रोत्साहित करना स्व-नियमन का ही हिस्सा है. सच यह है कि जस्टिस काटजू ने वास्तव में कोई नया मुद्दा नहीं उठाया है. अलबत्ता, उनकी भाषा खासकर उसकी टोन और कुछ मामलों में उनके अतिरेक पर ऊँगली उठाई जा सकती है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/-Sj4eimfhvXo/TtTiZE4ahCI/AAAAAAAABS4/IJOFABBY9aM/s1600/images%255B10%255D.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; cssfloat: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" dda="true" height="239" src="http://2.bp.blogspot.com/-Sj4eimfhvXo/TtTiZE4ahCI/AAAAAAAABS4/IJOFABBY9aM/s320/images%255B10%255D.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;लेकिन सच यह है कि उन्होंने वही बातें दोहराई हैं और वही सवाल उठाये हैं जो पिछले काफी समय से उठाये जा रहे हैं. लेकिन मीडिया में आमतौर पर उन्हें अनदेखा किया जाता रहा है. लेकिन अब समय आ गया है जब चैनलों को उन मुद्दों से नजरें चुराने या उनकी अनदेखी के बजाय उनपर खुलकर चर्चा करनी चाहिए. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसा ही मुद्दा है न्यूज चैनलों सहित समूचे समाचार मीडिया में अल्पसंख्यक समुदाय खासकर मुस्लिम समाज के प्रति पूर्वाग्रहग्रस्त रवैये और उनकी एक नकारात्मक स्टीरियोटाइप छवि प्रस्तुत करने का. जस्टिस काटजू ने इस मुद्दे से जुड़े एक बहुत संवेदनशील पहलू को उठाया है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उनके मुताबिक, अधिकांश आतंकवादी हमलों, बम विस्फोटों आदि के बाद मीडिया खासकर न्यूज चैनल जिस तरह से बिना किसी गहरी जांच-पड़ताल और छानबीन के जल्दबाजी में आतंकवादी समूहों के बारे में कयास लगाने लगते हैं या किसी अज्ञात ई-मेल/फोन के आधार किसी विशेष आतंकवादी समूह को जिम्मेदार ठहराने लगते हैं, उस दौरान चैनलों की भाषा और टोन के कारण एक पूरे समुदाय को शक की निगाह से देखा जाने लगता है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जस्टिस काटजू के मुताबिक, चैनलों समेत पूरे समाचार मीडिया के इस रवैये के कारण समाज में विभाजन बढ़ता है. हैरानी की बात यह है कि मीडिया में काटजू के बयानों/उद्गारों के हर पहलू पर चर्चा हुई और हो रही है लेकिन इस मुद्दे पर चुप्पी छाई हुई है. क्या यह मीडिया की ‘षड्यंत्रपूर्ण चुप्पी’ का एक और उदाहरण है? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;निश्चय ही, यह मुद्दा समाचार मीडिया की एक ऐसी दुखती रग है जिसे या तो सिरे से ख़ारिज करने की कोशिश की जाती है और चर्चा लायक नहीं माना जाता है या फिर इसे एक अत्यधिक संवेदनशील मुद्दा बताकर उसपर चर्चा से बचने की कोशिश की जाती है. इस तरह इस मुद्दे पर एक सामूहिक चुप्पी साध ली जाती है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/-QcnXrrvah10/TtTim8WYQ1I/AAAAAAAABTA/_5FdOs28aA0/s1600/imagesCAE73SNB.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; cssfloat: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" dda="true" height="214" src="http://4.bp.blogspot.com/-QcnXrrvah10/TtTim8WYQ1I/AAAAAAAABTA/_5FdOs28aA0/s320/imagesCAE73SNB.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;लेकिन यह एक कड़वी सच्चाई है कि भारतीय समाचार मीडिया खासकर न्यूज चैनलों में हाल के वर्षों में घटी आतंकवादी घटनाओं की कवरेज में कभी खुलकर और कभी बारीकी के साथ मुस्लिम समुदाय और इस्लाम धर्म के प्रति पूर्वाग्रह (कुछ मामलों में विद्वेष की हद तक) दिखाई पड़ा है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हालांकि भारतीय मीडिया में अल्पसंख्यक समुदायों के प्रति यह पूर्वाग्रह नया नहीं है लेकिन पिछले डेढ़-दो दशकों में यह और अधिक गहरा और विकृत होता गया है. खासकर १९९३ के मुंबई बम धमाकों के बाद से आतंकवादी हमलों और धमाकों की रिपोर्टिंग की भाषा, टोन और कलर में इस पूर्वाग्रह को साफ देखा जा सकता है. कुछ मामलों में इस कवरेज में एक सांप्रदायिक रुझान भी किसी से छुपा नहीं है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मीडिया के इस पूर्वाग्रह और अतिरेकपूर्ण कवरेज से मुस्लिम समुदाय और इस्लाम धर्म की ऐसी छवि&amp;nbsp;बनी&amp;nbsp;है जिसमें पूरा समुदाय आतंकवादी या फिर आतंकवाद के समर्थक या उससे छुपे तौर पर सहानुभूति रखनेवाले समुदाय के बतौर पहचाना जाने लगा है जबकि इस्लाम धर्म की छवि एक हिंसक, आक्रामक, असहिष्णु, दकियानूसी और कट्टरपंथी धर्म की बना दी गई है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह सच है कि हाल के वर्षों में हुए कुछ बड़े और बर्बर आतंकवादी हमलों/बम विस्फोटों में कुछ मुस्लिम शामिल पाए गए हैं लेकिन इससे बड़ा सच यह है कि उन्हें न सिर्फ मुस्लिम समाज का समर्थन हासिल नहीं है बल्कि आम मुसलमान उसके खिलाफ है. यही नहीं, इन बम विस्फोटों और आतंकवादी हमलों में खुद कई निर्दोष मुसलमान भी मारे गए हैं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/-lBAqrcJ2dcM/TtTjDgEppUI/AAAAAAAABTI/ONddK0P1yw4/s1600/images%255B11%255D.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; cssfloat: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" dda="true" height="256" src="http://3.bp.blogspot.com/-lBAqrcJ2dcM/TtTjDgEppUI/AAAAAAAABTI/ONddK0P1yw4/s320/images%255B11%255D.