शनिवार, नवंबर 24, 2012

शोकाकुल चैनलों पर बाल ठाकरे का महिमामंडन

यह शिव सैनिकों का डर था या टी आर पी का लालच लेकिन चैनलों ने संतुलन और अनुपात बोध को ताखे पर रख दिया

पहली क़िस्त

न्यूज चैनलों खासकर हिंदी न्यूज चैनलों में बहुत शुरू से संतुलन और उससे ज्यादा अनुपात बोध का अभाव रहा है. अक्सर उनकी कवरेज को देखकर यह आशंका होती रही है कि जैसे चैनलों ने ये शब्द कभी सुने नहीं हैं या कहें कि उनके सम्पादकीय शब्दकोष से संतुलन और अनुपात बोध जैसे दो महत्वपूर्ण संपादकीय मूल्यों और विचारों को पूरी तरह से विदाई दे दी गई है.
इसकी जगह न्यूज चैनलों में अतार्किकता, भावुकता और अतिरेक का बोलबाला रहा है. उस समय चैनलों के संपादकों का दावा हुआ करता था कि चैनल अभी अपने बाल्य-काल में हैं और जैसे-जैसे समय गुजरेगा, वे परिपक्व होंगे और उनमें एक स्थिरता, संतुलन और अनुपात बोध भी बढ़ेगा.
लेकिन लगता है कि चैनलों की उम्र बढ़ने के साथ उनका संतुलन और अनुपात बोध और बिगड़ता जा रहा है. इसका सबसे ताजा उदाहरण महाराष्ट्र में शिव सेना नेता बाल ठाकरे की बीमारी और मौत के समय दिखा, जब सभी चैनल भावुकता की बाढ़ में ऐसे डूबने-उतराने लगे कि संतुलन और अनुपात बोध के साथ-साथ तथ्य और तर्क भी उसमें डूब गए.  

बाल ठाकरे की मौत से शोकाकुल चैनलों का संतुलन इस कदर बिगड़ा कि उन्हें ठाकरे में ऐसे-ऐसे गुण नजर आने लगे, जिसके बारे में शायद ही पहले किसी ने सुना हो. विचित्र स्थिति यह हो गई कि जिन कारणों से ठाकरे की जीवन भर आलोचना हुई, वे सभी उनके ‘गुण’ बन गए और चैनलों में उनके यशगान की होड़ सी चलती रही.

यह सचमुच हैरान करनेवाला दृश्य था जब न्यूज चैनल एक साथ सामूहिक स्मृति भ्रंश के शिकार नजर आए. वे भूल गए कि ये वही बाल ठाकरे थे जिन्होंने जीवन भर क्षेत्रीय, सांप्रदायिक, भाषाई और जातीय आधारों पर घृणा, विभाजन, गुंडागर्दी और आतंक की संकीर्ण और जहरीली राजनीति की, मराठी मानुष के नामपर देश के विभिन्न हिस्सों से मुंबई आए आप्रवासी मजदूरों से लेकर धार्मिक अल्पसंख्यकों को निशाना बनाया और लोकतंत्र को गाली देने से लेकर हिटलर की खुलेआम प्रशंसा करने में कोई शर्म महसूस नहीं की.
यही नहीं, चैनल यह भी भूल गए कि ये वही बाल ठाकरे थे और उनकी शिव सेना थी जिसने अनेकों बार अखबारों/चैनलों के दफ्तरों पर हमला किया, तोड़फोड़ और पत्रकारों के साथ मारपीट की.
लेकिन मजा देखिये कि न्यूज चैनल इन्हीं कारणों से ठाकरे की प्रशंसा करने में जुटे रहे कि वे बहुत ‘साहसी, बेलाग, खरी-खरी बात करनेवाले और अपनी बातों पर डटे रहनेवाले नेता’ थे. लेकिन यह कहते हुए बहुत कम चैनलों ने बताया कि ठाकरे के कथित साहसिक बयान क्या थे और उनके मायने क्या थे? उल्टे ठाकरे को ‘एक था टाइगर’ जैसी उपमाओं से याद किया जाता रहा.

ठाकरे की शवयात्रा और अंतिम संस्कार में उमड़ी भीड़ ने तो चैनलों को ऐसा विह्वल कर दिया कि वे सभी ठाकरे के ‘करिश्मे’ से ‘शॉक एंड आव्’ की स्थिति में पहुँच गए और शवयात्रा के साथ चैनलों पर कमेंट्री कर रहे एंकर-रिपोर्टर पत्रकार कम और कथाकार ज्यादा लग रहे थे. वस्तुनिष्ठता, तथ्यात्मकता और संतुलन को ताखे पर रख दिया गया था.   

नतीजा, बाल ठाकरे की बीमारी और खासकर मृत्यु और शवयात्रा को चैनलों ने जिस तरह से 24x7 कवरेज दिया, उसने ठाकरे को रातों-रात ‘हिंदू हृदय सम्राट’ और क्षेत्रीय (खासकर मुंबई-ठाणे) नेता से राष्ट्रीय नेता बना दिया. चैनलों के बीच बाल ठाकरे को वीरोचित विशेषणों से नवाजने की होड़ लगी हुई थी और साथ में आदरपूर्ण शोकधुन भी बज रही थी.
यही नहीं, चैनल और उनके एंकरों-रिपोर्टरों के साथ-साथ बाल ठाकरे की परिघटना को समझाने के लिए स्टूडियो में बैठे विशेषज्ञ भी भावनाओं में बहे जा रहे थे. कई मौकों पर कुछ एंकरों-रिपोर्टरों के अंदर बैठा शिव सैनिक बाहर निकल आया और कई बार उनकी आवाज़ भी रूंधने लगती थी.
कहना मुश्किल है कि चैनल और उनके एंकर-रिपोर्टर और विशेषज्ञ बाल ठाकरे के प्रति किसी वास्तविक श्रद्धा, आदर और आस्था के कारण भावनाओं में बहे जा रहे थे या बाल ठाकरे के शिव सैनिकों का ज्ञात-अज्ञात डर था जिसके कारण मुंबई के फिल्म सितारों-उद्योगपतियों-नेताओं-खिलाडियों की भीड़ ठाकरे के बंगले मातोश्री पर अपनी मौजूदगी दर्ज करवाने में होड़ कर रही थी?

इन दो के अलावा चैनलों के कवरेज की कोई और व्याख्या नहीं हो सकती है क्योंकि यह सिर्फ सामान्य लोकाचार का मामला नहीं था जिसके कारण किसी मृत व्यक्ति की आलोचना नहीं की जाती है. सच पूछिए तो यह तो सिर्फ बहाना था क्योंकि अगर यह सिर्फ सामान्य लोकाचार होता तो चैनलों के कवरेज में संतुलन और अनुपात बोध दिखता जोकि सिरे से गायब था.