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;लेकिन मीडिया और चैनलों में अक्सर इन तथ्यों की अनदेखी की जाती है. यह भी देखा गया है कि इन आतंकवादी घटनाओं और कथित ‘प्लाटों’ के खुलासे की रिपोर्टिंग और कवरेज में एक अंधराष्ट्रवादी दृष्टिकोण के साथ पाकिस्तान को निशाना बनाया जाता है लेकिन उसके वास्तविक निशाने पर देश के अंदर मुस्लिम समुदाय होता है. इन मौकों पर चैनलों की देशभक्ति जैसे उबाल मारने लगती है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रिपोर्टिंग और कवरेज की भाषा और प्रस्तुति इतनी उग्र और आक्रामक होती है कि उसमें तर्क और तथ्यों के लिए जगह नहीं रह जाती है. आश्चर्य नहीं कि इस प्रक्रिया में सबसे महत्वपूर्ण पत्रकारीय मूल्यों- तथ्यपूर्णता (एक्यूरेसी), वस्तुनिष्ठता, निष्पक्षता और संतुलन की कुर्बानी सबसे पहले दी जाती है. जाहिर है कि सबसे ज्यादा जोर सनसनी पैदा करने और दर्शकों को डराने पर रहता है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;&lt;em&gt;नोट: आप सभी मित्रों से आग्रह है कि आप इस मुद्दे पर जो सोचते हैं, अपनी&amp;nbsp;टिप्पणी&amp;nbsp;जरूर&amp;nbsp;भेजे..इस&amp;nbsp;विषय&amp;nbsp;पर&amp;nbsp;चर्चा&amp;nbsp;बहुत&amp;nbsp;जरूरी&amp;nbsp;है...&lt;/em&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;&lt;em&gt;('कथादेश' के आगामी दिसंबर'११ में प्रकाशित हो रहे स्तम्भ की पहली किस्त..पूरे लेख के लिए स्टाल से खरीदकर पढ़ें..)&lt;/em&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8157191427767672214-5685458971846441157?l=teesraraasta.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://teesraraasta.blogspot.com/feeds/5685458971846441157/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8157191427767672214&amp;postID=5685458971846441157' title='4 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8157191427767672214/posts/default/5685458971846441157'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8157191427767672214/posts/default/5685458971846441157'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://teesraraasta.blogspot.com/2011/11/blog-post_29.html' title='क्या भारतीय मीडिया हिन्दूवादी मीडिया है?'/><author><name>आनंद प्रधान</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05288123571817148120</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_r2d8D7rSfq8/SzcAjql1JOI/AAAAAAAAAGg/C6og8D0qeWE/S220/anand+pradhan+in+class.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/-oshv3f1X_IE/TtThqFSG3NI/AAAAAAAABSo/x9rvozO4dfc/s72-c/images%255B4%255D.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8157191427767672214.post-308217559047959434</id><published>2011-11-28T20:20:00.000+05:30</published><updated>2011-11-28T20:20:43.724+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='खुदरा व्यापार में एफ.डी.आई'/><title type='text'>खुदरा व्यापार में विदेशी पूंजी यानी जादू की छड़ी !</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;span style="color: blue; font-size: large;"&gt;&lt;strong&gt;सरकार बड़ी देशी-विदेशी पूंजी को खुश करने के लिए करोड़ों लोगों की आजीविका दांव पर लगाने जा रही है&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;span style="color: purple; font-size: large;"&gt;&lt;em&gt;लेकिन&amp;nbsp;भाजपा&amp;nbsp;का&amp;nbsp;विरोध&amp;nbsp;भी&amp;nbsp;नाटक&amp;nbsp;है&amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;/em&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/-j-wl-jNU0js/TtJHUuJ4yCI/AAAAAAAABR4/26GOTbBqvvI/s1600/images%255B1%255D.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; cssfloat: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" hda="true" height="205" src="http://2.bp.blogspot.com/-j-wl-jNU0js/TtJHUuJ4yCI/AAAAAAAABR4/26GOTbBqvvI/s320/images%255B1%255D.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;अंदर और बाहर के तमाम विरोधों को दरकिनार करते हुए आख़िरकार यू.पी.ए सरकार ने खुदरा व्यापार में ५१ फीसदी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफ.डी.आई) की इजाजत देने का फैसला कर लिया. इस फैसले के लिए सरकार पर देशी और विदेशी बड़ी पूंजी का जबरदस्त दबाव था. आर्थिक उदारीकरण के प्रति मनमोहन सिंह सरकार की प्रतिबद्धता दांव पर थी. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गुलाबी अखबारों और सी.आई.आई-फिक्की के सम्मेलनों में आर्थिक सुधारों को आगे बढ़ाने को लेकर सरकार की मंशा पर सवाल उठाए जा रहे थे. आर्थिक उदारीकरण के पैरोकार सरकार पर ‘नीतिगत पक्षाघात’ के आरोप लगा रहे थे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसे में, यू.पी.ए सरकार की घबड़ाहट और हड़बड़ी समझी जा सकती है. उसे देशी-विदेशी बड़ी पूंजी के बीच अपनी गिरती साख की चिंता सता रही थी. इसी दबाव और हताशा में उसने पिछले एक पखवाड़े में ऐसे कई फैसले किये हैं जिससे देशी-विदेशी बड़ी पूंजी का विश्वास जीत सके. खुदरा व्यापार में विदेशी पूंजी की इजाजत के फैसले को भी इसी सन्दर्भ में देखने की जरूरत है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसमें कोई दो राय नहीं है कि मनमोहन सिंह सरकार ने उत्तर प्रदेश सहित कई राज्यों के विधानसभा चुनावों से ठीक पहले यह फैसला करके एक बड़ा लेकिन नपा-तुला राजनीतिक जोखिम लिया है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/--0WzJ6jEkck/TtJHioDZs_I/AAAAAAAABSA/H7ejDmoaP4A/s1600/images%255B8%255D.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; cssfloat: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" hda="true" height="266" src="http://1.bp.blogspot.com/--0WzJ6jEkck/TtJHioDZs_I/AAAAAAAABSA/H7ejDmoaP4A/s320/images%255B8%255D.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;कारण, सरकार को आशंका थी कि अगर अभी फैसला नहीं लिया तो चुनावों के बाद यह फैसला करना और मुश्किल हो जाएगा. खासकर अगर कांग्रेस राज्य विधानसभा चुनावों में अच्छा प्रदर्शन नहीं करती है तो उसके लिए अपने और गठबंधन के राजनीतिक अंतर्विरोधों को साधना और मुश्किल हो जाएगा. खुद सरकार का राजनीतिक इकबाल कमजोर होगा. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसे में, उसके लिए बड़े और विवादस्पद राजनीतिक और आर्थिक फैसले करना आसान नहीं होगा. जाहिर है कि इन सभी पहलुओं के मद्देनजर सरकार ने अंग्रेजी के मुहावरे ‘बाईट द बुलेट’ यानी जोखिम लेने का फैसला किया है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन इस फैसले के पक्ष में सरकार जिस तरह के तर्क दे रही है और सपने दिखा रही है, उससे लगता है कि खुदरा व्यापार में विदेशी पूंजी यानी वालमार्ट, टेस्को और कारफुर जैसी कंपनियों के आते ही महंगाई से लेकर बेरोजगारी तक, कृषि से लेकर आर्थिक विकास तक और किसानों से लेकर लघु और मंझोले उद्योगों तक सभी समस्याएं चुटकी बजाते ही हल हो जाएँगी. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वाणिज्य मंत्री का दावा है कि इस फैसले से अगले पांच सालों में एक करोड़ से अधिक रोजगार पैदा होगा, किसानों को उचित कीमत मिलेगी, उपभोक्ताओं को सस्ता सामान मिलेगा और महंगाई पर अंकुश लगेगा. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसका अर्थ यह हुआ कि सरकार खुदरा व्यापार में विदेशी पूंजी को जादू की छड़ी की तरह देख रही है. अगर यह सच है तो यू.पी.ए सरकार ने इस फैसले को लेने में इतनी देर क्यों की? उसे यह फैसला बहुत पहले ले लेना चाहिए था. दूसरे, अगर खुदरा व्यापार में विदेशी सभी मर्जों की दवा है तो ५१ फीसदी और १० लाख की आबादी से अधिक के शहरों में ही स्टोर्स खोलने जैसे प्रतिबंधों की क्या जरूरत है? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/-2g7RpqOwAr4/TtJHvx9y0NI/AAAAAAAABSI/aaQCn_zZMfQ/s1600/images%255B1%255D+%25282%2529.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; cssfloat: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" hda="true" height="216" src="http://1.bp.blogspot.com/-2g7RpqOwAr4/TtJHvx9y0NI/AAAAAAAABSI/aaQCn_zZMfQ/s320/images%255B1%255D+%25282%2529.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;असल में, इसे कहते हैं, फिसल पड़े तो हर गंगे. मतलब यह कि बड़ी देशी-विदेशी पूंजी के दबाव में सरकार को यह फैसला करना पड़ा है और अब उसे जायज ठहराने के लिए तर्क गढे जा रहे हैं और लोगों को सपने दिखाए जा रहे हैं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन खुदरा व्यापार में विदेशी पूंजी की सच्चाई उतनी सुन्दर और हसीन नहीं है, जितनी बताई जा रही है. पहली बात तो यह है कि अगर खुदरा व्यापार में बड़ी पूंजी महंगाई का इलाज होती तो देश में पिछले चार-पांच सालों में रिलायंस, बिग बाज़ार, आर.पी.जी, भारती, बिरला, टाटा जैसे बड़े औद्योगिक समूहों ने खुदरा व्यापार के क्षेत्र में पाँव पसारे हैं लेकिन इससे महंगाई कहीं कम नहीं हुई है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन बड़ी कंपनियों के सुपर स्टोर्स में भी कीमतें बाहर से कम नहीं हैं. इन कंपनियों के आने से न तो बिचौलिए खत्म हुए हैं और न ही किसानों को उनके उत्पादों की वाजिब कीमत और उपभोक्ताओं को सस्ता सामान मिल रहा है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसे में, क्या रिलायंस और भारती के साथ वालमार्ट और टेस्को जैसी बड़ी विदेशी खुदरा व्यापारी कंपनियों के आ जाने से सब कुछ बदल जाएगा? जी नहीं. तथ्य यह है कि अमेरिका और यूरोप के जिन विकसित देशों में वालमार्ट और टेस्को जैसी बड़ी कम्पनियाँ हैं, वहाँ भी उनसे किसानों को कोई फायदा नहीं हुआ है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/-plAhSg1l4TI/TtJH7eF9lfI/AAAAAAAABSQ/c47YA7lembU/s1600/images%255B2%255D+%25282%2529.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; cssfloat: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" hda="true" height="216" src="http://2.bp.blogspot.com/-plAhSg1l4TI/TtJH7eF9lfI/AAAAAAAABSQ/c47YA7lembU/s320/images%255B2%255D+%25282%2529.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;अगर इन देशों में हर साल किसानों को अरबों डालर की सरकारी सब्सिडी न मिले तो किसान खत्म हो जाएं. अगर वालमार्ट और टेस्को से किसानों को इतना ही फायदा होता तो विकसित देशों को अपने किसानों को हर साल अरबों डालर की सब्सिडी नहीं देनी पड़ती. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तीसरे, खुदरा व्यापार में एक करोड़ रोजगार पैदा होने का दावा भी भ्रामक है. सच यह है कि संगठित खुदरा व्यापारी कम्पनियों का पूरा बिजनेस माडल कम से कम कर्मचारियों से, कम से कम वेतन पर, अधिक से अधिक काम पर टिका है. वालमार्ट और एक देशी परचून/खुदरा दूकान के बीच सबसे बड़ा अंतर यह है कि वालमार्ट का प्रति कर्मचारी सालाना बिजनेस, घरेलू किराने से कई गुना ज्यादा है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह ठीक है कि इनमें कुछ हजार/लाख लोगों को रोजगार मिल जाएगा लेकिन इन बड़ी देशी-विदेशी कंपनियों के कारण जिन लाखों खुदरा व्यापारियों का कारोबार प्रभावित होगा, क्या उसकी भरपाई इससे हो पायेगी? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसकी उम्मीद बहुत कम है. असल में, भारत जैसे देशों में खुदरा व्यापार सिर्फ व्यापार नहीं बल्कि रोजगार का सबसे बड़ा साधन है. इसमे कृषि क्षेत्र के बाद सबसे ज्यादा लोगों को रोजगार मिला हुआ है. एन.एस.एस.ओ के ताजा सर्वेक्षण के मुताबिक, खुदरा व्यापार में कोई ३.३१ करोड़ लोग लगे हुए हैं. जिन्हें कोई काम नहीं मिलता, वे कुछ पैसे जुगाड के पटरी से लेकर घर के बाहर छोटी सी दूकान खोलकर बैठ जाते हैं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/-9aITqfYqLB8/TtJIHIxiSYI/AAAAAAAABSY/gcBM3nkoMXg/s1600/images%255B1%255D+%25283%2529.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; cssfloat: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" hda="true" height="213" src="http://3.bp.blogspot.com/-9aITqfYqLB8/TtJIHIxiSYI/AAAAAAAABSY/gcBM3nkoMXg/s320/images%255B1%255D+%25283%2529.