यहाँ तक कि ठाकरे की राजनीति और विचारों के आलोचक संपादकों/पत्रकारों की भाषा भी बदली-बदली सी थी और वे जिस सावधानी से शब्द चुन रहे थे, उनकी भाषा और लहजे में जिस तरह का असमंजस दिख रहा था, उसमें इस अज्ञात डर को महसूस किया जा सकता था.
ऐसे में, वे असुविधाजनक सवाल पूछने की न तो गुंजाइश थी और न ही ऐसा करने का जोखिम उठाने का साहस अधिकांश चैनलों में दिखाई पड़ा. यह जरूर है कि कई चैनलों पर कुछ वरिष्ठ पत्रकारों और विशेषज्ञों ने धारा के विपरीत तैरने और तथ्यों को रखने की कोशिश की लेकिन उनकी तार्किक बातें भी चैनलों पर ठाकरे के लिए उमड़ रही भावुकता के कोलाहल और शोकधुन में गुम हो गईं.
सवाल यह है कि चैनलों की इस कवरेज की व्याख्या कैसे की जाए? पहली बात तो यह है कि इस भावुकता भरे कवरेज में लोकाचार से अधिक एक बिजनेस सेन्स था.

असल में, मुंबई न सिर्फ देश की आर्थिक और वित्तीय राजधानी है बल्कि वह चैनलों के कारोबार के लिए भी बहुत महत्वपूर्ण है. मुंबई और महाराष्ट्र में न सिर्फ सर्वाधिक टी.आर.पी मीटर लगे हुए हैं बल्कि देश के सबसे समृद्ध राज्य और शहर होने के नाते विज्ञापनदाताओं की स्वाभाविक तौर पर उनमें सबसे अधिक दिलचस्पी भी होती है.
इसके कारण चैनलों में मुंबई और महाराष्ट्र के प्रति एक अतिरिक्त झुकाव दिखता रहा है. मुंबई के खाते-पीते मध्यवर्गीय दर्शकों का ध्यान खींचने की अंग्रेजी और हिंदी चैनलों में हमेशा होड़ रहती है.

कहते हैं कि चैनलों की दुनिया मुंबई से दिल्ली तक और कुछ हद तक पश्चिमी भारत तक सीमित है. यही कारण है कि मुंबई की अपेक्षाकृत सामान्य खबरें भी चैनलों पर तुरंत छा जाती हैं जबकि देश के अन्य हिस्से खासकर पूर्वी भारत और उनकी बड़ी घटनाएं, समस्याएं और मुद्दे अनदेखे चले जाते हैं. ठाकरे की बीमारी और मृत्यु/अंतिम संस्कार भी इसके अपवाद नहीं थे.
सच यह है कि अगर ठाकरे मुंबई में न हुए होते तो उनकी बीमारी और मृत्यु की खबर चैनलों पर इतने विस्तार से नहीं चलती. बहुत दूर जाने की जरूरत नहीं है, पिछले साल नवंबर में असम के मशहूर गायक/कलाकार भूपेन हजारिका की मौत हुई थी और उनकी शवयात्रा और अंतिम संस्कार में गुवाहाटी जैसे अपेक्षाकृत छोटे शहर में ५ लाख से ज्यादा लोग जुटे थे लेकिन कितने चैनलों पर भूपेन हजारिका को ठाकरे की तरह कवरेज मिली.
साफ़ है कि ठाकरे को इतनी अधिक और महिमापूर्ण कवरेज मिलने की एक बड़ी वजह उनका टी.आर.पी राजधानी मुंबई से होना था. चैनलों की टी.आर.पी आधारित ‘न्यूज वैल्यू’ पर स्वाभाविक तौर पर यह ‘बड़ी खबर’ थी. यहाँ तक भी गनीमत थी लेकिन मुंबई के ठाकरे भक्त ‘मराठी मानुष’ दर्शकों का दिल जीतने की चैनलों में ऐसी होड़ मची कि उन्हें ठाकरेमय होने में देर नहीं लगी.

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हालाँकि यह भी चैनलों की कोई नई बीमारी नहीं है. वे हमेशा से ‘पापुलर मूड’ के  साथ तैरने की कोशिश करते हैं. ऐसा नहीं है कि वे ‘पापुलर मूड’ के साथ बहने के खतरे नहीं जानते हैं लेकिन इसके बावजूद वे इसलिए भी करते हैं क्योंकि इससे उनके कारोबारी के साथ-साथ वैचारिक हित भी जुड़े हुए हैं.

आश्चर्य नहीं कि वे ऐसे मौकों पर ‘पापुलर मूड’ बनाने की कोशिश भी करते हैं. ठाकरे प्रकरण इसका एक और ताजा प्रमाण है. चैनलों ने जिस तरह से कोई एक सप्ताह तक घंटों ठाकरे की बीमारी की कवरेज की और ठाकरे का महिमामंडन शुरू किया, उसके साथ ही यह तय हो गया था कि हवा का रुख क्या है?
उसी की तार्किक परिणति मृत्यु से लेकर अंतिम संस्कार तक की कवरेज में भी दिखी. असल में, चैनल और उनके विशेषज्ञ मुंबई में ठाकरे की शवयात्रा और अंतिम संस्कार में उमड़ी भीड़ को लोकप्रियता और पापुलर मूड के उदाहरण के बतौर पेश कर रहे हैं, वह काफी हद तक खुद चैनलों की अतिरेकपूर्ण 24X7 कवरेज का नतीजा थी.
एक तो चैनलों ने ऐसा माहौल बनाया जिसमें शुरू से लाखों की भीड़ जुटने के अनुमान-चर्चाओं और बाद में टी.वी कैमरों के कमाल ने एक बैंड-वैगन प्रभाव पैदा कर दिया और जिसके कारण बहुतेरे लोग देखा-देखी और इस डर के साथ उस भीड़ का हिस्सा बनते गए कि कहीं पीछे न छूट जाए. एक तरह की ‘सामूहिक उन्माद’ (मॉस हिस्टीरिया) की स्थिति पैदा हो गई थी.

कहते हैं कि भीड़ का अपने एक खास मनोविज्ञान होता है. मुंबई जैसे महानगर में जहाँ असुरक्षा बोध बहुत ज्यादा है, वहां एक विशाल ‘मराठी मानुष’ भीड़ का हिस्सा बनकर खुद को सुरक्षित और शक्तिशाली महसूस करने के मनोविज्ञान को नजरंदाज़ नहीं किया जा सकता है...

जारी ...... 

('कथादेश' के दिसंबर अंक में प्रकाशित हो रही टिप्पणी की पहली क़िस्त...विस्तार से पत्रिका में पढ़ें या 5 दिसंबर तक इंतजार करें। आपकी टिप्पणियों का इंतजार रहेगा।)

शुक्रवार, नवंबर 23, 2012

आइ-पैड से लिखा यह पहला पोस्ट

आज आई-पैड से यह पहला पोस्ट लिख रहा हूं। हालाँकि इसे लिखने में काफ़ी समय लग रहा है लेकिन यह अच्छी सुविधा है। मज़ा आ रहा है। थोड़ी मेहनत की जाए तो इसपर मास्टरी हासिल की जा सकती है।
देखें, यह शौक़ कब तक चलता है? क्यों?

शनिवार, नवंबर 17, 2012

सी ए जी की रिपोर्ट दोबारा पढ़िए सिब्बल साहब!