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;यही कारण है कि पूरी दुनिया में दुकानों के घनत्व यानी प्रति एक लाख की आबादी पर कुल दुकानों की संख्या के मामले में भारत पहले नंबर पर है. इनमें से ज्यादातर दुकानों में पूरा परिवार लगा हुआ है. पूरे घर की रोजी-रोटी इससे ही चलती है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसलिए सरकार चाहे जो दावा करे लेकिन तथ्य यह है कि बड़ी विदेशी कंपनियों के आगे मुकाबले में बहुत कम देशी खुदरा व्यापारी टिक पाएंगे. दुनिया के अधिकांश देशों के अनुभव भी इसी ओर इशारा करते हैं. साथ ही, वालमार्ट और टेस्को जैसी कम्पनियाँ किसानों को लाभकारी मूल्य, उपभोक्ताओं को सस्ता सामान देने और रोजगार पैदा करने नहीं बल्कि मुनाफा कमाने आ रही हैं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सीधी सी बात यह है कि अगर इन तीनों चीजों के साथ मुनाफा कमाना संभव होता तो देशी कम्पनियाँ भी यह कर सकती थीं. लेकिन यह तब तक संभव नहीं जब तक बड़ी कम्पनियाँ छोटे दुकानदारों को प्रतियोगिता से बाहर न करें और किसानों, उत्पादकों और उपभोक्ताओं को अपने कब्जे में न लें. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;साफ है कि खुदरा व्यापार को बड़ी देशी-विदेशी पूंजी के लिए खोलकर सरकार ने ऐसा सौदा किया है जिसमें चूना लगने का खतरा ज्यादा है और फायदे की उम्मीद कम. लेकिन बड़ी पूंजी को खुश करने में जुटी सरकार को इसकी परवाह कहाँ है? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/-4ovu3hCP2Fk/TtJIQ1s7nwI/AAAAAAAABSg/fE7H2mIGokQ/s1600/images%255B2%255D+%25283%2529.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; cssfloat: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" hda="true" height="320" src="http://2.bp.blogspot.com/-4ovu3hCP2Fk/TtJIQ1s7nwI/AAAAAAAABSg/fE7H2mIGokQ/s320/images%255B2%255D+%25283%2529.jpg" width="259" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;पर इसके साथ यह भी उतना ही बड़ा सच है कि जो विपक्षी पार्टियां खासकर भाजपा इस फैसले के विरोध में इतनी आगबबूला दिख रही है, वे सिर्फ विरोध का नाटक कर रही हैं. तथ्य यह है कि भाजपा न सिर्फ आर्थिक उदारीकरण और सुधारों की समर्थक है बल्कि खुदरा व्यापार में विदेशी पूंजी को इजाजत देने के पक्ष में रही है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगर २००४ के आम चुनावों में एन.डी.ए सरकार हारी नहीं होती तो चुनावों के तुरंत बाद वाजपेयी सरकार खुदरा व्यापार में विदेशी पूंजी की अनुमति दे देती. चुनावों से ठीक पहले तत्कालीन वित्त मंत्री जसवंत सिंह ने ‘बिजनेस स्टैण्डर्ड’ को इंटरव्यू में कहा था कि उनकी सरकार खुदरा व्यापार में २६ फीसदी विदेशी पूंजी की इजाजत देगी. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यही नहीं, पिछले साल जिन कुछ राज्य सरकारों ने खुदरा व्यापार में एफ.डी.आई को मंजूरी के हक में राय जाहिर की थी, उनमें गुजरात की नरेन्द्र मोदी और पंजाब की अकाली-भाजपा सरकार प्रमुख हैं. मजे की बात यह है कि जो उमा भारती वालमार्ट में आग लगाने की बात कर रही हैं, उनके अपने राज्य मध्यप्रदेश में भोपाल और इंदौर में और पडोसी छत्तीसगढ़ के रायपुर में भारती-वालमार्ट ने थोक व्यापार में यानी कैश एंड कैरी स्टोर्स खोल रखे हैं? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्या उमा भारती वहां आग लगाने जाएँगी? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;('नया इंडिया' के २८ नवम्बर'११ के अंक में प्रकाशित लेख का विस्तृत रूप)&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8157191427767672214-308217559047959434?l=teesraraasta.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://teesraraasta.blogspot.com/feeds/308217559047959434/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8157191427767672214&amp;postID=308217559047959434' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8157191427767672214/posts/default/308217559047959434'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8157191427767672214/posts/default/308217559047959434'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://teesraraasta.blogspot.com/2011/11/blog-post_28.html' title='खुदरा व्यापार में विदेशी पूंजी यानी जादू की छड़ी !'/><author><name>आनंद प्रधान</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05288123571817148120</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_r2d8D7rSfq8/SzcAjql1JOI/AAAAAAAAAGg/C6og8D0qeWE/S220/anand+pradhan+in+class.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/-j-wl-jNU0js/TtJHUuJ4yCI/AAAAAAAABR4/26GOTbBqvvI/s72-c/images%255B1%255D.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8157191427767672214.post-8364382106120262601</id><published>2011-11-25T10:32:00.000+05:30</published><updated>2011-11-25T10:32:51.399+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राजनीतिक अर्थशास्त्र'/><title type='text'>कैसा लोकतंत्र है यह, जहाँ जनता की नहीं पूंजी की इच्छा बड़ी है?</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color: blue; font-size: large;"&gt;अर्थनीति,&amp;nbsp;राजनीति से मुक्त&amp;nbsp;हो&amp;nbsp;चुकी है और&amp;nbsp;उसे&amp;nbsp;निर्देशित&amp;nbsp;कर&amp;nbsp;रही है&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दूसरी और आखिरी किस्त &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/-FLw_t2l7y-c/Ts8QkobpqrI/AAAAAAAABRQ/V9I0CRIO0EE/s1600/Manmohan+Singh.