बकौल वित्त मंत्री 2 जी घोटाला एक 'मिथ' है उर्फ़ मुदहूँ आँख, कतहूँ कछु नाहिं
ऐसा लगता है कि यू.पी.ए सरकार न सिर्फ गंभीर स्मृति दोष की शिकार है बल्कि वह मानती है कि आम आदमी की याददाश्त भी बहुत कमजोर है. यही कारण है कि २ जी स्पेक्ट्रम की ताजा नीलामी के ‘फेल’ हो जाने के तुरंत बाद संचार मंत्री कपिल सिब्बल ने तंज और तुर्शी के साथ पूछा कि ‘कहाँ हैं कम्पट्रोलर एंड आडिटर जनरल (सी.ए.जी)?’
बताने की जरूरत नहीं है कि उसके बाद से सूचना एवं प्रसारण मंत्री मनीष तिवारी और वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने भी कुछ इसी अंदाज़ में सी.ए.जी से सवाल पूछे हैं कि कहाँ गए २ जी के १,७६००० करोड़ रूपये?
वित्त मंत्री ने २ जी स्पेक्ट्रम की ताजा नीलामी में उम्मीद से कम कमाई का हवाला देते हुए २ जी घोटाले को एक मिथ घोषित कर दिया तो कपिल सिब्बल ने मीडिया से लेकर सिविल सोसायटी सब पर हल्ला बोलते हुए कहा कि सनसनी के चक्कर में टेलीकाम की सफलता की कहानी को चौपट कर दिया गया.

ऐसा लगा जैसे यू.पी.ए सरकार २ जी नीलामी की नाकामी का ही बेसब्री इंतज़ार कर रही थी. आश्चर्य नहीं कि सरकार में इसे लेकर चिंता कम और जश्न का माहौल ज्यादा दिख रहा है. कारण साफ़ है. कांग्रेस और यू.पी.ए को सी.ए.जी के खिलाफ हमला बोलने का एक और बहाना मिल गया है.

लेकिन सी.ए.जी पर यू.पी.ए सरकार के मंत्रियों और कांग्रेस नेताओं के हमले का पहला शिकार तथ्य हो रहे हैं. वे २ जी घोटाले पर सी.ए.जी की रिपोर्ट से न सिर्फ आधे-अधूरे तथ्य पेश कर रहे हैं बल्कि उन्हें मनमाने तरीके से तोड़-मरोड़ कर भी पेश कर रहे हैं. इन तथ्यों पर गौर कीजिए:
·       पहली बात यह है कि सी.ए.जी ने २ जी स्पेक्ट्रम के मनमाने तरीके से आवंटन के कारण विभिन्न स्थितियों में सरकारी खजाने को नुकसान के चार अनुमान पेश किये थे. (विस्तार से यहाँ पढ़िए : http://cag.gov.in/html/reports/civil/2010-11_19PA/chap5.pdf ) सी.ए.जी की रिपोर्ट के मुताबिक, २ जी स्पेक्ट्रम आवंटन में अलग-अलग आधारों पर आकलन के अनुसार क्रमश: ६७३६४ करोड़ रूपये या ६९६२६ करोड़ रूपये या  ५७६६६ करोड़ रूपये या १,७६,६४५ करोड़ रूपये के नुकसान का अनुमान लगाया था. इसलिए सी.ए.जी पर केवल १,७६,६४५ करोड़ रूपये के अनुमान को लेकर सवाल पूछने के पीछे क्या मकसद है?

·       दूसरे, सी.ए.जी ने ये सभी चार अनुमान किसी कल्पना के आधार पर नहीं बल्कि ठोस और वास्तविक आधारों पर निकाले थे. उदाहरण के लिए, सी.ए.जी ने ६७३६४ करोड़ रूपये के नुकसान का आकलन टेलीकाम कंपनी- एस. टेल की ओर से तत्कालीन संचार मंत्री ए. राजा को अखिल भारतीय लाइसेंस और स्पेक्ट्रम के लिए की गई पेशकश के आधार पर किया था.

·       इसी तरह ६९६२६ करोड़ और ५७६६६ करोड़ रूपये के नुकसान का आकलन २ जी स्पेक्ट्रम लेने में कामयाब रही कंपनी- यूनिटेक और स्वान टेलीकाम द्वारा अपने शेयर क्रमशः यूनिनार और एतिसलात को बेचने के लिए तय किये गए मूल्य के आधार किया गया था.

·       इसी तरह १,७६,६४५ करोड़ रूपये के नुकसान का आकलन ३ जी स्पेक्ट्रम की नीलामी के आधार किया गया था. यही नहीं, सी.ए.जी ने ये चारों आकलन पेश करते हुए किसी खास एक अनुमान को ज्यादा प्राथमिकता नहीं दी थी. अलबत्ता, मीडिया में स्वाभाविक तौर पर १,७६,६४५ करोड़ रूपये के नुकसान की चर्चा खूब हुई थी.

·       इसलिए संचार मंत्री का पहले का ‘जीरो नुकसान’ का दावा हो या अब १,७६,६४५ करोड़ रूपये के आकलन के भ्रामक होने का दावा- यह घोटाले की लीपापोती से ज्यादा कुछ नहीं है. आखिर वे ‘जीरो नुकसान’ की ‘थियरी’ को छोड़कर बताएँगे कि इस तरह के मामलों में नुकसान के आकलन का सही तरीका क्या है? सी.ए.जी ने कहाँ और कैसे गलत आकलन किया?

यही नहीं, वित्त मंत्री का यह दावा भी तथ्यों और सच्चाई के आगे कहीं नहीं ठहरता है कि २ जी घोटाला एक मिथ है. अच्छा होता कि खुद वित्त मंत्री एक बार फिर से सी ए जी की रिपोर्ट खासकर उसका निष्कर्ष पढ़ लेते तो उन्हें पता चल जाता कि यह क्यों मिथ नहीं बल्कि भारी घोटाला है. उनका सुविधा के लिए उस रिपोर्ट के निष्कर्ष के तीन पृष्ठ का लिंक यह रहा: http://cag.gov.in/html/reports/civil/2010-11_19PA/chap6.pdf    

वैसे तुलसीदास कह गए हैं, ‘मुदहूँ आँख, कतहूँ कछु नाहिं !’ वित्त मंत्री जी, अगर २ जी घोटाला नहीं तो क्या था कि तत्कालीन संचार मंत्री ए. राजा जेल चले गए? वे ही क्यों, संसद कनिमोजी से लेकर कारपोरेट समूहों के मालिक, अफसर और सरकारी अफसर जेल क्यों गए? क्या सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में गलत फैसला किया? क्या सी.बी.आई की चार्जशीट गलत है?

ऐसे एक नहीं दर्जनों सवाल और तथ्य हैं जो साबित करते हैं कि २ जी के आवंटन की न सिर्फ नीति गलत थी बल्कि उसमें खूब मनमानी और धांधली हुई. सच पूछिए तो इस मामले को यू.पी.ए सरकार जितना ही दबाने, तोड़ने-मरोड़ने और छुपाने की कोशिश कर रही है, वह उतनी ही बेपर्दा होती जा रही है.         