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; cssfloat: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" hda="true" height="320" src="http://2.bp.blogspot.com/-FLw_t2l7y-c/Ts8QkobpqrI/AAAAAAAABRQ/V9I0CRIO0EE/s320/Manmohan+Singh.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;ऐसा नहीं है कि मनमोहन सिंह सरकार इन खतरों से वाकिफ नहीं है. इसके बावजूद अगर वह जोखिम उठाने को तैयार है तो इसका सिर्फ एक कारण है. वह यह कि वह बड़ी पूंजी की नाराजगी का जोखिम नहीं उठाना चाहती है. इसके लिए वह कोई भी राजनीतिक कुर्बानी देने को तैयार है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सरकार के इस रवैये का ही एक और उदाहरण यह है कि आसमान छूती महंगाई के बावजूद न सिर्फ पेट्रोल की कीमतें वि-नियमित की गईं बल्कि हर १५ दिनों दिनों पर कीमतें बढ़ाई गई. सरकार और कांग्रेस को पता है कि आम आदमी इस फैसले से नाराज है और इसकी उसे राजनीतिक कीमत चुकानी पड़ सकती है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसके बावजूद सरकार अपने फैसले पर डटी हुई है. इससे पूंजीवादी जनतंत्र की असलियत का पता चलता है. यह कैसा जनतंत्र है कि इसमें जनता कुछ चाहती है और सरकार ठीक उसका उल्टा कर रही है. लेकिन यह कोई भारत तक सीमित परिघटना नहीं है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यूरोप खासकर यूनान (ग्रीस), इटली, पुर्तगाल, स्पेन जैसे आर्थिक-वित्तीय संकट में फंसे देशों की सरकारें जनमत के खिलाफ जाकर बड़ी वित्तीय पूंजी को खुश करने के लिए किफ़ायतखर्ची उपायों का पूरा बोझ आम लोगों पर डालने पर तुली हैं. इन देशों में सड़कों पर हो रहे जबरदस्त प्रदर्शनों से साफ़ है कि आम लोग इन उपायों का समर्थन नहीं कर रहे हैं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन सवाल यह है कि इसे जनतंत्र कैसे कहा जाए जिसमें सरकारें लोगों की इच्छाओं और मर्जी के खिलाफ जाकर फैसले कर रही हैं? याद कीजिये, हाल में यूनान के (अब पूर्व) प्रधानमंत्री जार्ज पापेंद्र्यु ने देश को दिवालिया होने से बचाने के लिए यूरोपीय संघ से मिलनेवाले बेलआउट पैकेज की शर्त के रूप में प्रस्तावित किफ़ायतखर्ची उपायों पर जब देश में जनमतसंग्रह कराने का एलान किया तो क्या हुआ था? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/-lh7gWkAZ6kk/Ts8Q5SWPXxI/AAAAAAAABRY/UAs-lv12K7I/s1600/Economic+Crisis+2.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; cssfloat: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" hda="true" height="320" src="http://4.bp.blogspot.com/-lh7gWkAZ6kk/Ts8Q5SWPXxI/AAAAAAAABRY/UAs-lv12K7I/s320/Economic+Crisis+2.jpg" width="264" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;इस फैसले के खिलाफ न सिर्फ ब्रुसेल्स, बान से लेकर लन्दन और न्यूयार्क तक वित्तीय बाजारों में हंगामा मच गया बल्कि यूरोपीय संघ का पूरा राजनीतिक नेतृत्व किसी भी तरह से जनमतसंग्रह को टालने में जुट गया. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह सबको पता था कि अगर जनमतसंग्रह हुआ तो लोग इन प्रस्तावों को स्वीकार नहीं करेंगे. मजबूरी में पापेंद्र्यू अपनी बात वापस लेनी पड़ी. लेकिन इससे भी बात नहीं बनी और उन्हें इस्तीफा देना पड़ा. इसी तरह, इटली में बर्लुस्कोनी को हटाकर नई सरकार बनाई गई है जिसने बेलआउट पैकेज के बदले किफ़ायतखर्ची के कड़े उपाय लागू करने पर सहमति जताई है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्या यही ‘जनता का, जनता के लिए और जनता के द्वारा’ शासन वाला लोकतंत्र है? साफ़ है कि इस पूंजीवादी उदार लोकतंत्र में जनता की इच्छा पर पूंजी की मर्जी ज्यादा भारी है. इसमें जनता के हितों के मुकाबले पूंजी के हितों को तरजीह दी जा रही है. यही कारण है कि जब भी दोनों में टकराव की स्थिति पैदा होती है तो पूंजी के हितों के आगे जनहित की कुर्बानी देने में देर नहीं लगती है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस मायने में पूंजीवाद और जनतंत्र परस्पर विरोधी विचार हैं. दरअसल, मार्क्स ने पूंजीवाद को एक ऐसी ‘स्वतः संचालित व्यवस्था’ बताया था जो अपने भागीदारों की इच्छा और समझ से स्वतंत्र परिचालित होती है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तात्पर्य यह कि एक स्वतः संचालित व्यवस्था होने के कारण पूंजीवादी व्यवस्था में राज्य के किसी ऐसे हस्तक्षेप की गुंजाइश नहीं होती है जो पूंजीवाद की स्वाभाविक गति को प्रभावित करे. लेकिन कोई भी लोकतंत्र तब तक सच्चा लोकतंत्र नहीं हो सकता, जिसमें लोगों की इच्छाओं के मुताबिक राजनीति और राज्य हस्तक्षेप न करे. लेकिन यहाँ तो राजनीति और राज्य के हाथ बांध दिए गए हैं और पूंजी को मनमर्जी की खुली छूट मिली हुई है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/-JSeYzEW_9Gc/Ts8RIjpctGI/AAAAAAAABRo/j9h1C-0wqvE/s1600/corporate+power+2.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; cssfloat: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" hda="true" height="230" src="http://4.bp.blogspot.com/-JSeYzEW_9Gc/Ts8RIjpctGI/AAAAAAAABRo/j9h1C-0wqvE/s320/corporate+power+2.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;याद रहे कि एकीकृत यूरोपीय आर्थिक संघ और एकल मुद्रा- यूरो के बुनियाद में यही विचार है जिसने अर्थनीति को राजनीति से पूरी तरह आज़ाद कर दिया. आर्थिक एकीकरण के लिए हुई मास्ट्रिख संधि में अर्थनीति तय करने के मामले में सदस्य राष्ट्रों के हाथ बांधते हुए इस व्यवस्था की गई है कि कोई देश पूर्वघोषित वित्तीय घाटे की सीमा को नहीं लांघ सकता है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मतलब यह कि आमलोगों की जरूरत भी हो तो सरकारें एक सीमा से ज्यादा खर्च नहीं कर सकती हैं. आश्चर्य नहीं कि आज यूरो को बचाने के लिए राजनीति यानी लोगों की इच्छाओं और आकांक्षाओं की बलि चढाई जा रही है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कहने की जरूरत नहीं है कि भारत भी उसी रास्ते पर है. पिछली एन.