शुक्रवार, नवंबर 16, 2012

आई.सी.यू. की ओर जाती हुई अर्थव्यवस्था

मर्ज बढ़ता गया, ज्यों-ज्यों दवा की उर्फ़ मामला है अर्थव्यवस्था के मर्ज की नीमहकीमी का

सुस्त और लड़खड़ाती अर्थव्यवस्था में दीपावली का धूम-धड़ाका भी जान फूंकने में नाकाम रहा है. उल्टे अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों से आ रही नकारात्मक खबरों ने दीपावली की रौनक को भी कुछ हद तक फीका कर दिया. आश्चर्य नहीं कि शेयर बाजार में मुर्दनी सी छाई हुई है और सेंसेक्स नीचे लुढकता नजर आ रहा है.
कारण साफ़ है. बीमार अर्थव्यवस्था में नव उदारवादी आर्थिक सुधारों और एफ.डी.आई के नए डोज के बावजूद कोई सुधार नहीं दिख रहा है. ताजा रिपोर्टों के मुताबिक, औद्योगिक उत्पादन से लेकर निर्यात तक में गिरावट और खुदरा मूल्य सूचकांक पर आधारित मुद्रास्फीति में वृद्धि का दौर जारी है.   
इन रिपोर्टों ने योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलुवालिया के इस दावे को झुठला दिया है कि भारतीय अर्थव्यवस्था गिरावट के सबसे निचले स्तर तक पहुँच चुकी है और यहाँ से वह ऊपर की ओर चढ़ेगी. इसके उलट अर्थव्यवस्था से आ रही रिपोर्टें स्थिति के और बिगड़ने की ओर इशारा कर रही हैं.

उदाहरण के लिए औद्योगिक उत्पादन को लीजिए. ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, सितम्बर महीने में औद्योगिक उत्पादन की दर एक बार फिर नकारात्मक (-) ०.४ प्रतिशत रही जबकि उसमें वृद्धि की उम्मीद की जा रही थी. यह गिरावट इसलिए भी चौंकानेवाली है क्योंकि यह गिरावट ठीक त्यौहारों- दशहरा, ईद और दीपावली से पहले के महीने में आई है.

माना जाता है कि त्यौहारों के दौरान उपभोक्ता वस्तुओं की मांग बढ़ जाती है और इस मांग को पूरा करने के लिए उसके पहले के महीनों में उत्पादन भी बढ़ता है. यही नहीं, अगस्त में औद्योगिक उत्पादन की वृद्धि दर २.३ प्रतिशत रही जिसके कारण औद्योगिक उत्पादन में सुधार की उम्मीदें दिखने लगी थीं.
लेकिन सितम्बर में औद्योगिक उत्पादन में गिरावट से सुधार की उम्मीदों को झटका लगा है. सबसे अधिक चिंता की बात यह है कि औद्योगिक क्षेत्र के अंदर मैन्युफैक्चरिंग की वृद्धि दर में (-) १.५ फीसदी और पूंजीगत सामानों में सबसे अधिक (-) १२.२ फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है. यहाँ तक कि उपभोक्ता सामानों के उत्पादन में भी मामूली गिरावट दर्ज की गई है.
हैरानी की बात नहीं है कि चालू वित्तीय वर्ष के पहले छह महीनों- अप्रैल से सितम्बर के बीच औद्योगिक उत्पादन की वृद्धि दर गिरकर सिर्फ ०.१ फीसदी रह गई है जबकि पिछले साल की इसी अवधि में यह ५.१ फीसदी थी. इससे साफ़ है कि औद्योगिक क्षेत्र की स्थिति नाजुक बनी हुई है.

सवाल यह है कि ऐसी स्थिति क्यों है? यू.पी.ए सरकार, औद्योगिक-वाणिज्यिक लाबी संगठनों और गुलाबी अखबारों की मानें तो इसकी सबसे बड़ी वजहें वैश्विक आर्थिक संकट से लेकर आर्थिक सुधारों को आगे बढ़ा पाने में आ रही राजनीतिक मुश्किलें हैं. इसके कारण एक अनिश्चितता और निराशा का माहौल बना है जिसके कारण देशी-विदेशी पूंजी अर्थव्यवस्था में नया निवेश करने से कतरा रही है और उसका असर मांग और औद्योगिक उत्पादन में गिरावट के रूप में दिखाई पड़ रहा है.

लेकिन यह आधा-अधूरा और भ्रामक तर्क है. यह सच है कि अर्थव्यवस्था में सुस्ती और उसकी लड़खड़ाहट की सबसे बड़ी वजह निवेश में आई गिरावट है. इसका एक बड़ा प्रमाण खुद औद्योगिक उत्पादन के ताजा आंकड़े हैं जिनके मुताबिक सितम्बर महीने में पूंजीगत सामानों के उत्पादन में सर्वाधिक (-) १२.२ फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है.
यह साफ़ तौर पर नए निवेश में आई गिरावट की ओर इशारा करता है. यही नहीं, वैश्विक आर्थिक संकट के कारण निर्यात में गिरावट आई है जिसका असर औद्योगिक उत्पादन पर पड़ा है. लेकिन नए निवेश में गिरावट की सबसे बड़ी वजह आर्थिक सुधारों को आगे बढ़ाने में कथित नाकामी या भ्रष्टाचार और घोटालों को लेकर बना नकारात्मक माहौल या विभिन्न प्रोजेक्ट्स को पर्यावरणीय मंजूरी आदि मिलने में हो रही देरी नहीं है.
सच यह है कि नए निवेश में गिरावट के लिए खुद यू.पी.ए सरकार की नव उदारवादी आर्थिक नीतियां जिम्मेदार हैं. समस्या यह है कि यू.पी.ए सरकार मौजूदा आर्थिक संकट के समाधान का रास्ता उन्हीं नव उदारवादी आर्थिक नीतियों में खोज रही है जिनके कारण यह संकट आया है. इसका नतीजा ‘मर्ज बढ़ता गया, ज्यों-ज्यों दवा की’ के रूप में सामने आ रहा है.

असल में, नव उदारवादी आर्थिक सैद्धांतिकी में सबसे अधिक जोर सरकार के वित्तीय घाटे को काबू में रखने और निजी क्षेत्र को अधिक से अधिक प्रोत्साहित करने के वास्ते अर्थव्यवस्था को उसके लिए अधिक से अधिक खोलने पर जोर दिया जाता है. कहने की जरूरत नहीं है कि यू.पी.ए सरकार इसी रणनीति पर आगे बढ़ रही है.

आश्चर्य नहीं कि पिछले दो महीनों में यू.पी.ए सरकार ने वित्तीय घाटे को कम करने के लिए सब्सिडी में कटौती पर काफी जोर दिया है. इसके लिए पेट्रोलियम उत्पादों और रसोई गैस से लेकर उर्वरकों की कीमतों में वृद्धि की है. बिजली क्षेत्र में सुधारों के नामपर राज्य सरकारों को बिजली दरों में वृद्धि करने पर बाध्य किया है. रेल किरायों में वृद्धि प्रस्तावित है.
इस साल के बजट में गैर योजना व्यय में १० फीसदी की कटौती पहले से जारी थी और खबर है कि योजना बजट में भी २० फीसदी कटौती का प्रस्ताव है. वित्त मंत्री पी. चिदंबरम बार-बार वित्तीय घाटे को बजट अनुमान के भीतर रखने की कसमें खा रहे हैं.
दूसरी ओर, सुधारों के नामपर एक झटके में खुदरा व्यापार को एफ.डी.आई के लिए खोलने से लेकर बीमा-पेंशन क्षेत्र में एफ.डी.आई की सीमा बढ़ाने तक के फैसले किये गए हैं. यहाँ तक कि निवेश को प्रोत्साहित करने के नामपर टैक्स बचाने की कोशिशों पर रोक लगानेवाले गार नियमों और वोडाफोन पर पीछे से टैक्स लगानेवाले प्रस्ताव को स्थगित कर दिया गया.

यही नहीं, देशी-विदेशी निवेशकों को खुश करने के नामपर निवेश की राह में आनेवाली पर्यावरणीय मंजूरी की अनिवार्यता को दूर करने के लिए खुद प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में राष्ट्रीय निवेश बोर्ड बनाने का प्रस्ताव है.
कहने की जरूरत नहीं है कि इस पूरी कसरत का एकमात्र मकसद देशी-विदेशी पूंजी को लुभाना और उन्हें नए निवेश के लिए प्रोत्साहित करना है. लेकिन यू.पी.ए सरकार के यह दांव बहुत कामयाब होता नहीं दिख रहा है. यह ठीक है कि इन फैसलों का निजी देशी-विदेशी पूंजी और कारपोरेट समूहों ने स्वागत किया है और इससे बाजार में ‘फीलगुड’ का माहौल भी दिख रहा है.
लेकिन यह माहौल जमीन पर कम और हवा में ज्यादा है. अर्थव्यवस्था के ताजा संकेतकों से साफ़ है कि जमीन पर स्थिति बद से बदतर होती जा रही है क्योंकि अर्थव्यवस्था नए निवेश की कमी से सूखती जा रही है.
असल में, नया निवेश न बढ़ने के पीछे सबसे बड़ी वजह यह है कि वैश्विक आर्थिक संकट के कारण एक ओर देशी-विदेशी निवेशक/कार्पोरेट्स सुस्त हो गए हैं और दूसरी ओर, घरेलू तौर पर भी भ्रष्टाचार और याराना (क्रोनी) पूंजीवाद के कारण माहौल काफी नकारात्मक हो गया है. अति सक्रिय सिविल सोसायटी, कोर्ट्स, सी.ए.जी और मीडिया के कारण बड़ी देशी-विदेशी पूंजी और कार्पोरेट्स को मनमाने लाभ देनेवाले फैसले करना आसान नहीं रह गया है.

दूसरे, निवेश के अधिकांश प्रोजेक्ट्स के लिए जमीन अधिग्रहण से लेकर उनके लिए पर्यावरणीय मंजूरी आदि लेने में भारी मुश्किल आ रही है क्योंकि किसान-आदिवासी और जनसंगठन अब न सिर्फ जागरूक हो गए हैं बल्कि वे अपने अधिकारों और पर्यावरण सुरक्षा के लिए मरने-मारने पर उतारू हैं. इसके कारण सैकड़ों प्रोजेक्ट फंसे पड़े हैं.

तीसरे, निजी निवेश में आई गिरावट की भरपाई यू.पी.ए सरकार सार्वजनिक निवेश में बढ़ोत्तरी करके कर सकती थी. सार्वजनिक निवेश में बढ़ोत्तरी से निजी निवेश को भी प्रोत्साहन मिलता है. लेकिन वित्तीय घाटे को काबू में रखने की जिद में सरकार सार्वजनिक निवेश में बढ़ोत्तरी तो दूर की बात है, उल्टे उसमें कटौती पर उतारू दिखाई दे रही है.
योजना बजट में २० फीसदी की कटौती का प्रस्ताव अर्थव्यवस्था के लिए बहुत घातक साबित हो सकता है. उल्लेखनीय है कि सार्वजनिक क्षेत्र की एक दर्जन से अधिक कंपनियों के पास लगभग २.७५ लाख करोड़ रूपये का अधिशेष पड़ा हुआ है लेकिन सरकार उन्हें निवेश को लिए उत्साहित करने में नाकाम रही है. उल्टे वह सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों के विनिवेश और अधिक लाभांश से वित्तीय घाटे की भरपाई के लिए बेताब दिख रही है.
इससे अर्थव्यवस्था एक ऐसे दुष्चक्र में फंसती जा रही है जिससे बाहर निकलना दिन पर दिन मुश्किल होता जा रहा है. दीपावली पर अर्थव्यवस्था से आई चेतावनियों ने इसकी एक बार फिर पुष्टि की है लेकिन यू.पी.ए सरकार इसे देखने-सुनने को तैयार नहीं है.

यह नव उदारवादी आर्थिक नीतियों के प्रति उसके आब्सेशन का एक और उदाहरण है. आश्चर्य नहीं होगा अगर कुछ दिनों में अर्थव्यवस्था आई.सी.यू में पहुँच जाए.
           
('दैनिक भास्कर', नई दिल्ली के 16 नवम्बर के अंक में आप-एड पर प्रकाशित टिप्पणी)

मंगलवार, नवंबर 13, 2012

दीपावली ऐसे मनाएं, जैसे इन विद्यार्थियों ने मनाई

ये उम्मीद के दिए हैं, इन्हें सलाम कीजिये
 
मेरे विद्यार्थी अक्सर मुझे चौंकाते रहते हैं. आज दीपावली के दिन उन्होंने फिर मुझे चौंका दिया. वैसे तो इस बार की दीपावली कुछ अवसाद और कुछ बेचैनी के बीच गुजर रही थी. लेकिन मेरे विद्यार्थियों ने उसमें कुछ खुशी और उत्साह की वजहें जोड़ दीं. कहें कि उन्होंने मेरी दीपावली बना दी है.
हुआ यह कि पिछले सप्ताह गुरुवार को सुबह आई.आई.एम.सी में हिंदी पत्रकारिता की कक्षा में जाकर बैठा और कुछ चर्चा शुरू करने की भूमिका बना ही रहा था कि कक्षा प्रतिनिधि आदर्श शुक्ल धीरे से बगल में खड़े हो गए. फिर कुछ हिचकिचाते हुए आदर्श कान में फुसफुसाने लगे कि सर, तरुणकान्त का सुझाव है कि क्यों न हम इस दीवाली अपनी खुशियों में से कुछ गरीब बच्चों में भी बाँटें? आपस में कुछ पैसे इक्कट्ठा करें और उससे कुछ मिठाइयां और चाकलेट आदि खरीदकर फुटपाथ पर रहनेवाले बच्चों के बीच बाँटें.