डी.ए सरकार ने विश्व बैंक-मुद्रा कोष और आवारा बड़ी पूंजी के दबाव में संसद में वित्तीय उत्तरदायित्व एवं बजट प्रबंधन (एफ.आर.बी.एम) कानून पारित किया था जिसमें वित्तीय घाटे की सीमा तय की गई है. यह अर्थनीति के राजनीति के बंधन से आज़ाद होने का एक और सबूत है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/-aWJx0oV9ZWo/Ts8RlUJfEFI/AAAAAAAABRw/M6sa9GqQPJM/s1600/Soniya+and+manmohan+singh.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; cssfloat: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" hda="true" height="320" src="http://2.bp.blogspot.com/-aWJx0oV9ZWo/Ts8RlUJfEFI/AAAAAAAABRw/M6sa9GqQPJM/s320/Soniya+and+manmohan+singh.jpg" width="196" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;हैरानी की बात नहीं है कि एन.डी.ए के बाद सत्ता में आई यू.पी.ए सरकार ने सबसे पहला काम इस कानून को नोटिफाई करने का किया था. समझना मुश्किल नहीं है कि यू.पी.ए सरकार बड़ी पूंजी को खुश करने के लिए राजनीतिक और आर्थिक नतीजों की परवाह किये बगैर जिस हड़बड़ी में फैसले कर रही है, उसकी जड़ें कहाँ हैं?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;&lt;em&gt;&lt;strong&gt;('जनसत्ता' के २३ नवम्बर के अंक में सम्पादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित&amp;nbsp;आलेख का&amp;nbsp;दूसरी&amp;nbsp;और अंतिम किस्त)&amp;nbsp;&lt;/strong&gt;&lt;/em&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8157191427767672214-8364382106120262601?l=teesraraasta.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://teesraraasta.blogspot.com/feeds/8364382106120262601/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8157191427767672214&amp;postID=8364382106120262601' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8157191427767672214/posts/default/8364382106120262601'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8157191427767672214/posts/default/8364382106120262601'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://teesraraasta.blogspot.com/2011/11/blog-post_25.html' title='कैसा लोकतंत्र है यह, जहाँ जनता की नहीं पूंजी की इच्छा बड़ी है?'/><author><name>आनंद प्रधान</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05288123571817148120</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_r2d8D7rSfq8/SzcAjql1JOI/AAAAAAAAAGg/C6og8D0qeWE/S220/anand+pradhan+in+class.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/-FLw_t2l7y-c/Ts8QkobpqrI/AAAAAAAABRQ/V9I0CRIO0EE/s72-c/Manmohan+Singh.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8157191427767672214.post-3208493216467535047</id><published>2011-11-24T10:30:00.000+05:30</published><updated>2011-11-24T10:30:41.794+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राजनीतिक अर्थशास्त्र'/><title type='text'>लोकतंत्र पर हावी पूंजी</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;span style="color: blue; font-size: large;"&gt;&lt;strong&gt;बड़ी पूंजी को खुश करने के लिए जनहित की अनदेखी की जा रही है&amp;nbsp;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&amp;nbsp; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पहली किस्त &lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/-AWW23DLlKXs/TsvXwrXt-GI/AAAAAAAABQg/wzLWd5UJs1c/s1600/upa+3.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; cssfloat: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" hda="true" height="178" src="http://3.bp.blogspot.com/-AWW23DLlKXs/TsvXwrXt-GI/AAAAAAAABQg/wzLWd5UJs1c/s320/upa+3.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;यू.पी.ए सरकार बहुत दबाव और जल्दी में दिखाई दे रही है. उसपर बड़ी देशी-विदेशी पूंजी का जबरदस्त दबाव है जो सरकार से इस बात पर सख्त नाराज है कि पिछले डेढ़-दो वर्षों में उसने आर्थिक सुधारों को आगे बढ़ाने के लिए कुछ खास नहीं किया है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नतीजा, पिछले एक सप्ताह में उसने ताबड़तोड़ कई फैसले किये हैं जिनका एकमात्र मकसद बड़ी देशी-विदेशी पूंजी को खुश करना है. उदाहरण के लिए, वित्त मंत्रालय ने खुदरा व्यापार में ५१ फीसदी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफ.डी.आई) के विवादस्पद और राजनीतिक रूप से अलोकप्रिय प्रस्ताव को हरी झंडी दे दी है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसी तरह, पेंशन फंड के बारे में संसद की स्थाई समिति की गारंटीशुदा आमदनी की सिफारिश को परे रखते हुए पी.एफ.आर.डी.ए कानून में संशोधन करके विदेशी निवेश की सीमा बढ़ाने के प्रस्ताव को कैबिनेट की मंजूरी दे दी गई है. साथ ही, आवारा विदेशी पूंजी को खुश करने के लिए सरकारी प्रतिभूतियों और कारपोरेट बांडों में विदेशी निवेश की सीमा ५ अरब डालर बढाकर क्रमश: १५ और २० अरब डालर कर दी गई है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसके अलावा बड़े विदेशी निवेशकों (क्यू.एफ.आई) को शेयर बाजार में सीधे निवेश का रास्ता खोलने की तैयारी हो चुकी है. इससे पहले सरकार ट्रेड यूनियनों के विरोध के बावजूद विवादास्पद नई मन्युफैक्चरिंग नीति को मंजूरी दे चुकी है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/-EQqYTxxjL7c/TsvYFIw9HlI/AAAAAAAABQw/wmrE60hnQyo/s1600/FII.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; cssfloat: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" hda="true" height="239" src="http://3.bp.blogspot.com/-EQqYTxxjL7c/TsvYFIw9HlI/AAAAAAAABQw/wmrE60hnQyo/s320/FII.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;यही नहीं, एयरलाइंस उद्योग में विदेशी निवेश खासकर विदेशी एयरलाइनों के निवेश को भी इजाजत देने की तैयारी हो गई है. साफ है कि यू.पी.ए सरकार न सिर्फ देशी-विदेशी बड़ी पूंजी को खुश करने की जल्दबाजी में है बल्कि नव उदारवादी आर्थिक सुधारों के प्रति अपना समर्पण और भक्ति-भाव साबित करने पर भी तुल गई है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सरकार की घबड़ाहट और जल्दबाजी समझी जा सकती है. असल में, मनमोहन सिंह सरकार देशी-विदेशी बड़ी पूंजी की बढ़ती नाराजगी से घबड़ाई हुई है. इन दिनों बड़ी पूंजी खुद संकट में और इससे बाहर निकलने के लिए बेचैन है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसे लगता है कि भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों, वरिष्ठ केन्द्रीय मंत्रियों की आपसी लड़ाई, सरकार और कांग्रेस पार्टी के बीच खींचतान और अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की राजनीतिक चुनौती में उलझकर यू.पी.ए सरकार ‘नीतिगत पक्षाघात’ का शिकार हो गई है. इसके संकेत बड़ी पूंजी के मुखपत्र बन गए गुलाबी अखबारों से मिलते हैं जिनका दावा है कि न सिर्फ देशी-विदेशी बड़े कारोबारियों और उद्योगपतियों का देश की अर्थव्यवस्था में विश्वास कमजोर हुआ है बल्कि देश में ‘निवेश का माहौल’ खराब हो रहा है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आमतौर पर बड़े उद्योगपति सार्वजनिक तौर पर राजनीतिक बयान देने से बचते हैं लेकिन पिछले छह महीनों में एक के बाद दूसरे उद्योगपति ने खुलकर सरकार के ‘नीतिगत पक्षाघात’ की आलोचना की है और आर्थिक सुधारों को आगे बढ़ाने की अपील दोहराई है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दरअसल, बड़ी पूंजी को यह आशंका सताने लगी है कि अगर यू.पी.ए सरकार ने आर्थिक सुधारों के दूसरे चरण से जुड़े लेकिन वर्षों से फंसे, विवादस्पद और राजनीतिक रूप से अलोकप्रिय कुछ बड़े नीतिगत फैसले तुरंत नहीं किये तो अगले छह महीनों में ये फैसले करने और मुश्किल हो जाएंगे. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/-mqzYC9b-rP4/TsvYRd_1rEI/AAAAAAAABQ4/w1VNaV2Vh7g/s1600/Congress+symbol.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; cssfloat: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" hda="true" height="320" src="http://1.bp.blogspot.com/-mqzYC9b-rP4/TsvYRd_1rEI/AAAAAAAABQ4/w1VNaV2Vh7g/s320/Congress+symbol.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;इसकी वजह यह है कि अगर आनेवाले विधानसभा चुनावों खासकर उत्तर प्रदेश में कांग्रेस ने अच्छा प्रदर्शन नहीं किया तो केन्द्र की यू.पी.ए सरकार की हालत राजनीतिक रूप से काफी कमजोर हो जायेगी. दूसरी ओर, सरकार के तीन साल पूरे हो जाएंगे और तीन साल के बाद यूँ भी किसी सरकार के लिए राजनीतिक रूप से अलोकप्रिय फैसले करना मुश्किल हो जाता है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जाहिर है कि इस कारण देशी-विदेशी बड़ी पूंजी बहुत बेचैन है. उसे यू.पी.ए सरकार से बहुत उम्मीद थी. खासकर २००९ के चुनावों में वामपंथी पार्टियों की हार और यू.पी.ए की उनपर निर्भरता खत्म हो जाने के बाद बड़ी पूंजी की उम्मीदें बहुत बढ़ गईं थीं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;माना जाता है कि चुनाव जीतने के बाद पहले दो-ढाई सालों में सरकारें राजनीतिक रूप सख्त और अलोकप्रिय फैसले ले लेती हैं क्योंकि उसके बाद उनपर अगले चुनावों का राजनीतिक दबाव बढ़ने लगता है. लेकिन पिछले दो-ढाई वर्षों में यू.पी.ए सरकार एक के बाद दूसरे विवादों, भ्रष्टाचार के आरोपों और आपसी खींचतान में ऐसी फंसी कि वह बड़ी पूंजी की अधिकांश उम्मीदों को पूरा नहीं कर पाई. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इससे बड़ी पूंजी की सरकार से निराशा बढ़ती जा रही है. उसके गुस्से का एक बड़ा कारण यह भी है कि पिछले दो-तीन वर्षों में देश भर में जहाँ भी बड़ी पूंजी ने नए प्रोजेक्ट शुरू करने की कोशिश की, चाहे वह कोई स्टील प्लांट हो, अल्युमिनियम प्लांट हो, बिजलीघर हो, न्यूक्लियर पावर प्लांट हो, सेज हो, आटोमोबाइल यूनिट हो या कोई रीयल इस्टेट परियोजना, उसे स्थानीय आम जनता का विरोध झेलना पड़ रहा है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/-ydpbmxMAToc/TsvYmJiuNXI/AAAAAAAABRA/318exkB1glA/s1600/india-poor%255B1%255D.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; cssfloat: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" hda="true" height="217" src="http://1.bp.blogspot.com/-ydpbmxMAToc/TsvYmJiuNXI/AAAAAAAABRA/318exkB1glA/s320/india-poor%255B1%255D.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;लोग अपने जमीन, जल, जंगल और खनिज संसाधनों को छोड़ने के लिए तैयार नहीं हैं. इस कारण, बड़ी पूंजी न सिर्फ मन-मुताबिक प्रोजेक्ट नहीं लगा पा रही है बल्कि प्राकृतिक संसाधनों का पूरा दोहन नहीं कर पा रही है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बड़ी पूंजी को उम्मीद थी कि सरकार उसे इस गतिरोध से निकालेगी. लेकिन उसकी यह उम्मीद भी पूरी होती नहीं दिखाई पड़ रही है. इससे बड़ी पूंजी और कारपोरेट जगत के गुस्से का अनुमान लगाया जा सकता है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस बीच, अजीम प्रेमजी, मुकेश अम्बानी और सुनील मित्तल जैसे बड़े उद्योगपतियों के बयानों ने सरकार की नींद उड़ा दी है. यह एक तरह से खतरे की घंटी थी. मनमोहन सिंह सरकार को लग गया कि अगर बड़ी देशी-विदेशी पूंजी को खुश करने के लिए जल्दी से कुछ बड़े फैसले नहीं किये गए तो न सिर्फ सरकार चलाना मुश्किल हो जाएगा बल्कि सरकार खतरे में पड़ जायेगी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस डर से घबराई यू.