फिर पूरी क्लास में इस प्रस्ताव पर चर्चा हुई और तुरंत सबकी सहमति बन गई. यह तय हुआ कि हर छात्र/छात्रा अपनी मर्जी से जो दे सकते हैं और संकाय सदस्यों से भी जो मिले, उसे जुटा कर थोड़ी खुशियाँ- मिठाइयों/चाकलेट/पटाखों उन बच्चों तक भी पहुंचाई जाए, जो बिलकुल हाशिए पर हैं. उससे ज्यादा अच्छी बात यह हुई कि क्लास में उसके बाद यह चर्चा भी हुई कि छात्र/छात्राएं उन गरीबों/हाशिए पर पड़े लोगों/बच्चों की मदद और उनकी जिंदगी को बेहतर बनाने के लिए स्थाई मदद कैसे करें?
यह भी बात हुई कि दान देने और खुशियाँ बांटने के साथ-साथ पत्रकारिता के विद्यार्थी होने के नाते वे उनकी परेशानियां, समस्याएं और मुद्दे उठाने में मदद करें. यह भी तय हुआ कि उनके बीच नियमित तौर पर जाया जाए, उनकी तकलीफों और समस्याओं को समझने की कोशिश की जाए और संभव हो तो राशन कार्ड बनवाने में आर.टी.आई आदि के जरिये मदद की जाए. आई.आई.एम.सी के आसपास की कुछ झुग्गी बस्तियों के बारे में लैब जर्नल निकाला जाए, अखबारों में लिखा जाए, कम्युनिटी रेडियो पर चर्चा की जाए और ब्लाग/फेसबुक आदि पर उठाया जाए.
यह बात पिछले हप्ते हुई और फिर शुक्रवार को संस्थान में दीपावली की छुट्टियाँ हो गईं. हालाँकि आदर्श ने शुक्रवार को बताया कि वे लोग पैसे इक्कट्ठा कर रहे हैं और संस्थान के बाकी कोर्सेज के विद्यार्थियों का भी सहयोग मिल रहा है. लेकिन फिर तीन दिन कुछ पता नहीं चला कि आगे क्या हुआ?
आज दोपहर फेसबुक पर कुछ तस्वीरें दिखीं और यह देखकर अच्छा लगा कि हिंदी पत्रकारिता के छात्र/छात्राओं- आदर्श, आरती, कामिनी, आशा, सुमित और आनंद ने अपना वायदा निभाया. आज वे सब फुटपाथ के उन बच्चों के बीच गए. उनके साथ दीपावली मनाई. लेकिन सबसे चौंकानेवाली बात यह हुई कि वे अपने साथ गर्म कपड़े ले गए थे. उन्होंने इन बच्चों में जाड़ों के लिए गर्म कपड़े भी बांटे. यह ख्याल उन्हें बाद में आया होगा. लेकिन अच्छा लगा कि उन्हें इन गरीब बच्चों की असली तकलीफ का ध्यान आया.

शाबास मेरे दोस्तों. सरोकार की पत्रकारिता यहीं से शुरू होती है. सरोकार की पत्रकारिता सिर्फ किताबों और क्लास रूम की बहसों से नहीं बल्कि उन गरीबों और हाशिए पर पड़े लोगों के बीच जाने और उनकी तकलीफों को समझने और उससे जुड़ने से आती और आगे बढ़ती है. जानता हूँ कि यह सिर्फ शुरुआत है. लेकिन इस शुरुआत में उम्मीदों के दिए टिमटिमा उठे हैं.
आइये, इन विद्यार्थियों को सलाम करें और कामना करें कि उनके अंदर यह सरोकार जीवित रहें, वे इसे आगे बढ़ाएं और पत्रकारिता को नई धार दें.


सोमवार, नवंबर 12, 2012

किसकी दीपावली?

दीपावली बाजार का, बाजार के लिए और बाजार के द्वारा त्यौहार बनती जा रही है

उदारीकरण और भूमंडलीकरण के इस दौर में बाजार की पकड़ से बच पाना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन सा हो गया है. पर्व-त्यौहार भी इसके अपवाद नहीं हैं. हालाँकि किसी भी समाज में पर्व-त्यौहार उसकी संस्कृति, उत्सवधर्मिता और सामाजिकता की पहचान होते हैं, वे लोगों की सामूहिकता, आपसी मेलजोल और खुशी बांटने के मौके होते हैं.
लेकिन ठीक इन्हीं कारणों से वे बाजार को भी लुभाते हैं. बाजार को इसमें खुशियों की मार्केटिंग और खरीदने-बेचने का मौका दिखाई देता है. खासकर एक ऐसे दौर में जब वास्तविक खुशी दुर्लभ होती जा रही है, बाजार उपभोक्ता वस्तुओं को उत्सव और खुशियों का पर्याय बनाके बेचने के मौके की तरह इस्तेमाल करता है.
इसके लिए बाजार पारंपरिक त्यौहारों के नए अर्थ गढ़ता है, उनकी नए सिरे से पैकेजिंग करता है और उन्हें बाजार और वस्तुओं से जोड़ देता है. दीपावली उन त्यौहारों में है जिसे बाजार की सबसे पहले नजर लगी. विडम्बना देखिये कि एक ऐसा त्यौहार जो अंधकार पर प्रकाश की जीत का उत्सव है, वह आज जैसे सामुदायिक सामूहिकता, साझेदारी और संतोष पर व्यक्तिगत उपभोग, लालच और तड़क-भड़क की जीत का उत्सव बन गया है.

दीपावली आते ही बाजार जिस तरह से अति सक्रिय हो जाता है और त्यौहार को महंगे उपभोक्ता सामानों की खरीद और महंगे उपहारों के लेन-देन तक में सीमित कर देता है, उसमें त्यौहार की वास्तविक भावनाएं कहीं पीछे छूट जाती हैं और उसकी जगह गैर जरूरी उपभोग, फिजूलखर्ची और दिखावा हावी हो जाता है.

यह ठीक है कि दीपावली का एक पहलू लक्ष्मी की पूजा से जुड़ा रहा है. लेकिन इसमें वह लक्ष्मी नहीं थीं जो आज के बाजार की असीमित उपभोग की आराध्य देवी हैं बल्कि यह लक्ष्मी दरिद्रता से मुक्ति और घर में इतने धन-धान्य की इच्छा से जुडी थीं जिसमें ‘साईँ इतना दीजिए जिसमें कुटुंब समय, खुद भी भूखा ना रहूँ, साधू न भूखा जाए.’
मुझे याद है, छुटपन में हम पूर्वी उत्तर प्रदेश के एक अति पिछड़े इलाके के एक गाँव में दीपावली की रात के बाद भोर में घर के हर कमरे में सूप पीटते हर गाते जाते थे-“अइसर-पईसर दरिदर निकसे, लछमी घर वास हो.” मतलब यह कि लक्ष्मी की प्रार्थना वहीं तक थी, जहाँ तक घर से दरिद्रता को निकालने की आस थी.
लेकिन आज दीपावली का मतलब सिर्फ और सिर्फ लक्ष्मी और बाजार की उपासना तक सीमित रह गया है. सच पूछिए तो बाजार ने दीपावली का पूरी तरह से टेक-ओवर कर लिया है और इसे कारोबार का उत्सव बना दिया है. यह बाजार की, बाजार के लिए और बाजार के द्वारा त्यौहार बनटी जा रही है.

आज दीपावली के बाजार पर हजारों करोड़ रूपये का कारोबार दांव पर लगा रहता है. बड़ी देशी-विदेशी कम्पनियाँ खासकर उपभोक्ता सामान/आटोमोबाइल आदि बनानेवाली और रीयल इस्टेट कम्पनियाँ छह महीने पहले से तैयारी करने लगती हैं.

इसकी वजह यह है कि दशहरे से दीपावली के बीच के महीने भर में जितनी खरीददारी होती है, वह साल के कई महीनों की कुल खरीददारी से अधिक होती है. हैरानी की बात नहीं है कि इस दौरान अखबारों/टी.वी चैनलों पर कार से लेकर टी.वी तक भांति-भांति के विज्ञापनों और पुल-आउट की भरमार लग जाती है.

यही नहीं, मीडिया और मार्केटिंग के जरिये कम्पनियाँ ऐसा माहौल बनाती हैं जिसमें दीपावली के मौके पर उपहार लेना-देना एक अनिवार्य शगुन सा बना दिया जाता है. इस लेन-देन को संबंधों की निकटता के पर्याय की तरह देखा जाने लगा है.
आपने दीपावली पर अपने घर के अंदर और घर से बाहर अपने सगे संबंधियों-करीबियों को कितना महंगा उपहार दिया, इससे संबंधों की व्याख्या की जाने लगती है. एक तरह से दीपावली के मौके पर दिए जानेवाले उपहारों की कीमत आपसी संबंधों और उनकी निकटता के पैमाने बना दिए गए हैं. इस तरह संबंधों में भावनाओं की जगह वस्तुओं ने ले ली है. त्यौहार की सात्विक खुशी से ज्यादा महत्वपूर्ण उपहार की खुशी हो गई है.
लेकिन बात यहीं खत्म नहीं होती. दीपावली पर उपहार देने के इस बाजारी कर्मकांड को कारोबारी समुदाय ताकतवर-प्रभावशाली खासकर सत्ता में बैठे नेताओं-अफसरों को खुश करने और बदले में उनकी कृपादृष्टि हासिल करने के मौके की तरह भी इस्तेमाल करता है. कई मामलों में यह उपहार की आड़ में घूस देने या पी.आर करने का भी मौका है.

आश्चर्य नहीं कि दीपावली के मौके पर दिए जानेवाले कारपोरेट गिफ्ट का बाजार भी बहुत तेजी से बढ़ा है. उद्योगपतियों के संगठन एसोचैम के मुताबिक, वर्ष २०१० में देश के कारपोरेट समूहों ने लगभग ३२०० करोड़ रूपये के उपहार दिए. इस साल मंदी के कारण इसके घटकर २००० करोड़ रूपये रहने की उम्मीद है. इस मायने में दीपावली वास्तव में सबसे लोकप्रिय कारपोरेट त्यौहार बन चुकी है.

लेकिन दूसरी ओर, आसमान छूती महंगाई, घटती आय, दिन पर दिन बढ़ती बेरोजगारी और सामाजिक असुरक्षा से आमलोगों में दीपावली मनाने को लेकर वह उत्साह नहीं रह गया है जो उसकी सामूहिकता की पहचान रही है. आज बाजार की ओर से पेश की जा रही आदर्श दीपावली गरीबों की तो छोडिये, बहुतेरे मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए उनका दीवाला निकालने के लिए काफी है.
अलबत्ता, तीन-तेरह और तमाम तिकडमों से लेकर भ्रष्ट तौर-तरीकों से अथाह पैसा कमानेवाले नव दौलतिया वर्गों के लिए दीपावली अपनी धन-सम्पदा दिखाने का एक मौका बन गई है. अगर आप अपने आसपास गौर से देखें तो पायेंगे कि महंगे उपहारों से लेकर धूम-धड़ाके से भरी दीपावली मनानेवालों में ज्यादातर यही नव दौलतिया वर्ग है क्योंकि लक्ष्मी सबसे ज्यादा उसी पर मेहरबान हैं.
सच पूछिए तो लक्ष्मी आज उनकी कैद में हैं. यह विडम्बना है कि देश में एक ओर दरिद्रता बढ़ रही है, उस दरिद्रता के साथ अशिक्षा-बीमारी-भूखमरी और जल-जंगल-जमीन-खनिज की लूट का अँधेरा बढ़ रहा है और दूसरी ओर, एंटीला जैसे धन-दौलत के नए महल भी जगमगा रहे हैं.
अफसोस यह कि आज के भारत में दीपावली अँधेरे पर प्रकाश की जीत का नहीं बल्कि दरिद्रता के अँधेरे के विस्तार और बढ़ती गहनता के बीच शाइनिंग इंडिया की जीत का त्यौहार बनता जा रहा है.

आप खुद सोचिये कि इस दीपावली में कितने भारतीयों की खुशी शामिल है?

और इन भारतीयों को देने के लिए भारतीय राज्य के पास क्या है?


('शुक्रवार' के 15 नवम्बर के अंक में प्रकाशित टिप्पणी)                                 

शनिवार, नवंबर 10, 2012

न्यूज मीडिया का अंडरवर्ल्ड और उसके शार्प शूटर्स

खबरों की खरीद-फरोख्त का धंधा अब पूरी तरह से संस्थाबद्ध हो चुका है और ब्लैकमेल उसका  हथियार है

न्यूज मीडिया के अंदर लगातार मजबूत होते अंडरवर्ल्ड और इसके साथ बढ़ते नैतिक-आपराधिक विचलन और फिसलन के बीच जैसे यह होना ही था. कोयला आवंटन घोटाला मामले में आरोपों में घिरी जिंदल स्टील एंड पावर कंपनी के मालिक और कांग्रेसी सांसद नवीन जिंदल ने जी न्यूज समूह पर ब्लैकमेलिंग और डरा-धमकाकर पैसा वसूलने का आरोप लगाया है.
जिंदल ने सबूत के बतौर जी न्यूज समूह के दो संपादकों और बिजनेस हेड- सुधीर चौधरी और समीर अहलुवालिया का स्टिंग पेश किया है जिसमें वे दोनों जिंदल समूह के खिलाफ चल रही खबरों को रोकने के लिए १०० करोड़ रूपये का बिजनेस मांगते हुए नजर आते हैं.
लेकिन इस खुलासे के बाद से न्यूज मीडिया खासकर चैनलों में ऐसी हैरानी और घबराहट दिखाई पड़ रही है, जैसे अचानक कोई दुर्घटना हो गई हो. आनन-फानन में बचाव की कोशिशें शुरू हो गईं.

ब्राडकास्ट एडिटर्स एसोशियेशन (बी.ई.ए) ने न सिर्फ इस मामले की जांच के लिए तीन सदस्यी समिति गठित कर दी बल्कि जाँच-पड़ताल के बाद जी न्यूज के एडिटर/बिजनेस हेड और बी.ई.ए के कोषाध्यक्ष सुधीर चौधरी को संगठन से बाहर कर दिया. मजे की बात यह है कि चौधरी की बी.ई.ए की सदस्यता खत्म करने का फैसला सदस्यों के बीच गोपनीय वोट के जरिये किया गया.