पी.ए सरकार ने बड़ी पूंजी को खुश करने के लिए पिछले एक सप्ताह में ऐसे कई बड़े नीतिगत फैसले किये हैं और आनेवाले दिनों में कई और करने जा रही है जिन्हें लेकर न सिर्फ व्यापक राजनीतिक सहमति नहीं है बल्कि उनका कई राजनीतिक दलों, जन संगठनों, ट्रेड यूनियनों, छोटे और खुदरा व्यापारियों के संगठनों द्वारा विरोध किया जा रहा है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यही नहीं, इन फैसलों से देशी-विदेशी बड़ी पूंजी को भले खूब फायदा हो लेकिन अर्थव्यवस्था और खासकर आम लोगों के रोटी-रोजगार पर बुरा असर पड़ने की आशंका है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उदाहरण के लिए, खुदरा व्यापार में ५१ फीसदी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के प्रस्ताव को वित्त मंत्रालय की हरी झंडी को ही लीजिए. दुनिया भर के अनुभवों से साफ़ है कि खुदरा व्यापार में बड़ी देशी-विदेशी कंपनियों के आने से आम उपभोक्ताओं को कोई खास फायदा नहीं होता लेकिन उनकी आक्रामक रणनीति के कारण करोड़ों छोटे और मंझोले व्यापारियों की रोटी-रोजी खतरे में पड़ सकती है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/-x0_f0gaUY50/TsvZC4hayBI/AAAAAAAABRI/6q4xoMlTIEo/s1600/corporate+power.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; cssfloat: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" hda="true" height="280" src="http://2.bp.blogspot.com/-x0_f0gaUY50/TsvZC4hayBI/AAAAAAAABRI/6q4xoMlTIEo/s320/corporate+power.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;इसी तरह, नई मन्युफैक्चरिंग नीति और पेंशन फंड में सुधारों के नाम पर न सिर्फ श्रमिकों के हितों की बलि चढ़ाई जा रही है बल्कि लाखों लोगों की जीवन भर की कमाई को शेयर बाजार में उड़ाने का रास्ता साफ किया जा रहा है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जारी...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;('जनसत्ता' के नवम्बर'११ के अंक में सम्पादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित लेख की पहली किस्त)&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8157191427767672214-3208493216467535047?l=teesraraasta.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://teesraraasta.blogspot.com/feeds/3208493216467535047/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8157191427767672214&amp;postID=3208493216467535047' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8157191427767672214/posts/default/3208493216467535047'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8157191427767672214/posts/default/3208493216467535047'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://teesraraasta.blogspot.com/2011/11/blog-post_24.html' title='लोकतंत्र पर हावी पूंजी'/><author><name>आनंद प्रधान</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05288123571817148120</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_r2d8D7rSfq8/SzcAjql1JOI/AAAAAAAAAGg/C6og8D0qeWE/S220/anand+pradhan+in+class.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/-AWW23DLlKXs/TsvXwrXt-GI/AAAAAAAABQg/wzLWd5UJs1c/s72-c/upa+3.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8157191427767672214.post-4351664340642592757</id><published>2011-11-22T17:51:00.000+05:30</published><updated>2011-11-22T17:51:30.855+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='तमाशा मेरे आगे'/><title type='text'>बाजार बड़ा या आत्म-नियमन?</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color: blue; font-size: large;"&gt;कसमे-वादे, आत्मनियंत्रण और आत्म-नियमन सब बातें है, बातों का क्या&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/-nhh3EQVGceg/TsUiUty8xXI/AAAAAAAABPA/xDudNdgZeB0/s1600/images%255B4%255D.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; cssfloat: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" hda="true" height="299" src="http://1.bp.blogspot.com/-nhh3EQVGceg/TsUiUty8xXI/AAAAAAAABPA/xDudNdgZeB0/s320/images%255B4%255D.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;न्यूज चैनलों की दुनिया में इन दिनों खासी उथल-पुथल है. प्रेस काउन्सिल के नए अध्यक्ष जस्टिस मार्कंडेय काटजू के बयानों और इरादों से हडकंप मच हुआ है. ऐसा लगता है कि चैनलों को जस्टिस काटजू के डंडे का डर सताने लगा है. नतीजा, काटजू के भूत से निपटने के लिए चैनलों के अंदर कुछ कम लेकिन बाहर कुछ ज्यादा आत्मानुशासन और आत्म-नियमन का जाप होने लगा है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आत्म-नियमन को लेकर अपनी ईमानदारी का सबूत देने के लिए चैनलों के संपादकों ने मिल-जुलकर ‘तीसरी कसम’ के हिरामन की तर्ज पर तीन नहीं, दस कस्में खाई हैं. इनका लब्बोलुआब यह है कि चैनल जानी-मानी अभिनेत्री ऐश्वर्या राय के बच्चे के जन्म की रिपोर्टिंग करते हुए बावले नहीं होंगे. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैसे कहते हैं कि कसमें तोड़ने के लिए ही होती हैं. देखें, इस कसम पर चैनल कितने दिन टिकते हैं और सबसे पहले इसे कौन तोड़ता है? नहीं-नहीं, संपादकों और उनकी कसम की ईमानदारी पर मुझे कोई शक नहीं है. उनकी बेचैनी भी कुछ हद तक समझ में आती है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हालांकि उनमें से कई चैनलों में मची गंध के लिए कुछ हद तक खुद भी जिम्मेदार हैं लेकिन यह भी ठीक है कि इनमें से कई थक गए हैं, कुछ पूरी ईमानदारी से उस अंधी दौड़ से बाहर निकलना चाहते हैं जिसके कारण चैनलों के न्यूजरूम में अधिकतर फैसले संपादकीय विवेक से कम और इस डर से अधिक लिए जाते है