खबर यह भी है कि न्यूज चैनलों के मालिकों/प्रबंधकों के संगठन- न्यूज ब्राडकास्टर्स एसोशियेशन (एन.बी.ए) की स्व-नियमन व्यवस्था- न्यूज ब्राडकास्टिंग स्टैण्डर्ड आथरिटी भी इस मामले की जांच कर रही है. लेकिन सारा जोर जी-जिंदल मामले से भडकी आग पर तात्कालिक तौर पर काबू पाने और नुकसान कम करने पर है.
इसके साथ ही दूरगामी नुकसान से बचाव के लिए इस पूरे प्रकरण को एक अपवाद, नैतिक भटकाव और एक खास न्यूज चैनल और उसके दो संपादकों के विचलन के रूप में पेश करने की कोशिश की जा रही है. गोया यह विचलन और भटकाव सिर्फ उस चैनल और उसके संपादकों तक सीमित मामला है.
लेकिन यह चैनलों के मालिक और संपादक भी जानते हैं कि यह पूरा सच नहीं है. अगर मामला सिर्फ एक चैनल और उसके दो संपादकों के नैतिक विचलन और आपराधिक व्यवहार का होता तो चैनलों में इतनी घबराहट और बेचैनी नहीं दिखाई देती. उससे निपटना बहुत आसान होता.

लेकिन मुश्किल यह है कि ख़बरों की खरीद-बिक्री के इस हम्माम में ज्यादातर चैनल और अखबार नंगे हैं. पेड न्यूज के पहले से जारी शोर-शराबे के बीच अब जी-जिंदल प्रकरण के खुलासे से न्यूज चैनलों को यह डर सताने लगा है कि कल उनका नंबर भी सकता है.

दूसरे, इस प्रकरण ने न्यूज मीडिया और खासकर न्यूज चैनलों के उस ‘नैतिक प्रभामंडल’ पर और भी कालिख पोत दी है जो पहले से ही दाग-धब्बों से चमक खो रहा है और जिसके बिना उनका धंधा नहीं चल सकता है.  

असल में, लोकतंत्र के चौथे खम्भे को लगी बीमारी कहीं ज्यादा गहरी और व्यापक है. अगर शेक्सपीयर के ‘हैमलेट’ का हवाले से कहा जाए तो शायद गलत नहीं होगा कि ‘लोकतंत्र के चौथे स्तंभ में भी कुछ सड़ सा गया है.’ इस अर्थ में जी न्यूज-जिंदल प्रकरण न सिर्फ इस सड़न और लाइलाज होती बीमारी के एक और लक्षण के रूप में सामने आया है बल्कि उसके और गंभीर होते जाने की पुष्टि करता है.
इससे पता चलता है कि न्यूज मीडिया में खबरों की खरीद-बिक्री का धंधा किस हद और स्तर तक पहुँच चुका है. जी न्यूज-जिंदल प्रकरण में नया यह है कि कारपोरेट मीडिया में खबरों की खरीद-बिक्री के धंधे में न सिर्फ दाँव बहुत ऊँचे होते जा रहे हैं बल्कि उसे एक सांस्थानिक रूप भी दिया जा रहा है और उसमें संपादक और विज्ञापन/सेल्स मैनेजर/बिजनेस हेड के बीच कोई फर्क नहीं रह गया है.
लेकिन ऐसा क्यों हो रहा है? साफ़ है कि न्यूज मीडिया में आ रही बड़ी कारपोरेट पूंजी को न सिर्फ अधिक से अधिक मुनाफा चाहिए बल्कि वह न्यूज मीडिया के प्रभाव का इस्तेमाल अपने दूसरे कारपोरेट/निजी हितों को आगे बढ़ाने के लिए भी करना चाहती है.

यही नहीं, न्यूज मीडिया खासकर न्यूज चैनलों में हाल के वर्षों में कारपोरेट के अलावा और भी कई तरह की पूंजी आई है जिनमें नेताओं-अफसरों-व्यापारियों/कारोबारियों/ठेकेदारों/बिल्डरों के अलावा चिट फंड कम्पनियाँ की ओर से किया गया निवेश शामिल है.

कहने की जरूरत नहीं है कि इसमें ज्यादातर कालाधन है और जिसका मकसद चैनलों के आवरण में अपने दूसरे कानूनी-गैर कानूनी धंधों के लिए राजनीतिक और नौकरशाही का संरक्षण और प्रोत्साहन हासिल करना है.

सच पूछिए तो इन दोनों यानी कारपोरेट और आपराधिक पूंजी को मिलाकर न्यूज मीडिया खासकर न्यूज चैनलों का अंडरवर्ल्ड बनता है जिसमें मालिक-संपादक खबरों के सौदागर बन गए हैं. यहाँ खबर समेत हर पत्रकारीय मूल्य और नैतिकता बिकाऊ है और जिसके पास भी पैसा है, वह उसे खरीद/दबा/बदल सकता है. चाहे वह भ्रष्टाचार के मामलों फंसी कोई कंपनी/नेता/अफसर हो या चुनाव लड़ रहा कोई माफिया डान.
हालत इतने बदतर हो चुके हैं कि ज्यादातर चैनलों और अखबारों में जहाँ से भी और जैसे भी पैसा आता हो और उसके लिए चाहे खबर बेचनी हो या पत्रकारीय मूल्यों-नैतिकता को ताक पर रखना हो या कोई नियम-कानून तोड़ना पड़े, इसकी कोई परवाह या शर्म नहीं रह गई है.
इस मायने में जी-जिंदल प्रकरण पेड न्यूज की परिघटना का ही स्वाभाविक विस्तार है और इसमें चौंकानेवाली कोई बात नहीं है और न ही यह कोई अचानक हुई दुर्घटना है.

जैसाकि वरिष्ठ पत्रकार पी. साईनाथ कहते रहे हैं कि बड़ी कारपोरेट पूंजी से संचालित न्यूज मीडिया ‘संरचनागत तौर पर झूठ बोलने के लिए बाध्य’ है. सच पूछिए तो न्यूज मीडिया के अंडरवर्ल्ड की मुनाफे की हवस और कारपोरेट और दूसरे निजी हितों को आगे बढ़ाने के दबाव ने संपादकों और पत्रकारों को भी हप्ता वसूलने वाले हिटमैन और शार्प शूटर्स में बदलना शुरू कर दिया है.

क्या नवीन जिंदल के ‘उल्टा स्टिंग’ आपरेशन में जी न्यूज के संपादक भी ऐसे ही हिटमैन और शार्प शूटर की तरह नजर नहीं आते हैं? याद रखिये, वे न्यूज मीडिया के अंडरवर्ल्ड के हिटमैन और शार्प शूटर भर हैं, असली डान नहीं हैं.
लेकिन अंडरवर्ल्ड का खेल देखिये, डान के बारे में कोई बात नहीं हो रही है. क्या इसमें आपको ‘षड्यंत्रपूर्ण चुप्पी’ नहीं सुनाई दे रही है.
(''तहलका" के 15 नवम्बर के अंक में प्रकाशित टिप्पणी : )